Wednesday, 18 October 2017

क्या महिषासुर और रावण सचमुच मर गये ? .....

क्या महिषासुर और रावण सचमुच मर गये ? .....
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अभी कुछ दिन पूर्व ही हमने विजयदशमी यानि दशहरे का त्यौहार मनाया और स्थान स्थान पर रावण के कागजी पुतलों को जलाया था| इससे पूर्व नवरात्रों में महिषासुरमर्दिनी माँ दुर्गा की आराधना की| अब प्रश्न है कि क्या महिषासुर और रावण सचमुच में ही मर गए हैं?
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नहीं, महिषासुर और रावण दोनों ही अमर और शाश्वत हैं, जब तक सृष्टि है तब तक इनका अस्तित्व बना रहेगा, ये कभी नहीं मर सकते| ये प्रत्येक व्यक्ति के अवचेतन मन में हैं, और हर व्यक्ति को निज प्रयास से अपने अंतर में ही इनका दमन करना होगा| इनका दमन हो सकता है, नाश नहीं|
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महिषासुर हमारे भीतर का तमोगुण है जो प्रमाद, दीर्घसूत्रता आदि अवगुणों के रूप में छिपा हुआ है| हम सब के भीतर यह महिषासुर बहुत गहराई से छिपा है|
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यह रावण हमारे अवचेतन मन में लोभ, कामुकता, अहंकार आदि वासनाओं के रूप में छिपा हुआ है| हम दूसरों का धन, दूसरों के अधिकार आदि छीनना चाहते हैं, अपने अहंकार के समक्ष दूसरों को कीड़े-मकोड़ों से अधिक कुछ नहीं समझते, यह हमारे अंतर का रावण है| नशा अहंकार का हो या मदिरा का, दोनों में विशेष अंतर नहीं है, पर यह अहंकार का नशा मदिरा के नशे से हज़ार गुणा अधिक घातक है| इस नशे में हर रावण स्वयं को राम समझता है|
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हमारे ह्रदय के एकमात्र राजा राम हैं| उन्होंने ही सदा हमारी ह्रदय भूमि पर राज्य किया है, और सदा वे ही हमारे राजा रहेंगे| अन्य कोई हमारा राजा नहीं हो सकता| वे ही हमारे परम ब्रह्म हैं|
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हमारे ह्रदय की एकमात्र महारानी सीता जी हैं| वे हमारे ह्रदय की अहैतुकी परम प्रेम रूपा भक्ति हैं| वे ही हमारी गति हैं| वे ही सब भेदों को नष्ट कर हमें राम से मिला सकती हैं| अन्य किसी में ऐसा सामर्थ्य नहीं है|
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हमारी पीड़ा का एकमात्र कारण यह है कि हमारी सीता का रावण ने अपहरण कर लिया है| हम सीता को अपने मन के अरण्य में गलत स्थानों पर ढूँढ रहे हैं और रावण के प्रभाव से दोष दूसरों को दे रहे हैं, जब कि कमी हमारे प्रयास की है| यह मायावी रावण ही हमें भटका रहा है| सीता जी को पा कर ही हम रावण का नाश कर सकते हैं, और तभी राम से जुड़ सकते हैं|
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राम से एकाकार होने तक इस ह्रदय की प्रचंड अग्नि का दाह नहीं मिटेगा, और राम से पृथक होने की यह घनीभूत पीड़ा हर समय निरंतर दग्ध करती रहेगी| राम ही हमारे अस्तित्व हैं और उनसे एक हुए बिना इस भटकाव का अंत नहीं होगा| उन से जुड़कर ही हमारी वेदना का अंत होगा और तभी हम कह सकेंगे ..... "शिवोSहं शिवोSहं अहं ब्रह्मास्मि"|
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इस हिन्दू राष्ट्र में धर्म रूपी बैल पर बैठकर भगवान शिव ही विचरण करेंगे, और नवचेतना को जागृत करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी ही बजेगी| यहाँ के राजा सदा राम ही रहेंगे| सनातन हिन्दू धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा होगी व असत्य और अन्धकार की राक्षसी शक्तियों का निश्चित रूप से दमन होगा| भारत माँ अपने द्विगुणित परम वैभव के साथ अखण्डता के सिंहासन पर बिराजमान होंगी| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

= कृपा शंकर =

प्राचीन भारत की वैदिक राष्ट्र प्रार्थना ......

