Wednesday, 18 March 2026

मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "आत्म-साक्षात्कार" है ---

 मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "आत्म-साक्षात्कार" है ---

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संक्षेप में यानि कम से कम शब्दों में आज मैं उस विषय पर बात कर रहा हूँ जो मेरे अब तक के समस्त अनुभवों और अर्जित ज्ञान का सार है। उसी में तल्लीन और तन्मय होकर अवशिष्ट जीवन परमात्मा को समर्पित है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - " हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥"
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मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "आत्म-साक्षात्कार" (Self-Realization) यानि "ब्रह्म" (Ultimate Reality) के साथ एकत्व की अनुभूति है। यह उच्चतम स्थिति है जिसे "तुरीय चेतना" भी कहते हैं। यह विशुद्ध जागरूकता की स्थिति है जिसमें हम इस सत्य को अनुभूत करते हैं कि हम यह अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) नहीं, बल्कि एक साक्षी आत्मा हैं। अंततः यह साक्षी भाव भी तिरोहित हो जाता है। हम स्वयं ब्रह्ममय हो जाते हैं।
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ध्यान, मौन, भक्ति और समर्पण -- ये मार्ग हैं, जो हमें वीतरागता, स्थितप्रज्ञता, और समत्व में स्थित करते हैं। इस अवस्था यानि स्थिति में व्यक्ति को किसी भी तरह का कोई मोह या भ्रम नहीं रहता। सुख-दुःख, लाभ-हानि जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी साधक विचलित नहीं होता।
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इस आलेख का उद्देश्य कम से कम शब्दों में परम सत्य को व्यक्त करना है। इस का विस्तार श्रीमद्भगवद्गीता और सारे उपनिषद हैं।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ फरवरी २०२६

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का हरिःहर रूप ---

 श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का हरिःहर रूप ---

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भगवान हरिःहर हैं। हरिः और हर में कोई भेद नहीं है। हरिः — भगवान विष्णु को कहते हैं, और हर — भगवान शिव को। इनमें भेद करना महापाप है। भगवान शिव और भगवान विष्णु एक ही निराकार ब्रह्म (परम सत्य) की दो अभिव्यक्तियाँ हैं। वे एक-दूसरे के पूरक हैं, न कि पृथक-पृथक।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो अपना विराट, सर्वव्यापी, अनंत दिव्य विश्वरूप दिखाया है, भगवान का वह महाकाल रूप है, जिसमें हम पूर्ण भक्तिभाव से अपनी पृथकता के सम्पूर्ण बोध का समर्पण करते हैं। महाकाल ही शिव हैं। उसी रूप का हम उपासना में ध्यान करते हैं। भगवान विष्णु की पूजा तो उनके सौम्य चतुर्भुज रूप की होती है, लेकिन ध्यान उनके विश्वरूप का ही होता है। इस विश्व रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड, देवता, ऋषि, ग्रह-नक्षत्र, और काल (समय) समाहित होता है।
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गीता में श्रीभगवान ने स्वयं को (महा) काल बताया है --
"कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वेयेऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥११:३२॥"
अर्थात् - श्रीभगवान् ने कहा -- "मैं लोकों का नाश करने वाला प्रवृद्ध काल हूँ। इस समय, मैं इन लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हूँ। जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा हैं, वे सब तुम्हारे बिना भी नहीं रहेंगे॥ (११:३२)"
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इससे अगले मंत्र में भगवान हमें निमित्त मात्र होने का उपदेश देते हैं --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३)"
अर्थात् - "इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥ (११:३३)"
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गीता में इससे पहिले भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को रुद्र और शंकर भी बता चुके हैं --
"रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥१०:२३॥"
अर्थात् - " मैं (ग्यारह) रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धनपति कुबेर (वित्तेश) हूँ; (आठ) वसुओं में अग्नि हूँ तथा शिखर वाले पर्वतों में मेरु हूँ॥ (१०:२३)"
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हरिः (विष्णु) और हर (शिव) सनातन धर्म में एक ही ब्रह्म (सर्वोच्च चेतना) के दो अभिन्न रूप हैं, जिनमें कोई भेद नहीं है। हरि पालनकर्ता हैं तो हर संहारक, जो मिलकर सृष्टि का संतुलन बनाते हैं। दोनों ही भक्तों के पापों का हरण करते हैं। शिव, विष्णु का ध्यान करते हैं और विष्णु, शिव की पूजा करते हैं। हरिः और हर मिलकर एक ही "हरिःहर" रूप बनते हैं, जो समानता का प्रतीक है। भगवान विष्णु के बिना शिव प्रसन्न नहीं होते और शिव के बिना विष्णु की कृपा नहीं मिलती। "हरिः" का अर्थ है दुखों को हरने वाला (विष्णु), और "हर" का अर्थ है बुराइयों का नाश करने वाला (शिव)।
स्कन्द पुराण तो यहाँ तक कहता है -- "ॐ नमः शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे। शिवस्य हृदयं विष्णुं विष्णोश्च हृदयं शिवः॥"
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कहीं पढ़ा था कि बिहार के सोनपुर में हरिःहर का एक प्रसिद्ध मंदिर भी है, जहां दोनों की एक साथ पूजा की जाती है। भगवान हरिःहर को नमन।
गीता में अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति ---
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥"
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ॐ तत् ॐ सत्॥ ॐ स्वस्ति॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ "ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिव च शिवतराय च।"
कृपा शंकर
१४ फरवरी २०२६

