मैं भगवान की निगाह में हर समय हूँ, वे हर समय मुझे देख रहे हैं, मेरा कोई भी विचार उनसे छिपा हुआ नहीं है। मुझे इस बात का पता बहुत देरी से चला। उनसे प्रेम को मैं कैसे व्यक्त करूँ? कुछ समझ में नहीं आ रहा है।
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गीता में तो उनका आदेश है --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
मेरी सीमित तुच्छ बुद्धि से कुछ समझ में नहीं आ रहा है। हृदय में एक प्रचंड अग्नि प्रज्ज्वलित है। ऐसा लगता है जैसे कि मेरे सिर पर किसी ने जलते हुए कोयलों से भरी हुई एक परात रख दी है। यह अग्नि मुझे भस्म भी नहीं कर रही है। केवल पीड़ा दे रही है, जिसमें भी एक आनंद छिपा है।
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भगवान तो कहते हैं कि -- "मद्भक्तः" -- अर्थात् जो मुझे प्रेम करता है वह मेरा ही स्वरूप होगा। भगवान् ने असीम प्रेम को ही मोक्ष का साधन बतलाया है। वह प्रेम क्या है? यही जानना चाहता हूँ। भक्त बनें तो कैसे बनें ? अपनी सब कमियाँ अब भगवान को वापस सौंप रहा हूँ। उन से मेरी एकमात्र प्रार्थना है कि वे मेरे प्रेम को अपनी पूर्णता प्रदान करें। उन की और आप सब की जय हो।
कृपा शंकर
२२ फरवरी २०२६
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