प्राचीन भारत की वैदिक राष्ट्र प्रार्थना ......
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"आ ब्रह्मण ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतां राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योतिव्याधि महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानडवानाशुः सप्ति पुरन्धिर्योषाः जिष्णु रथेष्ठा सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे न पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यतां योगक्षेमो न कल्पतां"
- यजुर्वेद 22, 22
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||ॐ|| इस राष्ट्र में ब्रह्मतेजयुक्त ब्राह्मण उत्पन्न हों| धनुर्धर, शूर और बाण आदि का उपयोग करने वाले कुशल क्षत्रिय पैदा हों| अधिक दूध देने वाली गायें हों| अधिक बोझ ढो सकें ऐसे बैल हों| ऐसे घोड़े हों जिनकी गति देखकर पवन भी शर्मा जाये| राष्ट्र को धारण करने वाली बुद्धिमान तथा रूपशील स्त्रियां पैदा हों| विजय संपन्न करने वाले महारथी हों| समय समय पर अच्छी वर्षा हो, वनस्पति, वृक्ष और उत्तम फल हों| हमारा योगक्षेम सुखमय बने| ||ॐ ॐ ॐ ||


Monday, 9 October 2017

समय के साथ सब कुछ बदल जाता है .....

सुना और पढ़ा है कि प्राचीन भारत में घर घर में यज्ञशालाएँ होती थीं| आजकल शायद ही किसी घर में यज्ञशाला मिले|

समय के साथ सब कुछ बदल जाता है .....

गाँवों में शौचालय तो अपने जीवन में कहीं भी मैनें नहीं देखे| यह नगरों की आवश्यकता थी| गाँवों में लोग खेत में ही मल-मूत्र त्याग कर उस पर मिट्टी डाल दिया करते थे| इससे खाद बनती थी| अब जनसंख्या बहुत अधिक बढ़ गयी है और भूमि भी कम पड़ने लगी है इसलिए गाँवों में भी शौचालय आवश्यक हो गए हैं|

आजकल गाँवों में लोग खेती से विमुख होने होने लगे हैं| नरेगा जैसी योजनाओं से लोगों में परिश्रम करने की भावना समाप्त होने लगी है| कृषि मजदूर नहीं मिलते है| अनेक लोग ताश खेल खेल कर समय काटते हैं| खेती के लिए बैंक से ऋण लेते हैं पर खेती करते नहीं हैं| फिर फसल नहीं हुई कहकर आन्दोलन कर के ऋण माफ़ करा लेते हैं| पहले बिचौलिए आधा पैसा खा जाते थे, अब खाते में पैसा सीधा आ जाता है| कहते हैं कि खूब प्रगति हो रही है|

आज से चालीस-पचास वर्षों पूर्व तक चाय की आदत लोगों में नहीं थी| अब चाय के बिना काम ही नहीं चलता|

पानी की बिक्री पहले कभी नहीं होती थी| लोग प्यासे को पानी पिलाना अपना धर्म मानते थे|

सुना और पढ़ा है कि प्राचीन भारत में दूध इतना अधिक होता था कि लोग दूध बेचना अपना अपमान समझते थे| अब दुग्ध उद्योग सबसे अधिक लाभकारी है|

समय के साथ सब कुछ बदल जाता है| बीता हुआ युग कभी बापस नहीं आता| जो हो रहा है वह समय के अनुसार अच्छा ही हो रहा है, क्योंकि हम मूक साक्षीमात्र ही हैं| कोई शिकायत नहीं है| साक्षी मात्र बनकर ही देखते रहो|

क्या मनुष्य के दूषित विचारों से प्रदूषण नहीं फैलता ?
क्या निर्दोष पशुओं की क्रूर ह्त्या से प्रदूषण नहीं फैलता ?
क्या एयर कंडीशनर चलाने से प्रदूषण नहीं फैलता ?
क्या कारखानों के धुएँ से प्रदूषण नहीं फैलता ?
क्या सडकों पर चल रहे इतने सारे वाहन प्रदूषण नहीं फैलाते?

ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!

स्वयं की आध्यात्मिक प्रगति का मापदंड ......

