Tuesday, 1 June 2021

भगवान कहते हैं ..... यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि (मैं यज्ञों में जपयज्ञ हूँ) ---

 भगवान कहते हैं ..... यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि (मैं यज्ञों में जपयज्ञ हूँ) ---

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"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्| यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः||१०:२५||
अर्थात् "मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ| मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ||"
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अग्नि पुराण के अनुसार ....."जकारो जन्म विच्छेदः पकारः पाप नाशकः| तस्याज्जप इति प्रोक्तो जन्म पाप विनाशकः||" इसका अर्थ है .... ‘ज’ अर्थात् जन्म मरण से छुटकारा, ‘प’ अर्थात् पापों का नाश ..... इन दोनों प्रयोजनों को पूरा कराने वाली साधना को ‘जप’ कहते हैं|
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अतः सबसे बड़ा यज्ञ ... "जपयज्ञ' है| इस से बड़ा दूसरा कोई यज्ञ नहीं है| इसमें हम अपनी स्वयं की ही हवि शाकल्य बन कर, स्वयं ही श्रुवा बन कर, स्वयं की ही ब्रह्मरूप अग्नि में, स्वयं ही ब्रह्मरूप कर्ता बन कर हवन करते हैं| हमारा गन्तव्य भी ब्रह्म ही है|
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कोई भी साधना जितने सूक्ष्म स्तर पर होती है वह उतनी ही फलदायी होती है| जितना हम सूक्ष्म में जाते हैं उतना ही समष्टि का कल्याण कर सकते हैं| वाणी के चार क्रम हैं ----- परा, पश्यन्ति, मध्यमा और बैखरी| जिह्वा से होने वाले शब्दोच्चारण को बैखरी वाणी कहते हैं| उससे पूर्व मन में जो भाव आते हैं वह मध्यमा वाणी है| मन में भाव उत्पन्न हों, उससे पूर्व वे मानस पटल पर दिखाई भी दें वह पश्यन्ति वाणी है| और उससे भी परे जहाँ से विचार जन्म लेते हैं वह परा वाणी है|
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पश्यन्ति और परा में प्रवेश कर के ही हम समष्टि का वास्तविक कल्याण कर सकते हैं| जप के लिये प्रयुक्त की जाने वाली वाणी का स्तर कैसा हो, इसे हर व्यक्ति अपने अपने स्तर पर ही समझ सकता है| हमारी चेतना सूक्ष्म देह में मेरुदंड के किस चक्र में है, उसी के अनुसार हमारे विचारों की सृष्टि होती है| यह अनुभूति का विषय है, बुद्धि का नहीं| अतः जप हमेशा आज्ञाचक्र से ऊपर ही अति सूक्ष्म स्तर पर करना चाहिए|
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साधनाकाल के आरंभ में जप वाणी द्वारा बोलकर ही होता है| फिर हरिःकृपा से शनैः शनैः आज्ञाचक्र से सहस्त्रार, फिर सहस्त्रार से ब्रह्मरंध्र, फिर ब्रह्मरंध्र से परे अनंत विस्तार में, और अनंत विस्तार से भी परे "परमशिव" में होता है| वहीं क्षीरसागर है जहाँ भगवान नारायण का निवास है| जब उनकी और भी अधिक कृपा होगी तब वे इस से से भी परे ले जाएँगे| परमात्मा की कृपा पर ही सब निर्भर है, स्वयं के प्रयासों पर नहीं| प्रयास भी वे ही करवाते हैं, और यथार्थ में करते भी वे स्वयं ही हैं|

गीता के निम्न श्लोकों को स्वयं को ही समझना होगा .....
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्| ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना||४:२४||"
"सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः| इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्||१८:६४||
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||"
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||"
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः| तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम||१८:७८||"
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हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! जय गुरु !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ जून २०२०

पुनश्च: :--- भगवान श्रीकृष्ण ने ऐकाक्षर ब्रह्म ओंकार के अतिरिक्त अन्य किसी भी मंत्र के जप को नहीं बताया है|

क्या भ्रष्टाचार को तंत्र-मंत्र से समाप्त किया जा सकता है?

 क्या भ्रष्टाचार को तंत्र-मंत्र से समाप्त किया जा सकता है?

