Friday, 25 June 2021

"चित्तवृत्तिनिरोध" क्या होता है?

 

"चित्तवृत्तिनिरोध" क्या होता है?
.
मनुष्य की निम्न प्रकृति और उच्च प्रकृति ..... दोनों जब विपरीतगामी होती हैं, तब बड़ी पीड़ादायक स्थिति उत्पन्न हो जाती है|आत्मा की अभीप्सा परमात्मा के लिए होती है, यह उच्च प्रकृति है जो परमात्मा की ओर खींचती है|
निम्न प्रकृति वासनाओं की ओर खींचती है| वासनायें चित्त का धर्म हैं| ये मनुष्य को परमात्मा से दूर ले जाती हैं| 

वासनाओं की ओर आकर्षण चित्त की स्वाभाविक वृत्ति है, जिस का निरोध कर उसे परमात्मा की ओर उन्मुख करने की साधना योगसाधना है| तभी इसे "चित्त वृत्ति निरोध:" कहते है|
.
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
२५ जून २०२०

Wednesday, 23 June 2021

श्रद्धा और विश्वास हो तो तभी हमारे पर भगवान की कृपा होती है ---

 

एक सत्य जो प्रत्यक्ष और व्यवहारिक रूप से मुझे बहुत देरी से समझ में आया, अब तो वह स्पष्ट हो गया है कि .....
हमें जो कुछ भी जीवन में मिलता है, (चाहे वह परमात्मा की कृपा ही क्यों न हो) ..... स्वयं की "श्रद्धा और विश्वास" से ही मिलता है, न कि किसी अन्य माध्यम से| श्रद्धा और विश्वास हो तो तभी हमारे पर भगवान की कृपा होती है| बाकी अन्य सब जैसे पीर-फकीर, कब्र-मकबरे, व महात्माओं के आशीर्वाद ... बहाने मात्र हैं| उनसे कुछ नहीं मिलता| श्रद्धा, विश्वास और समर्पण ... हमारी पात्रता के मापदंड हैं|
.
रामचरितमानस के मंगलाचरण में ही लिखा है ...
"भवानी शङ्करौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ| याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्||"
जिस श्रद्धा एवं विश्वास के बिना सिद्ध पुरुष भी अपने हृदय में स्थित ईश्वर के दर्शन नही कर पाते उन श्रद्धा रूपी पार्वती जी तथा विश्वास रूपी शंकर जी को प्रणाम करता हूँ|
.
गीता में भगवान कहते हैं ....
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः| ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति||४:३९||"
अर्थात श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है| ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है||
ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
२४ जून २०२०

भगवान को पाने का एकमात्र मार्ग "भक्ति" है ---

 

भगवान को पाने का एकमात्र मार्ग "भक्ति" है ---
.
गीता में भगवान कहते हैं ...
"भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः| ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्||१८:५५||"
अर्थात् (उस परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत: जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ| (इस प्रकार) तत्त्वत: जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है, अर्थात् मत्स्वरूप बन जाता है||
.
आचार्य शंकर व स्वनामधन्य अन्य अनेक आचार्यों ने उपरोक्त श्लोक पर बड़ी बड़ी टीकायें की हैं| गीता में कर्म, भक्ति व ज्ञान ... इन तीनों विषयों को बहुत अच्छी तरह समझाया गया है| मैं उन सभी आचार्यों की वंदना करता हूँ जिन्होनें गीता का संदेश जनमानस को समझाया|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
२४ जून २०२०

अहंकार व ब्रह्मभाव में क्या अंतर है?

 अहंकार व ब्रह्मभाव में क्या अंतर है?

