जीवन का सर्वश्रेष्ठ पल :--- जिस क्षण मैं प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में सो कर उठता हूँ, वह जीवन का सर्वश्रेष्ठ आनंदमय समय होता है। उस क्षण परमात्मा स्वयं सो कर उठते हैं। सारी चेतना ब्रह्ममय होती है। प्रातः उठते ही थोड़ा सा उष:पान कर के लघुशंका आदि से निवृत होकर अर्ध-खेचरी मुद्रा में बैठ कर चेतना के ऊर्ध्वमूल में प्रकट हुई ब्रह्मज्योति (कूटस्थ-सूर्यमण्डल) में भगवान पुरुषोत्तम अपना ध्यान मुझे निमित्त बनाकर स्वयं करते हैं। भगवान पुरुषोत्तम की ही दूसरी अभिव्यक्ति परमशिव है। दोनों में कोई अंतर नहीं है। प्रातःकाल उठते ही किया गया ध्यान सर्वश्रेष्ठ होता है। इस चेतना में उठना तभी संभव होता है जब रात्रि को सोते समय हम ध्यान कर के जगन्माता की गोद में उसी तरह सोयें जैसे एक शिशु अपनी माँ की गोद में सोता है।
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