वासनात्मक चिंतन से जीवन में न चाहते हुए भी हमारा व्यवहार राक्षसी हो जाता है। हम असुर/पिशाच बन जाते हैं, और गहरे से गहरे गड्ढों में गिरते रहते हैं। ऐसी परिस्थिति न आये, इस के लिए एक ही उपाय है -- निरंतर परमात्मा का चिंतन, और परमात्मा को पूर्ण समर्पण।
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मैंने एक-दो बड़े बड़े ज्ञानी पुरुषों को भी जीवन में राक्षस होते हुए देखा है। हमारे विचार ही हमें गिराते हैं और विचार ही हमारा उत्थान करते हैं। जैसा हम सोचते हैं, वैसे ही बन जाते हैं। मेरा एकमात्र उद्देश्य अपनी सम्पूर्ण चेतना और अस्तित्व का परमात्मा में पूर्ण विलय करना है। समष्टि के कल्याण के अतिरिक्त अन्य कोई बात मेरी चेतना में आती ही नहीं है।
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आपको परमात्मा की ध्यान साधना में कोई कठिनाई आती है तो मुझसे परामर्श कर सकते हैं। अन्यथा मैं उपलब्ध नहीं हूँ।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२० अगस्त २०२५
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