Tuesday, 26 August 2025

रक्षा-बंधन, रक्षा-सूत्र, भगवा-ध्वज और श्रावण-पूर्णिमा .....

 रक्षा-बंधन, रक्षा-सूत्र, भगवा-ध्वज और श्रावण-पूर्णिमा .....

----------------------------------------------------------
(आज प्रातः रा.स्व.से.संघ झुंझुनूं की प्रौढ़ शाखा में बौद्धिक देने का मुझे आदेश हुआ| उस आदेश को मानते हुए निम्न बौद्धिक मेरे द्वारा दिया गया)
>
परम पवित्र भगवा ध्वज, माननीय विभाग संघचालक जी, अधिकारीगण व उपस्थित स्वयंसेवको,
.
भारत त्योहारों का देश है जहाँ पूरे वर्ष ही अनेक त्यौहार मनाये जाते हैं| संघ में हम सिर्फ छः उत्सव मनाते हैं ... वर्षप्रतिपदा, गुरुपूर्णिमा, रक्षाबंधन, शिवाजी साम्राज्य दिनोत्सव, विजयादशमी और मकर संक्रांति| आज हम रक्षा बंधन का पर्व मना रहे हैं| आज पवित्र श्रावण माह की पूर्णिमा होने के कारण रक्षाबंधन का पर्व है|
.
रक्षा-बंधन वह बंधन है जो रक्षा के लिए बांधा जाता है| भगवा रंग अग्नि का रंग है जो पवित्रता का प्रतीक है| भगवा ध्वज भारत के धर्म और संस्कृति का प्रतीक है| हम परम पवित्र भगवा ध्वज को तिलक लगा कर और रक्षा-सूत्र बांधकर प्रणाम करते हैं तो यह हमारे धर्म और संस्कृति का सम्मान है| यह हमारा संकल्प है कि हम हमारे धर्म, संस्कृति और मान-सम्मान की रक्षा करेंगे|
.
हम भारत को एक परम वैभवयुक्त, सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो वर्गभेद मिटाकर समानता और समरसता का भाव जागृत करना होगा| यह तभी संभव होगा जब हम समाज के दुर्बल, और उपेक्षित लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाकर उनमें राष्ट्र-रक्षा का भाव जागृत करेंगे| धर्म उन्हीं की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करते हैं| धर्मरक्षा हेतु हमें समाज के उपेक्षित और दुर्बल वर्ग को गले लगाना होगा| वर्तमान में देश की आतंरिक व बाह्य सुरक्षा को बड़ी चुनौतियां मिल रही हैं| इन चुनौतियों के मध्य हमारा क्या दायित्व हो सकता है, इसका निर्णय हम अपने विवेक से करें|
.
श्रावण-पूर्णिमा का दिन ब्राह्मण वर्ग के लिए आत्मशुद्धि का पर्व है| वैदिक परम्परानुसार यह वेदपाठी ब्राह्मणों के लिए सबसे बड़ा त्यौहार है जो इसे श्रावणी उपाकर्म के रूप में मनाते हैं| नदियों व तालाबों के किनारे ब्राह्मण एकत्र होते हैं और आत्मशुद्धि के लिए अभिषेक व हवन करते हैं| इस में विधि-विधान से बनाया हुआ पंचगव्य, भस्म, चन्दन, अपामार्ग, दूर्वा, कुशा और मन्त्रों का प्रयोग किया जाता है| नया यज्ञोपवीत भी धारण करते हैं| गुरुकुलों में वेदपाठ का आरम्भ भी आज के दिन से ही होता है|
.
एक बार कालखंड में वेदों का ज्ञान लुप्त हो गया था, स्वयं ब्रह्मा जी के पास भी वेदों का ज्ञान नहीं रहा| तब भगवान विष्णु ने हयग्रीव का अवतार लेकर फिर से वेदों का ज्ञान ब्रह्माजी को दिया| हयग्रीव अवतार में उनकी देह मनुष्य की थी पर सिर घोड़े का था| उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी| भगवान हयग्रीव बुद्धि के देवता है| तब से श्रावणी उपाकर्म को आत्मशुद्धि के लिए मनाते हैं| हयग्रीव नाम का एक राक्षस भी था, उसका वध भी भगवान विष्णु ने हयग्रीवावतार में किया|