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एक बहुत पुरानी स्मृति है सन १९७६ की| मुझे कुछ दिनों के लिए पूर्वी यूरोप के देश रोमानिया के कोन्स्तांजा (Constanta) नगर में जाना पड़ा था| उस समय जहाँ तक मैं समझता हूँ, इतना भ्रष्ट देश दुनियाँ में शायद ही कोई दूसरा होगा| भ्रष्टाचार ही वहाँ का शिष्टाचार था| लोगों की मजबूरी थी| वहाँ के कम्युनिष्ट तानाशाह निकोलाई चाउशेस्को और उसकी पत्नी एलेना ने देश का सारा धन तो लोगों से छीनकर अपने पास जमा कर रखा था और लोगों को मार्क्सवाद के नाम पर अपना गुलाम बना कर रखा था| किसी भी नागरिक में स्वाभिमान नहीं बचा था और देश की अधिकांश महिलाओं की तो बहुत ही बुरी गति थी|
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अब उपरोक्त घटना के १३ वर्ष बाद दिसंबर १९८९ की बात है| मैं पूर्वी यूरोप के ही मार्क्सवादी देश यूक्रेन गया हुआ था जो तब तक सोवियत संघ का ही भाग था| रूसी भाषा का उस समय तक अच्छा ज्ञान था (अब तो भूल गया हूँ) अतः भाषा की कोई कठिनाई नहीं थी| एक दिन वहाँ के टीवी पर समाचार देखा कि रोमानिया में मार्क्सवाद विरोधी क्रांति हो गई है, वहाँ का तानाशाह निकोलाई चाउशेस्को और उसकी पत्नी एलेना दोनों ही हेलिकॉप्टर से भाग रहे थे, लोगों ने नीचे से गोलियां चला कर हेलिकॉप्टर को नीचे गिरा दिया और दोनों को पहले तो पकड़ लिया, फिर पीट-पीट कर मार डाला|
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सबसे बड़ा आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब सोवियत संघ ने इस घटना का समर्थन किया| यह मेरे तब तक के जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य था| मैं उसी समय समझ गया कि मार्क्सवाद का अंत आ चुका है और सोवियत संघ भी बिखर सकता है|
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उससे पहिले सन १९६८ की एक घटना याद आ गई| उस समय मैं सोवियत रूस में एक प्रशिक्षण के लिए गया हुआ था| अक्तूबर १९६८ में हंगरी में मार्क्सवाद विरोधी क्रांति हो गई थी तब ४ नवंबर १९६८ को रूसी सेना ने हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट और अन्य नगरों पर अपने टैंकों से भयंकर आक्रमण किया और अगले ६ दिनों में २५०० से अधिक हङ्गेरियन क्रांतिकारियों को मार कर बापस मार्क्सवादी सत्ता को स्थापित किया| लगभग दो लाख हङ्गेरियन देश छोड़कर भाग गए और ७०० से अधिक सोवियत सैनिक भी मारे गए|
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रोमानिया में मार्क्सवादी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह और सोवियत संघ द्वारा उसका समर्थन ..... एक महान प्रतिक्रांति थी जो विश्व से मार्क्सवाद के अंत की शुरुआत थी| सौभाग्य से मैं भी इसका साक्षी था|
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लोग कहते हैं कि रोमानिया के कुछ कबीलों की महिलाओं को तंत्र-मंत्र का ज्ञान था जो दिन रात वहाँ की भ्रष्ट सरकार और व्यवस्था को बदलने के लिए कुछ अभिचार कर्म किया करती थीं| कई वर्षों की साधनाओं के उपरांत उनके अभिचार कर्म सिद्ध हुए और वहाँ की भ्रष्ट व्यवस्था धराशायी हुई| यह सुनी हुई बात है| इस विषय पर श्री नरेश आर्य जी ने एक वीडियो और पोस्ट भी डाली थी जिसका लिंक नीचे कॉमेंट बॉक्स में है|
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भारत में भी अभिचार कर्म .... वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारन जानने वाले बहुत लोग होंगे| मैं क्षमायाचना सहित पूछना चाहता हूँ कि क्या भारत के सारे तांत्रिक, मांत्रिक, अघोरी सब मिलकर कोई ऐसा अनुष्ठान कर सकते हैं जो भारत के भीतर और बाहर के सब शत्रुओं का नाश कर सके? मैं अनाड़ी आदमी हूँ, इसलिए ये सब लिख रहा हूँ| आप सब को नमन !
कृपा शंकर
१ जून २०२०

Sunday, 30 May 2021

राग-द्वेष से रहित होकर ही हम प्रसन्न और स्वस्थ रह सकते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है .....

