Wednesday, 12 July 2017

उलटा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग .......

उलटा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग .......
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आसमान में एक उलटा कुआँ लटक रहा है जिसका रहस्य सिर्फ प्रभु कृपा से ही ध्यान साधक योगी समझ पाते हैं| उस कुएँ में एक चिराग यानि दीपक सदा प्रज्ज्वलित रहता है| उस दीपक में न तो कोई ईंधन है, और ना ही कोई बत्ती है फिर भी वह दीपक दिन रात छओं ऋतु और बारह मासों जलता रहता है|
उस दीपक की अखंड ज्योति में से एक अखंड ध्वनि निरंतर निकलती है जिसे सुनते रहने से साधक समाधिस्थ हो जाता है| संत पलटूदास जी कहते हैं कि उस ध्वनी को सुनने वाला बड़ा भाग्यशाली है| पर उस ज्योति के दर्शन और उस नाद का श्रवण सद् गुरु के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं करा सकता|
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उलटा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग ......
तिसमें जरै चिराग, बिना रोगन बिन बाती |
छह ऋतु बारह मास, रहत जरतें दिन राती ||
सतगुरु मिला जो होय, ताहि की नजर में आवै |
बिन सतगुरु कोउ होर, नहीं वाको दर्शावै ||
निकसै एक आवाज, चिराग की जोतिन्हि माँही |
जाय समाधी सुनै, और कोउ सुनता नांही ||
पलटू जो कोई सुनै, ताके पूरे भाग |
उलटा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग ||
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उलटा कुआँ मनुष्य कि खोपड़ी है जिसका मुँह नीचे की ओर खुलता है| उस कुएँ में हमारी आत्मा यानि हमारी चैतन्यता का निवास है| उसमें दिखाई देने वाली अखंड ज्योति ----- ज्योतिर्मय ब्रह्म है, उसमें से निकलने वाली ध्वनि ---- अनाहत नादब्रह्म है, यही राम नाम की ध्वनी है|
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'कूटस्थ' में इनके साथ एकाकार होकर और फिर इनसे भी परे जाकर जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त होती है| इसका रहस्य समझाने के लिए परमात्मा श्रोत्रीय ब्रह्मनिष्ठ सद्ग गुरु के रूप में अवतरित होते हैं| यह चैतन्य का दीपक ही हमें जीवित रखता है, इसके बुझ जाने पर देह मृत हो जाती है|
बाहर हम जो दीपक जलाते हैं ---- वे प्रतीक मात्र हैं| बाहर कि घंटा, घड़ियाल, टाली और शंख आदि की ध्वनी उस अनाहत नाद की ही प्रतीक हैं|
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ह्रदय में गहन भक्ति और अभीप्सा ही हमें राम से मिलाती हैं|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
२९ जून २०१५
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पुनश्चः :--
ज्योतिर्मय ब्रह्म पर ध्यान करते करते हम शब्द ब्रह्म तक पहुँच जाते हैं| मेरे अपने अनुभव के अनुसार जब हम शिवनेत्र होकर भ्रूमध्य में ध्यान करते हैं तब गुरुकृपा से ज्योति के भी दर्शन होते हैं और और नाद भी सुनाई देने लगता है| जैसे जैसे अज्ञान दूर होता है, कामनाएँ भी नष्ट होने लगती हैं और हम जीवन मुक्ति की ओर अग्रसर होने लगते हैं| ॐ ॐ ॐ ||

हम विजयी हैं ......