स्वयं की आध्यात्मिक प्रगति का मापदंड ......
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हमने चाहे खूब जप-तप किया हो, खूब ध्यान किया हो, और खूब भक्ति की हो, पर यदि अहंकार और काम वासना कम न हुई है तो हमारी आध्यात्मिक साधना और भक्ति से हमें अभी तक कोई लाभ नहीं हुआ है| मन की शान्ति, अहंकार का नाश, और काम-वासना से निवृति .... ये मील के पत्थर हैं जो हमारी आध्यात्मिक प्रगति को दर्शाते हैं|
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हम अपनी प्रगति का आंकलन अपने विचारों और व्यवहार को देखकर भी कर सकते हैं| हम अपने बुरे विचारों और बुरे भावों से मुक्त होने के लिए परमात्मा के सदगुणों का ध्यान करते हैं ताकि वे सदगुण हम में आयें और हमें अपने बुरे संस्कारों से मुक्ति मिले| अच्छे और बुरे विचार पूर्व जन्मों से अब तक के संस्कारों से आते हैं|
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किसी सिद्ध गुरु का सान्निध्य अत्यंत आवश्यक है जो हमें दिशा निर्देश तो देता ही है साथ साथ हमारी रक्षा भी करता है| पांडित्य प्रदर्शन, तर्क-वितर्क और वाक् पटुता से बचें, ये अहंकार को जन्म देते हैं|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!
१० अक्टूबर २०१७

अहंकार पतन का मार्ग है .....

अहंकार पतन का मार्ग है .....
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मेरे एक घनिष्ठ मित्र हैं जो बहुत अधिक धनी व्यक्ति थे| धन के नशे में अपने सामने किसी को कुछ समझते ही नहीं थे| हालाँकि उनमें सदगुण भी बहुत अधिक थे| बड़े परोपकारी, दानवीर, विद्वान् और राष्ट्रभक्त थे| पर अहंकार उनका बड़ा प्रबल था| पूर्वजन्म के कुछ संस्कारों के कारण ही मेरी उनसे मित्रता थी जिसे आप उनकी एक विवशता भी समझ सकते हैं| जिससे भी उन्होंने मित्रता की वे सब उनसे कुछ न कुछ अपेक्षा ही रखते थे, लोगों ने उन्हें बहुत अधिक ठगा| पर मेरी उनसे कभी भी कोई अपेक्षा नहीं रही, इस कारण वे मेरा अब भी बहुत अधिक सम्मान करते हैं| अपने अहंकार के कारण उन्होंने जीवन में अनेक श्रेष्ठों का अनादर किया, इस कारण उनके परिवार के लोग भी उनसे दूर हो गए| कई बार कर्मों का फल बहुत शीघ्र मिल जाता है| एक दिन ऐसी भी स्थिति आई कि लक्ष्मी जी उनसे रूठ कर उनसे बहुत दूर चली गयी और वे पराश्रित हो गए| अत्यधिक अभिमान भी व्यक्ति को खाई-खड्डे में डाल सकता है, यह सीख मैनें उनके जीवन से ली| उनकी सहन शक्ति असामान्य रूप से बड़ी प्रबल थी इसीलिए वे जीवित बचे, अन्यथा एक सामान्य व्यक्ति ऐसे आघात नहीं सह सकता और शीघ्र ही यमलोक पहुँच जाता है| मित्रता धर्म निभाने के लिए उनके कष्ट भरे जीवन में भी मैनें उनका कभी साथ नहीं छोड़ा| अब जीवन के संध्याकाल में वे अपनी भूलें मान रहे हैं|
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जब मनुष्य का अहंकार प्रबल हो जाता है तब क्रोध और घृणा भी उसके जीवन में आ जाती है| मेरा अनुभवजन्य विचार तो यही है कि हम स्वयं को यह देह मान लेते हैं और इसके सुख के लिए जीवन को दाँव पर लगा देते हैं, यह हमारे पतन का एक सबसे बड़ा कारण है| इस देह से परे भी जीवन है, यह बात बुद्धि से समझ में नहीं आती| इसके लिए भगवान से प्रेम और ध्यान साधना करनी पड़ती है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
०९ अक्टूबर २०१७

परमात्मा की अनंतता ही हमारा घर है, वही हमारा वास्तविक अस्तित्व है .....