 राग-द्वेष से रहित होकर ही हम प्रसन्न और स्वस्थ रह सकते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है .....

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भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते| सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते||२:६२||"
अर्थात विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है| आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है||
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"क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः| स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति||२:६३||"
अर्थात क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम| स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है||
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"रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्| आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति||२:६४||"
अर्थात आत्मसंयमी (विधेयात्मा) पुरुष रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई (आत्मवश्यै) इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ प्रसन्नता (प्रसादम्) (प्रसादः प्रसन्नता स्वास्थ्यम्) प्राप्त करता है||
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"प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते| प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते||२:६५||"
अर्थात प्रसाद के होने पर सम्पूर्ण दुखों का अन्त हो जाता है और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि ही शीघ्र ही स्थिर हो जाती है||
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"नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना| न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्||२:६६||"
अर्थात (संयमरहित) अयुक्त पुरुष को (आत्म) ज्ञान नहीं होता और अयुक्त को भावना और ध्यान की क्षमता नहीं होती भावना रहित पुरुष को शान्ति नहीं मिलती अशान्त पुरुष को सुख कहाँ?
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राग-द्वेष से मुक्त होने का उपाय भी बड़े स्पष्ट रूप से गीता में बताया गया है| अतः गीता का नित्य स्वाध्याय करें|
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
३० मई २०२०

Saturday, 29 May 2021

चीन ने क्या कभी अन्य किसी देश से कोई युद्ध जीता है?

 चीन ने क्या कभी अन्य किसी देश से कोई युद्ध जीता है?