शिवरात्रि की मंगलमय अनंत शुभ कामनाएं ---

 शिवरात्रि की मंगलमय अनंत शुभ कामनाएं ---

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शिवरात्रि तो एक बहाना है, अन्यथा निरंतर सर्वव्यापक सर्वस्व परमशिव की चेतना ही मेरा अस्तित्व है। शिवलिंग उनका प्रतीक चिह्न है। पूरा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि, सारा अस्तित्व एक शिवलिंग है। वह परम मंगल और कल्याणकारी परम-चैतन्य जिसमें सब का विलय हो जाता है -- स्थूल जगत का सूक्ष्म जगत में, सूक्ष्म जगत का कारण जगत में, और कारण जगत का सभी आयामों से परे तुरीय चेतना में, -- उस का प्रतीक है शिवलिंग। उसकी अनुभूति कूटस्थ में होती है। उस पर ध्यान से चेतना ऊर्ध्वमुखी होने लगती है। लिंग का शाब्दिक शास्त्रीय अर्थ है -- विलीन होना। शिवत्व में विलीन होने का प्रतीक है शिवलिंग।
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पहले जब मैं अपनी साधना स्वयं करता था, तो तत्व की अनेक बातें लिखता था। लेकिन अब भगवान परमशिव अपनी साधना स्वयं करते हैं, मैं एक निमित्त साक्षी मात्र हूँ, अतः अब कुछ भी नहीं लिखा जाता। एक ही बात लिख सकता हूँ कि -- "शिवो भूत्वा शिवं यजेत्", यानि "शिव बनकर शिव का ध्यान करो"। शिव-तत्व को जीवन में उतार लेना ही शिवत्व को प्राप्त करना है और यही शिव होना है।
(१) शिव का अर्थ है -- कल्याणकारी।
(२) शंभू का अर्थ है — मंगलदायक।
(३) शंकर का अर्थ है — शमनकारी और आनंददायक।
(४) भूतनाथ का अर्थ है -- पञ्च भूतों यानि पञ्च तत्व के अधिपति।
(५) महाकाल का अर्थ है — काल के प्रवर्तक और नियंत्रक। तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण -- ये पाँचों मिल कर काल कहलाते हैं। ये काल के पाँच अंग हैं।
(६) शिव परिवार -- शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदीश्वर -- ये पाँचों मिलकर शिव-परिवार कहलाते हैं। नन्दीश्वर साक्षात धर्म हैं।
(७) पंचाक्षरी मंत्र -- 'नम: शिवाय' है। इसके साथ ॐ का संपुट लगता है।
(८) पंचमुखी रुद्राक्ष की माला -- शिव साधना में प्रयुक्त होती है। यह भी अनिवार्य है।
(९) भस्म -- बड़ी पवित्रता से देसी नस्ल की गाय के गोबर से ही तैयार होती है। इसमें और कुछ भी प्रयोग नहीं होता। शिव साधना के किए यह अनिवार्य है।
(१०) परमशिव -- एक अनुभूति है। ब्रह्मरंध्र से परे परमात्मा की विराट अनंतता व उससे परे का सचेतन बोध परमशिव की अनुभूति है। तब साधक स्वयं ही परमशिव हो जाता है। परमशिव की अनुभूति निरंतर होती रहती है।
(११) त्रिपुरारी -- भगवान शिव जीवात्मा को संसारजाल, कर्मजाल और मायाजाल से मुक्त कराते हैं। जीवों के स्थूल, सूक्ष्म और कारण देह के तीन पुरों को ध्वंश कर महाचैतन्य में प्रतिष्ठित कराते है अतः वे त्रिपुरारी हैं।
(१२) दुःखतस्कर -- तस्कर का अर्थ चोर होता है जो दूसरों की वस्तु का हरण कर लेता है। भगवान परमशिव अपने भक्तों के सारे दुःख और कष्ट चुपचाप हर लेते हैं। भक्त को पता ही नहीं चलता। अतः वे दुःखतस्कर हैं।
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परमात्मा के लिए ब्रह्म शब्द का प्रयोग किया जाता है। ब्रह्म शब्द का अर्थ है -- जिनका निरंतर विस्तार हो रहा है, जो सर्वत्र व्याप्त हैं, वे ब्रह्म हैं।
सूक्ष्म देह में सुषुम्ना नाड़ी के भीतर एक शिवलिंग तो मूलाधार चक्र के बिलकुल ऊपर है। उसका रहस्य हर किसी को नहीं बताया जा सकता। कूटस्थ ज्योति भी एक शिवलिंग है, जिसका ध्यान किया जाता है। कूटस्थ-चैतन्य में मानसिक रूप से रहते हुए परमशिव अर्थात ईश्वर की कल्याणकारी ज्योतिर्मय सर्वव्यापकता का ध्यान किया जाता है। सम्पूर्ण अनंतता से परे मेरे उपास्य देव भगवान परमशिव हैं, जिनकी चेतना ही मेरा अस्तित्व है। मेरा समर्पण उन्हीं के प्रति है। जो वे हैं, वो ही मैं हूँ।
पुनश्च शुभ कामनाएँ॥ ॐ ॐ ॐ॥ ॐ नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ तत् सत् ॥ ॐ नमः शिवाय॥
कृपा शंकर
१५ फरवरी २०२६

