Thursday, 17 October 2019

हे मृत्यु, तेरा दंश कहाँ है ? हे मृत्यु, तेरी विजय कहाँ है ?......

हे मृत्यु, तेरा दंश कहाँ है ? हे मृत्यु, तेरी विजय कहाँ है ?......
-------------------------------------------------
अपने किसी पूर्व जन्म में मैं वाराणसी के योगिराज श्री श्री श्याचरण लाहिड़ी महाशय (३० सितम्बर १८२८ -- २६ सितंबर १८९५) से जुड़ा हुआ था, जिनकी आज १२४ वीं पुण्यतिथि है| मुझे लगता है कि उस के उपरांत यह मेरा तीसरा जन्म है| इस जन्म में भी मुझे उनका आशीर्वाद प्राप्त है| यह लेख मैंने दो वर्ष पूर्व लिखा था जिसे संशोधित कर के उन की पुण्य-स्मृति में पुनर्प्रेषित कर रहा हूँ| उनकी सत्ता किसी सूक्ष्म जगत में है, जहाँ से आध्यात्मिक मार्गदर्शन और रक्षा आज भी उनके आशीर्वाद से हो रही है|
.
हे मृत्यु, तेरी विजय कहाँ है ? हे मृत्यु, तेरा दंश कहाँ है ? जीवन और मृत्यु दोनों ही प्रकाश और अन्धकार के खेल हैं| कभी प्रकाश हावी हो जाता है और कभी अन्धकार, पर विजय सदा प्रकाश की ही होती है यद्यपि अन्धकार के बिना प्रकाश का कोई महत्त्व नहीं है| सृष्टि द्वंद्वात्मक यानि दो विपरीत गुणों से बनी है| जीवन और मृत्यु भी दो विपरीत गुण हैं, पर मृत्यु एक मिथ्या भ्रम मात्र है, और जीवन है वास्तविकता| जीवात्मा कभी मरती नहीं है, सिर्फ अपना चोला बदलती है, अतः विजय सदा जीवन की ही है, मृत्यु की नहीं|
.
भगवान श्रीकृष्ण का वचन है ....
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ||०२:२२||"
अर्थात् जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है? वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है ||
(गीता में आस्था रखने वालों को समाधियों, मक़बरों और कब्रों की पूजा नहीं करनी चाहिए क्योंकि दिवंगत आत्मा तो तुरंत दूसरा शरीर धारण कर लेती है| महापुरुष तो परमात्मा के साथ सर्वव्यापी हैं)
.
जीवात्मा सदा शाश्वत है| भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ...
"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः| न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारूतः"||०२:२३||
अर्थात इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती||
.
भगवान श्रीकृष्ण ने ही कहा है ....
"न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे||०२:२०||"
अर्थात यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है| यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है| शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता||
.
शरीर के मरने या मारे जाने पर जीवात्मा मरती नहीं है| बाइबिल के अनुसार ...
{1 Corinthians 15:54-55 (N.I.V.)}
54 "When the perishable has been clothed with the imperishable, and the mortal with immortality, then the saying that is written will come true: “Death has been swallowed up in victory.”[a]
55 “Where, O death, is your victory? Where, O death, is your sting?”
1 Corinthians 15:54 Isaiah 25:8
1 Corinthians 15:55 Hosea 13:14
.
श्री श्री लाहिड़ी महाशय अपनी देहत्याग के दूसरे दिन प्रातः दस बजे दूरस्थ अपने तीन शिष्यों के समक्ष एक साथ एक ही समय में अपनी रूपांतरित देह में यह बताने को साकार प्रकट हुए कि उन्होंने अपनी उस भौतिक देह को त्याग दिया है, और उन्हें उनके दर्शनार्थ काशी आने की आवश्यकता नहीं है| उनके साथ उन्होंने और भी बातें की| समय समय पर उन्होंने अपने अनेक शिष्यों के समक्ष प्रकट होकर उन्हें साकार दर्शन दिए हैं| विस्तृत वर्णन उनकी जीवनियों में उपलब्ध है|
.
सचेतन देहत्याग के पूर्व उन्होंने कई घंटों तक गीता के श्लोकों की व्याख्या की और अचानक कहा कि "मैं अब घर जा रहा हूँ"| यह कह कर वे अपने आसन से उठ खड़े हुए, तीन बार परिक्रमा की और उत्तराभिमुख हो कर पद्मासन में बैठ गए और ध्यानस्थ होकर अपनी नश्वर देह को सचेतन रूप से त्याग दिया| पावन गंगा के तट पर मणिकर्णिका घाट पर गृहस्थोचित विधि से उनका दाह संस्कार किया गया| वे मनुष्य देह में साक्षात शिव थे|
.
ऐसे महान गृहस्थ योगी को नमन करते हुए मैं इस लेख का समापन करता हूँ|
ॐ नमः शिवाय ! ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२६ सितम्बर २०१९

गीता भारत का प्राण है ....

