Wednesday, 18 March 2026

शीश कटा खाटू लड़े महंत मंगलदास ---

 शीश कटा खाटू लड़े महंत मंगलदास ---

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आजकल श्याम जी खाटू का मेला चल रहा है। मुख्य मेला फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वादसी को पड़ता है। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी के दिन से ही मेले का आरंभ हो गया है, जो होली तक चलेगा। कुम्भ के मेले के पश्चात सर्वाधिक भीड़ इस मेले में होती है। भगवान की भक्ति की पराकाष्ठा देखनी हो तो इस मेले से अधिक अच्छा संभवतः ही अन्यत्र कहीं देखने को मिलेगा। हर रास्तों से लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ इस समय हाथों में ध्वज लिए पैदल ही भजन-कीर्तन करते हुए खाटू की ओर बढ़ रही है। थोड़ी थोड़ी दूर पर हज़ारों सेवार्थी -- आगंतुकों की सेवा में खड़े हैं। एकादशी को तो पूरी रात ही भजन-कीर्तन होते हैं, कोई नहीं सोता। यह मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में पड़ता है। सबसे समीप का रेलवे स्टेशन रींगस है। राजस्थान में शेखावाटी की संस्कृति और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति ही देखनी हो तो एक बार यहाँ अवश्य आना चाहिए। प्रशासन और स्वयंसेवकों के द्वारा बहुत अच्छी व्यवस्था रहती है।
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इस स्थान की महिमा और कथा का वर्णन पौराणिक है। इस मंदिर का विस्तृत इतिहास राजस्थान पत्रिका के "नगर परिक्रमा" स्तम्भ के अंतर्गत एक बार छपा था। दो बार मुग़ल शासकों ने इस मंदिर को तोड़ा था। एक बार तो औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। उस समय इस मंदिर की रक्षा के लिए अनेक क्षत्रियों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था। फिर दुबारा मुग़ल बादशाह फर्रूखशियर ने इसको तोड़ा था तब क्षेत्र के क्षत्रियों और दादुपंथी नागा साधुओं के साथ साथ अनेक ब्राह्मणों ने भी शस्त्र उठाकर युद्ध किया था। उस समय नागा साधुओं के महंत मंगल दास और उनके भंडारी सुन्दर दास की कथा बहुत प्रसिद्ध हुई थी। उनके सिर कट गये पर धड़ युद्ध करते करते मुग़ल सेना के अन्दर तक चले गये गये, जिससे डर कर मुग़ल सेना भाग खड़ी हुई। मुगल बादशाह फर्रूखशियर ने उनके पैरों में पड़कर माफी माँगी और स्वयं को गाफिल बताया तब जाकर वे धड़ शांत हुए। तब एक कहावत पड़ी थी—"शीश कटा खाटू लड़े महंत मंगलदास"। फिर कभी मुग़ल सेना का इस ओर आने का साहस नहीं हुआ।
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यहाँ श्रद्धालुओं की भक्ति और लगन देखकर कोई भी भावविह्वल हो जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण और उनके भक्त बर्बरीक की जय, जिनका भव्य मंदिर खाटू ग्राम में खाटू श्याम जी के नाम से प्रसिद्ध है। जय हो।
कृपा शंकर
२६ फरवरी २०२६
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पुनश्च: -- खाटू श्याम (बर्बरीक) की कथा मुख्य रूप से स्कंद पुराण के अंतर्गत वर्णित है। स्कंद पुराण के 'माहेश्वर खंड' के 'कौमारिक खंड' (अध्याय 59 से 66) में बर्बरीक के शीशदान और उनके भगवान कृष्ण द्वारा 'श्याम' नाम पाने की विस्तृत दिव्य कथा दी गई है। यह कहानी महाभारत काल से जुड़ी है

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