जो इसी जीवन में भगवत्-प्राप्ति करना चाहते हैं, ऐसे सत्यनिष्ठ मुमुक्षु ही मेरे मित्र-संकुल में रहें ---

 जो इसी जीवन में भगवत्-प्राप्ति करना चाहते हैं, ऐसे सत्यनिष्ठ मुमुक्षु ही मेरे मित्र-संकुल में रहें। भगवान मिलें या न मिलें, यह उनकी समस्या है। हमारा कार्य तो उनका उपकरण बनकर उनके प्रकाश का निरंतर विस्तार करना है। इसके लिए भक्ति, योग व तंत्र आदि सभी साधन उपलब्ध हैं।

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मुझे किसी भी तरह का कोई संशय या कोई आकांक्षा नहीं है। मैं धर्म-अधर्म और पाप-पुण्य से परे हूँ। मेरे लिए कोई कर्तव्य, लक्ष्य या उपलब्धि नहीं है। मैं स्वयं ही हर कर्तव्य, हर लक्ष्य, व हर उपलब्धि हूँ। मैं यह देह नहीं बल्कि असीम सम्पूर्ण अनंतता व उससे भी परे का सम्पूर्ण अस्तित्व हूँ। मेरे सिवाय कोई अन्य नहीं है।
शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ अहं ब्रह्मास्मि॥ ॐ शिव शिव शिव॥
कृपा शंकर
१५ फरवरी २०२६

कर्ता कौन है? हम ईश्वर को कैसे प्राप्त हों? हमारी क्या पात्रता हो?

 गीता में भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार इस सृष्टि में तीनों गुणों से अतिरिक्त अन्य कोई भी कर्ता नहीं है। ईश्वर त्रिगुणातीत है, अतः ईश्वर से जुड़कर ही हम निस्त्रेगुण्य हो सकते हैं। यही अमृतत्व को प्राप्त करने का मार्ग है। पर यह कैसे संभव हो? भगवान इसका मार्ग बताते हैं --

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४;२६॥"
अर्थात् -- जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों से अतीत होकर ब्रह्म बनने योग्य हो जाता है॥
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ईश्वर से अतिरिक्त अन्य किसी भी कामना के होने को भगवान ने व्यभिचार की संज्ञा दी है, और अनन्य-योग व वैराग्य को साधन बताया है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिर्व्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् -- अनन्ययोग के द्वारा मुझ में अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
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भगवान ने स्वयं को अमृत, अव्यय, ब्रह्म, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा बताया है। जितनी मात्रा में अहंकार तिरोहित होता है, उतनी ही मात्रा में आत्मा की दिव्यता अभिव्यक्त होती है। प्रतिष्ठा का अर्थ है — जिसमें वस्तु की स्थिति होती है। भगवान ने स्वयं को अमृत और अव्यय ब्रह्म की प्रतिष्ठा बताया है, अतः वे प्रत्यगात्मा यानी परमात्मा हैं।
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अनन्य-योग और अव्यभिचारिणी भक्ति से भजन करते करते भगवान हमारे समक्ष शनैः शनैः स्वयं को अनावृत करते हैं। यदि इससे आगे की कोई और भी विद्या है तो भगवान उसका भी बोध हमें कराते हैं। उनकी विशेष कृपा के हम पात्र बनें। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के अनुशासन पर्व में महाराजा युधिष्ठिर को भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उपदेश दिया है।
ॐ तत् ॐ सत्॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२६

राष्ट्र हित में वर्तमान केंद्र सरकार से २ मुद्दों पर हमारी असहमति है ---

राष्ट्र हित में वर्तमान केंद्र सरकार से २ मुद्दों पर हमारी असहमति है। यदि इनका समाधान नहीं हुआ तो अगले चुनावों में भाजपा की, और स्वयं प्रधानमंत्री की चुनावी पराजय सुनिश्चित है।

