Tuesday, 18 March 2025

देश के रजोगुण में वृद्धि, और तमोगुण का ह्रास देश की प्रगति का सूचक है ---

 देश के रजोगुण में वृद्धि, और तमोगुण का ह्रास देश की प्रगति का सूचक है ---

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पिछले कुछ समय में अत्यधिक सराहनीय एक सकारात्मक परिवर्तन पूरे देश में हुआ है। तमोगुण में कुछ कमी आयी है और रजोगुण में वृद्धि हुई है। लोगों के सोच-विचार और आचरण में भी बहुत सुधार हुआ है।
हमारा लक्ष्य बहुत ऊंचा रहे, क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण तो गीता के दूसरे अध्याय के ४५वें श्लोक में हमें निस्त्रेगुण्य यानि गुणातीत होने को कहते हैं। गुणातीत वही हो सकता है जो वीतराग और स्थितप्रज्ञ हो। गीता में भगवान कहते हैं --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥"२:४५॥
यहाँ भगवान हमें निस्त्रेगुण्य ही नहीं, अपितु हमें नित्यसत्वस्थ, निर्योगक्षेम और आत्मवान होने को भी कहते हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ मार्च २०२५

हमारे मोहल्ले की होली अवश्य देखिये ---

 https://www.youtube.com/watch?v=LBzzcoPjiOM

झुंझुनूं (राजस्थान) में हमारे मोहल्ले की होली अवश्य देखिये। पहले प्रातः पाँच बजे एक अति लोकप्रिय और प्रख्यात महात्मा हरिशरण जी महाराज का सत्संग/प्रवचन हुआ, फिर उनके नेतृत्व में प्रभातफेरी हुई, और उनके नेतृत्व में ही फूलों की होली हुई। अब फूलों की होली का प्रचलन हो गया है। होली खेलने के समय जम कर भजन-कीर्तन होते हैं। (इस वीडियो की रिकॉर्डिंग के मध्य में भूलवश कुछ समय तक ध्वनि नहीं आयी) भगवान की भक्ति का प्रबल जागरण हमारे यहाँ हो रहा है।पहले प्रातः पाँच बजे एक अति लोकप्रिय और प्रख्यात महात्मा हरिशरण जी महाराज का सत्संग/प्रवचन हुआ, फिर उनके नेतृत्व में प्रभातफेरी हुई, और उनके नेतृत्व में ही फूलों की होली हुई। अब फूलों की होली का प्रचलन हो गया है। होली खेलने के समय जम कर भजन-कीर्तन होते हैं। (इस वीडियो की रिकॉर्डिंग के मध्य में भूलवश कुछ समय तक ध्वनि नहीं आयी) भगवान की भक्ति का प्रबल जागरण हमारे यहाँ हो रहा है। वृंदावन में श्रीराधा-कृष्ण के साथ जैसी होली मनाई जाती है, बिल्कुल वैसी ही होली खाटू-श्याम में भी मनायी जाती है। उसी तर्ज पर होली मनाना हमारे यहाँ भी आरंभ हो गया है, लेकिन रंगों के स्थान पर केवल फूलों की पत्तियों और प्राकृतिक सुगंधों का ही उपयोग होता है। रंगों का उपयोग नहीं के बराबर होता है।

एक ब्रह्मज्ञ किसी भी पाप से लिप्त नहीं होता है ---

 एक ब्रह्मज्ञ किसी भी पाप से लिप्त नहीं होता है। उस आत्मविद को कोई पाप छू भी नहीं सकता। गीता में भगवान कहते हैं --

"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते"॥१८:१७॥"
अर्थात् जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न (पाप से) बँधता है।
He who has no pride, and whose intellect is unalloyed by attachment, even though he kill these people, yet he does not kill them, and his act does not bind him.
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हम पूर्णरूपेण परमात्मा को समर्पित हों। परमात्मा की कृपा ही हम सब की रक्षा करेगी। भगवान की परमकृपा हम सब पर हो। | ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ मार्च २०२५

