Tuesday, 25 March 2025

सत्साहित्य पढ़ने से भक्ति जागृत होती है ...

यह मेरा सौभाग्य था कि किशोरावस्था से ही मुझे पढ़ने के लिए प्रचूर मात्रा में बहुत अच्छा साहित्य मिला जिनमें महापुरुषों की जीवनियाँ, उनके लेख, और तत्कालीन हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृतियाँ थीं| पढ़ने का शौक भी बहुत अधिक था जिसे पूरा करने केलिए बहुत अच्छा वातावरण मिला| उस जमाने में बहुत अच्छी पत्रिकाओं का प्रकाशन हिंदी भाषा में होता था जैसे ... "साप्ताहिक हिन्दुस्तान", "धर्मयुग", "कादम्बिनी", "नवनीत" आदि| बाल साहित्य भी खूब अच्छा मिलता था और बालकों के लिए भी अनेक ज्ञानवर्धक व रोचक पत्रिकाएँ छपती थीं, जैसे "बालभारती", "चंदामामा" आदि, जिनमें से कइयों के तो अब नाम भी याद नहीं हैं| पूरी महाभारत और रामायण तो घर पर ही किशोरावस्था में पढ़ ली थीं| बहुत अच्छे पुस्तकालय थे और लोगों को पढने का शौक भी बहुत था| अब तो लगता है कि वह ज़माना ही दूसरा था| आजकल के विद्यार्थियों पर तो ट्यूशन और कोचिंग का इतना अधिक भार है कि वे पाठ्यक्रम से बाहर का कुछ पढ़ने की सोच ही नहीं सकते| पहले हिंदी के समाचार पत्रों में भी बड़े अच्छे अच्छे ज्ञानवर्धक लेख आते थे जो अब नहीं आते|

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मेरे पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा सम्पूर्ण विवेकानंद साहित्य का जो मैनें १५-१६ वर्ष की आयु में ही पूरा पढ़ लिया था| फिर रमण महर्षि का सारा साहित्य पढ़ा| संघ का और संघ से सम्बंधित सारा उपलब्ध राष्ट्रवादी साहित्य पढ़ा| हिंदी में ओशो की जितनी भी पुस्तकें मिलीं, सारी पढ़ डालीं| संत साहित्य और आर्य समाज का साहित्य भी खूब पढ़ा| स्वामी रामतीर्थ के वेदान्त पर सारे उपलब्ध लेख पढ़े| परमहंस योगानंद का साहित्य भी पूरा पढ़ा| अनेक साहित्यिक रचनाएँ भी पढ़ीं जब तक मन पूरी तरह नहीं भर गया| सिर्फ वही नहीं पढ़ा जिसे समझने की क्षमता नहीं थी| इस अध्ययन से सबसे बड़ा लाभ तो यह हुआ कि भगवान की भक्ति जागृत हुई जिसे मैं जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूँ| भगवान की कृपा से जीवन में बड़े अच्छे अच्छे लोग मिले|
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अब और पढने की क्षमता नहीं है अतः पढ़ना छोड़ दिया है| बचा हुआ शेष जो जीवन है उसे गीता के स्वाध्याय और ध्यान साधना में ही बिताने की प्रेरणा मिल रही है| अंत समय में चेतना पूरी तरह परमात्मा में हो इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहिए| भगवान ही जिससे मिलाना चाहे उससे मिला दे, पर चलाकर अब मेरी किसी से भी मिलने की इच्छा नहीं है| कभी कभी कुछ आश्रमों में एकांत लाभ के लिए चला जाता हूँ, पर सामाजिकता या पर्यटन के नाते कहीं भी नहीं जाता| किसी भी विषय पर अब किसी से भी कोई चर्चा या वाद-विवाद नहीं करता| किसी भी तरह की कोई शंका या संदेह नहीं है| भगवान् ने सारी जिज्ञासाओं की पूर्ती कर दी है|
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परमात्मा के प्रति प्रेम बना रहे, और इस जीवन का यह अंतिम समय भी परमात्मा के प्रेम में ही बीत जाए, यही प्रार्थना है| अंत समय में कोई कष्ट नहीं होगा सचेतन रूप से ही प्राण छूटेंगे, इतनी तो मेरी आस्था और विश्वास है|
सभी को मेरी शुभ कामनाएँ और नमन ! सब पर परमात्मा की परम कृपा बनी रहे|
ॐ ॐ ॐ !!
२६ मार्च २०१८

