Wednesday, 20 August 2025

हर हिन्दू परिवार प्रमुख का दायित्व ---

 हर हिन्दू परिवार प्रमुख का दायित्व

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हरेक हिन्दू सनातन धर्मावलम्बी परिवार प्रमुख का यह दायित्व है कि वह अपने परिवार में एक भयमुक्त प्रेममय वातावरण का निर्माण करे | अपने बालक बालिकाओं में इतना साहस विकसित करें कि वे अपनी कोई भी समस्या या कोई भी उलझन बिना किसी भय और झिझक के अपने माता/पिता व अन्य सम्बन्धियों को बता सकें | बच्चों की समस्याओं को ध्यान से सुनें, उन्हें डांटें नहीं, उनके प्रश्नों का उसी समय तुरंत उत्तर दें | इससे generation gap की समस्या नहीं होगी | बच्चे भी माँ-बाप व बड़े-बूढों का सम्मान करेंगे | हम अपने बालकों की उपेक्षा करते हैं, उन्हें डराते-धमकाते हैं, इसीलिए बच्चे भी बड़े होकर माँ-बाप का सम्मान नहीं करते |
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परिवार के सभी सदस्य दिन में कम से कम एक बार साथ साथ बैठकर पूजा-पाठ/ ध्यान आदि करें, और कम से कम दिन में एक बार साथ साथ बैठकर प्रेम से भोजन करें | इस से परिवार में एकता बनी रहेगी |
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बच्चों में परमात्मा के प्रति प्रेम विकसित करें, उन्हें प्रचूर मात्रा में सद बाल साहित्य उपलब्ध करवाएँ और उनकी संगती पर निगाह रखें | माँ-बाप स्वयं अपना सर्वश्रेष्ठ सदाचारी आचरण का आदर्श अपने बच्चों के समक्ष रखें |
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इस से पीढ़ियों में अंतर (generation gap) की समस्या नहीं रहेगी और बच्चे बड़े होकर हमारे से दूर नहीं भागेंगे | लड़कियाँ भी घर-परिवार से भागकर लव ज़िहाद का शिकार नहीं होंगी |
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
२० अगस्त २०१७

पीढ़ियों में अंतर (Generation Gap) कैसे दूर हो? .....

 पीढ़ियों में अंतर (Generation Gap) कैसे दूर हो? .....

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पीढ़ियों में अंतर (Generation Gap) पूरे विश्व में , विशेषकर भारत में एक बहुत बड़ी समस्या है जिसका कारण घर-परिवार के बड़े-बूढ़ों की नासमझी और अहंकार है| इसको दूर करने के लिए विशेष प्रशिक्षण और विवेक की आवश्यकता है| जिस परिवार में यह समस्या होती है उस परिवार के बच्चे बड़े होकर अपने माँ-बाप व बुजुर्गों का कोई सम्मान नहीं करते|
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हर परिवार प्रमुख का यह दायित्व है कि वह अपने परिवार में एक भयमुक्त प्रेममय वातावरण का निर्माण करे| अपने बालक बालिकाओं में इतना साहस विकसित करें कि वे अपनी कोई भी समस्या या कोई भी उलझन बिना किसी भय और झिझक के अपने माता/पिता व अन्य सम्बन्धियों को बता सकें| बच्चों की समस्याओं को ध्यान से सुनें, उनके साथ मारपीट नहीं करें, उन्हें डांटें नहीं, और उनके प्रश्नों का तुरंत उसी समय उत्तर दें|
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इससे generation gap की समस्या नहीं होगी| बच्चे भी माँ-बाप व बड़े-बूढों का सम्मान करेंगे| हम अपने बालकों की उपेक्षा करते हैं, उन्हें डराते-धमकाते हैं, इसीलिए बच्चे भी बड़े होकर माँ-बाप का सम्मान नहीं करते| परिवार के सभी सदस्य दिन में कम से कम एक बार साथ साथ बैठकर पूजा-पाठ/ ध्यान आदि करें, और कम से कम दिन में एक बार साथ साथ बैठकर प्रेम से भोजन करें| इस से परिवार में एकता बनी रहेगी |
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बच्चों में परमात्मा के प्रति प्रेम विकसित करें, उन्हें प्रचूर मात्रा में सद बाल साहित्य उपलब्ध करवाएँ और उनकी संगती पर निगाह रखें| माँ-बाप स्वयं अपना सर्वश्रेष्ठ सदाचारी आचरण का आदर्श अपने बच्चों के समक्ष रखें| इस से पीढ़ियों में अंतर (generation gap) की समस्या नहीं रहेगी और बच्चे बड़े होकर हमारे से दूर नहीं भागेंगे | लड़कियाँ भी घर-परिवार से भागकर लव ज़िहाद का शिकार नहीं होंगी|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२० अगस्त २०१७

आज (१९ अगस्त २०२२ की मध्य रात्रि में) जितनी भक्ति तो मैंने मेरे इस पूरे जीवन में कभी भी नहीं देखी।

आज (१९ अगस्त २०२२ की मध्य रात्रि में) जितनी भक्ति तो मैंने मेरे इस पूरे जीवन में कभी भी नहीं देखी। यह मैं पूरी गंभीरता से लिख रहा हूँ। मैं एक ७५ वर्षीय वरिष्ठ नागरिक हूँ, और पूरे विश्व में व भारत में खूब घूमा हुआ हूँ।

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१८ अगस्त से ही पूरे विश्व से भक्ति के स्पंदन आ रहे थे, जो १९ अगस्त को तो बहुत अधिक बढ़ गए। मैंने तो जन्माष्टमी का व्रत कल १८ अगस्त को किया था। लेकिन मंदिरों में जन्माष्टमी १९ अगस्त को थी। १९ अगस्त की मध्यरात्री के समय सभी मंदिरों में अभूतपूर्व भीड़ थी। जिन लोगों से मुझे कभी भक्ति की उम्मीद भी नहीं थी, वे भी भाव-विभोर होकर कृष्ण-भक्ति में तल्लीन थे। यह एक चमत्कार था। इस बार तो अभूतपूर्व भक्ति देखी। यह एक सकारात्मक संकेत है जो हिंदुओं में पुनर्जागरण होता हुआ दिखा रहा है। यह भगवान श्रीकृष्ण की बड़ी कृपा है।
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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२० अगस्त २०२२