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(१) "समान नागरिक संहिता" के आश्वासन पर वचन भंग कर के भाजपा ने जनता के साथ विश्वासघात किया है। सन २०१४ के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के चुनाव घोषणापत्र (Manifesto) में "समान नागरिक संहिता" (Uniform Civil Code - UCC) लागू करने का आश्वासन दिया गया था। घोषणापत्र में भाजपा ने कहा था कि जब तक भारत "समान नागरिक संहिता" नहीं अपना लेता, तब तक लैंगिक समानता (gender equality) नहीं हो सकती। पार्टी ने सभी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोत्तम परंपराओं को शामिल करते हुए एक "समान नागरिक संहिता" का मसौदा तैयार करने के अपने रुख को दोहराया था।
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उसके बाद दो-दो आम चुनाव हो चुके हैं, लेकिन अभी तक "समान नागरिक संहिता" लागू नहीं की गई है। अनारक्षित वर्ग के विरुद्ध क्रमशः बिलकुल वैसे ही कानून बनाए जा रहे हैं जैसे जर्मनी में हिटलर ने यहूदियों के विरुद्ध बनाये थे। अब अनारक्षित वर्ग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व कायस्थ आदि) को अपने अधिकारों के लिए संगठित होना पड़ेगा, अन्यथा उनकी वही गति होगी जैसी जर्मनी में यहूदियों की हुई थी। "समान नागरिक संहिता" को लागू न करना भारत से सनातन धर्म को नष्ट करने का आसुरी प्रयास है।
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(२) भारत सरकार और भाजपा के नेता बार बार अपने भाषणों में कहते हैं कि हमारी सरकार दलितों, पिछड़ों, अल्प-संख्यकों, और वंचितों की है। सारा आरक्षण उन्हीं के लिए है। फिर जो अनारक्षित सामान्य वर्ग है, वह कहाँ जायेगा ? अनारक्षित सामान्य वर्ग -- भाजपा को मत (Vote) क्यों दे जब उनके बच्चों का भविष्य ही भाजपा के राज में अंधकारमय है।
पं.दीन दयाल उपाध्याय के स्थान पर बाबा साहब को ही उद्धृत किया जा रहा है। भीमराव रामजी अंबेडकर को बाबा साहब के नाम से कहा जा रहा है, क्योंकि उनके असली नाम में राम नाम है जिसे बोलने में शर्म आती है।
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मैंने जब से होश संभाला है, आज तक जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का ही समर्थन किया है। बचपन से ही संघ का स्वयंसेवक रहा हूँ। मेरा संघ प्रवेश भी ६४ वर्ष का है। भाजपा को सत्ता में लाने के लिए पूरी ऊर्जा लगा दी थी। अब बात इतनी बढ़ गई है कि कोई भी आरक्षित वर्ग का व्यक्ति अनारक्षित के विरुद्ध झूठा आरोप लगाकर उसे जेल भिजवा सकता है। अनारक्षित की न तो कोई जांच होगी, न सुनवाई होगी और न कोई जमानत मिलेगी। वह स्वयं तो जेल में सड़ेगा और उसका परिवार आत्म-हत्या को मजबूर हो जायेगा। अतः आरक्षित वर्ग में थोड़ा सा भी स्वाभिमान है तो क्यों ऐसे दल को वोट देगा ? मैं तो ऐसे दल को तब तक कोई वोट नहीं दूंगा, जब तक समान नागरिक संहिता लागू नहीं हो जाती। वोट यदि NOTA में डालने पड़े तो NOTA में ही डालूँगा। हमने और हमारे पूर्वजों ने किसी के साथ अन्याय नहीं किया, कभी किसी पर अत्याचार नहीं किया, अब हमें अत्याचारी और अन्यायी बताया जा रहा है। क्या हमारी संवेदनाएं नहीं हैं? क्या हमें दुःख और पीड़ा नहीं होती?
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वर्ग-संघर्ष एक दुःखान्तिका है, जो किसी भी परिस्थिति में भारत में न हो। भारत में तुरंत प्रभाव से "समान-नागरिक संहिता" लागू हो, और सब के लिए समान कानून हो।
ॐ तत्सत् ॥ ॐ शिव॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपा शंकर
१७ फरवरी २०२६
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पुनश्च: _--- जीवन में सब कुछ किया लेकिन राम का नाम नहीं लिया, इसीलिए जो लोग सामाजिक-समरसता और हिन्दू-एकता की बातें करते थे, वे ही झूठे वर्ग उत्पन्न कर समाज में वर्ग-संघर्ष और विषमता का रस घोल रहे हैं। यह उनका लोभ और सत्ता की लालसा है। पूरा मार्क्सवाद ही वर्ग-संघर्ष पर आधारित है, जो सनातन-धर्म का शत्रु है। सनातन के सभी शत्रुओं का नाश स्वयं भगवान करेंगे। हमारा तो धर्म ही ईश्वर की साधना है।

यह यूरेशिया किधर है? कौन सा रेलवे स्टेशन पास में पड़ता है? वहाँ जमीन का क्या भाव है?

 यह यूरेशिया किधर है? कौन सा रेलवे स्टेशन पास में पड़ता है? वहाँ जमीन का क्या भाव है? कुछ लोग नारे लगा रहे हैं कि ब्राह्मणो, भारत छोड़ो। वे आरोप लगा रहे हैं कि सारे ब्राह्मण मनुवादी हैं, और यूरेशिया से आए हैं। इसका उत्तर दे रहा हूँ।

