जो इसी जीवन में भगवत्-प्राप्ति करना चाहते हैं, ऐसे सत्यनिष्ठ मुमुक्षु ही मेरे मित्र-संकुल में रहें। भगवान मिलें या न मिलें, यह उनकी समस्या है। हमारा कार्य तो उनका उपकरण बनकर उनके प्रकाश का निरंतर विस्तार करना है। इसके लिए भक्ति, योग व तंत्र आदि सभी साधन उपलब्ध हैं।
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मुझे किसी भी तरह का कोई संशय या कोई आकांक्षा नहीं है। मैं धर्म-अधर्म और पाप-पुण्य से परे हूँ। मेरे लिए कोई कर्तव्य, लक्ष्य या उपलब्धि नहीं है। मैं स्वयं ही हर कर्तव्य, हर लक्ष्य, व हर उपलब्धि हूँ। मैं यह देह नहीं बल्कि असीम सम्पूर्ण अनंतता व उससे भी परे का सम्पूर्ण अस्तित्व हूँ। मेरे सिवाय कोई अन्य नहीं है।
शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ अहं ब्रह्मास्मि॥ ॐ शिव शिव शिव॥
कृपा शंकर
१५ फरवरी २०२६
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