Wednesday, 18 March 2026

हम जल की एक बूंद नहीं, यह सम्पूर्ण महासागर ही हम स्वयं हैं ---

 हम जल की एक बूंद नहीं, यह सम्पूर्ण महासागर ही हम स्वयं हैं ---

.
परमात्मा के ऊर्ध्वस्थ महासागर में जल की एक बूंद की तरह हम तैर ही नहीं रहे, बल्कि वह सम्पूर्ण महासागर ही हम स्वयं हैं। परमात्मा में और हम में कोई भेद नहीं है। परमात्मा ही हमारा निज-स्वरूप है। अपने निज स्वरूप का ही ध्यान हम करें।
.
द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार -- ये सब मन की अवस्थाएँ हैं, इन की ओर ध्यान न दें। हमारा ध्यान परमात्मा की संपूर्णता पर ही हो, जो हम स्वयं हैं। हमारे में बहुत अधिक कमियाँ हैं, उनकी ओर भी ध्यान न दें। वे सब कमियाँ परमात्मा को बापस सौंप दें। हमारे गुण-अवगुण सब परमात्मा के हैं, हमारा कुछ भी नहीं। हम परमात्मा की संपूर्णता हैं। उस संपूर्णता की चेतना में ही रहें, और उसी का ध्यान करें।
.
मुझे प्रेरणा मिल रही है तंत्र के 'सृष्टि बीज', 'संहार बीज', 'अजपा जप' और 'हंस गायत्री' के ऊपर कुछ चर्चा करने की। अतः कम से कम शब्दों में उस विषय पर ही कुछ चर्चा कर रहा हूँ। इस लेख में
.
नारायण ! जब हम सामान्यतः साँस लेते हैं तब स्वाभाविक रूप से "हं" की ध्वनी उत्पन्न होती है, यह ध्वनी 'संहार बीज' है| और जब साँस छोड़ते हैं तब "सः" की ध्वनी उत्पन्न होती है, यह 'सृष्टि बीज' है| जब हम निरंतर चल रही इन ध्वनियों को सजग होकर सुनते हैं तब "हं सः" मन्त्र बनता है| यह एक बहुत उन्नत साधना है जो "अजपा-जप" कहलाती है| साँस लेते समय "हं" का मानसिक जाप, और छोड़ते समय "सः" का मानसिक जाप "अजपा गायत्री" कहलाता है| अचेतन रूप से हर मनुष्य इस मन्त्र का दिन में लगभग २१,६०० बार जाप करता है| अति उन्नत साधकों का क्रम स्वतः बदल जाता है, और यह मन्त्र "हंसः" से "सोहं" हो जाता है|
.
नारायण ! इस साधना में साधक भ्रूमध्य में एक प्रकाश की भावना करता है जिसे वह समस्त ब्रह्मांड में फैला देता है और यह भाव रखता है की मैं सर्वव्यापी ज्योतिर्मय हूँ, यह देह नहीं| धीरे धीरे यह प्रकाश निरंतर दिखाई देने लगता है और कूटस्थ में ओंकार की ध्वनी सुनाई देने लगती है| यह एक बहुत उन्नत साधना है अतः परमात्मा को समर्पित होकर पूर्ण भक्तिभाव से करनी चाहिए|
.
ॐ तत्सत् ! ॐ शिव ! तत्वमसि ! सोsहं | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२२ फरवरी २०२६

No comments:

Post a Comment