एक जल की बूंद महासागर में मिल कर स्वयं महासागर बन जाती है ---

एक जल की बूंद महासागर में मिल कर स्वयं महासागर बन जाती है, वैसे ही एक जीवात्मा, परमात्मा में समर्पित होकर स्वयं परमात्मा बन जाती है| यह संसार परमात्मा का है, हमारा नहीं| उन्हें हमारी सलाह की आवश्यकता नहीं है, अपनी सृष्टि को चलाने में वे सक्षम हैं| अपने सृष्टि के संचालन और भरण-पोषण के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं, हम नहीं| हमारा कार्य उनके प्रति भक्ति और समर्पण है| जब हम निमित्त मात्र यानि उनके एक उपकरण मात्र हैं तब हमारा कर्ताभाव, हमारे संकल्प-विकल्प, आदि सब हमारा अहंकार है|
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सूक्ष्म जगत के अनंताकाश में विस्तृत होता ही रहूँ, कहीं कोई पृथकता न हो| इस अनंतता और विस्तार से परे मेरे आराध्य देव परमशिव हैं जिनसे मिलने को मेरे प्राण व्याकुल हैं| वे ही नारायण हैं, वे ही वासुदेव है और वे ही मेरे सर्वस्व हैं| प्राणों की यह तड़प कभी कम नहीं हो सकती| परमात्मा एक प्रवाह हैं, जिन्हें हम स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दें, कोई अवरोध न उत्पन्न करें| वे एक रस हैं, जिसका हम निरंतर आस्वादन करें| निज जीवन के हर क्षण में उन्हें अपने अंतर में व्यक्त करें| ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ मार्च २०२१

मेरी कोई भी कामना, आकांक्षा, संकल्प या प्रतिज्ञा -- अधर्म और व्यभिचार है, क्योंकि मैं निमित्त मात्र हूँ, कर्ता नहीं ---

 मेरी कोई भी कामना, आकांक्षा, संकल्प या प्रतिज्ञा -- अधर्म और व्यभिचार है, क्योंकि मैं निमित्त मात्र हूँ, कर्ता नहीं| भगवान की सर्वव्यापकता ही हमारा आत्मस्वरूप है| हमारे निज जीवन में वे निरंतर व्यक्त हों| एक जल की बूंद महासागर में मिल कर स्वयं महासागर बन जाती है, वैसे ही एक जीवात्मा, परमात्मा में समर्पित होकर स्वयं परमात्मा बन जाती है| यह संसार परमात्मा का है, हमारा नहीं| उन्हें हमारी सलाह की आवश्यकता नहीं है, अपनी सृष्टि को चलाने में वे सक्षम हैं| अपनी सृष्टि के संचालन और भरण-पोषण के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं, हम नहीं| हमारा कार्य उनके प्रति भक्ति और समर्पण है| जब हम निमित्त मात्र यानि उनके एक उपकरण मात्र हैं तब हमारा कर्ताभाव, हमारे संकल्प-विकल्प, आदि सब हमारा अहंकार है|

परमात्मा एक प्रवाह हैं, जिन्हें हम स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दें, कोई अवरोध न उत्पन्न करें| वे एक रस हैं, जिसका हम निरंतर आस्वादन करें| निज जीवन के हर क्षण में उन्हें अपने अंतर में व्यक्त करें|
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ मार्च २०२१

परोपकार की भावना से जितना हम दूसरों को देते हैं, उससे कई गुणा अधिक हमें प्रकृति प्रदान करती है|