गीता भारत का प्राण है| गीता ने भारत को जीवित रखा है| गीता का एक एक शब्द जीवंत है| नीचे के तीन श्लोक गीता के कर्मयोग का सार हैं| यह संसार भी ऐक युद्धभूमि यानि कर्मभूमि है| यहाँ युद्ध करने का भावार्थ अपने कर्म निष्ठापूर्वक करने से है|
भगवान कहते हैं .....
"मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा| निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः||३:३०||"
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः| श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः||३ ३१||"
"ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌ | सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ||३:३२||"

भावार्थ : अत: हे अर्जुन! अपने सभी प्रकार के कर्तव्य-कर्मों को मुझमें समर्पित करके पूर्ण आत्म-ज्ञान से युक्त होकर, आशा, ममता, और सन्ताप का पूर्ण रूप से त्याग करके युद्ध कर ||
जो मनुष्य मेरे इन आदेशों का ईर्ष्या-रहित होकर, श्रद्धा-पूर्वक अपना कर्तव्य समझ कर नियमित रूप से पालन करते हैं, वे सभी कर्मफ़लों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं ||
परन्तु जो मनुष्य ईर्ष्यावश इन आदेशों का नियमित रूप से पालन नही करते हैं, उन्हे सभी प्रकार के ज्ञान में पूर्ण रूप से भ्रमित और सब ओर से नष्ट-भ्रष्ट हुआ ही समझना चाहिये||
.
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!

आत्म-तत्व में स्थित रहना ही मेरी दृष्टि में वास्तविक साधना है .....

आत्म-तत्व में स्थित रहना ही मेरी दृष्टि में वास्तविक साधना है .....
.
ध्यान में चेतना के विस्तार की अनुभूतियाँ वास्तव में आत्म-तत्व की ही आरंभिक अनुभूतियाँ हैं| आत्मतत्व ही ब्रह्म-तत्व है| तब यह लगने लगता है कि हम यह देह नहीं, बल्कि परमात्मा की अनंतता हैं| उस अनंतता में स्थित रहना ही मेरी सीमित व अल्प समझ से वास्तविक साधना है| आत्म-तत्व को सदा अनुभूत करते रहें| इस से आगे की अनुभूतियाँ गुरुकृपा से सहस्त्रार में ब्रह्मरंध्र से भी परे यानि देह की चेतना से भी परे जाकर होती हैं| वे अनुभूतियाँ पारब्रह्म परमशिव परमात्मा की होती हैं| वे परमशिव ही भगवान वासुदेव हैं, जिनके बारे में गीता में कहा है....
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते| वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||०७:१९||"
अर्थात बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि यह सब वासुदेव है ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है||
आचार्य शंकर ने इस श्लोक की व्याख्या यों की है ....
"बहूनां जन्मनां ज्ञानार्थसंस्काराश्रयाणाम् अन्ते समाप्तौ ज्ञानवान् प्राप्तपरिपाकज्ञानः मां वासुदेवं प्रत्यगात्मानं प्रत्यक्षतः प्रपद्यते| कथम् वासुदेवः सर्वम् इति। यः एवं सर्वात्मानं मां नारायणं प्रतिपद्यते सः महात्मा न तत्समः अन्यः अस्ति अधिको वा| अतः सुदुर्लभः मनुष्याणां सहस्रेषु इति हि उक्तम् आत्मैव सर्वो वासुदेव इत्येवमप्रतिपत्तौ कारणमुच्यते||
.
परमात्मा से एक क्षण के लिए भी पृथक होना महाकष्टमय मृत्यु है| वास्तविक महत्व इस बात का है कि हम क्या हैं| सच्चिदान्द परमात्मा सदैव हैं, परन्तु जीवभाव रूपी मायावी आवरण भी उसके साथ-साथ लिपटा है| उस मायावी आवरण के हटते ही सच्चिदानन्द परमात्मा भगवान परमशिव व्यक्त हो जाते हैं| सच्चिदानन्द से भिन्न जो कुछ भी है उसे दूर करना ही सच्चिदानंद की अभिव्यक्ति और वास्तविक उपासना है जिसमें सब साधनायें आ जाती हैं| अपने वास्तविक स्वरुप में स्थित होना ही साक्षात्कार है| उपासना और भक्ति (परम प्रेम) ही मार्ग हैं| जब परमात्मा के प्रति प्रेम हमारा स्वभाव हो जाए तब पता चलता है कि हम सही मार्ग पर हैं| परमात्मा के प्रति प्रेम यानि भक्ति ही हमारा वास्तविक स्वभाव है|
.
कर्ता भाव को सदा के लिए समाप्त करना है| वास्तविक कर्ता तो परमात्मा ही हैं| कर्ताभाव सबसे बड़ी बाधा है| अतः सब कुछ यहाँ तक कि निज अस्तित्व भी परमात्मा को समर्पित हो| यह समर्पण ही साध्य है, यही साधना है और यही आत्म-तत्व में स्थिति है| इसके लिए वैराग्य और अभ्यास आवश्यक है| जो भी बाधा आती है उसे दूर करना है| अमानित्व, अदम्भित्व और परम प्रेम ये एक साधक के लक्षण हैं| हम जो कुछ भी है, जो भी अच्छाई हमारे में है, वह हमारी नहीं अपितु परमात्मा की ही महिमा है| आप सब महान आत्माओं को मेरा दंडवत प्रणाम !
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ सितंबर २०१९

