आध्यात्म में साधक कौन है? साध्य क्या है? और साधना क्या होती है?
.
आध्यात्म मेरा प्राण है। निरंतर मेरे अस्तित्व से परमात्मा स्वयं व्यक्त हो रहे हैं। मेरे बारे में कोई कुछ भी सोचे यह उसकी अपनी समस्या है। मेरी प्रथम, अंतिम, और एकमात्र समस्या -- निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है। यह मेरा व्यक्तिगत मामला है। इसमें न तो मुझे किसी की कोई सलाह चाहिए और न किसी का कोई सहयोग या स्वीकारोक्ति। मैं किसी से कुछ नहीं मांगने वाला अतः यह शंका न करें कि मैं आपसे कुछ मांग लूँगा।
मैं भगवान से भी कुछ मांगने नहीं, उन्हें उनका सारा सामान बापस देने आया हूँ। भगवान को बापस देने के लिए मेरे पास बहुत कुछ है। सबसे बड़ी चीज तो उनका दिया हुआ "अन्तःकरण" (मन बुद्धि चित्त अहंकार) है, फिर ये भौतिक, सूक्ष्म व कारण शरीर, सारी ज्ञानेंद्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ और उनकी तन्मात्राएँ हैं।
.
मैं योगमार्ग के अपने अनुभवों की बात करता हूँ। साधनाकाल के आरंभ में साधक होने का भ्रम था कि इतना जप, इतना तप, इतना ध्यान, और इतनी क्रियाएँ आदि करनी है। यह सब मेरा भ्रम था।
सारी साधनायें तो जगन्माता/भगवती स्वयं घनीभूत प्राण तत्व कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में करती हैं, और साध्य ऊर्ध्वमूल में सच्चिदानंद पुरुषोत्तम/परमशिव हैं। ध्यान और साक्षात्कार उन्हीं का होता है। कैसे होता है? यह विषय गोपनीय है जिसकी चर्चा गुरु-परंपरा के बाहर नहीं होती।
सार की बात यह है कि सारी साधना तो जगन्माता स्वयं करती हैं, और साध्य भगवान परमशिव हैं। हम एक निमित्त साक्षी मात्र हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ फरवरी २०२६
No comments:
Post a Comment