 परोपकार की भावना से जितना हम दूसरों को देते हैं, उससे कई गुणा अधिक हमें प्रकृति प्रदान करती है| समष्टि के कल्याण के लिए ही हम परमात्मा द्वारा परमात्मा के ही ध्यान का निमित्त बनते हैं| यह हमारा "निष्काम कर्मयोग" भी है, और "आत्मोत्थान" का मूल भी| यह हमें क्षुद्र से महान बनाता है|

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इस समय तो परमात्मा के प्रति परमप्रेम उमड़ रहा है| यह उनका ही प्रेम है, जो वे ही कर रहे हैं| यह आत्मानुभूति का आनंद भी दे रहा है| कोई इच्छा नहीं है, कोई कामना नहीं है, कोई आकांक्षा नहीं है| अब और कुछ नहीं चाहिए, जब परमात्मा स्वयम् ही प्रत्यक्ष बिराजमान हैं|
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२६ मर्च २०२१

सिर्फ तीन बातें कहने के लिए ही यहाँ उपस्थित हूँ ---

(१) पूरी सृष्टि, यानि सम्पूर्ण प्रकृति ही भगवान का नाम जप रही है। हम निमित्त मात्र होकर उसे सिर्फ सुन ही सकते हैं। हम न तो कर्ता हैं, और न श्रोता। कर्ताभाव एक अहंकार मात्र है। भगवान स्वयं ही अपना नाम जप रहे हैं, और स्वयं ही उसे सुन रहे हैं। दृष्टा भी वे हैं, और दृष्टि व दृश्य भी वे ही हैं। अंततः भोक्ता भी वे ही हैं।

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(२) हम कोई मंगते-भिखारी नहीं हैं। हम भगवान को अपनी पृथकता का बोध, और अपना अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) बापस दे रहे हैं, यानि उनका दिया हुआ सारा सामान उनको बापस लौटा रहे हैं। किसी भी दृष्टि से हम याचक नहीं है। वे स्वयं ही हमारे में व्यक्त हो रहे हैं।
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(३) इस संसार में किसी से कोई अपेक्षा मत रखें। जिनसे भी हम कुछ अपेक्षा रखते हैं, वे ही हमें धोखा देते हैं, और अंततः वे ही हमारा गला काटते हैं। लगता है इस सृष्टि का यही नियम है।
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परमात्मा की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति आप सब को नमन॥ हरिः ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
२६ मार्च २०२३

आध्यात्मिक साधना के मार्ग में मेरी समझ से सबसे बड़ी कमजोरी --- हमारे में साहस का अभाव है, अन्य कोई समस्या नहीं है

आध्यात्मिक साधना के मार्ग में मेरी समझ से सबसे बड़ी कमजोरी --- हमारे में साहस का अभाव है, अन्य कोई समस्या नहीं है। साहस के अभाव में हम कोई निर्णय नहीं ले पाते। निर्भीक बनने के लिए हमें भगवान श्रीराम या श्रीकृष्ण का ध्यान करना चाहिए। स्वयं निमित्त मात्र होकर उन्हें जीवन का कर्ता बनायें। ॐ ॐ ॐ !!

मेरे हृदय में परमात्मा को पाने की अभीप्सा थी, मैंने पाया कि वे तो मेरे साथ एक हैं। मेरे से पृथक कुछ भी नहीं है। उनके प्रेम को पाने की तड़प थी, मैंने पाया कि वह तो मेरे हृदय के द्वार को खटखटा कर भीतर आने की अनुमति मांग रहा है। मैं हतप्रभ और किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूँ? जो होगा सो देखा जायेगा। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।
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अंधकार में रहते रहते अंधेरे में रहने की बहुत बुरी आदत पड़ गई है। मुझे पता है कि मेरी सब समस्याओं का निदान परमात्मा के प्रकाश यानि भगवत्-प्राप्ति में है। लेकिन मैं साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ। अन्य कोई समस्या नहीं है। साहस का अभाव ही मेरी एकमात्र समस्या है। सिर्फ मेरी ही नहीं, सभी की यही एकमात्र समस्या है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ मार्च २०२४

