महाशिवरात्रि के त्योहार की तैयारी अभी से करें। महाशिवरात्रि की अग्रिम मंगलमय शुभ कामनाएँ ---
आध्यात्मिक साधना और मंत्र सिद्धि के लिए चार रात्रियों का बड़ा महत्त्व है --
(१) कालरात्रि (दीपावली), (२) महारात्रि (महाशिवरात्रि), (३) मोहरात्रि (जन्माष्टमी). और (४) दारुण रात्रि (होली)। इन रात्रियों को किया गया ध्यान, जप-तप, भजन -- कई गुणा अधिक फलदायी होता है।
भौतिक देह की चेतना से ऊपर उठने की साधना तो नित्य ही करनी चाहिये। आत्म-विस्मृति सब दुःखों का कारण है। इन रात्रियों को अपने आत्म-स्वरुप यानि सर्वव्यापी परमशिव का ध्यान यथासंभव अधिकाधिक करें। इन रात्रियों में सुषुम्ना नाड़ी में प्राण-प्रवाह अति प्रबल रहता है अतः निष्ठा और भक्ति से की गई साधना निश्चित रूप से सफल होती है।
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समय इधर उधर नष्ट करने की बजाय आत्मज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म और राष्ट्र के अभ्युदय के लिए भी साधना करें। धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए एक विराट आध्यात्मिक ब्रह्मशक्ति के जागरण की हमें आवश्यकता है, जो हमारी साधना के बल से ही जागृत होगी। भगवान परमशिव को ही कर्ता बनाकर समर्पण भाव से हम सब उनकी आराधना के निमित्त बनेंगे, और गीता आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय भी करेंगे। गीता में भगवान कहते हैं --
"शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ||६:२५||"
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये क्रमश: चलकर बुद्धि द्वारा विश्वास-पूर्वक अभ्यास करता हुआ मन को आत्मा में स्थित करके, परमात्मा के चिन्तन के अलावा अन्य किसी वस्तु का चिन्तन न करे।
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ||६:२६||"
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये स्वभाव से स्थिर न रहने वाला और सदा चंचल रहने वाला यह मन जहाँ-जहाँ भी प्रकृति में जाये, वहाँ-वहाँ से खींचकर अपनी आत्मा में ही स्थिर करे।
"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः||६:२९||"
भावार्थ : योग में स्थित मनुष्य सभी प्राणीयों मे एक ही आत्मा का प्रसार देखता है और सभी प्राणीयों को उस एक ही परमात्मा में स्थित देखता है, ऎसा योगी सभी को एक समान भाव से देखने वाला होता है।
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति||६:३०||"
भावार्थ : जो मनुष्य सभी प्राणीयों में मुझ परमात्मा को ही देखता है और सभी प्राणीयों को मुझ परमात्मा में ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता है।
"सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः|
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ||६:३१||"
भावार्थ : योग में स्थित जो मनुष्य सभी प्राणीयों के हृदय में मुझको स्थित देखता है और भक्ति-भाव में स्थित होकर मेरा ही स्मरण करता है, वह योगी सभी प्रकार से सदैव मुझमें ही स्थित रहता है।
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कूटस्थ सूर्यमण्डल में व उससे भी परे परमशिव का गहनतम ध्यान करें। मैं आप सब के साथ एक हूँ। महाशिवरात्रि की अग्रिम हार्दिक शुभ कामनाएँ !!
"ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिव च शिवतराय च।" "ॐ नमः शिवाय॥"
कृपा शंकर
११ फरवरी २०२६
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