प्राण-तत्व
प्राण-तत्व पर यह चर्चा तेरह वर्षों के पश्चात् कर रहा हूँ। प्राण-तत्व को बुद्धि से समझना असंभव है, क्योंकि यह अनुभव का विषय है, जिसे योग-साधना की अनुभूतियों द्वारा ही समझा जा सकता है।
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अष्टांग योग में प्रथम चार सोपान हैं --- यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान), आसन (स्थिर सुख से बैठने की विधि) और प्राणायाम। सांध्य क्रियाओं में भी प्राणायाम किया जाता है जो वर्तमान में एक श्वास-प्रश्वास का व्यायाम मात्र ही होकर रह गया है। प्राण-तत्व को समझे बिना प्राणायाम नहीं हो सकता।
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योग का अर्थ है -- जोड़ना। जो आत्मा को परमात्मा से, जीव को शिव से जोड़ता है वह योग है। योग है अपनी सूक्ष्म देह में अवस्थित महाशक्ति कुण्डलिनी को जागृत कर परमशिव से एकाकार करना।
योग साधना का उद्देश्य है --- परम शिवभाव को प्राप्त करना। चित्तवृत्ति निरोध इस लम्बी यात्रा में एक पड़ाव है, गंतव्य नहीं। गंतव्य है -- "सम्पूर्ण समर्पण"।
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चित्त स्वयं को दो रूपों --- वासनाओं व श्वाश-प्रश्वाश के रूप में व्यक्त करता है।वासनाएँ तो अति सूक्ष्म हैं जो पकड़ में नहीं आतीं। अतः आरम्भ में बीज मन्त्रों के साथ श्वाश-प्रश्वास पर ध्यान किया जाता है जिसे अजपा-जप (हंस:योग) कहते हैं। इस का अभ्यास करते करते मेरुदंड में प्राणशक्ति का आभास होता है, जिसके नियंत्रण से वासनाओं पर नियंत्रण होता है। आगे के मार्ग पर साधक गुरुकृपा से अग्रसर होता है।
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श्वास-प्रश्वाश भौतिक रूप से तो नाक से ही चलता है पर उसकी अनुभूति मेरुदंड में होती है। श्वाश-प्रश्वाश तो एक प्रतिक्रिया है, क्रिया नहीं। प्राण तत्व जो मेरुदंड में संचारित होता है, वह क्रिया है, जिस की प्रतिक्रया है सांस।
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जीवात्मा का निवास मस्तिकग्रंथि (मेरुशीर्ष/Medula Oblongata) व सहस्त्रारचक्र के मध्य में होता है। यह जीवात्मा ही है जो अपनी एक अभिव्यक्ति-- चित्त के द्वारा प्राण शक्ति का संचलन करता है, जिसकी प्रतिक्रिया-स्वरुप सांस चलती है। जब मेरुदंड में उस शक्ति की अनुभूति होने लगती है तब उसी की चेतना में "क्रिया-योग" साधना की जाती है। उस प्राण शक्ति का ही धनीभूत रूप है "कुण्डलिनी महाशक्ति"।
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योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय के अनुसार चंचल प्राण ही मन है। चंचल प्राण को स्थिर करके ही मन पर नियंत्रण किया जा सकता है। प्राणवायु सहस्त्रार में स्थिर रहता है, पर नीचे आने पर चंचल हो जाता है। प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान ये पञ्च प्राण यदि देह में समान रूप से स्थित रहें तो मन में कोई चंचलता नहीं रहती।
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ये पञ्च प्राण ही हैं जो ओंकार रूप गणेश जी के गण हैं। इन्हीं गणों के अधिपति होने के कारण इन्हें गणपति या गणेश कहते हैं। इन पञ्च प्राणों के पाँच सौम्य और पाँच उग्र रूप ही दस महाविद्याएँ हैं। इसलिए प्राणायाम की साधना श्रेष्ठ है।
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क्रिया-प्राणायाम द्वारा प्राण एवं अपान वायु स्थिर होते हैं। नाभि क्रिया द्वारा समान वायु, तथा महामुद्रा द्वारा उदान तथा व्यान वायु स्थिर होते हैं। इन साधनाओं के द्वारा पञ्च वायु स्थिर होने पर योनिमुद्रा (ज्योतिमुद्रा) द्वारा आत्मदर्शन होता है। प्राणायाम अनेक प्रकार के होते हैं पर सुषुम्ना स्थित षटचक्र प्राणायाम (क्रियायोग) सर्वश्रेष्ठ है। नदियों में गंगा, तीर्थों में काशी, मन्त्रों में गायत्री, और बीजों में प्रणव श्रेष्ठ है। वैसे ही साधनाओं में प्राणायाम की साधना श्रेष्ठ है।
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प्राण की साधना द्वारा सब देवि-देवताओं की साधना हो जाती है। धर्म कोई बाहरी अनुष्ठान नहीं है। पूरी सृष्टि धर्म से ही उत्पन्न और धर्म में ही स्थित है। धर्म के अस्तित्व में ही इसका अस्तित्व है। प्राण की चंचलता -- महामाया है। साधना के द्वारा जब जीव महास्थिर हो जाता है तब जीव जीव नहीं रहता, वह स्वयं शिव हो जाता है।
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परमात्मा बाहर से प्राप्त नहीं होते, स्वयं को ही परमात्मा होना पड़ता है| जीव का धर्म अपने उस मूल स्वरुप महास्थिर प्राण को पाना है| स्थिर प्राण ही ब्रह्म है। यही सोsहं अवस्था है|
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अष्टांग योग द्वारा प्राण को सुषुम्ना में चालित करते हैं जिसके परिणाम स्वरुप प्राण व मन सुषुम्ना के भीतर से ब्रह्मरंध्र में प्रवेश करता है। ब्रह्मरंध्र में प्रवेश के पश्चात चंचल प्राण व मन रुद्ध हो जाते हैं और योगी का मन परमानंद में डूब जाता है और समाधि की स्थिति प्राप्त होती है। यह जीवनमुक्ति की अवस्था है| यही निष्काम कर्म है।
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योग साधना के लिए भक्ति बहुत आवश्यक है। जब ह्रदय में एक तड़प, अभीप्सा और परम प्रेम हो तो सारे द्वार अपने आप खुल जाते हैं। सारे दीप जल उठते हैं और अंतर का समस्त अन्धकार दूर होने लगता है।
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आवश्यकता है सिर्फ एक अभीप्सा और परम प्रेम की। फिर समर्पण में अधिक समय नहीं लगता। जब समर्पण हो जाए तब और करने को कुछ भी शेष नहीं रहता। फिर सब कुछ परमात्मा ही करते हैं। ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ।
कृपा शंकर
५ अगस्त २०२५
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