Thursday, 1 August 2019

नित्यमुक्त को जाने की आज्ञा कौन दे ?

नित्यमुक्त को जाने की आज्ञा कौन दे? परमशिव स्वेच्छा से अविद्या का आनंद लेने स्वतंत्र बंधनों में आये हैं. वे परतंत्र नहीं हैं.
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जब उन की कृपा से "इदम्" मिट जाता हैे, तब वे ही "अहम्" बन जाते हैं, और हमें अपने अच्युत अपरिछिन्न भाव की सिद्धि और अहम् व इदम् के भेद का ज्ञान होता है. हमारे बंधन स्वतंत्र हैं, परतंत्र नहीं. अंततः साधकत्व और मुमुक्षुत्व भी एक भ्रम ही है, क्योंकि स्वयं से पृथक कोई सत्ता है ही नहीं. कोई बद्धता भी नहीं है, क्योंकि हम तो हैं ही नहीं. जो भी है वे भगवान वासुदेव ही हैं. वे ही परमशिव है, वे ही पारब्रह्म हैं, वे ही जगन्माता हैं, वे ही सर्वस्व हैं.
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते |
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: ||गीता ७:१९||

भवसागर पता नहीं कब का पार हो गया ! कुछ पता ही नहीं चला ----

भवसागर पता नहीं कब का पार हो गया ! कुछ पता ही नहीं चला.
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एक निर्जन, अनंत अन्धकार से घिरे प्रचंड चक्रवातों से ग्रस्त भयावह भवसागर को पार करने के लिए, जहाँ कोई तारा भी दृष्टिगत नहीं हो रहा था, वहाँ भगवान ने यह देह रुपी टूटी-फूटी असंख्य छिद्रों वाली नौका दी थी| सद्गुरु महाराज ने इसका कर्णधार बनने की बड़ी कृपा की और भगवान की अनुग्रह रूपी अनुकूलता मिली| सारे छिद्रों को भगवान ने भर दिया और जब ठीक से देखा तो पता चला कि भवसागर तो कभी का पार हो गया है, कुछ पता ही नहीं चला|
हे सच्चिदानंद हरिः, तुम कितने सुन्दर हो ! हे हरिः सुन्दर हे हरिः सुन्दर !

गुरुकृपा है या नहीं, इसकी क्या पहिचान है? गुरु, गुरुपूजा, गुरुदक्षिणा, गुरुस्थान और गुरुसेवा क्या है? .....

