अब हम किस का ध्यान करें ?
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वास्तव में हम जहां भी, जिस भी समय हैं, परमात्मा वहीं हैं। वहीं सारे तीर्थ हैं, और वहीं सारे संत-महात्मा हैं। हमारा अस्तित्व ही परमात्मा के होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हम यह शरीर नहीं, परमात्मा की अनंतता और उनका सम्पूर्ण अस्तित्व हैं। ध्यान परमात्मा के अंश का नहीं, उनकी संपूर्णता का होता है। द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार -- ये सब बुद्धि-विलास और मन की परिस्थितियाँ हैं। इन सब से ऊपर उठना पड़ेगा। सहस्त्रारचक्र में दिखाई दे रही ज्योति भगवान विष्णु के और भगवती श्री के पद्म-पाद हैं, वे ही गुरु महाराज के चरण-कमल हैं। अनन्य-योग से उसका ध्यान ही श्रीगुरु-चरणों का ध्यान है, और वहाँ पर स्थिति ही श्रीगुरुचरणों में आश्रय ग्रहण करना है। उस ज्योति का अनंत विस्तार करना होता है जिसमें सारी सृष्टि और उससे परे की संपूर्णता समाहित हो जाती है। फिर उस सर्वव्यापी ज्योति का ही ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में ध्यान होता है।
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आगे की और भी अनेक बातें हैं, जिनका ज्ञान सिद्ध गुरु की अनुकंपा से ही होता है अतः उनके बारे में लिखना अनुचित है। जिसमें पात्रता होती है, उनको मार्गदर्शन भी प्राप्त होता है। यहाँ कोई SC/ST या OBC का आरक्षण नहीं है। आध्यात्म की हरेक उपलब्धि पात्रता के अनुसार बिना किसी पक्षपात के है। सभी को मंगलमय शुभ कामना।
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मुझे अनावश्यक फोन न करें। अज्ञात नंबरों से आया हुआ फोन मैं अब नहीं उठाता हूँ।
ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ फरवरी २०२६
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