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हमें चीन से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है| आमने सामने की लड़ाई में चीनी सेना भारत की सेना के सामने नहीं टिक सकती| वर्तमान चीन के पास आणविक अस्त्र हैं, यही उसकी शक्ति है| बाकी तो सब उस की दादागिरी है| वह दूसरे देशों पर अपनी संख्या के बल पर धौंस जमाता है| निष्पक्ष दृष्टि से आप चीन का पूरा इतिहास देख लें, चीन ने कभी भी किसी भी देश के विरुद्ध आज तक कोई भी युद्ध नहीं जीता है| चीनी कोई लड़ाकू जाति नहीं है| उनमें क्रूरता ही क्रूरता और धूर्तता भरी हुई है पर उन में साहस नहीं है|
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चीन में जो शक्तिशाली महान शासक हुए वे सब मंगोल थे चीनी नहीँ| अपनी अत्यधिक गतिशील और अनुशासित अश्वारोही सेना के बल पर मंगोलों ने चीन पर लंबे समय तक राज्य किया| चीन का सबसे अधिक शक्तिशाली और महान शासक कुबलई (कैवल्य) खान (कान्ह) था जो चंगेज़ (गंगेश) खान (कान्ह) का पोता था| वह बौद्ध मतानुयायी था जिसका पृथ्वी के २०% भाग पर अधिकार था| चीन की दीवार चीनियों ने मंगोल आक्रमणकारियों से रक्षा के लिए बनवाई थी| पर उस से कोई फर्क नहीं पड़ा| चीन पर अधिकांश समय तक राज्य तो मंगोलों ने ही किया| प्राचीन संस्कृत साहित्य में जिस शिवभक्त किरात जाति का उल्लेख है वह मंगोल जाति ही है|
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चीन पर अंग्रेजों ने बड़ी आसानी से अपनी धूर्तता से अधिकार कर अपना राज्य स्थापित किया| बाद में जापान ने चीन पर क्रूरता से अधिकार किया|
१९६२ में हम चीन से सैनिक दृष्टि से नहीं हारे थे, भारत के राजनीतिक नेतृत्व की अपरिपक्वता और भूलों से हारे थे| भारत ने अपनी हार के कारणों की जांच Lieutenant general Henderson Brooks और Brigadier P S Bhagat (later lieutenant general) से करवाई थी| वह रिपोर्ट इतनी अधिक गोपनीय है कि उसकी सिर्फ एक ही प्रति छपी जिसको पढ़ने का अधिकार सिर्फ प्रधानमंत्री को है| कुछ वर्ष पूर्व एक ऑस्ट्रेलियन पत्रकार Neville Maxwell ने उसके अनेक अंश पता नहीं कैसे लीक कर दिए थे जिन पर ब्रिटेन में एक पुस्तक भी छपी| उस रिपोर्ट में सारा दोष भारत के तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व (प्रधान मंत्री) पर डाला गया था|
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१९६७ में चीन ने एक बार फिर दुःसाहस किया, तब भारतीय सेना ने चीन की सेना को हराकर भगा दिया था| चीनी सैनिक एक तो इस लिए डरते हैं कि वे अपने परिवार के इकलौते पुरुष सदस्य हैं, जिनके मरने पर उनका वंशनाश हो जाएगा| दूसरा उनका भोजन इतना अधिक आसुरी/राक्षसी है कि उनकी कामुकता अत्यधिक प्रबल है जिसके कारण उन में यौन-विकृतियाँ बहुत अधिक हैं| अतः उनमें कोई नैतिक बल और साहस नहीं है| उनकी शक्ति उनके अणुबम ही हैं|
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चीन ने १७ फरवरी १९७९ को वियतनाम पर आक्रमण किया था जो १६ मार्च १९७९ तक चला| चीन की इस यूद्ध मे बुरी तरह से हार हुई और उसके २०,००० सैनिक मारे गए| जब वियतनाम जैसा देश चीन को हरा सकता है तो भारत के सामने चीन की सेना कैसे टिक सकती है?
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चीन की सीमा से १४ देश जुड़े हैं पर २३ देशों से उसके सीमा विवाद चल रहे हैं| उसकी सीमा .... तजाकिस्तान, किर्गिज़स्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, म्यांमार, लाओस, वियतनाम, उत्तरी कोरिया, मंगोलिया, रूस, व कजाकिस्तान से लगती है| चीन की सीमायें भले ही सिर्फ १४ देशों के साथ मिलती हैं, लेकिन इसका सीमा विवाद २३ देशों के साथ है| चीन का इन्डोनेशिया, मलेशिया, ब्रुनेई आदि देशों के साथ भी विवाद चल रहा है| चीन मध्ययुग के देश की तरह वर्ताव कर रहा है|
कोरोना वायरस को फैलाना चीन का पूरे विश्व पर एक जैविक आक्रमण है| विश्व के अधिकांश देश मिलकर चीन से बदला तो अवश्य लेंगे|
कृपा शंकर
२९ मई २०२०

हमारी कोई समस्या नहीं है, समस्या हम स्वयं हैं ---

 हमारी कोई समस्या नहीं है, समस्या हम स्वयं हैं ---

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हमारी एकमात्र समस्या --परमात्मा से पृथकता है। यह बिना शरणागति और समर्पण के दूर नहीं होगी। परमात्मा का ध्यान और चिंतन ही सत्संग है। यह सत्संग मिल जाए तो सारी समस्याएँ सृष्टिकर्ता परमात्मा की हो जायें।
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हम साधना करते हैं, मंत्रजाप करते हैं, पर हमें सिद्धि नहीं मिलती। इसका मुख्य कारण है -- असत्यवादन। झूठ बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है, और किसी भी स्तर पर मन्त्रजाप का फल नहीं मिलता। इस कारण कोई साधना सफल नहीं होती। सत्य और असत्य के अंतर को शास्त्रों में, और विभिन्न मनीषियों ने स्पष्टता से परिभाषित किया है। सत्य बोलो पर अप्रिय सत्य से मौन अच्छा है। प्राणरक्षा और धर्मरक्षा के लिए बोला गया असत्य भी सत्य है, और जिस से किसी की प्राणहानि और धर्म की ग्लानि हो वह सत्य भी असत्य है। जिस की हम निंदा करते हैं उसके अवगुण हमारे में भी आ जाते हैं| जो लोग झूठे होते हैं, चोरी करते हैं, और दुराचारी होते हैं, वे चाहे जितना मंत्रजाप करें, और चाहे जितनी साधना करें उन्हें कभी कोई सिद्धि नहीं मिलेगी।
ॐ तत्सत्
२९ मई २०१६