गुरुकृपा है या नहीं, इसकी क्या पहिचान है? गुरु, गुरुपूजा, गुरुदक्षिणा, गुरुस्थान और गुरुसेवा क्या है? .....
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यदि गुरु के उपदेश निज जीवन में चरितार्थ हो रहे हैं, यानी हम गुरु के उपदेशों का पालन अपने निजी जीवन में कर पा रहे हैं तो हम पर गुरु-कृपा है, अन्यथा नहीं| इसके अतिरिक्त अन्य कोई मापदंड नहीं है|
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मेरी दृष्टि में कूटस्थ ही गुरु है, कूटस्थ ही गुरुस्थान है, और कूटस्थ पर निरंतर ध्यान और समर्पण ही गुरुसेवा है| गुरु-रूप ब्रह्म सब नाम-रूप और गुणों से परे हैं, वे असीम हैं, उन्हें किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता| वे परमात्मा की अनंतता, पूर्णता और आनंद हैं| असली गुरुदक्षिणा है ..... कूटस्थ में पूर्ण समर्पण, जिसकी विधी भी स्वयं गुरु ही बताते हैं|
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यह मनुष्य देह तो लोकयात्रा के लिए परमात्मा से मिला हुआ एक वाहन रूपी उपहार है| हम यह वाहन नहीं हैं, गुरु भी यह वाहन नहीं हैं| पर लोकाचार के लिए लोकधर्म निभाना भी आवश्यक है| लोकधर्म निभाने के लिए गुरु यदि देह में हैं तो प्रतीक के रूप में उनकी देह को, यदि नहीं हैं तो उनकी परम्परा को, आवश्यक धन, अन्न-वस्त्र और पत्र-पुष्प आदि अर्पित करना हमारा दायित्व बनता है| गुरु देह में हैं तो यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें किसी प्रकार का कोई कष्ट तो नहीं है| तब उनकी देह की भी सेवा होनी चाहिए| गुरु के उपदेशों को चरितार्थ करना गुरुसेवा है| गुरु कभी स्वयं को भौतिक देह नहीं मानते| जो स्वयं को भौतिक देह मानते हैं वे गुरु नहीं हो सकते| उनकी चेतना कूटस्थ ब्रह्म के साथ एक होती है| उनके साथ हमारा सम्बन्ध शाश्वत है और वे शिष्य को भी स्वयं के साथ ब्रह्ममय करने के लिए प्रयासरत रहते हैं|
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हमारी सूक्ष्म देह में हमारे मष्तिष्क के शीर्ष पर जो सहस्त्रार है, जहाँ सहस्त्र पंखुड़ियों वाला कमल पुष्प है, वह गुरु के चरण कमल रूपी हमारी गुरु-सत्ता है| वह गुरु का स्थान है| सहस्त्रार में स्थिति ही गुरुचरणों में आश्रय है| उस सहस्त्र दल कमल पर हमें निरंतर परमशिव परात्पर परमेष्ठी गुरु का ध्यान करना चाहिए| यह सबसे बड़ी गुरुसेवा है| सहस्त्रार से परे की अनंतता में वे परमशिव हैं| वह अनंतता ही वास्तव में हमारा स्वरुप है| ध्यान करते करते हम स्वयं भी अनंत बन जाते हैं|
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गुरु-चरणों में मस्तक एक बार झुक गया तो वह कभी उठना नहीं चाहिए| वह सदा झुका ही रहे| यही शीश का दान है| इससे हमारे चैतन्य पर गुरु का अधिकार हो जाता है| तब जो कुछ भी हम करेंगे उसमें गुरु हमारे साथ सदैव रहेंगे| तब कर्ता और भोक्ता भी वे ही बन जाते हैं| यही है गुरु चरणों में सम्पूर्ण समर्पण| तब हमारे अच्छे-बुरे सब कर्म भी गुरु चरणों में अर्पित हो जाते हैं| हम पर कोई संचित कर्म अवशिष्ट नहीं रहता| तब गुरु ही हमारी आध्यात्मिक साधना के कर्ता और भोक्ता हो जाते हैं|
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साकार रूप में गुरु-पादुका या गुरु के चरण-कमलों की पूजा होती है, गुरु के देह की नहीं| गुरु रूप परब्रह्म को कर्ता बनाओ| साधना, साध्य और साधक; दृष्टा, दृश्य और दृष्टी; व उपासना, उपासक और उपास्य .... सब कुछ हमारे गुरु महाराज ही हैं| हमारी उपस्थिति तो वैसे ही है जैसे यज्ञ में यजमान की होती है| गुरुकृपा ही हमें समभाव में अधिष्ठित करती है| गुरुकृपा हि केवलं||
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ॐ श्री गुरवे नमः ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ जुलाई २०१९
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(यह लेख मेरे निजी अनुभवों और विचारों पर आधारित है. यदि किसी के विचार नहीं मिलते तो अन्यथा न लें. मैं सभी का पूर्ण सम्मान करता हूँ.)

धर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है .....

धर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है .....
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जो दृढ़ राखे धर्म को, तिंही राखे करतार| इण मंत्र रो जाप करे, वो मेवाड़ी सरदार|| 
उपरोक्त पंक्तियाँ अकबर के सेनापति अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना ने महाराणा प्रताप की प्रशंसा में लिखी थीं).
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण का आश्वासन है ....
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते| स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्||२:४०||
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हमने अपना धर्म छोड़ दिया है, इसलिए हमारा पतन हो रहा है और हम इतने अधिक कष्टों में हैं| हम धर्म की रक्षा करेंगे तभी धर्म हमारी रक्षा करेगा|
"धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ||"
धर्म ही रक्षा करेगा, और कोई नहीं |

Thursday, 25 July 2019

पञ्च मकार साधन रहस्य .......