कल बहुत अधिक आनंद का पर्व जन्माष्टमी थी। आज दो लोक उत्सव हैं ---

 कल बहुत अधिक आनंद का पर्व जन्माष्टमी थी। आज दो लोक उत्सव हैं ---

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(१) आज महान लोकपर्व गोगा-नवमी है। सभी श्रद्धालुओं का अभिनंदन, बधाई और मंगलमय शुभ कामनाएँ। लोकदेवता जाहरवीर गोगा जी महाराज की जय॥
आज से गोगा जी का मेला सात दिन तक भरेगा। जाहरवीर गोगाजी महाराज राजस्थान के प्रमुख पाँच लोक देवताओं में से एक हैं। गुरु गोरखनाथ जी के आशीर्वाद से ये नागों के देवता हैं। राजस्थान के हर किसान के खेत में गोगा जी का एक छोटा सा मंडप अवश्य मिलेगा। जिन पर इनका आशीर्वाद हो, उन्हें सांप नहीं काट सकते। इनका पूरा नाम जाहरवीर राजा गोगाराव चौहान था, जिनका राज्य सतलज नदी से हरियाणा के हांसी तक था। इनकी राजधानी राजस्थान के चुरू जिले के ददरेवा में थी। राजस्थान की प्रायः सभी जनजातियाँ और किसान गोगा जी पर विशेष आस्था रखते हैं। गोगा जी नाग-वंश के क्षत्रिय राजा थे और गुरु गोरखनाथ जी के आशीर्वाद से नागों के देवता के रूप में पूजे जाते हैं। वे साँपों से रक्षा भी करते हैं, अतः उनमें लोगों की बहुत आस्था है। राजस्थान के सभी लोक देवता महान योद्धा थे जिन्होंने धर्म-रक्षार्थ बड़े दुर्धर्ष युद्ध किए। वे अमर हैं।
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(२) आज राजस्थान के झुंझुनू जिले में अरावली की पहाड़ियों में स्थित लोहार्गल तीर्थ से मालकेतु पर्वत की २४ कोसीय परिक्रमा आरंभ होगी। यह आस्था का बहुत बड़ा पर्व है, जिसमें लाखों लोग भाग लेते हैं। मालकेतु पर्वत की आराधना भगवान विष्णु के रूप में होती है। इस पर्वत को लोक आस्था से "मालकेत बाबा" कहते हैं। यह माउंट आबू के गुरु-शिखर के बाद अरावली पर्वतमाला का दूसरा सबसे ऊंचा शिखर है। इस परिक्रमा-पथ पर जल-कुंड सहित सात झरने आते हैं, जिनमें श्रद्धालु स्नान करते हैं।
वैष्णव खाकी अखाड़े के महंत जी की अगुवाई में यह यात्रा लोहार्गल के सूर्यकुंड स्थित भगवान सूर्यनारायण के मंदिर में पूजा-अर्चना व दर्शन के पश्चात साधू-संतों के नेतृत्व में आरम्भ होती है, जो भाद्रपद अमावस्या तक चलती है। आगे-आगे ठाकुर जी को पालकी में लेकर साधू-संत चलते हैं, पीछे-पीछे लाखों श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए चलते हैं। चिराणा, किरोड़ी घाटी, कोट गाँव, शाकम्भरी, सकराय, नागकुंड, टपकेश्वर, शोभावती, नीम की घाटी, खोरी कुंड व रघुनाथगढ़ होते हुए यह यात्रा अमावस्या के दिन बापस लोहार्गल पहुँचती है। सूर्यकुंड में अमावस्या के स्नान के पश्चात श्रद्धालू अपने अपने घर लौटना आरंभ कर देते हैं। पूरे मार्ग में स्वयंसेवी संस्थाओं और पंचायतों द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा की व्यवस्था की जाती है।
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आने वाला अगला लोकोत्सव आज से छठे दिन भाद्रपद अमावस्या पर झुंझुनू के विश्व प्रसिद्ध श्रीराणी सती जी मंदिर का वार्षिकोत्सव है।।
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ॐ तत्सत् ॥
कृपा शंकर
२० अगस्त २०२२

(प्रश्न) : मैं कौन हूँ? ---

 (प्रश्न) : मैं कौन हूँ? ---

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(उत्तर) : भारत का आध्यात्म और दर्शन इस प्रश्न के चारों ओर घूमता है कि मैं कौन हूँ। हम यह नश्वर शरीर तो नहीं हो सकते। यह शरीर इस लोकयात्रा के लिए मिला हुआ एक दोपहिया वाहन मात्र है। संसार में हमारी पहिचान इस वाहन से ही है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि हम एक शाश्वत आत्मा हैं, और जब यह शरीर रूपी वाहन जर्जर हो जाता है तब जीवात्मा इसे बदल लेती है। अंत समय की मति के अनुसार हमें दूसरी देह तुरंत मिल जाती है।
शास्त्र वचन सत्य हैं। लेकिन मैं परमात्मा के हृदय का परमप्रेम, और उनके साथ एक हूँ। मैं उनसे पृथक नहीं हो सकता। गीता में भगवान कहते हैं --
"अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥१०:८॥"
"मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥१०:९॥"
"तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१०:१०॥"
"तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥१०:११॥"
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परब्रह्म वासुदेव जगत की उत्पत्ति का कारण हैं। उन्हीं का चिंतन करना चाहिए। हमारा चित्त और प्राण उन्हीं में रत रहे, और उन से ही पूर्ण प्रेम हो। फिर उनका ज्योतिर्मय रूप हमारे समक्ष प्रकट होगा।
हमारी साधना मौन ही हो। किसी तरह के शोरगुल और दिखावे की आवश्यकता नहीं है। गीता के इसी दसवें अध्याय के ३८ वें श्लोक में भगवान कहते हैं --
"मौनं चैवास्मि गुह्यानां" अर्थात् गुप्त रखने योग्य भावों में मौन मैं हूँ।
जिस अनुपात में भगवान से प्रेम होता है, उसी अनुपात में उनकी कृपा होती है। उनको अपने हृदय का पूर्ण प्रेम देंगे तो पूर्ण प्रेम ही प्राप्त होगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० अगस्त २०२३