हम विजयी हैं ......
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हम पराजित राष्ट्र नहीं हैं| यह राष्ट्र सदा विजयी रहा है और विजयी रहेगा| अनंत काल में कुछ समय के लिए यहाँ अन्धकार छा जाता है पर हमारा विजयी भाव निश्चित रूप से उसे पराभूत कर देता है| अन्धकार का समय निकल चुका है| भारत की आत्मा, भारत की अस्मिता अब निश्चित रूप से विजयी होगी|
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हमें हमारे राष्ट्र की परम्पराओं, संस्कृति, धर्म और आध्यात्म पर अभिमान है| अभी जो अन्धकार दिखाई दे रहा है वह सूर्योदय से पूर्व का है| असत्य और अन्धकार की शक्तियों का नाश होगा| भारत जागेगा और अपने द्वीगुणित परम वैभव को प्राप्त होगा|
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हमें सिर्फ एक ही काम करना है कि कैसे भी स्वधर्म का पालन कर स्वधर्म की रक्षा करें| बाकी काम प्रकृति करेगी| हमें अपने राष्ट्र और धर्म की आलोचना करने वालों का मुँह बंद करना होगा| भारत की अधिकांश मीडिया, प्रेस और राजनीतिक शक्तियाँ विदेशियों के हाथों में बिकी हुई है, उन्हें प्रभावहीन करें| निज विवेक के प्रकाश में अपना सर्वश्रेष्ठ करें अपने परिवार में और युवा पीढ़ी में अच्छे संस्कार दें| हर प्रकार की नकारात्मकता का परित्याग करें, भगवान हमारे साथ हैं|
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हम विजयी थे, विजयी हैं और सदा विजयी रहेंगे| परमात्मा की शक्ति हमारे साथ है|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

अब कोई कामना न रहे ......

अब कोई कामना न रहे ......
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पिछले चार-पाँच वर्षों से जो भी आध्यात्मिक प्रेम के भाव आते थे वे फेसबुक के इस सार्वजनिक मंच पर व्यक्त हो जाया करते थे| अब पूर्ण संतुष्टि है, कोई कामना नहीं रही है, आगे कोई कामना हो भी नहीं, यही भगवान से प्रार्थना है|
इस मंच पर अनेक दिव्य और महान आत्माओं से मिलना हुआ है, बहुत अच्छा सत्संग मिला है, और सभी से अत्यधिक प्रेम मिला है| मैं सभी का आभारी हूँ और सब को सप्रेम साभार नमन करता हूँ|
अब परात्पर गुरु और परमशिव के प्रति परम प्रेम और उन्हें पाने की अभीप्सा बढ़ती ही जा रही है| अन्य सब भाव अब शनै शनै लुप्त हो रहे हैं| थोड़ा बहुत प्रारब्ध बचा है वह भी एक दिन कट ही जाएगा|
ध्यान साधना की दीर्घता और गहराई और अधिक बढाने की निरंतर प्रेरणा मिल रही है| जीवन अब परमात्मा को समर्पित है, जैसा वे चाहें वैसा करें| मेरी कभी कोई कणमात्र भी कामना न रहे यही उनसे प्रार्थना है|
आप सब से भी हार्दिक प्रार्थना है कि अपना अधिक से अधिक समय परमात्मा के ध्यान में व्यतीत करें|
ॐ सह नाववतु| सह नौ भुनक्तु| सह वीर्यं करवावहै| तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै| ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||
हरि ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

परमात्मा की कृपा ही सार है, बाकी सब निःसार है .....

परमात्मा की कृपा ही सार है, बाकी सब निःसार है .....
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कर्मफल और संस्कार ये दोनों ही अतीन्द्रिय हैं ये भगवान की कृपा से ही समझ में आते हैं| हम जैसा सोचते हैं, जैसे वातावरण में व जैसे लोगों के साथ रहते हैं, और जैसा खाते-पीते हैं, वैसे ही संस्कार पड़ते हैं|
हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं, जिनका फल भुगतना ही पड़ता है| प्रकृति अपना कार्य सतत निष्पक्ष भाव से करती रहती है| प्रकृति के नियमों को न समझना हमारी ही कमी है इसके लिए भगवान को दोष देना अनुचित है| हाँ, भगवान की शरण लेने से और अहंकार का त्याग करने से कर्मफलों से मुक्ति मिल सकती है| हमारा स्वभाव भी हमारे कर्मों का ही फल है| यदि स्वभाव प्रकृति की और है तो वह बंधन में डालता है, यदि परमात्मा की ओर है तो स्वतंत्रता दिलाता है| वास्तविक स्वतन्त्रता परमात्मा में ही है| अहंकार से मुक्ति परमात्मा की कृपा से ही मिलती है| मोक्ष कहो या मुक्ति .... ये सब भगवान की कृपा से ही प्राप्त होते हैं, न कि निज प्रयास से|
जितना मेरे सामर्थ्य में था उतना ही लिख पाया हूँ, बाकी मेरे सामर्थ्य से परे है| परमात्मा की कृपा सब पर बनी रहे|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
२९ जून २०१७ 

शबद अनाहत बागा ...........

