हमारी सबसे बड़ी समस्या है --- निरंतर भगवान की चेतना में कैसे रहें? भगवान से हमारा अनुराग/परमप्रेम कैसे हर समय बढ़ता रहे?
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विरक्त ही होना था तो ६० वर्ष पूर्व १५-१६ वर्ष की आयु में ही होना चाहिए था। उस समय विवेक और साहस नहीं था। लगता है पिछले जन्मों में अच्छे कर्म नहीं किये थे, इसलिए इस जन्म में वैराग्य लाभ नहीं हुआ, और वीतराग नहीं बन पाए; स्थितप्रज्ञता तो बहुत दूर की बात है। अवशिष्ट जीवन पूर्णतः परमात्मा को समर्पित है। जीवन का सब अच्छा-बुरा, सारे गुण-दोष, सब भगवान को समर्पित हैं। जो परमात्मा को उपलब्ध होना चाहते हैं, उन्हें मेरी सलाह यही है कि जीवन में जब भी परमात्मा की एक छोटी सी भी झलक मिले तो उसी समय विरक्त हो जाना चाहिए। लेकिन कुछ कर्म हैं जिनका त्याग नहीं किया जा सकता।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥१८:५॥"
"एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्िचतं मतमुत्तमम्॥१८:६॥"
"न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥१८:११॥"
अर्थात् - यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं है, किन्तु वह नि:सन्देह कर्तव्य है; यज्ञ, दान और तप - ये मनीषियों (साधकों) को पवित्र करने वाले हैं॥
हे पार्थ ! इन कर्मों को भी, फल और आसक्ति को त्यागकर करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है॥
क्योंकि देहधारी पुरुष के द्वारा अशेष कर्मों का त्याग संभव नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही पुरुष त्यागी कहा जाता है॥
भगवान के उपरोक्त वचन बड़े आनंद और संतोष देते है। कोई क्षोभ नहीं है। हम तो निमित्त मात्र हैं। कर्ता तो वे ही हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ मार्च २०२३