हर हिन्दू परिवार प्रमुख का दायित्व
Wednesday, 20 August 2025
हर हिन्दू परिवार प्रमुख का दायित्व ---
पीढ़ियों में अंतर (Generation Gap) कैसे दूर हो? .....
पीढ़ियों में अंतर (Generation Gap) कैसे दूर हो? .....
आज (१९ अगस्त २०२२ की मध्य रात्रि में) जितनी भक्ति तो मैंने मेरे इस पूरे जीवन में कभी भी नहीं देखी।
आज (१९ अगस्त २०२२ की मध्य रात्रि में) जितनी भक्ति तो मैंने मेरे इस पूरे जीवन में कभी भी नहीं देखी। यह मैं पूरी गंभीरता से लिख रहा हूँ। मैं एक ७५ वर्षीय वरिष्ठ नागरिक हूँ, और पूरे विश्व में व भारत में खूब घूमा हुआ हूँ।
कल बहुत अधिक आनंद का पर्व जन्माष्टमी थी। आज दो लोक उत्सव हैं ---
कल बहुत अधिक आनंद का पर्व जन्माष्टमी थी। आज दो लोक उत्सव हैं ---
(प्रश्न) : मैं कौन हूँ? ---
(प्रश्न) : मैं कौन हूँ? ---
नकारात्मक शक्तियों पर विजय कैसे पाएँ? ---
नकारात्मक शक्तियों पर विजय कैसे पाएँ? ---
परमात्मा की अनंतता का ध्यान करते हुए स्वयं उस अनंतता के साथ एक होकर, अनंतता से भी परे परमशिव ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करो ---
परमात्मा की अनंतता का ध्यान करते हुए स्वयं उस अनंतता के साथ एक होकर, अनंतता से भी परे परमशिव ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करो ---
श्रावण के इस पवित्र मास में, गुरु रूप में भगवान दक्षिणामूर्ती शिव को नमन --
श्रावण के इस पवित्र मास में, गुरु रूप में भगवान दक्षिणामूर्ती शिव को नमन --
मेरा अपने गुरु सें क्या सम्बन्ध है?
(प्रश्न) मेरा अपने गुरु सें क्या सम्बन्ध है?
मेरे कुछ प्रश्न हैं ---
मेरे कुछ प्रश्न हैं।
मेरा ७९वां जन्मदिवस
सरकारी कागजों और दसवीं के प्रमाणपत्र के आधार पर मेरी इस भौतिक देह का आज २ अगस्त २०२५ को मेरा ७९वां जन्मदिवस है। मेसेंजर में अनेक बधाई सन्देश मिले हैं। सभी को धन्यवाद व आभार।
"अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति" और "पुरुषोत्तम-योग" --
"अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति" और "पुरुषोत्तम-योग" --
प्राण-तत्व
प्राण-तत्व
"परमशिव" एक अनुभूति है ---
"परमशिव" एक अनुभूति है ---
क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ? --
"Where Ganges, woods, Himalayan caves,
जीवन की प्रथम, अंतिम और एकमात्र आवश्यकता -- "परमात्मा को आत्म-समर्पण" है ---
जीवन की प्रथम, अंतिम और एकमात्र आवश्यकता -- "परमात्मा को आत्म-समर्पण" है। हृदय में एक प्रचंड अग्नि जल रही है, जिसकी दाहकता अब और अधिक समय तक जीने नहीं देगी। परमात्मा हमारे प्रियतम से भी अधिक प्रिय, और निकटतम से भी अधिक निकट हैं। इस जन्म से पूर्व भी वे हमारे साथ थे, और इस जीवन के उपरांत भी वे ही हमारे साथ रहेंगे। वे ही माता-पिता, भाई-बहिन, पति-पत्नी, मित्र-संबंधी आदि, और अन्य सभी रूपों में आये। यह उन्हीं का प्रेम था जो जीवन में सभी से प्राप्त हुआ। उनसे एकाकार होना ही इस जीवन का लक्ष्य है। अब और उनके बिना नहीं रह सकते।
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परमात्मा के किस रूप का ध्यान करें ? .
(प्रश्न) : परमात्मा के किस रूप का ध्यान करें ?
भगवान की प्राप्ति एक सरल से सरल कार्य है। इससे अधिक सरल अन्य कुछ भी नहीं है ---
भगवान की प्राप्ति एक सरल से सरल कार्य है। इससे अधिक सरल अन्य कुछ भी नहीं है। भगवान की कृपा को प्राप्त करना कोई बड़ी बात नहीं है। भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए हमें सिर्फ सत्यनिष्ठा और परमप्रेम ही चाहिये, अन्य सारे गुण अपने आप खींचे चले आते हैं। भगवान सत्य-नारायण हैं, वे सत्य-नारायण की कथा से नहीं, हमारे स्वयं के सत्यनिष्ठ बनने से प्राप्त होते हैं। हमें स्वयं को ही सत्य-नारायण बनना होगा। भगवान की प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक हमारा लोभ और अहंकार है। किसी भी तरह की कोई कामना या आकांक्षा हमारे हृदय में नहीं हो, केवल अभीप्सा हो। ॐ ॐ ॐ॥
परमात्मा को अपनी पूरी शक्ति से पकड़ कर रखो, उन्हें कभी भी छोड़ो मत ---
परमात्मा को अपनी पूरी शक्ति से पकड़ कर रखो, उन्हें कभी भी छोड़ो मत। उन्हें पकड़ कर चलते रहो, चलते रहो, और चलते रहो। कभी भी, कहीं भी रुको मत। रुकते ही पतन और विनाश आरंभ होने लगता है। हमारी पकड़ में केवल परमात्मा ही आते हैं, और कोई या कुछ आता भी नहीं है। आजकल मामला कुछ उल्टा हो गया है, अब हर समय परमात्मा ही मुझे पकड़ कर रखते हैं, कभी छोड़ते ही नहीं है।
जीवन का सर्वश्रेष्ठ पल :--- जिस क्षण मैं प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में सो कर उठता हूँ
जीवन का सर्वश्रेष्ठ पल :--- जिस क्षण मैं प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में सो कर उठता हूँ, वह जीवन का सर्वश्रेष्ठ आनंदमय समय होता है। उस क्षण परमात्मा स्वयं सो कर उठते हैं। सारी चेतना ब्रह्ममय होती है। प्रातः उठते ही थोड़ा सा उष:पान कर के लघुशंका आदि से निवृत होकर अर्ध-खेचरी मुद्रा में बैठ कर चेतना के ऊर्ध्वमूल में प्रकट हुई ब्रह्मज्योति (कूटस्थ-सूर्यमण्डल) में भगवान पुरुषोत्तम अपना ध्यान मुझे निमित्त बनाकर स्वयं करते हैं। भगवान पुरुषोत्तम की ही दूसरी अभिव्यक्ति परमशिव है। दोनों में कोई अंतर नहीं है। प्रातःकाल उठते ही किया गया ध्यान सर्वश्रेष्ठ होता है। इस चेतना में उठना तभी संभव होता है जब रात्रि को सोते समय हम ध्यान कर के जगन्माता की गोद में उसी तरह सोयें जैसे एक शिशु अपनी माँ की गोद में सोता है।
अमेरिकी वर्चस्व के दिन समाप्त होने वाले हैं, अमेरिका की अर्थव्यवस्था पतनोन्मुख है और शीघ्र ही नष्ट होने वाली है।
अमेरिकी वर्चस्व के दिन समाप्त होने वाले हैं, अमेरिका की अर्थव्यवस्था पतनोन्मुख है और शीघ्र ही नष्ट होने वाली है।