पञ्च मकार साधन रहस्य .......
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तंत्र साधना में पञ्च मकारों का बड़ा महत्व है| पर जितना अर्थ का अनर्थ इन शब्दों का किया गया है उतना अन्य किसी का भी नहीं| इनका तात्विक अर्थ कुछ और है व शाब्दिक कुछ और| इनके गहन अर्थ को अल्प शब्दों में व्यक्त करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया गया उनको लेकर दुर्भावनावश कुतर्कियों ने सनातन धर्म को बहुत बदनाम किया है| मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन ये पञ्च मकार हैं|
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कुलार्णव तन्त्र के अनुसार --
"मद्यपानेन मनुजो यदि सिद्धिं लभेत वै|
मद्यपानरता: सर्वे सिद्धिं गच्छन्तु पामरा:||
मांसभक्षेणमात्रेण यदि पुण्या गतिर्भवेत|
लोके मांसाशिन: सर्वे पुन्यभाजौ भवन्तु ह||
स्त्री संभोगेन देवेशि यदि मोक्षं लभेत वै|
सर्वेsपि जन्तवो लोके मुक्ता:स्यु:स्त्रीनिषेवात||"
मद्यपान द्वारा यदि मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर ले तो फिर मद्यपायी पामर व्यक्ति भी सिद्धि प्राप्त कर ले| मांसभक्षण से ही यदि पुण्यगति हो तो सभी मांसाहारी ही पुण्य प्राप्त कर लें| हे देवेशि! स्त्री-सम्भोग द्वारा यदि मोक्ष प्राप्त होता है तो फिर सभी स्त्री-सेवा द्वारा मुक्त हो जाएँ|
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(1) आगमसार के अनुसार मद्यपान किसे कहते हैं ----
"सोमधारा क्षरेद या तु ब्रह्मरंध्राद वरानने|
पीत्वानंदमयास्तां य: स एव मद्यसाधक:||
हे वरानने! ब्रह्मरंध्र यानि सहस्त्रार से जो अमृतधारा निकलती है उसका पान करने से जो आनंदित होते हैं उन्हें ही मद्यसाधक कहते हैं|
ब्रह्मा का कमण्डलु तालुरंध्र है और हरि का चरण सहस्त्रार है| सहस्त्रार से जो अमृत की धारा तालुरन्ध्र में जिव्हाग्र पर (ऊर्ध्वजिव्हा) आकर गिरती है वही मद्यपान है|
इसीलिए ध्यान साधना हमेशा खेचरी मुद्रा में ही करनी चाहिए|
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(२) आगमसार के अनुसार--
"माँ शब्दाद्रसना ज्ञेया तदंशान रसना प्रियान |
सदा यो भक्षयेद्देवि स एव मांससाधक: ||"
अर्थात मा शब्द से रसना और रसना का अंश है वाक्य जो रसना को प्रिय है| जो व्यक्ति रसना का भक्षण करते हैं यानी वाक्य संयम करते हैं उन्हें ही मांस साधक कहते हैं| जिह्वा के संयम से वाक्य का संयम स्वत: ही खेचरी मुद्रा में होता है| तालू के मूल में जीभ का प्रवेश कराने से बात नहीं हो सकती और इस खेचरीमुद्रा का अभ्यास करते करते अनावश्यक बात करने की इच्छा समाप्त हो जय है इसे ही मांसभक्षण कहते हैं|
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(३) आगमसार के अनुसार --
"गंगायमुनयोर्मध्ये मत्स्यौ द्वौ चरत: सदा|
तौ मत्स्यौ भक्षयेद यस्तु स: भवेन मत्स्य साधक:||"
अर्थान गंगा यानि इड़ा, और यमुना यानि पिंगला; इन दो नाड़ियों के बीच सुषुम्ना में जो श्वास-प्रश्वास गतिशील है वही मत्स्य है| जो योगी आतंरिक प्राणायाम द्वारा सुषुम्ना में बह रहे प्राण तत्व को नियंत्रित कर लेते हैं वे ही मत्स्य साधक हैं|
