अमेरिकी वर्चस्व के दिन समाप्त होने वाले हैं, अमेरिका की अर्थव्यवस्था पतनोन्मुख है और शीघ्र ही नष्ट होने वाली है।
.
अमेरिकी राष्ट्रपति कोई मूर्ख, आत्ममुग्ध, अहंकारी या बड़वोले राजनेता नहीं हैं, वे एक बहुत बड़े सफल व्यापारी और समझदार राजनेता हैं। उनके पास विश्व के अच्छे से अच्छे सलाहकार और कूटनीतिज्ञ हैं, लेकिन समय बड़ा बलवान होता है जो उनके देश के विरुद्ध है। जब से BRICS नाम का संगठन बना है, अमेरिका के बुरे दिन आरंभ हो चुके हैं। इस संगठन के पीछे का दिमाग भारत का है, और विश्व के सबसे बड़े पाँच देश -- रूस, चीन, भारत, दक्षिण-अफ्रीका, और ब्राज़ील इसके संस्थापक सदस्य हैं। इसका मुख्यालय जान-बूझकर चीन में रखा गया है। इसके सदस्य देशों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।
.
BRICS के देशों की आपसी समझ है कि वे व्यवसायिक लेनदेन में डॉलर में भुगतान न कर के अपनी स्थानीय मुद्रा में ही करेंगे। इससे डॉलर का महत्व कम होता जा रहा है। जिस दिन अमेरिकी डॉलर का महत्व समाप्त हो गया उसी दिन अमेरिकी दादागिरी समाप्त हो जायेगी।
.
रूस - यूक्रेन युद्ध ने भी अमेरिका की आर्थिक कमर तोड़ दी है जिसे अमेरिका छिपा रहा है। यह युद्ध अमेरिका लड़ रहा है, यूक्रेन के केवल सैनिक मर रहे हैं। यह युद्ध पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो वाइडेन और उनके अफीमची बेटे हंटर वाइडेन के शैतानी दिमाग की उपज है। उन्होने तुर्की के माध्यम से यूक्रेन में खूब अफीम बेची और और एक बहुत बड़े वर्ग को अफीमची बना दिया। उस पैसे से वहाँ की चुनी हुई सरकार के विरुद्ध जम कर प्रचार हुआ, वैसा ही जैसा इस समय भारत में हो रहा है। वहाँ के चुने हुए राष्ट्रपति विक्टर यानूकोविच को देश छोड़कर भागना पड़ा। अमेरिकी डॉलर के ज़ोर से चलचित्रों के नशेड़ी विदूषक जेलेंस्की को यूक्रेन का राष्ट्रपति बना दिया गया, जिसके दिमाग पर अमेरिकी डीप स्टेट का पूरा अधिकार है।
.
फिर अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित यूक्रेनी अजोव बटालियन द्वारा रूसी मूल के लोगों का जन-संहार आरंभ कर दिया गया। छोटे छोटे शिशुओं को भी नहीं छोड़ा गया। वहाँ ऐसी प्रयोगशालाएँ खोली गयीं, जिन में कुछ ऐसे रसायनों पर अनुसंधान होने लगा जिन से पूरी रूसी नस्ल को ही निर्वीर्य और अपंग बनाया जा सके। रूस को यह युद्ध छेड़ने को बाध्य किया गया। रूस ने युद्ध आरंभ होते ही ऐसी सब प्रयोगशालाओं को नष्ट कर दिया।
.
अमेरिका ने अरबों डॉलर के हथियार रूस के विरुद्ध लड़ने के लिए अपने कठपुतली देश यूक्रेन को दिये। अमेरिका को उम्मीद थी कि वह एक तो इस युद्ध में अपने परम शत्रु देश रूस को नष्ट कर देगा। दूसरी उम्मीद थी कि यूक्रेन की धरती उसे मिल जाएगी जिस के भूगर्भ से वह अनमोल खनिजों का दोहन कर सकेगा और वहाँ की अति उपजाऊ भूमि से उत्पन्न गेंहूँ के व्यापार को अपने नियंत्रण में ले सकेगा। अमेरिका को यह भी उम्मीद थी कि यूक्रेन के नष्ट हुए नगरों के पुनर्निर्माण का ठेका भी उसे मिल जायेगा। लेकिन अमेरिका की आशा -- निराशा में बदल गयी जब रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने यह स्पष्ट कर दिया कि ---
"इस युद्ध में जितनी भूमि पर रूस ने अधिकार किया है वह स्थायी रूप से रूस की हो गयी है, उसे बापस नहीं किया जायेगा, अमेरिका को पुनर्निर्माण का ठेका नहीं मिलेगा और पूरे यूक्रेन पर भी रूस अपना अधिकार कर के रखेगा; उसे NATO का सदस्य नहीं बनने दिया जायेगा।"
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की निराशा और अवसाद का कारण यही है।
.
NATO के यूरोपीय देश अमेरिका का खून चूस रहे हैं, बदले में कुछ भी नहीं दे रहे हैं। यह भी अमेरिका के पतन के कारणों में से एक होगा। दादागिरी और धौंस सदा नहीं चल सकती। क्रीमीया के ऊपर मैं बहुत लिख चुका हूँ। उसे दुबारा नहीं लिखना चाहता। उस पर रूस ने अधिकार अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों के अंतर्गत ही किया है। रूस और यूक्रेन दोनों ही देशों में मैं रह चुका हूँ। अतः दोनों के बारे में मुझे अच्छी समझ है। आप सब को धन्यवाद॥
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२५
No comments:
Post a Comment