परमात्मा की अनंतता ही हमारा घर है, वही हमारा वास्तविक अस्तित्व है .....
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जब निज चेतना में भगवान स्वयं ही समक्ष हों तब क्या करना चाहिए ? इधर उधर हाथ मारने की बजाए स्वयं को ही पूर्ण रूप से उन्हें समर्पित कर देना चाहिए | कूटस्थ में एक प्रचंड अग्नि सदा प्रज्ज्वलित है जिसकी चेतना भ्रूमध्य में सदा बनी रहनी चाहिए | हर साँस एक यज्ञ है | स्वाभाविक रूप से साँस लेते समय अपनी सारी चेतना को सुषुम्ना मार्ग से मूलाधार चक्र से उठाते हुए आज्ञाचक्र तक लाकर कूटस्थ में उसकी आहुति दे देनी चाहिए | हर चक्र पर ओंकार का मानसिक जाप हो | इस तरह सुषुम्ना में ही विचरण करना चाहिए, पर दृष्टी भ्रूमध्य में ही स्थिर रहे | धीरे धीरे सारी चेतना आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में ही स्थिर हो जाती है | यह एक आदर्श स्थिति है |
कूटस्थ में दिखने वाली ब्रह्मज्योति का सदा ध्यान करें और वहीं सुनाई दे रहे प्रणव नाद को सुनते रहें| प्रणव नाद को निरंतर सुनना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है |
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सहस्त्रार ही गुरु महाराज के चरण कमल हैं जिसमें अपनी चेतना का समर्पण ही गुरु चरणों में समर्पण है | सहस्त्रार में स्थिति ही गुरु की परम कृपा है, यही गुरु चरणों का ध्यान है | फिर चेतना विस्तृत होते होते सारी समष्टि में और उससे भी परे व्याप्त हो जाती है, यह शिवभाव है | इस पूरी सृष्टि में और उससे भी परे तत्वरूप में जो व्याप्त हैं वे भगवान परमशिव हैं | उनकी अनंतता ही हमारी वास्तविक देह है | जब उस अनंतता का बोध हो जाए तब उस अनंतता की चेतना में ही रहना चाहिए | परमात्मा की अनंतता ही हमारा घर है, वही हमारा वास्तविक अस्तित्व है |
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ॐ नमः शिवाय ! ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
०९ अक्टूबर २०१७

किस को शुभ कामनाएँ दूँ और किस को नमन करूँ ? .....

किस को शुभ कामनाएँ दूँ और किस को नमन करूँ ? .....
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विगत जीवन का जब सिंहावलोकन करता हूँ तो पाता हूँ कि इस लोकयात्रा में परमात्मा अधिकांशतः सदा मित्रों के रूप में मेरे समक्ष आए | मैं अति भाग्यशाली हूँ कि जीवन में मुझे बहुत अच्छे अच्छे मित्र मिले | वे सब मित्र परमात्मा की ही साक्षात साकार अभिव्यक्तियाँ थीं | मुझे उन सब में साक्षात परमात्मा के दर्शन होते हैं |
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देश विदेश में अनजान देशों और अपरिचित स्थानों पर भी परमात्मा सदा मित्र के रूप में मिले | उन्होंने कहीं पर भी कभी कोई असुविधा या कष्ट नहीं होने दिया | आज पता ही नहीं है कि उनमें से अधिकाँश आत्माएँ कहाँ और कैसे हैं | अनेक तो इस लोक को छोड़कर अज्ञात में चली गयी हैं|
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मुझे किसी का भी अभाव नहीं अनुभूत होता, क्योंकि स्वयं परमात्मा ही माता-पिता, भाई-बंधू, सगे-सम्बन्धियों और सभी मित्रों के रूप में आये | इस जन्म से पहिले भी वे मेरे साथ थे और आगे भी सदा रहेंगे | उनका साथ शाश्वत है | अन्य सारे साथ मिथ्या भ्रम मात्र हैं |
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माता-पिता, सभी सम्बन्धियों और मित्रों से जो प्रेम मिला वह परमात्मा का ही प्रेम था जो परमात्मा ने उनके माध्यम से दिया | यह सारा खेल, यह सारी लीला स्वयं परमात्मा के मन की एक कल्पना मात्र है | वे ही यह मैं बन गए हैं | उनके सिवाय अन्य किसी का अस्तित्व नहीं है |
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एक विराट अथाह महासागर एक जल की बूँद को क्या दे सकता है ? एक जल की बूँद एक महासागर से क्या प्राप्त कर सकती हैं ? हम सब महासागर से छिटक कर बिखरी हुई जल की बूँदें हैं जिन्हें बापस महासागर में विलीन होना है |
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सभी को मंगल कामनाएँ और सप्रेम नमन !
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किस को शुभ कामनाएँ दूँ और किस को नमन करूँ ? अस्तित्व तो एकमात्र परमात्मा का ही है | मेरा भी पृथकता का बोध एक भ्रम मात्र ही है |
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

०७ अक्टूबर २०१७