.
स्वयं को यह देह, मन, और बुद्धि समझ लेना अहंकार है| शरीर के धर्म हैं ..... भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी आदि| मन का धर्म है राग-द्वेष, मद यानि घमंड आदि| चित्त का धर्म है वासनाएँ| प्राणों का धर्म है शक्ति और बल| इन सब को अपना समझना अहंकार है|
.
ब्रह्मभाव एक अनुभूति का विषय है जिसे सिर्फ सात्विक बुद्धि से ही समझा जा सकता है| परमात्मा सर्वव्यापक हैं| उनकी सर्वव्यापकता के साथ एक होने का बोध ..... ब्रह्मभाव है| यह अनुभूति गहन ध्यान में सभी साधकों को होती है|
.
आत्मा का धर्म है ... परमात्मा के प्रति अभीप्सा और परम प्रेम (भक्ति)| यही हमारा सही धर्म है| जब परमात्मा के प्रति भक्ति जागृत होती है, तब अभीप्सा का जन्म होता है| यहीं से आध्यात्मिक यात्रा का आरंभ होता है| भगवान तब गुरु रूप में मार्गदर्शन भी करते हैं, और अनुभूतियों के द्वारा हमें प्रोत्साहित भी करते हैं| उन अनुभूतियों के पश्चात ही हम ..... शिवोंहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि ..... कह सकते हैं| यह कोई अहंकार की यात्रा (Ego trip) नहीं बल्कि हमारा वास्तविक अंतर्भाव होता है| अहं ब्रह्मास्मि यानि मैं ब्रह्म हूँ यह कहना अहंकार नहीं है| ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
२३ जून २०२०

Monday, 21 June 2021

समय का सबसे बढ़िया उपयोग क्या हो सकता है? ---

 समय का सबसे बढ़िया उपयोग क्या हो सकता है? ---

.
कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है| मन में हर समय निरर्थक विचार आते रहते हैं, यह अवसाद-ग्रस्तता का मुख्य कारण है| इस मामले में मैंने देखा है कि जो लोग आस्तिक और भक्त हैं उन्हें यह टाइम-पास वाली समस्या नहीं है, वे स्वयं को अपने मानसिक जप से इतना अधिक व्यस्त रखते हैं कि उनके मन में कोई फालतू विचार ही नहीं आता| मुझे जीवन में कुछ ऐसे भक्त भी मिले हैं जो अपने इष्ट देवी/देवता के बीज-मंत्र की जब तक एक-सौ मालायें नहीं फेर लेते तब तक स्वयं को कोई भोजन नहीं देते| कुछ संप्रदायों में उनके बहुत लंबे गुरु-मंत्र की सौलह मालायें एक दिन में फेरना अनिवार्य हैं| अतः वे दिन-रात इसी में लगे ही रहते हैं|
.
जो सत्यनिष्ठ भक्त होते हैं वे तो अपने मन को कभी खाली रहने नहीं देते, हर समय अपने इष्ट देवी/देवता के मंत्र का मानसिक जप करते ही रहते हैं| सोते-जागते हर समय मानसिक रूप से उनके अपने गुरुमंत्र का जाप चलता ही रहता है| ऐसे लोग कभी अवसाद-ग्रस्त नहीं होते और आत्म-हत्या जैसा घटिया विचार तो उनके दिमाग में आता ही नहीं है| भगवान का भक्त कभी आत्म-हत्या नहीं करता| कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी आस्था से सारे दुःख-कष्ट-पीड़ाएँ सहन कर लेता है|
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः| यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते||६:२२||"
.
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को यज्ञों में जप-यज्ञ बताया है| अतः हर समय निरंतर सांसारिक काम के साथ-साथ यह जप-यज्ञ चलता रहे| इस से मन को बड़ा आनंद मिलेगा| कहा जाता है कि जप यज्ञ अत्यन्त कठिन एवं गुरूमुखगम्य है| पर श्रद्धा और विश्वास हो तो हम निष्काम भाव से मंत्र जप कर सकते हैं| भगवान श्रीकृष्ण से बड़ा कोई अन्य गुरु नहीं है| अतः सिर्फ उन की ही सुनेंगे|
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्| यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः||१०:२५||"
अर्थात् -- महर्षियोंमें भृगु और वाणियों-(शब्दों-) में एक अक्षर अर्थात् प्रणव मैं हूँ| सम्पूर्ण यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय मैं हूँ|
.
सभी को शुभ कामनायें और नमन !! हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ जून २०२०