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पहली बात तो यह बताओ कि क्या मनु-स्मृति आपने पढ़ी है? मनुस्मृति में कहाँ किस पृष्ठ पर और कौन सी पंक्ति में लिखा है कि किसी की दुरावस्था या जातियों के निर्माण के लिए मनु महाराज जिम्मेदार थे? हजारों वर्षों तक मनुस्मृति भारत का संविधान और आचार-संहिता रही है।
ब्राह्मण तो द्वापर, त्रेता और सतयुग में भी थे। विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों में कहाँ लिखा है कि ब्राह्मण और सारे हिन्दू बाहर से आये? अगर इतनी बड़ी जनसंख्या का संचलन होता तो वेदों में कहीं तो उल्लेख होता।
आप लोग दुष्ट अंग्रेज़ पादरियों के झूठे काल्पनिक प्रचार का शिकार हैं।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है --
"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥४:१३॥"
अर्थात् -- गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है। यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ, तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो॥
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यह सिद्ध करता है कि स्वयं भगवान ने वर्ण-व्यवस्था बनायी है। जातियों का निर्माण यदि ब्राह्मणों ने किया है तो मुसलमानों व अन्य मज़हबों में भी जातियों का निर्माण क्या ब्राह्मणों ने ही किया है? जातियों का निर्माण स्वयं भगवान ने किया है। लेकिन अधिकांश भारतीय, अंग्रेज़ पादरियों के झूठे प्रचार का शिकार हैं।
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चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः" (श्रीमद्भगवद्गीता ४:१३) का अर्थ है कि भगवान ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चार वर्णों की रचना की है। यह विभाजन गुणों (सत्व, रज, तम) और कर्म के आधार पर किया गया है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ फरवरी २०२६ .
जातिवाद को समाप्त करने के दो ही उपाय हैं --
(१) सब तरह का आरक्षण पूर्णतः समाप्त किया जाए। (२) सब तरह के सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख बंद किया जाए। सब तरह के जातीय प्रमाणपत्रों को अमान्य घोषित किया जाए। जातिवाद आप ही समाप्त हो जाएगा।
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मैं वर्णाश्रम धर्म और जातियों का समर्थक, लेकिन जातिवाद का घोर विरोधी हूँ।
जातिप्रथा ने भारत की रक्षा की है, लेकिन जातिवाद ने भारत का बहुत अधिक अहित किया है।

भक्ति — अपने ही पुण्यों का फल है ---

दूसरों से भक्ति की अपेक्षा करना — मेरी सबसे बड़ी भूल थी। भगवान की भक्ति वही कर सकता है जिसने अपने पूर्व जन्मों में बहुत सारे पुण्य किये हों, या जिस पर भगवान की कृपा हो। मेरी यह अपेक्षा पूर्णतः गलत है कि सब लोग भगवान की भक्ति करें या भगवान का ध्यान करें। वास्तव में भगवान स्वयं ही अपनी भक्ति स्वयं करते हैं। जिस पर भगवान की कृपा होती है, वही उनका माध्यम यानी निमित्त बन सकता है। भगवान अपनी अनुभूति मातृरूप में भी करवाते हैं, और पितृरूप में भी। माँ अधिक करुणामयी होती है। भगवान के सारे रूप एक उन्हीं के हैं। भगवान स्वयं ही स्वयं का ध्यान करते हैं, उनके सिवाय कोई अन्य है ही नहीं। भगवती के भी विभिन्न रूपों में जिनकी आराधना हम करते हैं, वे सारे रूप भी उन्हीं के हैं। वे ही ज्योतिर्मय ब्रह्म हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही विष्णु और वे ही नारायण हैं। इस विषय पर लिखने और चर्चा के लिए मेरे पास बहुत कुछ है।

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साधना करने, व साधक होने का भाव एक भ्रम मात्र ही है। भगवान स्वयं ही स्वयं की साधना करते हैं। हम तो उनके एक उपकरण, माध्यम और निमित्त मात्र हैं। कर्ता तो वे स्वयं हैं। उनकी यह चेतना सदा बनी रहे। फिर भी एक रहस्य अनावृत करना चाहता हूँ कि भगवान आपको भूले नहीं हैं। अपनी सृष्टि के उद्धार हेतु वे निरंतर प्रयासरत हैं। इससे अधिक लिखने का इस समय मुझे आदेश नहीं है।
ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
२० फरवरी २०२६

गाजा पट्टी का क्या होगा?

 गाजा पट्टी का क्या होगा?