भगवान की पकड़ बड़ी मजबूत होती है ---

 भगवान की पकड़ बड़ी मजबूत होती है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में नींद से उठते ही यदि वे पकड़ते हैं तो उल्लास मनाकर उनका स्वागत कीजिये और भाग्यशाली मानते हुए स्वयं को उनके हाथों में सौंप दीजिये। कई बार हम भगवान की चेतना में उठते हैं, वह दिन बड़ा शुभ होता है। उठते ही उनके नाम का कीर्तन और ध्यान कीजिये।

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भगवान "हैं" -- इसी समय, सर्वदा, यहीं पर और सर्वत्र वे हैं। इस "हैं" शब्द मे ही वे छिपे हुये हैं। यह कोई बुद्धि का विषय नहीं है, इसलिए अधिक लिखने से कोई लाभ नहीं है। आगे की बात स्वयं समझ में आ जाएगी। थोड़ी भक्ति और समर्पण का भाव चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं। रात्रि को सोने से पहिले उनका नामजप स्मरण/कीर्तन और ध्यान कर के सोयें। पूरे दिन उन्हें अपनी स्मृति में रखें। हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ मार्च २०२५

सत्य-सनातन-धर्म ही भारत की एकमात्र राजनीति होगी व भारत एक सत्य-धर्मनिष्ठ राष्ट्र होगा ---

 सत्य-सनातन-धर्म ही भारत की एकमात्र राजनीति होगी व भारत एक सत्य-धर्मनिष्ठ राष्ट्र होगा। यह सृष्टिकर्ता परमात्मा का संकल्प है।

भारत का पुनरोत्थान, एक आध्यात्मिक शक्ति व चेतना के अवतरण से हो रहा है। भारत की प्राचीन कृषि और शिक्षा व्यवस्था भी पुनःस्थापित होंगी। भारत अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखण्डता के सिंहासन पर विराजमान होगा। आसुरी शक्तियाँ पराभूत होंगी। सत्य का प्रकाश, असत्य के अंधकार को प्रभावहीन कर देगा। सनातन धर्म ही भारत का प्राण, और सम्पूर्ण सृष्टि का भविष्य है। सनातन धर्म है -- परमात्मा से परमप्रेम, उन्हें पाने की अभीप्सा, समर्पण और सदाचरण।
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मेरी श्रद्धा डगमगा रही थी जिसे विश्वास से बांध दिया है। अब वह डगमगा नहीं सकती। परमात्मा का विलय आत्मा में हो रहा है जिसके साक्षी स्वयं परमात्मा हैं। अपनी साधना परमात्मा स्वयं कर रहे हैं। मैं एक निमित्त/साक्षी मात्र हूँ।
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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
ॐ सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यंकरवावहै, तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांति शांति शांति॥"
ॐ सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे। तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम:॥
ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः'॥
ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१९ मार्च २०२५

अभीष्ट के लिए तपस्या ........

 अभीष्ट के लिए तपस्या ........