Friday, 18 June 2021

जब भी भगवान का स्मरण होता है ---

जब भी भगवान का स्मरण होता है, तब स्वतः ही मन इतना अधिक शांत, प्रेममय व आनंदमय हो जाता है कि उस स्थिति से बाहर आने का मन ही नहीं करता| लेकिन भगवान की माया अति प्रबल है जो विक्षेप उत्पन्न कर ही देती है|

एक न एक दिन तो करुणावश भगवान भी अपना अनुग्रह कर के अपनी माया के आवरण व विक्षेप से मुक्त कर ही देंगे| आज नहीं तो कल यह होना ही है, अतः कोई चिंता नहीं है| भगवान का काम ही है अनुग्रह करना| वे नहीं करेंगे तो और कौन करेगा? अन्य कोई विकल्प भी नहीं है| सारे तो वे ही हैं, और सब कुछ भी वे ही हैं|
भक्ति और श्रद्धा-विश्वास से सत्यनिष्ठापूर्वक भगवान के ध्यान से शरणागति व समर्पण का भाव उत्पन्न होता है, और चित्त समभाव में अधिष्ठित होने लगता है| उस समय इतनी अधिक शांति मिलती है कि किसी भी तरह की शब्द रचना बड़ी दुरूह हो जाती है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जून २०२०

Monday, 14 June 2021

फेसबुक के अनुभव ---

 फेसबुक के अनुभव .....

