"सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म" से प्रार्थना ---
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हे परमप्रेममय सर्वव्यापी ब्रह्म, आप एकमात्र सत्य, ज्ञान और अनंत हो। मैं आप के साथ एक हूँ। आपकी आरोग्यकारी उपस्थिति सभी प्राणियों के अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) में निरंतर व्यक्त हो रही है। आप सच्चिदानंद (सत् चित्त आनंद) हैं। सारी सृष्टि आपका एक संकल्प है। आप स्वयं ही यह विश्व हो। आप प्रेम और आनंद के रूप में सर्वत्र व्याप्त हो।
ॐ ॐ ॐ !!
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वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् - आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसार के परम आश्रय हैं। आप ही सब को जानने वाले, जानने योग्य और परमधाम हैं। हे अनन्तरूप ! आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।
आप वायु (अनाहतचक्र), यम (मूलाधारचक्र), अग्नि (मणिपुरचक्र), वरुण (स्वाधिष्ठानचक्र) , चन्द्रमा (विशुद्धिचक्र), प्रजापति (ब्रह्मा) (आज्ञाचक्र), और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी कारण) (सहस्त्रारचक्र) हैं; आपके लिए सहस्र बार नमस्कार, नमस्कार है, पुन: आपको बारम्बार नमस्कार, नमस्कार है॥
हे अनन्तसार्मथ्य वाले भगवन्! आपके लिए अग्रत: और पृष्ठत: नमस्कार है, हे सर्वात्मन्! आपको सब ओर से नमस्कार है। आप अमित विक्रमशाली हैं और आप सबको व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप सर्वरूप हैं॥
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कहीं कोई पृथकता का बोध न रहे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२१ मार्च २०२३