मेरे पास अधिक समय नहीं बचा है, इस शरीर में भी अधिक शक्ति नहीं रही है, इसलिए मुझे अपना निमित्त मात्र बनाकर भगवान अपनी साधना स्वयं करते हैं। आजकल स्वाध्याय भी वे केवल श्रीमद्भगवद्गीता का ही कर रहे हैं। चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान भी वे केवल आत्म-तत्व यानी आत्मा का ही करते हैं। मैं केवल एक अस्तित्वहीन निमित्त साक्षी मात्र ही रह गया हूँ। वास्तव में एकमात्र अस्तित्व केवल परमात्मा का है, उनसे पृथक कोई अस्तित्व नहीं है।
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वेदों का सार उपनिषदों में है। उपनिषदों का सार श्रीमद्भगवद्गीता में है। और श्रीमद्भगवद्गीता का सार पुरुषोत्तम-योग में है। पुरुषोत्तम योग से ऊंची कोई अन्य साधना नहीं है। यह ऊंची से ऊंची और बड़ी से बड़ी साधना है। जो पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं। परमात्मा की परम कृपा से ही यह बात समझ में आ सकती है। जो क्रियावान हैं, यानि जो क्रियायोग की साधना करते हैं, वे भी इसे बहुत अच्छी तरह से समझ सकते हैं।
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अपनी परमकृपा कर के जगद्गुरु रूप में भगवान श्रीकृष्ण, या दक्षिणामूर्ति रूप में भगवान शिव ही यह बात समझा सकते हैं। दोनों में कोई भेद नहीं है। श्रुति भगवती की आज्ञानुसार सर्वप्रथम किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय (जिन्हें वेदों का ज्ञान हो) आचार्य के मार्गदर्शन में बड़ी विनम्रता से उनका आश्रय लेकर साधना का आरंभ करें। तभी कल्याण होगा।
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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ फरवरी २०२६
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