Sunday, 14 July 2019

हम जातिवाद से मुक्त हों, जातिवाद हमारे पर एक अभिशाप है .....

हम जातिवाद से मुक्त हों, जातिवाद हमारे पर एक अभिशाप है .....
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"जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम| गृह हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम||"
परमार्थ के मार्ग पर चलने वाले पथिक तो भगवान को समर्पित होते ही जाति-विहीन व वर्ण-विहीन हो जाते हैं, घर से भी बेघर हो जाते हैं, देह की चेतना भी छुट जाती है और मोक्ष की कामना भी नष्ट हो जाती है| उनकी जाति अच्युत है|
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विवाह के बाद कन्या अपनी जाति, गौत्र और वर्ण सब अपने पति की जाति, गौत्र और वर्ण में मिला देती है| पति की इच्छा ही उसकी इच्छा हो जाती है| वैसे ही परमात्मा को समर्पित होने पर अपना कहने को कुछ भी नहीं बचता, सब कुछ उन्हीं का हो जाता है| 'मैं' और 'मेरापन' भी समाप्त हो जाता है| सब कुछ वे ही हो जाते हैं| भगवान् की जाति क्या है ? भगवान् का वर्ण क्या है ? भगवान् का घर कहाँ है ? जो उन का है वह ही हमारा है|
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प्रार्थना :---- तुम महासागर हो तो मैं जल की एक बूँद हूँ जो तुम्हारे में मिलकर महासागर ही बन जाती है| तुम एक प्रवाह हो तो मैं एक कण हूँ जो तुम्हारे में मिलकर विराट प्रवाह बन जाता है| तुम अनंतता हो तो मैं भी अनंत हूँ| तुम सर्वव्यापी हो तो मैं भी सदा तुम्हारे साथ हूँ| जो तुम हो वह ही मैं हूँ| मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है| जब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता तो तुम भी मेरे बिना नहीं रह सकते| जितना प्रेम मेरे ह्रदय में तुम्हारे प्रति है, उससे अनंत गुणा प्रेम तो तुम मुझे करते हो| तुमने मुझे प्रेममय बना दिया है| जहाँ तुम हो वहीँ मैं हूँ, जहाँ मैं हूँ वहीँ तुम हो| मैं तुम्हारा अमृतपुत्र हूँ, तुम और मैं एक हैं|
शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० जुलाई २०१९

"अहिंसा" पर मेरे विचार .....