नकारात्मक शक्तियों पर विजय कैसे पाएँ? ---

 नकारात्मक शक्तियों पर विजय कैसे पाएँ? ---

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जिस भौतिक विश्व में हम रहते हैं, उससे भी बहुत अधिक बड़ा एक सूक्ष्म जगत हमारे चारों ओर है, जिसमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह की सत्ताएँ हैं। हर कोई उसे नहीं समझ सकता। उस विश्व को मैं अनुभूत कर रहा हूँ, इसीलिए गुरूकृपा से ये पंक्तियाँ लिख पा रहा हूँ।
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जितना हम अपनी दिव्यता की ओर बढ़ते हैं, सूक्ष्म जगत की नकारात्मक आसुरी शक्तियाँ उतनी ही प्रबलता से हम पर अधिकार करने का प्रयास करती हैं। उन आसुरी जगत की शक्तियों के प्रभाव से हम जीवन में कई बार न चाहते हुए भी अनेक क्षुद्रताओं से बंधे हुए एक पशु की तरह आचरण करने लगते हैं, और चाह कर भी पतन से बच नहीं पाते। ऐसी परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिए?
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आग लगने पर कुआँ नहीं खोदा जा सकता, कुएँ को तो पहिले से ही खोद कर रखना पड़ता है। अपने समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग ईश्वर-प्रदत्त विवेक के प्रकाश में करें। लोभ, कामुकता, अहंकार, क्रोध, प्रमाद व दीर्घसूत्रता जैसी वासनायें हमें नीचे गड्ढों में गिराती हैं, जिन से बचने के किए हमें अपनी चेतना, विचारों, व चिंतन के स्तर को अधिक से अधिक ऊँचाई पर रखना चाहिए।
सहस्त्रारचक्र में गुरू-चरणों का ध्यान करो। सहस्त्रारचक्र में दिखाई दे रही ज्योति ही गुरूमहाराज के चरण-कमल हैं। वहाँ होने वाली स्थिति ही श्रीगुरू-चरणों में आश्रय है।
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यदि चेतना ब्रह्मरंध्र को भेद कर अनंतता में चली जाती है तो विराट अनंतता का ध्यान करो। वहाँ दिखाई दे रहे चक्रों का भी ध्यान करो। अनंताकाश से भी परे पंचमुखी महादेव के दर्शन होते हैं तो उन में स्वयं को समर्पित कर दो। फिर उन्हीं का ध्यान करो। चेतना को बिलकुल भी नीचे मत लाओ। डरो मत। जब तक प्रारब्ध में जीवन लिखा है, तब तक मरोगे नहीं।
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वासनायें -- चूहों व कौवों की तरह हैं, जिन पर अपना समय नष्ट न करें। स्वयं भाव-जगत की ऊँचाइयों पर परमशिव की चेतना में रहें, ये क्षुद्रतायें अपने आप ही नष्ट हो जायेंगी।
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वर्षों पहले युवावस्था में एक साहित्य पढ़ा था, जिसमें द्वितीय विश्व युद्ध के समय के एक युद्धक वायुयान चालक (Pilot) के अनुभव थे। वह वायुयान अपने लक्ष्य की ओर जा रहा था कि पायलट ने देखा कि एक चूहा एक बिजली के तार को काट रहा था| यदि चूहा उस तार को काटने में सफल हो जाता तो यान की विद्युत प्रणाली बंद हो जाती और विमान दुर्घटनाग्रस्त हो जाता। पायलट उस चूहे को किसी भी तरह से भगाने में असमर्थ था। समय बहुत कम और कीमती था। चालक ने भगवान को स्मरण किया, और विमान को उस अधिकतम ऊंचाई तक ले गया जहाँ तक जाना संभव था। वहाँ वायु का दबाव कम हो गया जिसे चूहा सहन नहीं कर पाया और बेहोश हो कर गिर गया। पायलट अपना कार्य पूरा कर सुरक्षित बापस आ गया। उस की रक्षा ऊँचाई के कारण हुई।
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बाज पक्षी कई बार ऐसे पशु का मांस खा जाते हैं जिसे कौवे खाना चाहते हैं। बाज के आगे कौवे असहाय होते हैं पर वे हिम्मत नहीं हारते। कौवा बाज़ की पीठ पर बैठ जाता है, और उसकी गर्दन पर अपनी चोंच से घातक प्रहार करता है, और काटता है। बाज भी ऐसी स्थिति में कौवे के आगे असहाय हो जाते हैं। बाज अपना समय नष्ट नहीं करते, और अपने पंख खोलकर आकाश में बहुत अधिक ऊँचाई पर चले जाते हैं। ऊँचाई पर वायु का दबाव कम होने से कौवा बेहोश होकर नीचे गिर जाता है। यहाँ भी बाज की रक्षा ऊँचाई से होती है। अतः अपनी उच्चतम चेतना में रहो, आपकी रक्षा होगी।
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शिवोहम् शिवोहम् अहम् ब्रह्मास्मि !! ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० अगस्त २०२३

परमात्मा की अनंतता का ध्यान करते हुए स्वयं उस अनंतता के साथ एक होकर, अनंतता से भी परे परमशिव ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करो ---

 परमात्मा की अनंतता का ध्यान करते हुए स्वयं उस अनंतता के साथ एक होकर, अनंतता से भी परे परमशिव ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करो ---

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हमारा वास्तविक शरीर परमात्मा की अनंतता है, यह भौतिक देह नहीं। ध्यान के समय ब्रह्मरंध्र के मार्ग से इस भौतिक देह से बाहर रहते हुये साधना करने का अभ्यास करो। ध्यान के पश्चात चेतना स्वयमेव ही इस भौतिक देह में लौट आयेगी।
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ध्यान के समय दूर दूर जहाँ तक मेरी चेतना जाती है, केवल मेरे सिवाय कोई अन्य नहीं है। चारों ओर आलोक ही आलोक है, उस आलोक से निःसृत हो रही प्रणव की ध्वनि है; कहीं कोई अंधकार नहीं है। मेरा होना भी भ्रम ही है, वास्तव में परमशिव के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ जुलाई २०२५

श्रावण के इस पवित्र मास में, गुरु रूप में भगवान दक्षिणामूर्ती शिव को नमन --

 श्रावण के इस पवित्र मास में, गुरु रूप में भगवान दक्षिणामूर्ती शिव को नमन --

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उनके प्रतीकात्मक चित्र से उनकी कोई समानता नहीं है। उनकी अनुभूति सहस्त्रारचक्र से भी बहुत ऊपर, उनकी अनन्तता से भी परे, एक विराट श्वेत सर्वव्यापी ज्योतिर्मय पुंज के रूप में होती है जो सूर्य से भी बहुत अधिक चमकीला लेकिन अति शीतल और आन्ददायक होता है।
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उनकी अनुभूति हमारा परम सौभाग्य और उनकी परम कृपा है। उनकी अनुभूति से हम झूम उठेंगे और उनके आनन्द में डूब जायेंगे। उनकी परम कृपा हुई है मुझ अकिंचन पर जो उनके बारे में कुछ लिख पा रहा हूँ। मैं धन्य हुआ। ॐ तत्सत्!! ॐ ॐ ॐ!!
कृपा शंकर
झुंझुनू (राजस्थान)
२९ जुलाई २०२५

मेरा अपने गुरु सें क्या सम्बन्ध है?

 (प्रश्न) मेरा अपने गुरु सें क्या सम्बन्ध है?