अब और क्या बचा है? मौज-मस्ती ही करनी है .....

अब और क्या बचा है? मौज-मस्ती ही करनी है .....
.
पिछले सात-आठ वर्षों से जैसी भी मुझे भगवान से प्रेरणा मिलती रहती, वैसा ही नित्य कुछ न कुछ लिखता ही रहता था| खुद का दिमाग तो कभी लगाया ही नहीं, सिर्फ हृदय की ही बात सुनता रहा| जो बात हृदय कह देता, उसे वैसी की वैसी ही लिख देता| अधिकांशतः तो प्रेरणा मुझे हृदय में बिराजमान भगवान वासुदेव से ही मिलती| दिमाग तो अब खालीस्थान है, जहाँ कुछ भी नहीं बचा है, पूरा बंजर हो गया है| हृदय भी एक बार भगवान को दिया था जो उन्होनें कभी बापस लौटाया ही नहीं, अपने पास ही रख लिया, अतः वह भी नहीं है| अपना कहने को कुछ भी नहीं है, सब कुछ श्रीहरिः ने छीन लिया है| सब कुछ था भी तो उन्हीं का, मैं तो उधार में मिली हुई चीज का जबर्दस्ती मालिक बना बैठा हुआ था| बहुत पहिले एक बार उनके समक्ष सिर झुकाया था जो फिर बापस कभी उठा ही नहीं, अभी तक झुका हुआ है|
.
पता नहीं क्यों, दुनियाँ की मौज-मस्ती करना ही भूल गए| अब हृदय कहता कि खूब मौज-मस्ती की जाए| लिखने की प्रेरणा मिली तो लिखेंगे, बाकी समय अपनी मौज-मस्ती करेंगे| और कुछ नहीं करना है|
.
इस संसार में मैं सबके साथ एक हूँ क्योंकि जो परमात्मा सब के हृदय में हैं, वे ही मेरे हृदय में हैं| अतः कहीं भी कोई फर्क नहीं है| अब हृदय की ही बात सुनेंगे, मन की नहीं| जो हृदय कहेगा वही करेंगे| किसी से कुछ लेना-देना नहीं है| एकमात्र संबंध ही अब सिर्फ भगवान से है| आप सब में व्यक्त उन भगवान वासुदेव को नमन ! वे ही मेरे परमशिव हैं| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ सितंबर २०१९