शबद अनाहत बागा ...........
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जब राम नाम यानि प्रणव की अनाहत ध्वनी अंतर में सुनाई देना आरम्भ कर दे तब पूरी लय से उसी में तन्मय हो जाना चाहिए| सदा निरंतर उसी को पूरी भक्ति और लगन से सुनना चाहिए|
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भोर में मुर्गे की बाँग सुनकर हम जान जाते हैं कि अब सूर्योदय होने ही वाला है, वैसे ही जब अनाहत नाद अंतर में बांग मारना यानि सुनना आरम्भ कर दे तब सारे संशय दूर हो जाने चाहिएँ और जान लेना चाहिए कि परमात्मा तो अब मिल ही गए हैं| अवशिष्ट जीवन उन्हीं को केंद्र बिंदु बनाकर, पूर्ण भक्तिभाव से उन्हीं को समर्पित होकर व्यतीत करना चाहिए|
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कबीर दास जी के जिस पद की यह अंतिम पंक्ति है वह पूरा पद इस प्रकार है ----
"अवधूत गगन मंडल घर कीजै,
अमृत झरै सदा सुख उपजै, बंक नाल रस पीजै॥
मूल बाँधि सर गगन समाना, सुखमनि यों तन लागी।
काम क्रोध दोऊ भये पलीता, तहाँ जोगिनी जागी॥
मनवा जाइ दरीबै बैठा, मगन भया रसि लागा।
कहै कबीर जिय संसा नाँहीं, सबद अनाहद बागा॥"
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जब भी समय मिले एकांत में पवित्र स्थान में सीधे होकर बैठ जाएँ| दृष्टी भ्रूमध्य में हो, दोनों कानों को अंगूठे से बंद कर लें, छोटी अंगुलियाँ आँखों के कोणे पर और बाकि अंगुलियाँ ललाट पर| आरम्भ में अनेक ध्वनियाँ सुनाई देंगी| जो सबसे तीब्र ध्वनी है उसी को ध्यान देकर सुनते रहो| उसके साथ मन ही मन ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ या राम राम राम राम राम का मानसिक जाप करते रहो| ऐसी अनुभूति करते रहो कि मानो किसी जलप्रपात की अखंड ध्‍वनि के मध्य में यानि केंद्र में स्‍नान कर रहे हो| धीरे धीरे एक ही ध्वनी बचेगी उसी पर ध्यान करो और साथ साथ ओम या राम का निरंतर मानसिक जाप करते रहो| दोनों का प्रभाव एक ही है| कोहनियों के नीचे कोई सहारा लगा लो| कानों को अंगूठे से बंद कर के नियमित अभ्यास करते करते कुछ महीनों में आपको खुले कानों से भी वह प्रणव की ध्वनी सुनने लगेगी| यही नादों का नाद अनाहत नाद है|
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इसकी महिमा का वर्णन करने में वाणी असमर्थ है| धीरे धीरे आगे के मार्ग खुलने लगेंगे| प्रणव परमात्मा का वाचक है| यही भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की ध्वनि है जिससे समस्त सृष्टि संचालित हो रही है| इस साधना को वे ही कर पायेंगे जिन के ह्रदय में परमात्मा के प्रति परम प्रेम है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
२८ जून २०१३

सभी मित्रों से मेरी व्यक्तिगत प्रार्थना :---

सभी मित्रों से मेरी व्यक्तिगत प्रार्थना :---
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(१) रात्री में शीघ्र सो जाएँ| सोने से पूर्व परमात्मा का गहनतम ध्यान कर के जगन्माता की गोद में निश्चिन्त होकर ही सोएँ| अपनी सारी चिंताएँ जगन्माता को सौंप दें|