=
फेसबुक पर आज से दो-चार वर्ष पहिले बहुत अच्छे-अच्छे गंभीर लेखक और पाठक हुआ करते थे| अब तो नगण्य हैं| मैं जुलाई २०११ में फेसबुक पर आया तब हिन्दी में लिखने का बिल्कुल भी अभ्यास नहीं था| फेसबुक पर ही कुछ साधु-संतों ने मुझे हिन्दी में लेख लिखने की प्रेरणा दी और खूब प्रोत्साहन दिया| उस समय मुझे हिन्दी के अधिक शब्दों का ज्ञान नहीं था| मैंने अपने हिन्दी के शब्दकोष को बढ़ाया और हिन्दी में लिखना आरंभ किया तो इतना मजा आया कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा| बहुत गंभीर आध्यात्मिक विषयों पर भी सहज रूप से लिखने लगा| शुरू-शुरू में कुछ भूलें हुईं पर किसी ने बुरा नहीं माना और खूब प्रोत्साहन दिया|
.
सबसे अच्छी बात तो यह हुई कि फेसबुक पर ही देश के अनेक विद्वानों, संतों और भक्तों से परिचय हुआ, जो अन्यथा नहीं हो सकता था| कुछ समूहों में धर्म और ज्ञान-विज्ञान पर खूब चर्चाएँ हुआ करती थीं, जिनसे बहुत कुछ सीखा| मैं सभी के नाम तो नहीं लिख सकता, पर दो-तीन नाम अवश्य लिखूँगा जिनसे परिचय फेसबुक पर ही हुआ था|
सबसे पहिला परिचय आचार्य सियारामदास नैयायिक से हुआ| उन्होने मुझे हिन्दी में लिखने की प्रेरणा दी और उनके व कुछ अन्य संतों के आशीर्वाद से मुझे लिखने में कभी कोई कठिनाई नहीं हुई| वे रामानंदी वैष्णव संप्रदाय के बहुत बड़े आचार्य हैं|
दंडी स्वामी मृगेंद्र सरस्वती (सर्वज्ञ शंकरेंद्र) के आशीर्वाद से मुझे वेदान्त का व्यवहारिक ज्ञान हुआ| वेदान्त पर साहित्य तो खूब पढ़ा था पर कभी कोई प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं हुई थी| कई अनुत्तरित प्रश्न थे| उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और उनकी उपस्थिति मात्र से ही मुझे कई दिव्य अनुभूतियाँ हुईं जिनसे वेदान्त का व्यवहारिक ज्ञान हुआ और सारे संशय दूर हुए| वे एक सिद्ध पुरुष हैं|
भुवनेश्वर के श्री अरुण उपाध्याय जैसे अलौकिक विलक्षण परम विद्वान से परिचय तो फेसबुक पर ही हुआ था और दो बार उनसे मिलने का सौभाग्य भी मिला| वे चलते-फिरते ज्ञान के भंडार हैं| उनके जैसा कोई अन्य विद्वान मुझे आज तक नहीं मिला| वे पूर्व जन्म के कोई सिद्ध पुरुष हैं जिनका ज्ञान कई जन्मों का है|
भक्तों में इंदौर के स्वर्गीय श्री हेमंत मिश्र उच्च कोटि के शिवभक्त थे| वे समय समय पर बड़े-बड़े विशाल यज्ञ करवाया करते थे जिन में करोड़ों रुपयों का खर्च हुआ करता था| दो बार उनके साथ हवन करने का अवसर मुझे भी मिला है|
इंदौर के ही डॉ. सुमित शुक्ल और उनकी धर्मपत्नी डॉ.(श्रीमती) सुधि शुक्ल दोनों ही विलक्षण व्यक्तित्व के धनी और परम भक्त हैं| उनसे मेरा बहुत अच्छा प्रेम है|
और भी अनेक दिव्य विभूतियाँ हैं जिनसे परिचय फेसबुक पर ही हुया था| कुछ से मिलना भी हुआ और कुछ से नहीं| वे सब मेरे हृदय में हैं और उन्हें मेरे हृदय का पूर्ण प्रेम समर्पित है|
.
क्रिया और वेदान्त की साधना से मुझे अनेक लाभ हुए हैं| अपनी कमियों का पता चला है जिनमें से कुछ तो दूर हुई हैं, और बाकी बची हुई भी दूर हो जाएंगी| सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह हुई है कि कोई भी मुझसे दूर नहीं है| मैं अब किसी के अभाव को अनुभूत नहीं करता| परमात्मा में सभी मेरे साथ एक हैं| सारा ब्रह्मांड मेरा घर है और सारी सृष्टि मेरा परिवार| मैं सभी के साथ एक हूँ| कोई भी मुझसे पृथक नहीं है| क्रियायोग की साधना से प्राण-तत्व व आकाश-तत्व का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, और कूटस्थ-चैतन्य में स्थिति होती है| परमशिव का बोध भी बुद्धि से नहीं, ध्यान की अनुभूतियों से ही होता है|
.
परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को नमन| ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१५ जून २०२०
.
पुनश्च :--- प्रयागराज के स्वर्गीय पं. मिथिलेश द्विवेदी जी को भी मैं कभी नहीं भूल सकता| वे बड़ी प्रेरणात्मक बातें कहते थे और कभी निराश नहीं होने दिया| एक ही अफसोस रहा कि कभी उनसे मिलने का संयोग नहीं हुआ| उन्होंने अपनी हिन्दी भाषा में लिखी एक पुस्तक मुझे भेंट में दी थीं जो उच्च कोटि की साहित्यिक कृति है| वे एक भक्त और साहित्यकार थे| उर्दू भाषा पर भी उनका बहुत अच्छा अधिकार था| देवनागरी लिपि में लिखा उर्दू का एक लेख भी उन्होनें मुझे नेट पर ही भेजा था जिस से पता चला कि वे उर्दू के भी विद्वान थे| वे चाहे भौतिक देह में न हों पर मेरे हृदय में हैं|
.
ओड़ीशा के ही भक्त श्री सोमदत्त शर्मा है जिनसे कई बार चलभाष पर ही सत्संग होता है|