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उत्तर : जो मैं लिखने जा रहा हूँ, वह आपको कहीं भी लिखा हुआ नहीं मिलेगा। आप इज़राइल का मानचित्र देख लीजिए। वास्तविकता यह है कि गाजा पट्टी को इज़राइल और अमेरिका ने आपस में बड़ी शांति से बंदरबाँट कर लिया है। अमेरिका अपने भाग में एक तो बहुत बड़ा सैनिक अड्डा बनाएगा, दूसरा एक अति भव्य विलासितापूर्ण नगर बसायेगा जहाँ दुनिया भर के अति धनवान लोग ही रह सकेंगे। उस नगर में जुआघर, नाइट-क्लब आदि सब तरह की विलासिता के साधन होंगे। अमेरिकी क्षेत्र अमेरिका का ही भाग होगा। इज़राइल अपने भाग में एक बंदरगाह का निर्माण करेगा।
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वेस्ट-बैंक पर तो इज़राइल का अधिकार है ही; और गोलान-हाइट्स पर अधिकार कर के इज़राइल ने अपनी सीमा का विस्तार सीरिया तक कर लिया है। अब लेबनान को छोड़कर किसी भी शत्रु देश से उसकी सीमा नहीं लगती। अन्य पड़ोसी मुस्लिम देशों से उसका समझौता है। ईरान के साथ उसका युद्ध तो होगा ही। यह युद्ध तय करेगा कि इज़राइल का अस्तित्व रहेगा या नहीं।
लेबनान भी कभी ईसाई बहुल देश और भोग-विलास का अड्डा था। वहाँ के ईसाईयों को भगाकर अब तो वहाँ उन का अधिकार है, भारत में जिन को अल्प-संख्यक कहते हैं।
सीरिया में पहले असद नाम के एक असुर का राज्य था, अब अल-सर्रा नाम के एक महा-असुर का राज्य है। पहले यह सदा से ही असुरों की भूमि थी, अब भी असुरों की ही भूमि है।
२० फरवरी २०२६

ईश्वर और गॉड व अल्लाह में क्या भेद है?

 ईश्वर और गॉड व अल्लाह में क्या भेद है?

बहुत अधिक अंतर है। ईश्वर अलग है, और गॉड व अल्लाह दोनों एक हो सकते हैं, जिनकी ईश्वर से कोई समानता नहीं है।
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(१) ईश्वर कौन है? -- विष्णु सहस्त्रनाम के अनुसार भगवान विष्णु स्वयं ही यह सम्पूर्ण विश्व हैं। यह पूरी सृष्टि ही विष्णु है। जो कुछ भी सृष्ट या असृष्ट है, वह सब विष्णु है।
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥"
जिसका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है उसे वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार -- ईश्वर सर्वव्यापी, परम सत्य, सर्वोच्च सत्ता, सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, और संहारकर्ता हैं, जो सर्वव्यापी, निराकार (सब आकार जिसके हैं), और सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं।
"ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति |
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥१८:६१॥"
अर्थात् - हे अर्जुन (मानों किसी) यन्त्र पर आरूढ़ समस्त भूतों को ईश्वर अपनी माया से घुमाता हुआ (भ्रामयन्) भूतमात्र के हृदय में स्थित रहता है॥
उपनिषदों में व आगम-शास्त्रों में इसे बहुत गहनता से बहुत ही अच्छी तरह समझाया गया है।
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(२) इस्लामी और ईसाई मान्यताओं के बारे में लिखने को मैं स्वयं को अधिकृत नहीं मानता हूँ, अतः नहीं लिख रहा। इतना ही लिख सकता हूँ कि वे सातवें आसमान के ऊपर अपने अर्श पर बिराजते हैं। उनके बारे में और अधिक नहीं लिख सकता। दोनों के पैगंबर भी अलग अलग हैं, लेकिन दोनों के ही पैगंबर -- हज़रत इब्राहिम अलैहिसलाम की नस्ल (खानदान) में ही जन्में। वास्तव में यहूदियत, ईसाईयत और इस्लाम — तीनों के ही आदि पुरुष हज़रत इब्राहिम (Prophet Abraham) अलैहिस्सलाम हैं।
यह संवेदनशील विषय है, अतः इस पर और अधिक लिखना उचित नहीं है (भावना बहिन बहुत जल्दी आहत होती है)। लेकिन यह सिद्ध होता है कि इनका ईश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। गॉड और अल्लाह दोनों एक ही हैं, ऐसा मुझे लगता है, लेकिन वे ईश्वर नहीं हैं।
कृपा शंकर
२१ फरवरी २०२६

जो शिक्षा सिर्फ ज्ञान देती है वह शिक्षा नहीं है, ज्ञान के साथ साथ सद्आचरण भी सिखाये वह ही शिक्षा है ---

 जो शिक्षा सिर्फ ज्ञान देती है वह शिक्षा नहीं है| ज्ञान के साथ साथ सद्आचरण भी सिखाये वह ही शिक्षा है| प्राचीन भारत के ब्राह्मण आचार्य पूज्य थे क्योंकि वे ब्रह्मआचरण यानि ब्रह्मचर्य भी सिखाते थे|

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आतताई से आत्म-रक्षा करना हमारा अधिकार ही नहीं कर्त्तव्य भी है|
आतताई .... यानि जो क्रूर हिंसक दुष्ट प्रवृत्ति का व्यक्ति जिसका दमन कठिन हो, जो हमारे प्राण लेने, हमारी स्त्री, संतानों आदि का अपहरण करने, हमारी संपत्ति को लूटने व जलाने के लिए आ रहा हो, उसके लिए हमारे शास्त्रों में क्षमा का कोई प्रावधान नहीं है| उसके लिए मृत्यु दंड ही निर्धारित है|
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जो दूसरों को अपना मत मानने को बलात् बाध्य करते हैं वे ही असुर राक्षस हैं|
२१ फरवरी २०२६