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प्राचीन भारत में लोग अपने हर अभीष्ट की प्राप्ति के लिए तपस्या को ही मूल साधन मानते थे, चाहे वह सांसारिक कामना हो या आध्यात्मिक| भारत के प्राचीन साहित्य में बहुत सारे प्रसंग भरे पड़े हैं जब धनसंपति, पुत्र-कन्यादि सन्तान प्राप्ति, मनपसंद वर, शत्रु विजय, रोग मुक्ति आदि, और पारलौकिक कामनाओं की सिद्धि के लिए भी लोग तपस्या को ही अमोघ साधन मानते थे|
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काश! मेरे भी जीवन में वह तपस्या होती! ह्रदय की चाहत तो यही है कि हर कार्य सिर्फ परमात्मा की प्रसन्नता के लिए ही करूँ| सिर्फ प्रभु-प्रेम की ही बातें करूँ, चाहे बिना बात किये ही रहना पड़े| दूसरी कोई बात करता हूँ तो बड़ी पीड़ा होती है| मिलना भी ऐसे ही लोगों से चाहता हूँ जिनके ह्रदय में भगवान के प्रति प्रेम भरा पडा हो| बाकि सांसारिक लोगों से तो मिलना पड़ता ही है पर उनसे मिलने मात्र से बड़ी पीड़ा होती है| कहीं किसी सामान्य व्यक्ति का आतिथ्य भी स्वीकार कर लेता हूँ तो अगले एक दो दिन तो बड़े कष्ट से निकलते हैं| ईश्वर के अतरिक्त कुछ भी अन्य चिंतन बड़ा दु:खदायी है|
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आज के युग में लोग इन बातों पर विश्वाश नहीं करेंगे या हँसेंगे| पर यह सत्य है| नर्मदादि तटों पर घने दुर्गम वनों में आज भी ऐसे तपस्यारत संत हैं जिन के अग्निकुंडो में यानि धूणों में बिना ईंधन के अग्नि प्रज्ज्वलित रहती है और जब वे वेदमंत्रों का पाठ करते हैं तब अग्नि स्वतः प्रकट होकर आहुतियाँ स्वीकार करती हैं|
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अनेक गुप्त तीर्थ हैं जिनके बड़े दिव्य स्पंदन हैं| बड़ी गुप्त रहस्यमयी विद्याएँ हैं और बड़े गुप्त रहस्यमय संत हैं| वनों में रहने वाले कई ऐसे साधुओं के बारे में पढ़ा है जो खुले में कुछ विशिष्ट गुप्त मन्त्र के साथ एक घेरा बनाकर निश्चिन्त होकर साधनारत हो जातें हैं या सो जाते हैं| उस घेरे में कोई भी हिंसक प्राणी प्रवेश नहीं कर सकता| कुछ ऐसे मन्त्र हैं जिनके जाप से दुर्गम और भयावह वनों में कोई भी हिंसक जीव आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता|
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ठाकुर जी जब एक बार ह्रदय में प्रवेश कर जातें हैं तो प्रवेश करते ही आड़े-टेढ़े हो जाते हैं फिर वे किसी भी परिस्थिति में बाहर नहीं निकलते| भगवान बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं| एक बार वे जब ह्रदय में घुस जाते हैं तो अन्य किसी का भी अन्दर प्रवेश नहीं होने देते| ऐसे ईर्ष्यालु प्रेमी से भी प्रेम का जो आनंद है वह अन्यत्र कहीं भी नहीं है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ मार्च २०१६

हमारे में सदगुण होंगे तभी हम अपनी भौतिक समृद्धि को सुरक्षित रख सकते हैं ---

हम स्वयं में बिना सदगुणों का विकास किये सांसारिक वैभव को प्राप्त करना चाहते हैं, यह हमारे पतन के मुख्य कारणों में से एक है| हमारे में सदगुण होंगे तभी हम अपनी भौतिक समृद्धि को सुरक्षित रख सकते हैं| .

भगवान से मैं प्रार्थना करता हूँ कि जब हमारे में सदगुण पूर्ण रूप से विकसित हो जाएँ तभी हमें सांसारिक वैभव देना|
उपास्य के गुण उपासक में आये बिना नहीं रहते| हम भगवान का ध्यान करेंगे तब निश्चित रूप से उनके गुण हमारे में अवतरित होंगे| नवरात्री का पावन पर्व चल रहा है| आओ जगन्माता की आराधना करें|
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हे माँ, तुम ही हमारी गति हो .....
हम सब की विकृतियों और दुष्ट वृत्तियों का नाश करो| आलस्य, अज्ञान, जड़ता और अविवेक रूपी तमोगुण हमारे में न रहें| हमें आत्मा का ज्ञान प्राप्त हो| कोई अवांछित दुर्गुण हम में न रहे| हमारा चित्त शुद्ध हो| हम सब का कल्याण हो|
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ १ ॥
भवाब्धावपारे महादुःखभीरु पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ २ ॥
न जानामि दानं न च ध्यानयोगं न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ३ ॥
न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ४ ॥
कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ५ ॥
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ६ ॥
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ७ ॥
अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः ।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रनष्टः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीमदादिशंकराचार्य विरचिता भवान्याष्ट्कं समाप्ता ॥

१९ मार्च २०१८