Tuesday, 20 January 2026

अपनी बुद्धि परमात्मा को बापस कर दें ---

 अपनी बुद्धि परमात्मा को बापस कर दें ---

श्रुति भगवती के आदेशानुसार बुद्धिमान् ब्राह्मण को चाहिए कि परमात्मा को जानने के लिए उसी में बुद्धि को लगाये, अन्य नाना प्रकार के व्यर्थ शब्दों की ओर ध्यान न दे, क्योंकि वह तो वाणी का अपव्यय मात्र है|
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः |
नानुध्यायाद् बहूब्छब्दान्वाची विग्लापन हि तदिति ||बृहद., ४/४/२९)
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नित्य की प्रार्थना --
"वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् | देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् ||"
"वंशी विभूषित करा नवनीर दाभात्,
पीताम्बरा दरुण बिंब फला धरोष्ठात् |
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादर बिंदु नेत्रात्,
कृष्णात परम किमपि तत्व अहं न जानि ||"
"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||"
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च,
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्||"
"कस्तुरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु करे कंकणम् |
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावलि |
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी ||"
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||"
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कृपा शंकर
२० जनवरी २०२०

निष्काम कर्मयोग ---

निष्काम कर्मयोग ---
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अपने आप को बिना किसी शर्त के व बिना किसी माँग के भगवान के हाथों में सौंप कर निरंतर उनका चिंतन -- निष्काम कर्म है, यही कर्मयोग है और यही ध्यान है| कोई भी कामना कभी तृप्त नहीं करती, कामनाओं से मुक्ति ही तृप्ति है| परमात्मा में स्थित होकर ही तृप्त हो सकते हैं| भगवान के ध्यान में साधक भी वे हैं, साधना भी वे हैं और साध्य भी वे ही हैं| यहाँ तक कि दृष्य, दृष्टी और दृष्टा भी वे ही हैं|
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२०

भारत एक धर्मनिष्ठ राष्ट्र है, जिसका लक्ष्य सनातन काल से ही धर्म की स्थापना रहा है ---

अब समय आ गया है जब धर्मरक्षा हेतु सनातन हिन्दू धर्मावलम्बी अपने धर्म का पालन करें| हिन्दू धर्म, व देवी-देवताओं के अपमान की सजा मृत्यु-दंड हो| हिन्दू आस्थाओं पर अधर्मियों द्वारा निरंतर मर्मांतक प्रहार किए जा रहे हैं, जो अब असह्य हैं|

देश के संविधान से हिन्दू विरोधी धाराएँ हटाई जाएँ| समान-नागरिक-संहिता लागू हो, और जनसंख्या पर नियंत्रण किया जाये| अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक अवधारणाओं को परिभाषित किया जाये|
भारत एक धर्मनिष्ठ राष्ट्र है, जिसका लक्ष्य सनातन काल से ही धर्म की स्थापना रहा है| कृपा शंकर २० जनवरी २०२१

माँ ---

 माँ ---

प्राण-तत्व के रूप में, इस देह की सुषुम्ना नाड़ी में मूलाधार से ब्रह्मरंध्र, व उस से भी परे तक, विचरण कर रही जगन्माता ही मेरे प्राण, और यह जीवन है|
पूरी सृष्टि को उन्होने ही धारण कर रखा है| घनीभूत होकर वे ही कुंडलिनी महाशक्ति हैं| सारी क्रियाएँ वे ही कर रही हैं|
मुझे निमित्त बनाकर, परमशिव का ध्यान भी वे स्वयं ही कर रही हैं| वे ही मेरे गति है| उन माँ भगवती के श्रीचरणों में मैं नतमस्तक हूँ|
२० जनवरी २०२१