(२) प्रातः परमात्मा की चेतना में ही उठें| हरिस्मरण करते हुए थोड़ा जल पीकर शौचादि से निवृत होकर कुछ मिनट तक कुछ प्राणायाम जैसे अनुलोम-विलोम व उज्जयी आदि, और शरीर की क्षमतानुसार कुछ आसन जैसे सूर्य नमस्कार, पश्चिमोत्तानासन, महामुद्रा, आदि कर के ऊनी आसन या कुशासन पर पूर्व या उत्तर की और मुँह कर के कमर सीधी रखते हुए स्थिर होकर सुख पूर्वक सुखासन/पद्मासन/सिद्धासन जैसे किसी आसन में बैठ जाएँ| यदि सीधे बैठने में कठिनाई हो तो नितम्बों के नीचे कोई छोटा तकिया लगा लें| शिवनेत्र होकर यानि दोनों आँखों के गोलकों को बिना किसी तनाव के भ्रूमध्य के निकटतम लाकर आँखें बंद रखते हुए दृष्टी भ्रूमध्य पर ही निरंतर रखें| पूर्ण भक्ति (परम प्रेम) के साथ अपने गुरु व गुरु-परम्परा को प्रणाम करते हुए अपनी अपनी गुरुपरम्परानुसार ध्यान करें|

(३) प्रातः 03:30 से 05.30 तक मैं भी आपके साथ साथ लगातार ध्यान करूँगा आप मुझे उस समय अपने साथ ही पाओगे| आपका साथ मुझे अत्यधिक संबल देगा| आप मेरा साथ दोगे तो यह आपकी मुझ पर बड़ी कृपा होगी और आप पर परमात्मा के आशीर्वादों की बड़ी वर्षा होगी|

(४) ध्यान का समापन शान्तिमंत्र और समष्टि के कल्याण की कामना के साथ करें| ध्यान के बाद कुछ देर तक उठें नहीं| अपने इष्टदेव के मन्त्र का जप करते रहें||

(५) उसके उपरांत प्रातः भ्रमण, व्यायाम आदि करें | ध्यान से पूर्व यदि स्नान आदि न भी कर सकें तो कोई बात नहीं, भगवान शिव को स्मरण कर चुटकी भर भस्म अपने सिर पर छिड़क लें और ध्यानस्थ हो जाएँ|

ॐ ॐ ॐ ||

25 जून 1975 का वह काला दिन .....

25 जून 1975 का वह काला दिन .....
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इंदिरा गाँधी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के अपने विरुद्ध किये गए एक फैसले को पलटने के लिए देश में आपात्काल लगा दिया था| नेहरू खानदान की और कोंग्रेस की, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से पता नहीं क्या शत्रुता थी जो सब से पहिले संघ पर ही प्रहार किया गया| संघ पर प्रतिबंध लगाकर सारे स्वयंसेवकों को गिरफ्तार कर लिया गया| वे ही बच पाए जो समय पर भूमिगत हो गए थे| इस आपातकाल का सर्वाधिक विरोध और प्रतिकार भी संघ के स्वयंसेवकों ने ही किया था| जहाँ भी संघ का साहित्य मिलता उसे पुलिस द्वारा जला दिया जाता था| किसी स्वयंसेवक के घर में सब्जी काटने का चाक़ू मिला उस पर भी आर्म्स एक्ट लगा दिया| 

सारे विरोधी दलों के नेता बंदी बना लिए गए| २६ जून को सारे समाचार पत्रों के सम्पादकीय या तो खाली थे या काली स्याही से पुते हुए थे| लोगों ने आल इंडिया रेडियो सुनना छोड़कर BBC लन्दन सुनना शुरू कर दिया था| एक स्वयंसेवक की बेटी की का विवाह था, पुलिस उसे कन्यादान से पहिले ही विवाह में से उठाकर ले गयी|
इस तरह से बहुत अधिक अवर्णनीय अत्याचार हुए| मेरे परिचित लगभग सारे स्वयंसेवक मित्र बंदी बना लिए गए थे, जो बचे उन्होंने बाद में आन्दोलन कर के स्वयं को गिरफ्तार करवा लिया|


मुझे सितम्बर में ही विदेश जाने का अवसर मिल गया था अतः पूरे उन्नीस महीनों के पश्चात ही मैं भारत बापस आया, तब तक सरकार बदल चुकी थीऔर आपात्काल समाप्त हो गया था|


भगवान करे वैसे दिन बापस भारत में न आयें|