Wednesday, 18 March 2026

कर्ता कौन है? हम ईश्वर को कैसे प्राप्त हों? हमारी क्या पात्रता हो?

 गीता में भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार इस सृष्टि में तीनों गुणों से अतिरिक्त अन्य कोई भी कर्ता नहीं है। ईश्वर त्रिगुणातीत है, अतः ईश्वर से जुड़कर ही हम निस्त्रेगुण्य हो सकते हैं। यही अमृतत्व को प्राप्त करने का मार्ग है। पर यह कैसे संभव हो? भगवान इसका मार्ग बताते हैं --

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४;२६॥"
अर्थात् -- जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों से अतीत होकर ब्रह्म बनने योग्य हो जाता है॥
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ईश्वर से अतिरिक्त अन्य किसी भी कामना के होने को भगवान ने व्यभिचार की संज्ञा दी है, और अनन्य-योग व वैराग्य को साधन बताया है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिर्व्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् -- अनन्ययोग के द्वारा मुझ में अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
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भगवान ने स्वयं को अमृत, अव्यय, ब्रह्म, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा बताया है। जितनी मात्रा में अहंकार तिरोहित होता है, उतनी ही मात्रा में आत्मा की दिव्यता अभिव्यक्त होती है। प्रतिष्ठा का अर्थ है — जिसमें वस्तु की स्थिति होती है। भगवान ने स्वयं को अमृत और अव्यय ब्रह्म की प्रतिष्ठा बताया है, अतः वे प्रत्यगात्मा यानी परमात्मा हैं।
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अनन्य-योग और अव्यभिचारिणी भक्ति से भजन करते करते भगवान हमारे समक्ष शनैः शनैः स्वयं को अनावृत करते हैं। यदि इससे आगे की कोई और भी विद्या है तो भगवान उसका भी बोध हमें कराते हैं। उनकी विशेष कृपा के हम पात्र बनें। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के अनुशासन पर्व में महाराजा युधिष्ठिर को भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उपदेश दिया है।
ॐ तत् ॐ सत्॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२६

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