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(४) आगमसार के अनुसार चौथा मकार "मुद्रा" है --
"सहस्त्रारे महापद्मे कर्णिका मुद्रिता चरेत|
आत्मा तत्रैव देवेशि केवलं पारदोपमं||
सूर्यकोटि प्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलं|
अतीव कमनीयंच महाकुंडलिनियुतं|
यस्य ज्ञानोदयस्तत्र मुद्रासाधक उच्यते||"
सहस्त्रार के महापद्म में कर्णिका के भीतर पारद की तरह स्वच्छ निर्मल करोड़ों सूर्य-चंद्रों की आभा से भी अधिक प्रकाशमान ज्योतिर्मय सुशीतल अत्यंत कमनीय महाकुंडलिनी से संयुक्त जो आत्मा विराजमान है उसे जिन्होंने जान लिया है वे मुद्रासाधक हैं|
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(५) शास्त्र के अनुसार मैथुन किसे कहते हैं अब इस पर चर्चा करते हैं|
आगमसार के अनुसार --
(इस की व्याख्या नौ श्लोकों में है अतः स्थानाभाव के कारण उन्हें यहाँ न लिखकर उनका भावार्थ ही लिख रहा हूँ)
मैथुन तत्व ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय का कारण है| मैथुन द्वारा सिद्धि और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है|
नाभि (मणिपुर) चक्र के भीतर कुंकुमाभास तेजसतत्व 'र'कार है| उसके साथ आकार रूप हंस यानि अजपा-जप द्वारा आज्ञाचक्र स्थित ब्रह्मयोनि के भीतर बिंदु स्वरुप 'म'कार का मिलन होता है|
ऊर्ध्व में स्थिति प्राप्त होने पर ब्रह्मज्ञान का उदय होता है, उस अवस्था में रमण करने का नाम ही "राम" है|
इसका वर्णन मुंह से नहीं किया जा सकता| जो साधक सदा आत्मा में रमण करते हैं उनके लिए "राम" तारकमंत्र है|
हे देवि, मृत्युकाल में राम नाम जिसके स्मरण में रहे वे स्वयं ही ब्रह्ममय हो जाते हैं|
यह आत्मतत्व में स्थित होना ही मैथुन तत्व है| अंतर्मुखी प्राणायाम आलिंगन है| स्थितिपद में मग्न हो जाने का नाम चुंबन है| केवल कुम्भक की स्थिति में जो आवाहन होता है वह सीत्कार है| खेचरी मुद्रा में जिस अमृत का क्षरण होता है वह नैवेद्य है|
अजपा-जप ही रमण है| यह रमण करते करते जिस आनंद का उदय होता है वह दक्षिणा है|
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यह ‪पंचमकार‬ की साधना भगवान शिव द्वारा पार्वती जी को बताई गयी है|
संक्षिप्त में आत्मा में यानि राम में सदैव रमण ही तंत्र शास्त्रों के अनुसार मैथुन है न कि शारीरिक सम्भोग|
(Note: यह साधना उन को स्वतः ही समझ में आ जाती है जो नियमित ध्यान साधना करते हैं| योगी नाक से या मुंह से सांस नहीं लेते| वे सांस मेरुदंड में सुषुम्ना नाड़ी में लेते है| नाक या या मुंह से ली गई सांस तो एक प्रतिक्रया मात्र है उस प्राण तत्व की जो सुषुम्ना में प्रवाहित है| जब सुषुम्ना में प्राण तत्व का सञ्चलन बंद हो जाता है तब सांस रुक जाति है और मृत्यु हो जाती है| इसे ही प्राण निकलना कहते हैं| अतः अजपा-जप का अभ्यास नित्य करना चाहिए|)
ॐ तत्सत्|
‪कृपाशंकर‬
११ जून २०१३
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(AA) उपरोक्त लेख पर मान्यवर श्री मिथिलेश द्विवेदी जी की टिपण्णी ......
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सादर नमन मान्यवर, 'पंच मकार' के रहस्य का अज्ञान भी इसके विषय में अनेक भ्रमों का उत्पादक है। आपके विवेचन के बाद कुछ भी लिखना अटपटा ही लगता है। फिर भी आपके आशीष का लोभ-संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। क्षमा करेंगे।