(यह बात बताई जा सकती है, इसलिए एक आंतरिक प्रेरणावश लिख रहा हूँ, अन्यथा किसी भी परिस्थिति में नहीं लिखता)
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(उत्तर) एक दिन मैं बहुत गहरे ध्यान में था। संसार की चेतना बिलकुल भी नहीं थी। मेरी चेतना भी इस भौतिक शरीर में नहीं थी। अचानक ही एक अनुभूति हुई कि गुरु महाराज पद्मासन में अपने परम ज्योतिर्मय रूप में मेरे समक्ष आकाश में बिराजमान हैं। उन्होने बड़े प्रेम से एक ही वाक्य बोला और अंतर्ध्यान हो गए। उस वाक्य का यदि अङ्ग्रेज़ी में अनुवाद किया जाये तो वह होगा -- "You be what I am".
उनका संदेश पूरी तरह समझ में आ गया। उनके कहने का तात्पर्य यही था कि शब्दों से ऊपर उठो और उस चेतना को प्राप्त करो जिसमें मैं हूँ। उनका आदेश था कि सब तरह के शब्दों और सांसारिकता से ऊपर उठकर परमात्मा में स्थित हो जाओ, और परमात्मा की चेतना में ही रहो।
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तब से गुरु और परमात्मा से पृथकता का बोध समाप्त हो गया है। वास्तविकता में एकमात्र अस्तित्व सिर्फ परमात्मा का है। मेरा पृथकता का बोध यानि मेरा अस्तित्व मिथ्या है। जब तक प्रारब्ध कर्मों का अवशेष है तब तक यह भौतिक देह रहेगी। फिर यह देह भी छूट जाएगी, और संसार के लिए मैं अज्ञात हो जाऊंगा। अब मेरी कोई स्वतंत्र इच्छा का कोई महत्व नहीं रहा है। जो भगवान की इच्छा है, वही मेरी भी इच्छा है।
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परमशिव ही सारा अस्तित्व हैं। गुरु भी वे हैं, शिष्य भी वे हैं, यह विश्व और उसकी सर्वव्यापक पूर्णता भी वे ही हैं। मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। वे स्वयं ही यह विश्व बन गए हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
३० जुलाई २०२३

मेरे कुछ प्रश्न हैं ---

  मेरे कुछ प्रश्न हैं।

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(१) सन १९४८ ई के भारत-पाक युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया था, फिर भी अधिकांश कश्मीर पकिस्तान के कब्जे में क्यों है।
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(२) तिब्बत एक स्वतंत्र देश था, भारत के संरक्षण में। भारत ने ब्रिटेन की अनुमति से, स्टालिन के कहने से उसे चीन को क्यों व कितने में बेचा? तिब्बत पर अधिकार करने के लिये पूरी लोजिस्टिक सपोर्ट भारत ने चीन को क्यों दी?
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(३) सन १९६२ का युद्ध हम क्यों हारे? चीन के पिछले एक हज़ार वर्षों के इतिहास में चीन ने एक भी युद्ध नहीं जीता। वह सदा हारा। चीन के इतिहास में यह उसकी पहली विजय थी। भारत ने अपनी वायुसेना का उपयोग क्यों नहीं किया? चीन के पास कोई वायुसेना नहीं थी।
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(४) भारत का विभाजन जब धर्म के आधार पर हुआ, पाकिस्तान मुस्लिम देश बना तब भारत सेकुलर क्यों बना?
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और भी अनेक प्रश्न हैं। हमारी विश्व शांति की बड़ी बड़ी बातें, बड़े बड़े उपदेश और झूठा दिखावा सब व्यर्थ हैं यदि हम बलहीन हैं|
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भारत पर यूनानी आकमण हुआ तब पौरुष से पराजित हुई यूनानी फौजें तब भाग खड़ी हुईं जब उन्हें पता चला कि मगध साम्राज्य की सेनाएं लड़ने आ रही हैं| फिर कई शताब्दियों तक किसी का साहस नहीं हुआ भारत की और आँख उठाकर देखने का|
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हम में यह गलत धारणा भर गई थी कि युद्ध करना सिर्फ क्षत्रियों का काम है| यदि पूरे भारत का हिन्दू समाज एकजुट होकर आतताइयों का सामना करता तो किसी का भी साहस नहीं होता हिन्दुस्थान की ओर आँख उठाकर देखने का|
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भारत में विधर्मी मत किसी संत महात्मा द्वारा नहीं आए थे| ये आये थे क्रूरतम आतंक और प्रलोभन द्वारा| हम सिर कटाते रहे और 'अहिंसा परमोधर्म' का जप करते रहे| समय के साथ हम अपनी मान्यताओं और सोच को नहीं बदल सके|
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वर्तमान में हम फिर संकट में हैं| हमें सब तरह के भेदभाव मिटाकर एक होना होगा और शक्ति-साधना करनी होगी, तभी हम अपना अस्तित्व बचा पाएंगे| अपने सोये हुए क्षत्रियत्व और ब्रह्मत्व को जागृत करना होगा|
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हिंदू धर्म ही नहीं बचेगा तो ये दर्शन और आध्यात्म की सब बातें निराधार हो जायेंगी| न तो साधू-संत रहेंगे, न ये बड़े बड़े उपदेशक और दार्शनिक| बचे खुचे हिन्दुओं को तो समुद्र में ही डूब कर मरना पडेगा| भारतवर्ष का ही अस्तित्व समाप्त हो जाएगा|
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इन सारे सेकुलर, माओपंथी, वाममार्गी, प्रगतिवादी, समाजवादी, साम्यवादी, सर्वधर्मसमभाववादी, धर्मनिरपेक्षतावादी आदि आदि इन सब का अस्तित्व भी तभी तक है जब तक भारत में हिन्दू बहुमत है| जिस दिन हिन्दू अल्पमत में आ गए उस दिन इन सब का हाल भी वही होगा जो सीरिया और इराक में हाल ही में देखने को मिला था|
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धर्म की रक्षा धर्म के पालन से ही होती है, सिर्फ बातों से नहीं| धर्म की रक्षा हम नहीं करेंगे तो धर्म भी हमारी रक्षा नहीं करेगा|
सभी का कल्याण हो | भारत माता की जय | जय श्रीराम |ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
०२ अगस्त २०१७.