.
देवासुर संग्राम में देवताओं की असुरों द्वारा सदा पराजय ही पराजय होती थी| एक बार इन्द्राणी ने इन्द्र के हाथ पर विजय-सूत्र बांधा और विजय का संकल्प कराकर रणभूमि में भेजा| उस दिन युद्ध में इंद्र विजयी रहे|
.
राजा बली का सारा साम्राज्य भगवान विष्णु ने वामन अवतार के रूप में दान में प्राप्त कर लिया था और सिर्फ पाताल लोक ही उसको बापस दिया| अपनी भक्ति से राजा बलि ने विष्णु को वश में कर के उन्हें अपने पाताल लोक के महल में ही रहने को बाध्य कर दिया| लक्ष्मी जी ने बड़ी चतुरता से राजा बली को रक्षासूत्र बांधकर एक वचन लिया और विष्णु जी को वहाँ से छुड़ा लाईं| तब से रक्षासूत्र बांधते समय ....
"येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल" .... मन्त्र का पाठ करते हैं|
.
महाभारत में शिशुपाल वध के समय भगवान श्रीकृष्ण की अंगुली में चोट लग गयी थी और रक्त बहने लगा| तब द्रोपदी वहीं खड़ी थी| उसने अपनी साड़ी का एक पल्लू फाड़कर भगवान श्रीकृष्ण की अंगुली में एक पट्टी बाँध दी| चीर-हरण के समय भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपदी की लाज की रक्षा की|
.
मध्यकाल में विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा हिन्दू नारियों पर अत्यधिक अमानवीय क्रूरतम अत्याचार होने लगे थे| तब से महिलाऐं अपने भाइयों को राखी बाँधकर अपनी रक्षा का वचन लेने लगीं, और रक्षासूत्र बांधकर रक्षाबंधन मनाने की यह परम्परा चल पड़ी|
.
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में पेशवा नाना साहब और और रानी लक्ष्मीबाई के मध्य राखी का ही बंधन था| रानी लक्ष्मीबाई ने पेशवा को रक्षासूत्र भिजवा कर यह वचन लिया था कि वे ब्रह्मवर्त को अंग्रेजों से स्वतंत्र करायेंगे|
.
बंग विभाजन के विरोध में रविन्द्रनाथ टैगोर की प्रेरणा से बंगाल के अधिकाँश लोगों ने एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर एकजूट रहने का सन्देश दिया|
.
श्रावण पूर्णिमा के दिन भगवान शिव धर्मरूपी बैल पर बैठकर अपनी सृष्टि में भ्रमण करने आते हैं| हमारे घर पर भी उनकी कृपादृष्टि पड़े, और वे कहीं नाराज न हो जाएँ, इस उद्देश्य से राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में महिलाऐं अपने घर के दरवाजों पर रक्षाबंधन के पर्व से एक दिन पहिले "सूण" मांडती हैं|
.
अंत में मैं इस प्रार्थना के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ कि .... "भारत माता अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखण्डता के सिंहासन पर बिराजमान हों, सम्पूर्ण भारत में असत्य और अन्धकार की शक्तियों का नाश हो, और सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा हो| वन्दे मातरं !! भारत माता की जय !!!
....................................................................................
कृपा शंकर
२६ अगस्त २०१८

