मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "आत्म-साक्षात्कार" है ---
.संक्षेप में यानि कम से कम शब्दों में आज मैं उस विषय पर बात कर रहा हूँ जो मेरे अब तक के समस्त अनुभवों और अर्जित ज्ञान का सार है। उसी में तल्लीन और तन्मय होकर अवशिष्ट जीवन परमात्मा को समर्पित है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - " हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥"
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मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "आत्म-साक्षात्कार" (Self-Realization) यानि "ब्रह्म" (Ultimate Reality) के साथ एकत्व की अनुभूति है। यह उच्चतम स्थिति है जिसे "तुरीय चेतना" भी कहते हैं। यह विशुद्ध जागरूकता की स्थिति है जिसमें हम इस सत्य को अनुभूत करते हैं कि हम यह अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) नहीं, बल्कि एक साक्षी आत्मा हैं। अंततः यह साक्षी भाव भी तिरोहित हो जाता है। हम स्वयं ब्रह्ममय हो जाते हैं।
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ध्यान, मौन, भक्ति और समर्पण -- ये मार्ग हैं, जो हमें वीतरागता, स्थितप्रज्ञता, और समत्व में स्थित करते हैं। इस अवस्था यानि स्थिति में व्यक्ति को किसी भी तरह का कोई मोह या भ्रम नहीं रहता। सुख-दुःख, लाभ-हानि जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी साधक विचलित नहीं होता।
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इस आलेख का उद्देश्य कम से कम शब्दों में परम सत्य को व्यक्त करना है। इस का विस्तार श्रीमद्भगवद्गीता और सारे उपनिषद हैं।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ फरवरी २०२६
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