मेरा ७९वां जन्मदिवस

सरकारी कागजों और दसवीं के प्रमाणपत्र के आधार पर मेरी इस भौतिक देह का आज २ अगस्त २०२५ को मेरा ७९वां जन्मदिवस है। मेसेंजर में अनेक बधाई सन्देश मिले हैं। सभी को धन्यवाद व आभार।

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जब बड़ा हुआ तो घरवालों ने बताया कि उस दिन भादवे की अमावस्या थी और इस स्थान तक धूप आयी हुई थी। बाद में मैने खुद ने हिसाब लगाया कि उस दिन उस स्थान पर धूप शाम के साढ़े तीन बजे ही आती थी। लेकिन वास्तविक जन्मदिन कुछ और ही दिन निकला।
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मैं हिन्दी तिथी से ही जन्मदिन मनाता हूँ, इसीलिए पिछडा हुआ हूँ। जन्मदिन पर शिवपूजा करके हनुमान जी के थोडा सा प्रसाद चढा कर घर में बाँट देते हैं। और कुछ भी नहीं करते। यही हमारा Happy birth day है। सभी का अभिनन्दन और धन्यवाद।।
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पुनश्च : --- जन्मदिन पर शिवपूजा और शिव का ध्यान, व हनुमान जी की आराधना, इस के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं, यही हमारी परंपरा है।

"अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति" और "पुरुषोत्तम-योग" --

 "अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति" और "पुरुषोत्तम-योग" --

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गीता के १३वें अध्याय के ११वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण "अनन्य-योग और अव्यभिचारिणी भक्ति" का उपदेश देते हैं। इसके लिये परम वैराग्य चाहिए जो इस जन्म में तो मेरे पास नहीं है। लगता है मुझे मनुष्य देह में और जन्म लेने होंगे। इस जन्म में तो यह संभव नहीं है। यह भक्ति की पराकाष्ठा है।
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"अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति" का अर्थ है -- परमात्मा के प्रति पूर्ण प्रेम और समर्पण, जिसमें किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के प्रति किसी भी तरह का कोई प्रेम या आसक्ति नहीं रहती है। यह ईश्वर से अन्य किसी भी सांसारिक वस्तु या व्यक्ति से प्रेम नहीं करने की स्थिति है, जो भक्ति में स्थिरता और पूर्णता को दर्शाता है।
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ऐसे ही गीता का सार -- १५वें अध्याय का पुरुषोत्तम-योग है, जिसे भगवान की परम कृपा से ही समझा जा सकता है। यह बुद्धि का विषय नहीं है। वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण ने करुणावश अपनी परम कृपा कर के यह विषय मुझे बहुत अच्छी तरह से समझाया है। यह योगमार्ग की उच्चतम साधना है। लेकिन इतना जीवन शेष नहीं है कि मैं इसे निज जीवन में अवतरित कर सकूं।
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मैं भगवत् कृपा पर निर्भर हूँ। जीवन का हर क्षण उन्हें समर्पित है। साधक, साध्य और साधना वे स्वयं ही हैं। उनसे पृथक चिंतन का विषय कुछ भी अन्य नहीं है।
ॐ तत्सत्।
कृपा शंकर
३ अगस्त २०२५

प्राण-तत्व

प्राण-तत्व

प्राण-तत्व पर यह चर्चा तेरह वर्षों के पश्चात् कर रहा हूँ। प्राण-तत्व को बुद्धि से समझना असंभव है, क्योंकि यह अनुभव का विषय है, जिसे योग-साधना की अनुभूतियों द्वारा ही समझा जा सकता है।
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अष्टांग योग में प्रथम चार सोपान हैं --- यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान), आसन (स्थिर सुख से बैठने की विधि) और प्राणायाम। सांध्य क्रियाओं में भी प्राणायाम किया जाता है जो वर्तमान में एक श्वास-प्रश्वास का व्यायाम मात्र ही होकर रह गया है। प्राण-तत्व को समझे बिना प्राणायाम नहीं हो सकता।
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योग का अर्थ है -- जोड़ना। जो आत्मा को परमात्मा से, जीव को शिव से जोड़ता है वह योग है। योग है अपनी सूक्ष्म देह में अवस्थित महाशक्ति कुण्डलिनी को जागृत कर परमशिव से एकाकार करना।
योग साधना का उद्देश्य है --- परम शिवभाव को प्राप्त करना। चित्तवृत्ति निरोध इस लम्बी यात्रा में एक पड़ाव है, गंतव्य नहीं। गंतव्य है -- "सम्पूर्ण समर्पण"।
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चित्त स्वयं को दो रूपों --- वासनाओं व श्वाश-प्रश्वाश के रूप में व्यक्त करता है।वासनाएँ तो अति सूक्ष्म हैं जो पकड़ में नहीं आतीं। अतः आरम्भ में बीज मन्त्रों के साथ श्वाश-प्रश्वास पर ध्यान किया जाता है जिसे अजपा-जप (हंस:योग) कहते हैं। इस का अभ्यास करते करते मेरुदंड में प्राणशक्ति का आभास होता है, जिसके नियंत्रण से वासनाओं पर नियंत्रण होता है। आगे के मार्ग पर साधक गुरुकृपा से अग्रसर होता है।
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श्वास-प्रश्वाश भौतिक रूप से तो नाक से ही चलता है पर उसकी अनुभूति मेरुदंड में होती है। श्वाश-प्रश्वाश तो एक प्रतिक्रिया है, क्रिया नहीं। प्राण तत्व जो मेरुदंड में संचारित होता है, वह क्रिया है, जिस की प्रतिक्रया है सांस।
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जीवात्मा का निवास मस्तिकग्रंथि (मेरुशीर्ष/Medula Oblongata) व सहस्त्रारचक्र के मध्य में होता है। यह जीवात्मा ही है जो अपनी एक अभिव्यक्ति-- चित्त के द्वारा प्राण शक्ति का संचलन करता है, जिसकी प्रतिक्रिया-स्वरुप सांस चलती है। जब मेरुदंड में उस शक्ति की अनुभूति होने लगती है तब उसी की चेतना में "क्रिया-योग" साधना की जाती है। उस प्राण शक्ति का ही धनीभूत रूप है "कुण्डलिनी महाशक्ति"।
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योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय के अनुसार चंचल प्राण ही मन है। चंचल प्राण को स्थिर करके ही मन पर नियंत्रण किया जा सकता है। प्राणवायु सहस्त्रार में स्थिर रहता है, पर नीचे आने पर चंचल हो जाता है। प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान ये पञ्च प्राण यदि देह में समान रूप से स्थित रहें तो मन में कोई चंचलता नहीं रहती।
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ये पञ्च प्राण ही हैं जो ओंकार रूप गणेश जी के गण हैं। इन्हीं गणों के अधिपति होने के कारण इन्हें गणपति या गणेश कहते हैं। इन पञ्च प्राणों के पाँच सौम्य और पाँच उग्र रूप ही दस महाविद्याएँ हैं। इसलिए प्राणायाम की साधना श्रेष्ठ है।
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क्रिया-प्राणायाम द्वारा प्राण एवं अपान वायु स्थिर होते हैं। नाभि क्रिया द्वारा समान वायु, तथा महामुद्रा द्वारा उदान तथा व्यान वायु स्थिर होते हैं। इन साधनाओं के द्वारा पञ्च वायु स्थिर होने पर योनिमुद्रा (ज्योतिमुद्रा) द्वारा आत्मदर्शन होता है। प्राणायाम अनेक प्रकार के होते हैं पर सुषुम्ना स्थित षटचक्र प्राणायाम (क्रियायोग) सर्वश्रेष्ठ है। नदियों में गंगा, तीर्थों में काशी, मन्त्रों में गायत्री, और बीजों में प्रणव श्रेष्ठ है। वैसे ही साधनाओं में प्राणायाम की साधना श्रेष्ठ है।
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प्राण की साधना द्वारा सब देवि-देवताओं की साधना हो जाती है। धर्म कोई बाहरी अनुष्ठान नहीं है। पूरी सृष्टि धर्म से ही उत्पन्न और धर्म में ही स्थित है। धर्म के अस्तित्व में ही इसका अस्तित्व है। प्राण की चंचलता -- महामाया है। साधना के द्वारा जब जीव महास्थिर हो जाता है तब जीव जीव नहीं रहता, वह स्वयं शिव हो जाता है।
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परमात्मा बाहर से प्राप्त नहीं होते, स्वयं को ही परमात्मा होना पड़ता है| जीव का धर्म अपने उस मूल स्वरुप महास्थिर प्राण को पाना है| स्थिर प्राण ही ब्रह्म है। यही सोsहं अवस्था है|
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अष्टांग योग द्वारा प्राण को सुषुम्ना में चालित करते हैं जिसके परिणाम स्वरुप प्राण व मन सुषुम्ना के भीतर से ब्रह्मरंध्र में प्रवेश करता है। ब्रह्मरंध्र में प्रवेश के पश्चात चंचल प्राण व मन रुद्ध हो जाते हैं और योगी का मन परमानंद में डूब जाता है और समाधि की स्थिति प्राप्त होती है। यह जीवनमुक्ति की अवस्था है| यही निष्काम कर्म है।
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योग साधना के लिए भक्ति बहुत आवश्यक है। जब ह्रदय में एक तड़प, अभीप्सा और परम प्रेम हो तो सारे द्वार अपने आप खुल जाते हैं। सारे दीप जल उठते हैं और अंतर का समस्त अन्धकार दूर होने लगता है।
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आवश्यकता है सिर्फ एक अभीप्सा और परम प्रेम की। फिर समर्पण में अधिक समय नहीं लगता। जब समर्पण हो जाए तब और करने को कुछ भी शेष नहीं रहता। फिर सब कुछ परमात्मा ही करते हैं। ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ।
कृपा शंकर
५ अगस्त २०२५

