परमात्मा ही मेरे प्रथम, अंतिम और एकमात्र सम्बन्धी हैं। उनकी अनुभूति में बने रहना ही परम तीर्थ है। उनके प्रति आकर्षण और उनमें तन्मय हो जाना ही सच्चा प्रकाश है। जन्म से पूर्व भी वे ही साथ थे, और मृत्यु के पश्चात भी वे ही साथ रहेंगे। इस देह को धारण भी उन्होंने ही कर रखा है। उनकी चेतना में बने रहना और पूर्ण रूपेण समर्पित होकर उनके साथ एकाकार होना ही इस जीवन का लक्ष्य है।
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यही साधना है और यही जीवन की सार्थकता है। जब अग्नि के समक्ष होते हैं तब तपन की अनुभूति अवश्य होती है। ऐसे ही जब भगवान के सम्मुख होते हैं तब अनायास ही उनके अनुग्रह की भी अनुभूति होती है। उनका निरंतर स्मरण व उनकी चेतना का प्रकाश ही हमारा जीवन हो।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ फरवरी २०१६
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