"अहिंसा" पर मेरे विचार .....
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उपनिषदों व गीता में 'अहिंसा' को सर्वोच्च नैतिक गुणों में माना गया है| महर्षि पतंजलि द्वारा योगसूत्र में वर्णित पाँच यम ..... अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह हैं| जैन धर्म का तो आधारभूत बिंदु ही 'अहिंसा' है| महाभारत में अनेक बार अहिंसा को परमधर्म कहा गया है| अहिंसा पर मेरे विचार औरों से हटकर कुछ भिन्न हैं| अधिकांश लोग जीवों को न मारने और पीड़ा न देने को ही अहिंसा मानते हैं| पर जैसा मुझे समझ में आया है उसके अनुसार .....
"मनुष्य का अहंकार और मोह" सबसे बड़ी हिंसा है| उसके पश्चात "किसी निरीह असहाय की जिसे सहायता की नितांत आवश्यकता है, सहायता न करना", और "किसी निरपराध को पीड़ित करना" ही हिंसा है|
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हिंसा के साथ साथ सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का भी उतना ही महत्व है| पर मात्र अहिंसा पर ही अत्यधिक जोर देने, यहाँ तक कि आतताइयों, तस्करों और दुष्ट आक्रान्ताओं से भी अहिंसा का व्यवहार करने से दुर्भाग्यवश भारत में एक ऐसी सद्गुण-विकृति आ गयी जिसके कारण विदेशी आतताइयों द्वारा आकमण के द्वार खुल गए, व भारत एक निर्वीर्य असंगठित और कमजोर राष्ट्र बन गया|
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ऐतिहासिक दृष्टी से जिस दिन सम्राट अशोक ने अपनी तलवार नीचे रख दी थी, उसी दिन से भारत का पतन आरम्भ हो गया| भारत में आततायी के लिए जो हमारी स्त्री, संतान, धन, और प्राणों का अपहरण करने, राष्ट्र पर आक्रमण करने, हमें अपने आधीन करने और राष्ट्र को दरिद्र बनाने आता है, के विरुद्ध हिंसा को धर्म माना गया था| आततायी के लिए कहीं भी क्षमा का प्रावधान नहीं था| पृथ्वीराज चौहान जैसे प्रतापी राजाओं द्वारा दी गयी क्षमा का दंड भारत आज तक भुगत रहा है| इस तरह की क्षमा अहंकार-जनित थी और उसका दुष्परिणाम ही हुआ| इसी तरह की अहंकार-जनित अहिंसा के उपासकों के विश्वासघात के कारण सिंध के महाराजा दाहरसेन की पराजय हुई और आतताइयों द्वारा भारत के पराभव का क्रम आरम्भ हुआ| इस तरह के विश्वासघात अनेक बार हुए| सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु पूरे मध्य एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में भी| तथाकथित अहिंसा के उपासकों ने आतताइयों का वीरता से निरंतर प्रतिरोध नहीं किया, जिसका परिणाम उन्हें मृत्यु या बलात् हिंसक मतांतरण के रूप में मिला|
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दुर्भाग्य से भारत में ही अहिंसा को परम धर्म मानने वाले लोग सबसे बड़े परिग्रही और भोगी बन गए हैं| अनैतिकता व भ्रष्ट आचारण के साथ-साथ अहिंसा संभव नहीं है| जीवों को न मारना तो अहिंसा है, किसी चींटी के मारने पर तो पछतावा हमें हो सकता है, किन्तु दूसरों को ठगने या उनका शोषण करने में कोई पछतावा हमें क्यों नहीं होता?
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भारत में सभी हिन्दू देवी-देवताओं के हाथ में शस्त्रास्त्र हैं| जब तक भारत में शक्ति की साधना की जाती थी, भारत की और आँख उठाकर देखने का दु:साहस किसी आतताई का नहीं हुआ| गीता में भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार हमारा अहंकार ही सबसे बड़ी हिंसा है| वे कहते हैं .....
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते| हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते||१८:१७||"
भगवान ने अहिंसा को बहुत बड़ा गुण भी बताया है .....
"अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्| दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्||१६:२||"
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आततायियों को दंड देने के लिए जिनके हाथ में धनुष और बाण हैं, वे प्रभु श्रीराम हमारे आराध्य हैं| वे यज्ञ की रक्षा करने के लिए ताड़का को मारना उचित समझते हैं, भक्तों की रक्षा के लिए मेघनाद के यज्ञ के विध्वंस का भी आदेश देते हैं, और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए लाखों राक्षसों के संहार को भी उचित मानते हैं| यह है अहिंसा का यथार्थ स्वरूप|
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आज की परिस्थिति में जब धर्म और राष्ट्र की अस्मिता पर मर्मान्तक प्रहार हो रहे हैं, तब धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए की गयी हिंसा भी अहिंसा है| इस समय राष्ट्र को एक ब्रह्मतेज और क्षात्रबल की नितांत आवश्यकता है| यही है -- 'अहिंसा परमो धर्म:'|
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महाभारत में अनेक स्थानों पर अहिंसा को परमधर्म बताया गया है, कुछ का यहाँ संकलन है .....
"अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः| सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः||
"अहिंसा परमः धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः सत्ये तु प्रतिष्ठाम् कृत्वा प्रवृत्तयः प्रवर्तन्ते|"
"अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः| दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृताय ते||"
"अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः| अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते||
"अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः| अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः||"
"अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम्| अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम्||"
"सर्वयज्ञेषु वा दानं सर्वतीर्थेषु वाऽऽप्लुतम्| सर्वदानफलं वापि नैतत्तुल्यमहिंसया ||"
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब महान दिव्यात्माओं को नमन !
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० जुलाई २०१९

अपनी चेतना में मैं सभी के साथ एक हूँ ....

