मैंने अनेक वर्षों पूर्व एक बात कही थी कि भारत को एक ब्रह्मतेज (ब्रह्मशक्ति) की आवश्यकता है। वह आवश्यकता अभी तो तुरंत है और भविष्य में भी सदा ही रहेगी। अनेक साधकों की एक गहन और समर्पित आध्यात्मिक साधना और पराविद्याओं के ज्ञान से ब्रह्मतेज जागृत होगा, केवल बातों से नहीं। ब्रह्मतेज जागृत होगा तो क्षात्रतेज भी जागृत होगा। भारत को ब्रह्मतेज़ और क्षात्रतेज दोनों की ही तुरंत आवश्यकता है। पराविद्या ही मनुष्य को भौतिक बंधनों से मुक्त कर सकती है।
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वर्ण-व्यवस्था और क्षत्रिय राजाओं का राज्य भारत में पुनः स्थापित होगा। पूरे विश्व में धर्म की पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा। धर्म केवल एक सनातन ही है जिसके दस लक्षण मनुस्मृति में बताये गये हैं। वैशेषिक सूत्रों में धर्म को परिभाषित किया गया है। महाभारत में इसे विस्तार से समझाया गया है।
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ध्यान-साधना, गीतापाठ, शिवपूजा आदि तो नित्य करनी ही चाहिये। गीता के सांख्य-योग (अध्याय २) को समझना बहुत आवश्यक है। उसको समझे बिना आगे कुछ भी समझ में नहीं आयेगा। इसी अध्याय में भगवान हमें निर्द्वंद्व, नित्यसत्वस्थ, निर्योगक्षेम, आत्मवान और निस्त्रैगुण्य होने का उपदेश देते हैं। इसी अध्याय में भगवान हमें वीतराग व स्थितप्रज्ञ होकर ब्राह्मी-स्थिति में स्थित होने को कहते हैं।
तंत्र, योग और भक्ति तीनों की ही आवश्यकता आध्यात्मिक साधना के लिए है। केवल आध्यात्मिक साधक ही ब्रह्मतेज को व्यक्त कर सकते हैं।
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ॐ तत् सत् ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१० फरवरी २०२६
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