"परमशिव" एक अनुभूति है ---

 "परमशिव" एक अनुभूति है ---

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परमशिव को परिभाषित नहीं किया जा सकता। यह अनुभूति गहन ध्यान में होती है। ध्यान करते करते जब सहस्त्रारचक्र का ऊपरी भाग हट जाये तब अनंतता की अनुभूति होती है। इस अनंतता से भी परे जाने का अभ्यास करें। अपनी चेतना में लाखों करोड़ किलोमीटर ऊपर उठ जाएँ। और ऊपर उठें, और ऊपर उठें, जितना ऊपर उठ सकते हैं, उतना ऊपर उठते जाएँ। मार्ग में कोई प्रकाश पुंज मिले तो उससे भी ऊपर उठते रहें। अंततः एक विराट श्वेत ज्योति पुंज, और पञ्चकोणीय श्वेत नक्षत्र के दर्शन होंगे। उसी में स्थित होकर ध्यान कीजिये। वहीं रहिये। कहीं कोई अंधकार नहीं है। जब आप इतनी ऊंचाई पर पहुँच जाएँगे तब आपको परमशिव की अनुभूति होगी। वहीं हमारा घर है। वहीं हमारा निवास है। किसी भी तरह की लौकिक आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। समर्पित होकर उसी में स्वयं को स्थित कीजिये। उसी चेतना में रहते हुए सारे सांसारिक कर्तव्यों को निभाएँ। आप यह मनुष्य देह नहीं, स्वयं परमशिव हैं।
यह अनुभूति स्वयं परमशिव और सिद्ध गुरु की परम कृपा से ही होती है। लेकिन प्रयास तो करते रहिए। उनकी कृपा अवश्य होगी।
ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ अगस्त २०२४

क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ? --

 "Where Ganges, woods, Himalayan caves,

and men dream God -- I am hallowed,
my body touched that sod." (Paramahansa Yogananda)
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(Re-Posted) क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ? --- नहीं, हम वास्तव में स्वतंत्र नहीं है। हम न तो आध्यात्मिक दृष्टी से स्वतंत्र हैं, और न ही मानसिक दृष्टी से। आध्यात्मिक दृष्टी से हम अपनी वासनाओं के गुलाम हैं। मानसिक दृष्टी से हम अभी भी अंग्रेजियत के गुलाम हैं। जो तथाकथित आज़ादी हमें मिली, एक समझौते के अंतर्गत सत्ता का हस्तांतरण था; वह भी देश के विभाजन, और विश्व के सबसे बड़े नर-संहार के साथ। जिसे हम स्वतन्त्रता कहते हैं, वह क्या हमारी उच्शृन्खलता नहीं है?
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भारत की नष्ट हुई भव्य प्राचीन शिक्षा व कृषि व्यवस्था, और प्राचीन महानतम सभ्यता के ह्रास की पीड़ा असहाय होकर देखने को बाध्य हैं। देश में आरक्षण के नाम पर योग्यता की ह्त्या, जातिवाद, ओछी राजनीति, और भ्रष्टाचार व अन्याय देखकर यह सोचने को बाध्य हूँ कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं? हम अभी भी कॉमन वेल्थ के सदस्य क्यों हैं? हमारे संविधान में धारा 147 जैसी धाराएँ अभी भी अस्तित्व में क्यों हैं जो हमें हमें अभी भी अंग्रेजों का गुलाम ही मानती हैं?
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हमारी स्थिति कामायनी के मनु जैसी ही है जो ---
"हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह।
एक व्यक्ति भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय अथाह॥"
हम भी असहाय होकर उस अथाह प्रलय के साक्षी होने को बाध्य हैं।
प्रसाद जी के शब्दों में --
"जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तिष्क में स्मृति सी छायी।
दुर्दिन में आँसू बनकर वो आज बरसने आयी॥"
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मेरे विचार से असली स्वतंत्र वे ही है जो आध्यात्मिक दृष्टी से वीतराग, जीवनमुक्त, स्थितप्रज्ञ, व त्रिगुणातीत हैं, जिन्होने तुरीयावस्था को प्राप्त कर लिया है।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१५ अगस्त २०२३
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पुनश्च: --- "हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'
असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!" (जयशंकर प्रसाद)