"गीता के अनुसार तप" का अर्थ क्या है? ---

 "गीता के अनुसार तप" का अर्थ क्या है? ---

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भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१७:१४॥"
अर्थात् -- "देव, द्विज (ब्राह्मण), गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन, शौच, आर्जव (सरलता), ब्रह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर संबंधी तप कहा जाता है॥
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भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर ने इसकी व्याख्या यों की है --
"देवाश्च द्विजाश्च गुरवश्च प्राज्ञाश्च देवद्विजगुरुप्राज्ञाः तेषां पूजनं देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनम्? शौचम्? आर्जवम् ऋजुत्वम्? ब्रह्मचर्यम् अहिंसा च शरीरनिर्वर्त्यं शारीरं शरीरप्रधानैः सर्वैरेव कार्यकरणैः कर्त्रादिभिः साध्यं शारीरं तपः उच्यते॥"
अर्थात् -- देव, ब्राह्मण, गुरु, और बुद्धिमान ज्ञानी -- इन सबका पूजन;
शौच (पवित्रता), आर्जव (सरलता), ब्रह्मचर्य और अहिंसा --
ये सब शरीर सम्बन्धी (शरीरद्वारा किये जानेवाले) तप कहे जाते हैं, अर्थात् शरीर जिनमें प्रधान है; ऐसे समस्त कार्य कर्ता द्वारा किये जायें, वे शरीर सम्बन्धी तप कहलाते हैं।

भगवान की भक्ति कभी न मिटने वाले छूत के रोग से भी अधिक संक्रामक है ---

 भगवान की भक्ति कभी न मिटने वाले छूत के रोग से भी अधिक संक्रामक है ---

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उर्दू भाषा का एक शेर है -- "इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया, वर्ना हम भी आदमी थे काम के।" इश्क़ का एक अर्थ भक्ति भी होता है। जो भगवान की भक्ति में पड़ जाता है वह दुनियाँ के किसी काम का नहीं रहता। उसको भगवान के अलावा और कुछ भी दिखाई नहीं देता। भगवान की भक्ति सबसे अधिक संक्रामक छूत का रोग है, जो एक बार लगने के बाद ठीक नहीं होता। कोई इसका उपचार करना चाहे तो चाहकर भी उपचार नहीं कर सकता, क्योंकि उपचार करने वाला स्वयं इसका शिकार हो जाता है। यह भगवान का रास्ता बड़ा खतरनाक है। इसमें थोड़ी दूर चलते ही फिर पीछे दिखना बंद हो जाता है। पीछे लौटना चाहो तो भी नहीं लौट सकते। आस-पास काँटों से भरी हुई खाइयाँ हैं, उनमें भले ही गिर जाओ लेकिन पीछे नहीं लौट सकते। पीछे लौटने के सारे मार्ग बंद होते रहते हैं, जिन पुलों को आप पार करते हो, पार करते ही वे पुल टूट जाते हैं। इस मार्ग का पथिक अन्य किसी भी काम का नहीं रहता।
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जैसे किसी भी शिवालय में नंदी की दृष्टि भगवान शिव की ओर ही निरंतर रहती है, इधर-उधर कहीं भी नहीं घूमती, वैसे ही एक भक्त की दृष्टि सिर्फ भगवान की ओर ही होती है। इधर-उधर कहीं भी नहीं जाती। गुरु-चरणों का ध्यान करते करते भगवान स्वयं सामने आ जाते हैं, और अपना स्वयं का ध्यान करने लगते हैं। सारी साधना वे स्वयं ही करते हैं। भक्त को तो बगल में बैठाकर कह देते हैं --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
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आप जंगल में जा रहे और अचानक सामने से एक शेर आ जाये तो आप क्या कर सकेंगे? जो करना है वह तो शेर ही करेगा। ऐसे ही भगवान जब दृष्टि, दृश्य और दृष्टा बन जाएँ तब जो कुछ भी करना है, वह तो वे ही करेंगे। हम तो निमित्त मात्र है। हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ मई २०२१