(प्रश्न) : मैं कौन हूँ? ---
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(उत्तर) : भारत का आध्यात्म और दर्शन इस प्रश्न के चारों ओर घूमता है कि मैं कौन हूँ। हम यह नश्वर शरीर तो नहीं हो सकते। यह शरीर इस लोकयात्रा के लिए मिला हुआ एक दोपहिया वाहन मात्र है। संसार में हमारी पहिचान इस वाहन से ही है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि हम एक शाश्वत आत्मा हैं, और जब यह शरीर रूपी वाहन जर्जर हो जाता है तब जीवात्मा इसे बदल लेती है। अंत समय की मति के अनुसार हमें दूसरी देह तुरंत मिल जाती है।
शास्त्र वचन सत्य हैं। लेकिन मैं परमात्मा के हृदय का परमप्रेम, और उनके साथ एक हूँ। मैं उनसे पृथक नहीं हो सकता। गीता में भगवान कहते हैं --
"अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥१०:८॥"
"मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥१०:९॥"
"तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१०:१०॥"
"तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥१०:११॥"
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परब्रह्म वासुदेव जगत की उत्पत्ति का कारण हैं। उन्हीं का चिंतन करना चाहिए। हमारा चित्त और प्राण उन्हीं में रत रहे, और उन से ही पूर्ण प्रेम हो। फिर उनका ज्योतिर्मय रूप हमारे समक्ष प्रकट होगा।
हमारी साधना मौन ही हो। किसी तरह के शोरगुल और दिखावे की आवश्यकता नहीं है। गीता के इसी दसवें अध्याय के ३८ वें श्लोक में भगवान कहते हैं --
"मौनं चैवास्मि गुह्यानां" अर्थात् गुप्त रखने योग्य भावों में मौन मैं हूँ।
जिस अनुपात में भगवान से प्रेम होता है, उसी अनुपात में उनकी कृपा होती है। उनको अपने हृदय का पूर्ण प्रेम देंगे तो पूर्ण प्रेम ही प्राप्त होगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० अगस्त २०२३
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