हम जल की एक बूंद नहीं, यह सम्पूर्ण महासागर ही हम स्वयं हैं ---

 हम जल की एक बूंद नहीं, यह सम्पूर्ण महासागर ही हम स्वयं हैं ---

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परमात्मा के ऊर्ध्वस्थ महासागर में जल की एक बूंद की तरह हम तैर ही नहीं रहे, बल्कि वह सम्पूर्ण महासागर ही हम स्वयं हैं। परमात्मा में और हम में कोई भेद नहीं है। परमात्मा ही हमारा निज-स्वरूप है। अपने निज स्वरूप का ही ध्यान हम करें।
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द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार -- ये सब मन की अवस्थाएँ हैं, इन की ओर ध्यान न दें। हमारा ध्यान परमात्मा की संपूर्णता पर ही हो, जो हम स्वयं हैं। हमारे में बहुत अधिक कमियाँ हैं, उनकी ओर भी ध्यान न दें। वे सब कमियाँ परमात्मा को बापस सौंप दें। हमारे गुण-अवगुण सब परमात्मा के हैं, हमारा कुछ भी नहीं। हम परमात्मा की संपूर्णता हैं। उस संपूर्णता की चेतना में ही रहें, और उसी का ध्यान करें।
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मुझे प्रेरणा मिल रही है तंत्र के 'सृष्टि बीज', 'संहार बीज', 'अजपा जप' और 'हंस गायत्री' के ऊपर कुछ चर्चा करने की। अतः कम से कम शब्दों में उस विषय पर ही कुछ चर्चा कर रहा हूँ। इस लेख में
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नारायण ! जब हम सामान्यतः साँस लेते हैं तब स्वाभाविक रूप से "हं" की ध्वनी उत्पन्न होती है, यह ध्वनी 'संहार बीज' है| और जब साँस छोड़ते हैं तब "सः" की ध्वनी उत्पन्न होती है, यह 'सृष्टि बीज' है| जब हम निरंतर चल रही इन ध्वनियों को सजग होकर सुनते हैं तब "हं सः" मन्त्र बनता है| यह एक बहुत उन्नत साधना है जो "अजपा-जप" कहलाती है| साँस लेते समय "हं" का मानसिक जाप, और छोड़ते समय "सः" का मानसिक जाप "अजपा गायत्री" कहलाता है| अचेतन रूप से हर मनुष्य इस मन्त्र का दिन में लगभग २१,६०० बार जाप करता है| अति उन्नत साधकों का क्रम स्वतः बदल जाता है, और यह मन्त्र "हंसः" से "सोहं" हो जाता है|
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नारायण ! इस साधना में साधक भ्रूमध्य में एक प्रकाश की भावना करता है जिसे वह समस्त ब्रह्मांड में फैला देता है और यह भाव रखता है की मैं सर्वव्यापी ज्योतिर्मय हूँ, यह देह नहीं| धीरे धीरे यह प्रकाश निरंतर दिखाई देने लगता है और कूटस्थ में ओंकार की ध्वनी सुनाई देने लगती है| यह एक बहुत उन्नत साधना है अतः परमात्मा को समर्पित होकर पूर्ण भक्तिभाव से करनी चाहिए|
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ॐ तत्सत् ! ॐ शिव ! तत्वमसि ! सोsहं | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२२ फरवरी २०२६

मैं भगवान की निगाह में हर समय हूँ, वे हर समय मुझे देख रहे हैं, मेरा कोई भी विचार उनसे छिपा हुआ नहीं है ---

 मैं भगवान की निगाह में हर समय हूँ, वे हर समय मुझे देख रहे हैं, मेरा कोई भी विचार उनसे छिपा हुआ नहीं है। मुझे इस बात का पता बहुत देरी से चला। उनसे प्रेम को मैं कैसे व्यक्त करूँ? कुछ समझ में नहीं आ रहा है।

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गीता में तो उनका आदेश है --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
मेरी सीमित तुच्छ बुद्धि से कुछ समझ में नहीं आ रहा है। हृदय में एक प्रचंड अग्नि प्रज्ज्वलित है। ऐसा लगता है जैसे कि मेरे सिर पर किसी ने जलते हुए कोयलों से भरी हुई एक परात रख दी है। यह अग्नि मुझे भस्म भी नहीं कर रही है। केवल पीड़ा दे रही है, जिसमें भी एक आनंद छिपा है।
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भगवान तो कहते हैं कि -- "मद्भक्तः" -- अर्थात् जो मुझे प्रेम करता है वह मेरा ही स्वरूप होगा। भगवान् ने असीम प्रेम को ही मोक्ष का साधन बतलाया है। वह प्रेम क्या है? यही जानना चाहता हूँ। भक्त बनें तो कैसे बनें ? अपनी सब कमियाँ अब भगवान को वापस सौंप रहा हूँ। उन से मेरी एकमात्र प्रार्थना है कि वे मेरे प्रेम को अपनी पूर्णता प्रदान करें। उन की और आप सब की जय हो।
कृपा शंकर
२२ फरवरी २०२६

मेरे पास अधिक समय नहीं बचा है, इस शरीर में भी अधिक शक्ति नहीं रही है, इसलिए मुझे अपना निमित्त मात्र बनाकर भगवान अपनी साधना स्वयं करते हैं ---

