Wednesday, 20 August 2025

क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ? --

 "Where Ganges, woods, Himalayan caves,

and men dream God -- I am hallowed,
my body touched that sod." (Paramahansa Yogananda)
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(Re-Posted) क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ? --- नहीं, हम वास्तव में स्वतंत्र नहीं है। हम न तो आध्यात्मिक दृष्टी से स्वतंत्र हैं, और न ही मानसिक दृष्टी से। आध्यात्मिक दृष्टी से हम अपनी वासनाओं के गुलाम हैं। मानसिक दृष्टी से हम अभी भी अंग्रेजियत के गुलाम हैं। जो तथाकथित आज़ादी हमें मिली, एक समझौते के अंतर्गत सत्ता का हस्तांतरण था; वह भी देश के विभाजन, और विश्व के सबसे बड़े नर-संहार के साथ। जिसे हम स्वतन्त्रता कहते हैं, वह क्या हमारी उच्शृन्खलता नहीं है?
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भारत की नष्ट हुई भव्य प्राचीन शिक्षा व कृषि व्यवस्था, और प्राचीन महानतम सभ्यता के ह्रास की पीड़ा असहाय होकर देखने को बाध्य हैं। देश में आरक्षण के नाम पर योग्यता की ह्त्या, जातिवाद, ओछी राजनीति, और भ्रष्टाचार व अन्याय देखकर यह सोचने को बाध्य हूँ कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं? हम अभी भी कॉमन वेल्थ के सदस्य क्यों हैं? हमारे संविधान में धारा 147 जैसी धाराएँ अभी भी अस्तित्व में क्यों हैं जो हमें हमें अभी भी अंग्रेजों का गुलाम ही मानती हैं?
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हमारी स्थिति कामायनी के मनु जैसी ही है जो ---
"हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह।
एक व्यक्ति भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय अथाह॥"
हम भी असहाय होकर उस अथाह प्रलय के साक्षी होने को बाध्य हैं।
प्रसाद जी के शब्दों में --
"जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तिष्क में स्मृति सी छायी।
दुर्दिन में आँसू बनकर वो आज बरसने आयी॥"
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मेरे विचार से असली स्वतंत्र वे ही है जो आध्यात्मिक दृष्टी से वीतराग, जीवनमुक्त, स्थितप्रज्ञ, व त्रिगुणातीत हैं, जिन्होने तुरीयावस्था को प्राप्त कर लिया है।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१५ अगस्त २०२३
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पुनश्च: --- "हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'
असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!" (जयशंकर प्रसाद)

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