Wednesday, 18 March 2026

अव्यभिचारिणी भक्ति और अनन्य योग --- .

 अव्यभिचारिणी भक्ति और अनन्य योग ---

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अब समय आ गया है। हमें बाहर की विपरीततम निराशाजनक परिस्थितियों से ऊपर उठकर, परमात्मा से परमप्रेम जागृत कर, उन के प्रकाश का निरंतर विस्तार करते हुए स्वयं को ब्रह्मभाव में स्थित होना होगा। यह निरंतर ब्रह्मभाव ही हमारा लक्ष्य हो, यही हमारी रक्षा कर सकता है। अन्य कोई उपाय नहीं है। यही कर्मयोग, भक्तियोग व ज्ञानयोग है।
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मुझे आजकल ठीक से नींद आनी बंद हो गयी है। चौबीस घंटों में बड़ी कठिनाई से कुल मिलाकर दो घंटे से अधिक सो नहीं पाता। किसी भी तरह की कोई औषधि प्रभाव नहीं करती। यह इस जीवन का संध्याकाल यानि अंतिम अध्याय है, अतः इस समय का उपयोग परमात्मा के चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान में ही हो। अभीप्सा केवल परमात्मा की सर्वव्यापक अनंतता में सम्पूर्ण समर्पण की हो। भगवान की उपासना ही उनकी सेवा है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने एक बहुत बड़ा आश्वासन दिया है --
"मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४:२६॥"
अर्थात् - जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है॥ And he who serves Me and only Me, with unfaltering devotion, shall overcome the Qualities and become One with the Eternal.
आचार्य शंकर के अनुसार -- मां च ईश्वरं नारायणं सर्वभूतहृदयाश्रितं यो यतिः कर्मी वा अव्यभिचारेण न कदाचित् यो व्यभिचरति भक्तियोगेन भजनं भक्तिः सैव योगः तेन भक्तियोगेन सेवते सः गुणान् समतीत्य एतान् यथोक्तान् ब्रह्मभूयाय भवनं भूयः ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय मोक्षाय कल्पते समर्थो भवति इत्यर्थः॥
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परमात्मा से अतिरिक्त अन्य किसी भी कामना या चाहत को भगवान ने व्यभिचार की संज्ञा दी है। अतः परमात्मा से अतिरिक्त अन्य किसी कामना का जन्म ही न हो। यही अनन्य-योग है, जो हमें पुरुषोत्तम तक ले जाकर उनमें स्थित करता है। यही भगवान को समर्पण है। जो पुरुषोत्तम हैं वे ही परमशिव हैं। उनसे परे कुछ भी नहीं है। उनकी अनुभूति ही इस जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।
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इससे पूर्व भगवान कह चुके हैं --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् -- अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
Unswerving devotion to Me, by concentration on Me and Me alone, a love for solitude, indifference to social life.
(आचार्य शंकर का इस विषय पर भाष्य थोड़ा लंबा है इसलिए उसे यहाँ उद्धृत नहीं कर रहा हूँ।)
अव्यभिचारिणी का अर्थ है -- अविभाजित अनन्य निश्चल प्रेम। ऐसी भक्ति जिस में मन ईश्वर से अतिरिक्त कहीं और भटकता नहीं है। अनन्ययोग का अर्थ है -- केवल भगवान का आश्रय लेना, किसी अन्य का नहीं। प्रतिकूलता या अनुकूलता आने पर भी भगवान की भक्ति से विचलित न होना। विविक्तदेशसेवित्व: का अर्थ है एकांत स्थान में रहने का स्वभाव जो ध्यान और साधना के लिए उपयुक्त हो।
जनसंसदि अरतिः का अर्थ है अध्यात्म-विमुख लोगों की भीड़ में रुचि न होना। यह अव्यभिचारिणी भक्ति तीनों तीन गुणों (सत्त्व रज तम) से ऊपर उठाकर ब्रह्मज्ञान (ब्रह्मभूयाय) प्राप्त करने में सहायक होती है।
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रामचरितमानस में दूसरी तरह से बहुत संक्षेप में लिखा है --
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥"
रामचरितमानस में "अनपायिनी भक्ति" शब्द का प्रयोग किया गया है। सुंदरकांड में हनुमानजी ने प्रभु राम से वरदान मांगते हुए कहा --
"नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी"
(हे नाथ! मुझे अत्यंत सुख देने वाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिए)।
इसका गूढ़ार्थ भी लगभग वही निकलता है।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२८ फरवरी २०२६

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