अद्भुत, अभूतपूर्व, अकल्पनीय और ऐतिहासिक घटना:----

अद्भुत, अभूतपूर्व, अकल्पनीय और ऐतिहासिक घटना:----
-------------------------------------------------
कल संयुक्त राज्य अमेरिका के टेक्सास प्रांत के ह्यूस्टन नगर में एक नया स्वर्णिम इतिहास रचा गया| पचास हजार से अधिक प्रवासी भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की उपस्थिती में सं.रा.अमेरिका के राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी का जो स्वागत और सम्मान किया गया वह अमेरिका के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना थी| ऐसा सम्मान आज तक अमेरिका के इतिहास में किसी भी राजनेता का नहीं किया गया| मंच पर वहाँ के प्रशासन का सारा नेतृत्व था|
.
>>> यह सम्मान पूरे भारत का सम्मान था| <<<
घटनास्थल अपनी क्षमता से अधिक पूरा खचाखच भरा हुआ था| लाखों प्रवासी अमेरिकी भारतीय व अन्य अमेरिकी नागरिक और करोड़ों लोग पूरे विश्व में यह कार्यक्रम टीवी पर प्रत्यक्ष देख रहे थे|
.
भारत को अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति और गरीबी दूर करने के लिए नवीनतम टेक्नोलोजी की आवश्यकता है, जिसे देने की क्षमता सिर्फ अमेरिका के पास है| साथ साथ भारत में जिहादी आतंकवाद को निपटाने के लिए भी अमेरिका का सक्रिय सहयोग आवश्यक है| अतः यह कार्यक्रम महान ऐतिहासिक था| दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व को मेरी ओर से अभिनंदन और नमन!
कृपा शंकर
२३ सितंबर २०१९

भगवान कहाँ हैं और कहाँ नहीं हैं ? ......

भगवान कहाँ हैं और कहाँ नहीं हैं ? ......
--------------------------------
यह एक प्रश्न है जो मैं आप सब से पूछ रहा हूँ कि भगवान कहाँ हैं, और कहाँ नहीं हैं?
लोग अपनी सीमित चेतना व सीमित अल्प ज्ञान से पूछते हैं कि भगवान कहाँ है? इसका कोई उत्तर है तो वह स्वयं के लिए ही हो सकता है| दूसरों को कोई संतुष्ट नहीं कर सकता| परमात्मा की स्पष्ट प्रत्यक्ष उपस्थिती कहाँ कितनी है यह हम अनुभूत ही कर सकते हैं|
.
वर्षा ऋतु चल रही है| वर्षा के पश्चात पृथ्वी से एक बड़ी मोहक गंध निकलती है| वह गंध जहाँ जितनी अधिक मात्रा में है, वहाँ परमात्मा की उपस्थिति उतनी ही अधिक है| यह हम अनुभूत कर सकते हैं| किसी व्यक्ति को देखते ही मन श्रद्धा से भर उठता है, और हम स्वतः ही उसे नमन करते हैं| यह उस व्यक्ति का तप है जिसे हम नमन करते हैं| परमात्मा ही उसके तप में व्यक्त होते हैं| हम किसी भी प्राणी को देखते हैं तो उस व्यक्ति की जो प्राण चेतना है वह परमात्मा ही है| परमात्मा सभी प्राणियों के प्राणों में व्यक्त होते हैं| अग्नि का तेज और बर्फ की शीतलता भी परमात्मा ही है| हर पदार्थ के अणु जिस ऊर्जा से निर्मित हैं, वह ऊर्जा भी परमात्मा है| उस ऊर्जा के पीेछे का विचार भी परमात्मा है| सारा जीवन और उस से परे भी जो कुछ है वह परमात्मा ही है| और भी अधिक स्पष्ट अनुभूति ध्यान साधना में सर्वव्यापी ब्रह्म तत्व की आनंददायक अनुभूति से होती है, जिसके पश्चात कोई संदेह नहीं रहता| जो विकार हैं वे सांसारिक पुरुषों के अज्ञान और अधर्म आदि के कारण ही हैं|
.
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ......
"पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ| जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु||७:९||"
अर्थात् पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ सम्पूर्ण भूतों में जीवन हूँ और तपस्वियों में मैं तप हूँ||
.
रामचरितमानस के आयोध्याकाण्ड में ऋषि वाल्मीकि भगवान श्रीराम से यही प्रश्न पूछते है कि जहाँ आप न हों वह स्थान तो बता दीजिये ताकि मैं चलकर वही स्थान आपको दिखा दूं? वे स्वयं सारे स्थान भी बता देते हैं जहाँ भगवान श्रीराम को रहना चाहिए| बड़ा ही सुंदर प्रसंग है जो सभी को एक बार तो पढ़ना और समझना ही चाहिए .....