जीवन की प्रथम, अंतिम और एकमात्र आवश्यकता -- "परमात्मा को आत्म-समर्पण" है ---

जीवन की प्रथम, अंतिम और एकमात्र आवश्यकता -- "परमात्मा को आत्म-समर्पण" है। हृदय में एक प्रचंड अग्नि जल रही है, जिसकी दाहकता अब और अधिक समय तक जीने नहीं देगी। परमात्मा हमारे प्रियतम से भी अधिक प्रिय, और निकटतम से भी अधिक निकट हैं। इस जन्म से पूर्व भी वे हमारे साथ थे, और इस जीवन के उपरांत भी वे ही हमारे साथ रहेंगे। वे ही माता-पिता, भाई-बहिन, पति-पत्नी, मित्र-संबंधी आदि, और अन्य सभी रूपों में आये। यह उन्हीं का प्रेम था जो जीवन में सभी से प्राप्त हुआ। उनसे एकाकार होना ही इस जीवन का लक्ष्य है। अब और उनके बिना नहीं रह सकते।

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मेरी मान्यता है कि जो वेदान्त के ब्रह्म हैं, वे ही साकार रूप में भगवान श्रीकृष्ण हैं। वे ही परमशिव और वे ही महादेव हैं। मैं उनका ध्यान कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम या परमशिव के रूप में करता हूँ, वहीं मुझे उनकी अनुभूतियाँ होती हैं। जन्माष्टमी का दीर्घ व गहन ध्यान आज भी होगा और कल भी होगा।
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"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥"
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"वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम्।
दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम्॥"
"वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात् , पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्।
पूर्णेंदु सुन्दर मुखादरविंदनेत्रात् , कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने॥"
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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥"
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च, जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
"कस्तूरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु: करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावली,
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूड़ामणि:॥"
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अगस्त २०२५

परमात्मा के किस रूप का ध्यान करें ? .

 (प्रश्न) : परमात्मा के किस रूप का ध्यान करें ?

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(उत्तर) : ध्यान हमेशा परमात्मा के आदित्य-वर्ण का ही किया जाता है। यह बात भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से कही है, जिस पर तनिक भी संशय नहीं किया जा सकता। भगवान कहते हैं --
"कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥८:९॥"
अर्थात् -- जो पुरुष सर्वज्ञ, प्राचीन (पुराण), सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर, सब के धाता, अचिन्त्यरूप, सूर्य के समान प्रकाश रूप और (अविद्या) अन्धकार से परे तत्त्व का अनुस्मरण करता है॥
Whoso meditates on the Omniscient, the Ancient, more minute than the atom, yet the Ruler and Upholder of all, Unimaginable, Brilliant like the Sun, Beyond the reach of darkness;
गीता के आठवें अध्याय का दो-तीन भाष्यों की सहायता से स्वाध्याय करें, और भगवान श्रीकृष्ण के सर्वव्यापी आदित्यवर्ण का ध्यान करें। भगवान आपकी सहायता अवश्य करेंगे। यह मैं अपने निजी अनुभव से कह रहा हूँ।
ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१६ अगस्त २०२५

भगवान की प्राप्ति एक सरल से सरल कार्य है। इससे अधिक सरल अन्य कुछ भी नहीं है ---

 भगवान की प्राप्ति एक सरल से सरल कार्य है। इससे अधिक सरल अन्य कुछ भी नहीं है। भगवान की कृपा को प्राप्त करना कोई बड़ी बात नहीं है। भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए हमें सिर्फ सत्यनिष्ठा और परमप्रेम ही चाहिये, अन्य सारे गुण अपने आप खींचे चले आते हैं। भगवान सत्य-नारायण हैं, वे सत्य-नारायण की कथा से नहीं, हमारे स्वयं के सत्यनिष्ठ बनने से प्राप्त होते हैं। हमें स्वयं को ही सत्य-नारायण बनना होगा। भगवान की प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक हमारा लोभ और अहंकार है। किसी भी तरह की कोई कामना या आकांक्षा हमारे हृदय में नहीं हो, केवल अभीप्सा हो। ॐ ॐ ॐ॥

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पुनश्च: --- वास्तविक स्वतन्त्रता ईश्वर में ही है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। हम निज जीवन में ईश्वर का साक्षात्कार करके ही स्वतंत्र हो सकते हैं, अन्यथा नहीं। एक वीतराग व्यक्ति ही स्वतंत्र है, जो सब तरह के राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त है। जीवन की सभी विषमताओं का एकमात्र कारण -- ईश्वर से विमुखता है।
श्रीमद्भगवद्गीता का चरम ध्लोक सदा याद रखें जिसमें भगवान कहते हैं --
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
इससे पूर्व भगवान कह चुके हैं कि --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"

परमात्मा को अपनी पूरी शक्ति से पकड़ कर रखो, उन्हें कभी भी छोड़ो मत ---

 परमात्मा को अपनी पूरी शक्ति से पकड़ कर रखो, उन्हें कभी भी छोड़ो मत। उन्हें पकड़ कर चलते रहो, चलते रहो, और चलते रहो। कभी भी, कहीं भी रुको मत। रुकते ही पतन और विनाश आरंभ होने लगता है। हमारी पकड़ में केवल परमात्मा ही आते हैं, और कोई या कुछ आता भी नहीं है। आजकल मामला कुछ उल्टा हो गया है, अब हर समय परमात्मा ही मुझे पकड़ कर रखते हैं, कभी छोड़ते ही नहीं है।

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उन्हें देने के लिए मेरे पास अपने अंतःकरण के सिवाय कुछ है भी नहीं। अपना अन्तःकरण ही उनमें समर्पित और विलय कर रहा हूँ। सभी को मंगलमय शुभ कामना और नमन !!
ॐ तत्सत् !! ॐ गुरु !! गुरु ॐ !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ अगस्त २०२५

जीवन का सर्वश्रेष्ठ पल :--- जिस क्षण मैं प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में सो कर उठता हूँ