भगवान की भक्ति में आनंद क्यों और कैसे प्राप्त होता है? ---

 भगवान की भक्ति में आनंद क्यों और कैसे प्राप्त होता है? ---

.
नारद-भक्ति-सूत्रों में भगवान से परमप्रेम को भक्ति कहा गया है, जो अमृतस्वरूपा भी है। शांडिल्य-सूत्रों में ईश्वर के प्रति परम अनुराग को भक्ति कहा गया है।
>>> भक्ति -- हमारे हृदय के गहनतम प्रेम की स्वभाविक अनुभूति और अभिव्यक्ति है। इस प्रेम को जब हम सम्पूर्ण सृष्टि की अनंतता में विस्तृत कर देते हैं, तब वही प्रेम -- आनंद के रूप में लौट कर बापस हमारे पास आ जाता है। <<<
.
सारा अस्तित्व ही भगवान विष्णु है। भगवान विष्णु स्वयं ही यह विश्व बन गए हैं। तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। हम ध्यान शिव का करें या विष्णु का, या विष्णु के अवतारों का, फल एक ही है। मैं तो वही बता सकता हूँ जिसका मैं स्वयं अनुसरण करता हूँ। बाकी सब मैंने भुला दिया है।
.
शिवभाव में स्थित होने के लिए सर्वप्रथम गुरु महाराज को मानसिक रूप से प्रणाम कर के, परमशिव के सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप का ध्यान भ्रूमध्य में करें। हमारी बंद आँखों के अंधकार के पीछे एक ज्योति है , उसका विस्तार सारे ब्रह्मांड में, सारी सृष्टि में कर दें। वह ज्योति ही हम स्वयं हैं, यह नश्वर देह नहीं। इस नश्वर देह को भुला दें और स्वयं ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप में स्थित होकर सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का अजपा-जप द्वारा ध्यान करें। अजपा-जप को ही हंसःयोग, और हंसवतिऋक भी कहते हैं।
.
सर्वव्यापी शिवमय होकर भ्रूमध्य में पूर्ण भक्ति से ध्यान करते करते बंद आँखों के अंधकार के पीछे एक न एक दिन प्रणव से लिपटी हुई ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। वह ब्रह्मज्योति फिर कभी नष्ट नहीं होती। यही वह कूटस्थ है जिसका उल्लेख भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अनेक बार किया है। योगी साधक इसी सर्वव्यापी कूटस्थ ज्योति के सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करते हैं, और नादरूप में सुनाई दे रही प्रणव की ध्वनि का श्रवण करते हैं। तंत्र साधक इस ज्योति को ब्रह्मयोनि कहते हैं। इस ज्योति पर ध्यान करते करते यह ज्योति एक पंचमुखी श्वेत नक्षत्र में परिवर्तित हो जाती है। यह पंचमुखी शिव का प्रतीक है। इस नक्षत्र का भेदन करने पर योगी की चेतना परमात्मा के साथ एक हो जाती है। आज्ञाचक्र और सहस्त्रारचक्र के मध्य के भाग को परासुषुम्ना कहते हैं। जीवात्मा का निवास वहीं होता है। वहीं सारी सुप्त सिद्धियाँ और विभूतियाँ हैं। अपनी चेतना को हर समय वहीं रखने का अभ्यास करें।
.
अंत में सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूँ >>>
***** परमात्मा की दृष्टि में सबसे अधिक महत्व हमारी भक्ति और समर्पण का है, अन्य सब गौण हैं। भक्ति और समर्पण में पूर्णता होगी तो अन्य सारी कमियों की ओर भगवान देखते भी नहीं हैं। अतः कौन क्या कहता है, इसका महत्व नहीं है। महत्व है परमात्मा की उपस्थिती और हमारे प्रेम व समर्पण का। तभी भगवान की विशेष परम कृपा होती है।
गीता में भगवान कहते हैं --
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् -- "मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥"
इस श्लोक पर आचार्य शंकर के भाष्य का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है -- "मुझ में चित्त वाला हो कर तूँ समस्त कठिनाइयों को अर्थात् जन्ममरणरूप संसार के समस्त कारणों को मेरे अनुग्रह से तर जायगा -- सबसे पार हो जायगा। परंतु यदि तूँ मेरे कहे हुए वचनों को अहंकार से 'मैं पण्डित हूँ' ऐसा समझकर नहीं सुनेगा/ग्रहण नहीं करेगा तो नष्ट हो जायगा -- नाश को प्राप्त हो जायगा॥" *****
.
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ अगस्त २०२३