"काम क्रोध मद मान न मोहा, लोभ न क्षोभ न राग न द्रोहा |
जिनके कपट दंभ नहीं माया, तिन्ह के ह्रदय बसहु रघुराया ||
जे हरषहिं पर सम्पति देखी, दुखित होहिं पर बिपति विशेषी |
जिनहिं राम तुम प्राण पियारे, तिनके मन शुभ सदन तुम्हारे ||
जाति पांति धनु धरम बड़ाई, प्रिय परिवार सदन सुखदाई |
सब तजि रहहुँ तुम्हहि उर लाई, तेहिं के ह्रदय रहहु रघुराई ||"
यहाँ इस बात का स्पष्ट उत्तर मिल जाता है कि भगवान कहाँ हैं और कहाँ नहीं हैं| आप सब में व्यक्त परमात्मा को नमन!
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ सितंबर २०१९

चित्त की विभिन्न अवस्थाएँ और योगसाधना का निषेध ....

चित्त की विभिन्न अवस्थाएँ और योगसाधना का निषेध ....
.
सनातन धर्म के अतिधन्य आचार्यों ने चित्त के स्वरूप को समझते हुए चित्त की पाँच अवस्थाएँ बताई हैं..... (१) क्षिप्त, (२) मूढ़, (३) विक्षिप्त, (४) एकाग्र और (५) निरुद्ध|
प्रथम तीन अवस्थाओं में योगसाधना का निषेध है| योगसाधना सिर्फ अंतिम दो अवस्था वालों के लिए ही है| कुछ सूक्ष्म प्राणायाम, धारणायें और ध्यान सिर्फ उन्हीं को बताए जाते हैं, और सिद्ध भी उन्हीं को होते हैं जिनका आचार-विचार शुद्ध हो व जो यम-नियमों का पालन करने में समर्थ हों| देवत्व उन्हीं में व्यक्त हो सकता है|
.
जो क्षिप्त, मूढ़ और विक्षिप्त चित्त वाले हैं, उनके लिए योग मार्ग का निषेध है| ऐसे चित्त वालों को साधना के रहस्य नहीं बताए जाते| वे दुराचारी यदि साधना करेंगे भी तो उन पर आसुरी जगत अपना अधिकार कर लेगा और वे घोर असुर बन जाएँगे| यह बात स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रवचनों में बड़े स्पष्ट रूप से कही है| मैं इस विषय की गहराई में नहीं जा रहा हूँ क्योकि यह बड़ा स्पष्ट है| क्षिप्त अवस्था में मनुष्य सदा तनावग्रस्त रहता है| मूढ़ावस्था में वह विवेकहीन हो जाता है| उसे अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं रहता| विक्षिप्त अवस्था में उसका चित्त स्थिर नहीं हो सकता, वह डांवाडोल रहता है| ऐसे लोग कभी एकाग्र नहीं हो सकते अतः उन के लिए योगसाधना का निषेध है| वे प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आदि का अभ्यास करेंगे भी तो उनमें आसुरी भाव ही प्रकट होगा और वे आसुरी शक्तियों के शिकार हो जाएँगे| ऐसे व्यक्ति मनुष्यता की सिर्फ हानि ही कर सकते हैं, कोई लाभ नहीं|
.
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः| हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः||१२:१५||"
अर्थात जिससे कोई लोक (अर्थात् जीव, व्यक्ति) उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी व्यक्ति से उद्वेग अनुभव नहीं करता तथा जो हर्ष, अमर्ष (असहिष्णुता), भय और उद्वेगों से मुक्त है, वह भक्त मुझे प्रिय है||

जिस से संसार उद्वेग को प्राप्त नहीं होता अर्थात् संतप्त -- क्षुब्ध नहीं होता और जो स्वयं भी संसार से उद्वेगयुक्त नहीं होता; जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग से रहित है (प्रिय वस्तु के लाभ से अन्तःकरण में जो उत्साह होता है, रोमाञ्च और अश्रुपात आदि जिसके चिह्न हैं उसका नाम हर्ष है| असहिष्णुता को अमर्ष कहते हैं| त्रास का नाम भय है, और उद्विग्नता ही उद्वेग है|) वह मुझे प्रिय है|
.
भगवान वासुदेव सब का कल्याण करें| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ सितंबर २०१९