निष्काम कर्मयोग ---
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अपने आप को बिना किसी शर्त के व बिना किसी माँग के भगवान के हाथों में सौंप कर निरंतर उनका चिंतन -- निष्काम कर्म है, यही कर्मयोग है और यही ध्यान है| कोई भी कामना कभी तृप्त नहीं करती, कामनाओं से मुक्ति ही तृप्ति है| परमात्मा में स्थित होकर ही तृप्त हो सकते हैं| भगवान के ध्यान में साधक भी वे हैं, साधना भी वे हैं और साध्य भी वे ही हैं| यहाँ तक कि दृष्य, दृष्टी और दृष्टा भी वे ही हैं|
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२०
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