Wednesday, 18 March 2026

परमात्मा में निरंतर रमण करते हुए हम परमात्मा में ही स्थित हों ---

 परमात्मा में निरंतर रमण करते हुए हम परमात्मा में ही स्थित हों ---

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पहले मुझे लगता था कि इस तापत्रय-सन्तप्त संसार में मैं अनुपयुक्त हूँ जो किसी गलत स्थान पर आ गया है। लेकिन मेरी सोच गलत थी। भगवान ने अपनी सृष्टि में हमें कहीं भी रखा हो, वे गलत नहीं हो सकते। इस सृष्टि में किसी भी तरह की किसी कामना का होना एक धोखा है, जो हमें सीधे एक भयंकर कष्ट यानि दुःख में डालता है। यहाँ केवल एक गहन अभीप्सा हो परमात्मा के लिये, और उन्हीं में हम निरंतर रमण करें। यही सीखने के लिए हम इस संसार में आते हैं।
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मैं ही सब की आत्मा हूँ, -- इस भाव का अनंत विस्तार ही -- "अहं ब्रह्मास्मि" है। संसार में हम अपनी प्रशंसा से प्रसन्न न हों, क्योंकि मान-सम्मान पाने की कामना, माया का एक बहुत बड़ा भयंकर जाल है, जिसमें धोखा ही धोखा है। समत्व की उपलब्धि ही ज्ञान है, और समत्व में स्थित व्यक्ति ही ज्ञानी है। गीता के अनुसार समत्व का अर्थ (समत्वं योग उच्यते - २:४८) जीवन की सभी विपरीत परिस्थितियों, में मन को स्थिर और समान बनाये रखना है।
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अहंकार से प्रेरित इच्छाओं और ममत्व के कारण हमारा व्यक्तित्व विखंडित भी हो सकता है। हमारे समस्त दुःखों का कारण -- राग-द्वेष, अहंकार और कामनायें हैं। वीतराग होकर यानि इन सब को त्याग कर अपनी प्रज्ञा की परमात्मा में निरंतर स्थिति -- स्थितप्रज्ञता है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति ही ब्राह्मी स्थिति यानि ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।
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मान-सम्मान पाने की कामना एक स्पृहा है जो हमारे मन को अशांत करती है। गीता में भगवान हमें निःस्पृह होने का उपदेश देते हैं --
"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ॥२:७१॥"
अर्थात् जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित, ममभाव रहित, और निरहंकार हुआ विचरण करता है, वह शान्ति प्राप्त करता है॥
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आत्मा में निरंतर रमण करते करते हम आत्मा में ही स्थित होकर आत्माराम
बनें। यही ब्रह्म में विचरण और ब्रह्मचर्य है जो सारे अंधकार को दूर कर आगे के सारे द्वार खोलता है।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ ॐ शिव !! ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ फरवरी २०२६

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