 जीवन का सर्वश्रेष्ठ पल :--- जिस क्षण मैं प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में सो कर उठता हूँ, वह जीवन का सर्वश्रेष्ठ आनंदमय समय होता है। उस क्षण परमात्मा स्वयं सो कर उठते हैं। सारी चेतना ब्रह्ममय होती है। प्रातः उठते ही थोड़ा सा उष:पान कर के लघुशंका आदि से निवृत होकर अर्ध-खेचरी मुद्रा में बैठ कर चेतना के ऊर्ध्वमूल में प्रकट हुई ब्रह्मज्योति (कूटस्थ-सूर्यमण्डल) में भगवान पुरुषोत्तम अपना ध्यान मुझे निमित्त बनाकर स्वयं करते हैं। भगवान पुरुषोत्तम की ही दूसरी अभिव्यक्ति परमशिव है। दोनों में कोई अंतर नहीं है। प्रातःकाल उठते ही किया गया ध्यान सर्वश्रेष्ठ होता है। इस चेतना में उठना तभी संभव होता है जब रात्रि को सोते समय हम ध्यान कर के जगन्माता की गोद में उसी तरह सोयें जैसे एक शिशु अपनी माँ की गोद में सोता है।

उस ब्रह्मज्योति में विचरण ही ब्रह्मचर्य है। उस में रमण करना ही आत्माराम होना है।
ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२०अगस्त २०२५

अमेरिकी वर्चस्व के दिन समाप्त होने वाले हैं, अमेरिका की अर्थव्यवस्था पतनोन्मुख है और शीघ्र ही नष्ट होने वाली है।

 अमेरिकी वर्चस्व के दिन समाप्त होने वाले हैं, अमेरिका की अर्थव्यवस्था पतनोन्मुख है और शीघ्र ही नष्ट होने वाली है।

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अमेरिकी राष्ट्रपति कोई मूर्ख, आत्ममुग्ध, अहंकारी या बड़वोले राजनेता नहीं हैं, वे एक बहुत बड़े सफल व्यापारी और समझदार राजनेता हैं। उनके पास विश्व के अच्छे से अच्छे सलाहकार और कूटनीतिज्ञ हैं, लेकिन समय बड़ा बलवान होता है जो उनके देश के विरुद्ध है। जब से BRICS नाम का संगठन बना है, अमेरिका के बुरे दिन आरंभ हो चुके हैं। इस संगठन के पीछे का दिमाग भारत का है, और विश्व के सबसे बड़े पाँच देश -- रूस, चीन, भारत, दक्षिण-अफ्रीका, और ब्राज़ील इसके संस्थापक सदस्य हैं। इसका मुख्यालय जान-बूझकर चीन में रखा गया है। इसके सदस्य देशों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।
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BRICS के देशों की आपसी समझ है कि वे व्यवसायिक लेनदेन में डॉलर में भुगतान न कर के अपनी स्थानीय मुद्रा में ही करेंगे। इससे डॉलर का महत्व कम होता जा रहा है। जिस दिन अमेरिकी डॉलर का महत्व समाप्त हो गया उसी दिन अमेरिकी दादागिरी समाप्त हो जायेगी।
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रूस - यूक्रेन युद्ध ने भी अमेरिका की आर्थिक कमर तोड़ दी है जिसे अमेरिका छिपा रहा है। यह युद्ध अमेरिका लड़ रहा है, यूक्रेन के केवल सैनिक मर रहे हैं। यह युद्ध पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो वाइडेन और उनके अफीमची बेटे हंटर वाइडेन के शैतानी दिमाग की उपज है। उन्होने तुर्की के माध्यम से यूक्रेन में खूब अफीम बेची और और एक बहुत बड़े वर्ग को अफीमची बना दिया। उस पैसे से वहाँ की चुनी हुई सरकार के विरुद्ध जम कर प्रचार हुआ, वैसा ही जैसा इस समय भारत में हो रहा है। वहाँ के चुने हुए राष्ट्रपति विक्टर यानूकोविच को देश छोड़कर भागना पड़ा। अमेरिकी डॉलर के ज़ोर से चलचित्रों के नशेड़ी विदूषक जेलेंस्की को यूक्रेन का राष्ट्रपति बना दिया गया, जिसके दिमाग पर अमेरिकी डीप स्टेट का पूरा अधिकार है।
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फिर अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित यूक्रेनी अजोव बटालियन द्वारा रूसी मूल के लोगों का जन-संहार आरंभ कर दिया गया। छोटे छोटे शिशुओं को भी नहीं छोड़ा गया। वहाँ ऐसी प्रयोगशालाएँ खोली गयीं, जिन में कुछ ऐसे रसायनों पर अनुसंधान होने लगा जिन से पूरी रूसी नस्ल को ही निर्वीर्य और अपंग बनाया जा सके। रूस को यह युद्ध छेड़ने को बाध्य किया गया। रूस ने युद्ध आरंभ होते ही ऐसी सब प्रयोगशालाओं को नष्ट कर दिया।
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अमेरिका ने अरबों डॉलर के हथियार रूस के विरुद्ध लड़ने के लिए अपने कठपुतली देश यूक्रेन को दिये। अमेरिका को उम्मीद थी कि वह एक तो इस युद्ध में अपने परम शत्रु देश रूस को नष्ट कर देगा। दूसरी उम्मीद थी कि यूक्रेन की धरती उसे मिल जाएगी जिस के भूगर्भ से वह अनमोल खनिजों का दोहन कर सकेगा और वहाँ की अति उपजाऊ भूमि से उत्पन्न गेंहूँ के व्यापार को अपने नियंत्रण में ले सकेगा। अमेरिका को यह भी उम्मीद थी कि यूक्रेन के नष्ट हुए नगरों के पुनर्निर्माण का ठेका भी उसे मिल जायेगा। लेकिन अमेरिका की आशा -- निराशा में बदल गयी जब रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने यह स्पष्ट कर दिया कि ---
"इस युद्ध में जितनी भूमि पर रूस ने अधिकार किया है वह स्थायी रूप से रूस की हो गयी है, उसे बापस नहीं किया जायेगा, अमेरिका को पुनर्निर्माण का ठेका नहीं मिलेगा और पूरे यूक्रेन पर भी रूस अपना अधिकार कर के रखेगा; उसे NATO का सदस्य नहीं बनने दिया जायेगा।"
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की निराशा और अवसाद का कारण यही है।
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NATO के यूरोपीय देश अमेरिका का खून चूस रहे हैं, बदले में कुछ भी नहीं दे रहे हैं। यह भी अमेरिका के पतन के कारणों में से एक होगा। दादागिरी और धौंस सदा नहीं चल सकती। क्रीमीया के ऊपर मैं बहुत लिख चुका हूँ। उसे दुबारा नहीं लिखना चाहता। उस पर रूस ने अधिकार अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों के अंतर्गत ही किया है। रूस और यूक्रेन दोनों ही देशों में मैं रह चुका हूँ। अतः दोनों के बारे में मुझे अच्छी समझ है। आप सब को धन्यवाद॥
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२५