अपनी चेतना में मैं सभी के साथ एक हूँ| परमात्मा में हम सब एक हैं| जो आनंद भगवान की भक्ति और समर्पण में है, वह अन्यत्र कहीं भी नहीं है| गीता में बताई गयी भगवान की अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति के समक्ष अन्य कुछ भी नहीं है|
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मेरे लिए तो साकार रूप में वे मेरे समक्ष नित्य शाम्भवी मुद्रा में पद्मासन में मेरे सहस्त्रार में समाधिस्थ हैं| वे ही मेरे ध्येय हैं और मेरा समर्पण उन्हीं के प्रति है| मेरे लिए वे ही परमशिव है, विष्णु हैं, नारायण हैं और जगन्माता हैं|
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शाम्भवी मुद्रा में पद्मासनस्थ समाधिस्थ एक छवि पुराण-पुरुष की अनेक साधकों के समक्ष चेतना में उभरती है| समर्पण उन्हीं के प्रति हो|
ॐ ॐ ॐ
९ जुलाई २०१९

श्रमण परम्परा और ब्राह्मण (वैदिक) परम्परा .....

श्रमण परम्परा और ब्राह्मण (वैदिक) परम्परा .....
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भगवान महावीर श्रमण परम्परा के चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर थे| श्रमण परम्परा और ब्राह्मण परम्परा दोनों ही अति प्राचीन काल से चली आ रही हैं| इनमें अंतर यह है कि श्रमण परम्परा नास्तिक है और ब्राह्मण परम्परा आस्तिक| जो श्रुति (वेदों) में आस्था रखता है व श्रुति (वेदों) को अंतिम प्रमाण मानता है, वह आस्तिक है, और जो श्रुतियों में आस्था नहीं रखता वह नास्तिक है| श्रमण परम्परा श्रुति (वेदों) को अपौरुषेय नहीं मानती अतः नास्तिक परम्परा है|
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पर इनमें एक समानता भी है| ये दोनों परम्पराएँ आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म और कर्मफलों के सिद्धांत को मानती हैं|
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ब्राह्मण परम्परा में ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को ही मोक्ष का आधार मानता है और वेदवाक्य को ही ब्रह्म-वाक्य मानता है|
श्रमण परम्परा में श्रमण वह है जो निज श्रम द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को मानता है और जिसके लिए जीवन में ईश्वर की नहीं बल्कि श्रम की आवश्यकता है| श्रमण परम्परा ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानती|
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श्रमण परम्परा का आधार .... श्रमण, समन, शमन .... इन तीन शब्दों पर है| 'श्रमण' शब्द 'श्रमः' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'परिश्रम करना'| श्रमण शब्द का उल्लेख वृहदारण्यक उपनिषद् में 'श्रमणोऽश्रमणस' के रूप में हुआ है| यह शब्द इस बात को प्रकट करता है कि व्यक्ति अपना विकास अपने ही परिश्रम द्वारा कर सकता है| सुख–दुःख, उत्थान-पतन सभी के लिए वह स्वयं उत्तरदायी है| 'समन' का अर्थ है, समताभाव, अर्थात् सभी को आत्मवत् समझना, सभी के प्रति समभाव रखना| जो बात अपने को बुरी लगती है, वह दूसरे के लिए भी बुरी है| ‘शमन' का अर्थ है अपनी वृत्तियों को शान्त रखना, उनका निरोध करना|
जो व्यक्ति अपनी वृत्तियों को संयमित रखता है वह महाश्रमण है| इस प्रकार श्रमण परम्परा का मूल आधार श्रम, सम, शम इन तीन तत्त्वों पर आश्रित है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ गुरुभ्यो नमः !
कृपा शंकर
९ जुलाई २०१९

(इस विषय पर आगे और लेखन पाठकों की प्रतिक्रियाओं पर निर्भर है| आगे के विषय अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहआदि हो सकते हैं| स्यादवाद और वेदांत पर भी विचार हो सकता है| साधनाओं पर भी लिखा जा सकता है, पर यह सब परिस्थितियों पर निर्भर है क्योंकि मेरा तो आजकल सर्वप्रिय विषय ही भक्ति है, भक्ति के अलावा अन्य किसी विषय पर लिखने की इच्छा ही नहीं होती|)

हर सांस एक पुनर्जन्म है .....