 मेरे पास अधिक समय नहीं बचा है, इस शरीर में भी अधिक शक्ति नहीं रही है, इसलिए मुझे अपना निमित्त मात्र बनाकर भगवान अपनी साधना स्वयं करते हैं। आजकल स्वाध्याय भी वे केवल श्रीमद्भगवद्गीता का ही कर रहे हैं। चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान भी वे केवल आत्म-तत्व यानी आत्मा का ही करते हैं। मैं केवल एक अस्तित्वहीन निमित्त साक्षी मात्र ही रह गया हूँ। वास्तव में एकमात्र अस्तित्व केवल परमात्मा का है, उनसे पृथक कोई अस्तित्व नहीं है।

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वेदों का सार उपनिषदों में है। उपनिषदों का सार श्रीमद्भगवद्गीता में है। और श्रीमद्भगवद्गीता का सार पुरुषोत्तम-योग में है। पुरुषोत्तम योग से ऊंची कोई अन्य साधना नहीं है। यह ऊंची से ऊंची और बड़ी से बड़ी साधना है। जो पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं। परमात्मा की परम कृपा से ही यह बात समझ में आ सकती है। जो क्रियावान हैं, यानि जो क्रियायोग की साधना करते हैं, वे भी इसे बहुत अच्छी तरह से समझ सकते हैं।
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अपनी परमकृपा कर के जगद्गुरु रूप में भगवान श्रीकृष्ण, या दक्षिणामूर्ति रूप में भगवान शिव ही यह बात समझा सकते हैं। दोनों में कोई भेद नहीं है। श्रुति भगवती की आज्ञानुसार सर्वप्रथम किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय (जिन्हें वेदों का ज्ञान हो) आचार्य के मार्गदर्शन में बड़ी विनम्रता से उनका आश्रय लेकर साधना का आरंभ करें। तभी कल्याण होगा।
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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ फरवरी २०२६

परमात्मा ही मेरे प्रथम, अंतिम और एकमात्र सम्बन्धी हैं ---

 परमात्मा ही मेरे प्रथम, अंतिम और एकमात्र सम्बन्धी हैं। उनकी अनुभूति में बने रहना ही परम तीर्थ है। उनके प्रति आकर्षण और उनमें तन्मय हो जाना ही सच्चा प्रकाश है। जन्म से पूर्व भी वे ही साथ थे, और मृत्यु के पश्चात भी वे ही साथ रहेंगे। इस देह को धारण भी उन्होंने ही कर रखा है। उनकी चेतना में बने रहना और पूर्ण रूपेण समर्पित होकर उनके साथ एकाकार होना ही इस जीवन का लक्ष्य है।

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यही साधना है और यही जीवन की सार्थकता है। जब अग्नि के समक्ष होते हैं तब तपन की अनुभूति अवश्य होती है। ऐसे ही जब भगवान के सम्मुख होते हैं तब अनायास ही उनके अनुग्रह की भी अनुभूति होती है। उनका निरंतर स्मरण व उनकी चेतना का प्रकाश ही हमारा जीवन हो।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ फरवरी २०१६

दुष्टों का विनाश करने और सज्जनों का परित्राण करने भगवान के अवतृत होने का समय हो गया है। हर्षोत्सव मनाइये।

दुष्टों का विनाश करने और सज्जनों का परित्राण करने भगवान के अवतृत होने का समय हो गया है। हर्षोत्सव मनाइये।
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ज्योतिषी कह रहे हैं की ग्रह-नक्षत्रों का संयोग बुरे दिन ला रहा है। लेकिन मैं कह रहा हूँ कि बहुत अच्छे दिन आ रहे हैं। परमात्मा की सृष्टि में कुछ भी गलत नहीं हो सकता। जो गलत हो रहा है, वह हमारी सृष्टि है। दुष्टों का नाश तो होगा ही, उसे कोई नहीं रोक सकता। सज्जनों का परित्राण भी होगा। धर्म की स्थापना करने भगवान स्वयं अवतृत होने वाले हैं।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥४:७॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥४:८॥ (श्रीमद्भगवद्गीता)
भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लेने का उद्देश्य बताया है। इसका अर्थ है: सज्जनों (साधुओं) की रक्षा करने, दुष्टों (पापियों) का विनाश करने और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ।
उनके अवतृत होने का समय आ गया है। उत्सव मनाइये॥ नारायण॥ नारायण॥
कृपा शंकर
२४ फरवरी २०२६
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पुनश्च: ... अब चाहे सारा ब्रह्मांड टूटकर बिखर जाए, यह शरीर रहे या न रहे, हमें कोई पीड़ा नहीं होगी। स्वयं सृष्टिकर्ता के अवतृत होने का समय हो गया है। इससे अधिक प्रसन्नता की बात और क्या हो सकती है?
प्रमाद, दीर्घसूत्रता, राग-द्वेष, अहंकार, संशय, और लोभ आदि के कारण ही हम भगवान से दूर हैं। अन्य कोई कारण नहीं है। समय हो गया है, उठो और ध्यान के आसन पर बैठकर गुरु-चरणों का कूटस्थ में ध्यान करो। अभी और इसी समय।