Monday, 24 March 2025

अति संक्षेप और सरलतम भाषा में नवरात्रों का महत्व :---

 अति संक्षेप और सरलतम भाषा में नवरात्रों का महत्व :-

भारतीय संस्कृति में नवरात्रों का एक विशेष महत्व है| यह भारतीय संस्कृति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उत्सवों में से एक है| इसका ज्ञान प्रत्येक भारतीय को होना चाहिए|
ईश्वर की जगन्माता के रूप में भी साधना भारतीय संस्कृति की विशेषता है| यह पर्व जगन्माता की व भगवान राम की साधना का पर्व है|
जगन्माता का प्राकट्य मुख्यतः तीन रूपों में है - (१)महाकाली (२)महालक्ष्मी (३)महासरस्वती|
नवरात्रों की साधना माँ के उपरोक्त तीन रूपों की प्रीति के लिए है|
(१)महाकाली:- श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को अर्जित करने के लिए चित्त की समस्त विकृतियों को नष्ट
करना आवश्यक है जो महाकाली की साधना द्वारा होता है| महाकाली हमारे भीतर की दुष्ट वृत्तियों का नाश कर देती है| 'महिष' तमोगुण का प्रतीक है| आलस्य, अज्ञान, जड़ता और अविवेक ये सब तमोगुण हैं| महिषासुर वध हमारे भीतर के तमोगुण के विनाश का प्रतीक है| महाकाली का बीजमंत्र 'क्लीम्' है|
(२)महालक्ष्मी:- तैतीरिय उपनिषद में प्रार्थना है कि हमें सांसारिक वैभव तभी प्रदान करना जब हममें सभी सद्गुण पूर्ण रूप से विकसित हो जाएँ| बिना आत्मानुशासन और आत्म-संयम के भौतिक संपदा नष्ट हो जाती है| जीवन का प्राथमिक लक्ष्य है मन पर विजय प्राप्त करना| वेदों का आदेश है -- "अश्माभव परशुर्भव हिरण्यमस्तृताम् भव|" यह तभी संभव है जब चित्त शुद्ध हो| चित्त को शुद्ध करने की प्रक्रिया ही महालक्ष्मी की साधना है| ये हमें चित्त की शुद्धि प्रदान करती हैं| महालक्ष्मी का बीजमंत्र 'ह्रीम्' है|
(३)महासरस्वती:- गीता में भगवान कहते हैं -- 'अपनी आत्मा का ज्ञान ही ज्ञान है, वही मेरी विभूति है, वही मेरी महिमा है|' आत्मज्ञान के सर्वोत्तम रूप की प्राप्ति महासरस्वती की आराधना से होती है| महासरस्वती का बीजमंत्र 'ऐम्' (अईम्) है|
नवार्णमन्त्र महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली से प्रार्थना ही है कि माँ मेरी अज्ञानरुपी ग्रंथि का नाश करो|
जब चित्त की अशुद्धियाँ नष्ट हो जाएँ, हमारा चित्त सद्गुणों से संपन्न हो जाए और आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाए तब चित्त में 'राम' का जन्म होता है| वे जो सब के हृदयों में रमण कर रहे हैं वे ही श्रीराम हैं| राम वह सच्चिदानंद ब्रह्म हैं जिनमें समस्त योगी सदैव रमण करते हैं| राम, ज्ञान के स्वरूप हैं; सीताजी भक्ति हैं| अयोध्या हमारा ह्रदय है|
भगवान राम ने भी शक्ति की उपासना की थी क्योंकि उन्हें समुद्र लांघना था| यह समुद्र अविद्द्या और अविवेक का महासागर है| अपने भीतर के शत्रुओं को नष्ट करने के लिए इसे पार करना ही पड़ेगा|
जय जय माँ, जय जय श्री राम ! सनातन हिंदू धर्म और भारत माता की जय !
२५ मार्च २०१२