साधना के मार्ग पर शत-प्रतिशत रहें| अपने हृदय में जो प्रचंड अग्नि जल रही है उसे दृढ़ निश्चय और सतत् प्रयास से निरंतर प्रज्ज्वलित रखिए| आधे-अधूरे मन से किया गया कोई प्रयास सफल नहीं होगा| साधना निश्चित रूप से सफल होगी, चाहे यह देह रहे या न रहे ...... इस दृढ़ निश्चय के साथ साधना करें, आधे अधूरे मन से नहीं|
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परमात्मा का स्मरण करते करते यदि मरना भी पड़े तो वह इस नारकीय सांसारिक जीवन जीने से तो अच्छा है|
परमात्मा मन का विषय नहीं है| "वह" जिसके द्वारा मन स्वयं मनन का विषय बन जाता है, "वह" ही ब्रह्म यानि परमात्मा है| वह मन और बुद्धि की समझ से परे है| उसके गुणों की हम गहरे ध्यान में अनुभूति तो कर सकते हैं, पर अपना रहस्य तो वे स्वयं ही कृपा कर के ही किसी को अनावृत कर सकते हैं|
"सोइ जानहि जेहि देहु जनाई, जानत तुमहिं तुमहि हुई जाई|"
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हर सांस एक पुनर्जन्म है|दो साँसों के मध्य का संधिक्षण वास्तविक संध्याकाल है, जिसमें की गयी साधना सर्वोत्तम होती है|हर सांस पर परमात्मा का स्मरण रहे क्योंकि हर सांस तो वे ही ले रहे हैं, न कि हम|
"हं" (प्रकृति) और "सः" (पुरुष) दोनों में कोई भेद नहीं है| प्रणवाक्षर परमात्मा का वाचक है| कोई अन्य नहीं है, सम्पूर्ण अस्तित्व हमारी ही अभिव्यक्ति है.
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श्रीगुरुभ्यो नमः ! हरिः ॐ !
८ जुलाई २०१९

महावीर का 'जीयोऔर जीने दो' का सिद्धांत .....

महावीर का 'जीयोऔर जीने दो' का सिद्धांत .....
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भगवान महावीर श्रमण परम्परा के चौंबीसवें तीर्थंकर थे| तीर्थंकर का अर्थ है जो स्वयं तप के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त करते है और संसार-सागर से पार लगाने वाले तीर्थ की रचना करते है| तीर्थंकर वह व्यक्ति है जिसने पूरी तरह से क्रोध, अभिमान, छल, इच्छा, आदि पर विजय प्राप्त की है| महावीर का जन्म ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व वैशाली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था| तीस वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज-वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये| १२ वर्षो की कठिन तपस्या के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ| यह श्रमण परम्परा ही कालान्तर में जैन धर्म कहलाई| जैन का अर्थ होता है जितेन्द्रिय, यानि जिस ने मन आदि इन्द्रियों को जीत लिया है|
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श्रमण परम्परा के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे जिनके पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष है| ऋषभदेव का उल्लेख श्रुति में भी है और भागवत में भी| तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को उच्चतम नैतिक गुण बताया| उनके पंचशील के सिद्धांत ..... अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य हैं| योग-दर्शन में ये ही 'यम' कहलाते हैं| उन्होंने अनेकांतवाद व स्यादवाद जैसे अद्भुत सिद्धांत दिए|
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हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें स्वयं को पसंद हो| यही महावीर का 'जीयो और जीने दो' का सिद्धांत है|
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(इस विषय पर अगले लेख में श्रमण परम्परा और ब्राह्मण परम्परा के बारे में लिखूंगा| दोनों में भेद है|) (कृपया कोई भी अशोभनीय टिप्पणी न करें)
कृपा शंकर
८ जुलाई २०१९

सारी साधनाएँ एक बहाना है, असली चीज तो प्रभु की कृपा है .....