सनातन धर्म में एक खासियत है - तन्त्र विद्या। यह विद्या और किसी धर्म में नहीं पायी जाती। तन्त्र के द्वारा सारी सुख सुविधाओं को भोगते हुए अंतत: परमात्मा को पाना तन्त्र विद्या का सार है। तन्त्र सिद्धियों के द्वारा सारी भौतिक सुख सुविधाएं प्राप्त होती हैं। पंच मकार : मैथुन, मध, मांस, मत्स्य और मुद्रा इन पांचो पर टिका है तन्त्र। मैथुन क्या है? खुद का परमात्मा में रमण करना हीं मैथुन है। आज इसे गलत रूप में दिखाया या समझाया जा रहा है। तन्त्र का गहन अध्यन करने वाले आगम शास्त्रों के आधार पर मैथुन का यही अर्थ बताते हैं, हमेशा परमात्मा के साथ रमण का सुख भोगना हीं मैथुन है। वर्तमान में मैथुन का गलत अर्थ लगाया जाता है।
मध है हमेशा परमात्मा रूपी शराब का नशा करना। आगम तंत्रों के अनुसार मष्तिष्क में बिंदु रूपी स्थान से हमेशा अमृत बरसता रहता है योगी लोग उसी का पान अनवरत करते हैं जो मध से लाख गुना बेहतर और आनन्दायक होता है। वर्तमान में मध का अर्थ भी गलत लगाया जाता है।
मांस आगम तंत्रों के अनुसार मौन को मांस कहा गया है। मौन में अदभुत शक्ति है। मौन स्वयं से साक्षात्कार कराने में सहायक है। स्वयं में परमात्मा का दीदार होता है। मौन की महता समझने के लिए दो चार दिन मौन रह कर अवश्य देखें। वर्तमान में मांस का भी गलत अर्थ लगाया जाता है।
मत्स्य-आगम तंत्रों के अनुसार इडा ( बायाँ नासिका ) और पिंगला ( दायाँ नासिका ) से स्वास का लेना हीं ये दो मत्स्य हैं। योगिगन इन दोनों नासिकाओं के स्वांसो का विलय कर के सुषुम्ना नाडी ( दोनों नासिकाओं से साँसों का साथ साथ चलना ) को चलाते हैं जिससे कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होने में मदद मिलती है। इसका भी वर्तमान में गलत अर्थ लिया जाता है।
मुद्रा - हांथो की उंगलियों से तथा विभिन्न भाव भंगिमाओं के द्वारा मुद्रा का प्रदर्शन होता है। इसका भी गूढ़ अर्थ है। विशेष मुद्राओं से इष्ट प्रसन्न होतें हैं। इसमें अभी विकृति नहीं आई है जो की प्रसन्नता की बात है।
तन्त्र वैज्ञानिक प्रक्रिया पर आधारित एक गूढ़ विद्या है जिसका उल्लेख किसी अन्य धर्म में मेरे देखने-सुनने में नहीं मिला है। (साभार मान्यवर मिथिलेश द्विवेदी जी)
June 11, 2013 at 10:41pm
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(BB) उपरोक्त लेख पर मान्यवर श्री विकास त्यागी जी की टिपण्णी .......
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पूज्यवर कुछ दिन पहले एक ग्रुप मैं मैंने एक पोस्ट दी थी... आज पुनः उसे यहाँ रखा रहा हूँ....
कई बार मन में जिज्ञाषा उठती है की क्या क्या पञ्च मकार के बिना तंत्र की सिद्धि संभव है... सभी एक मत से मानते है की नहीं पञ्च मकार तंत्र का अकाट्य अंग है... कहा भी गया है....
मध् मासं च मीन च मुद्रा मैथुन्मेव च,
मकार पंचक प्राहुर्योगिना मुक्तिदायाकम...
तो क्या पुर्णतः सात्विक रहकर सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकते... आईये देखते है कुछ प्राचीन तंत्र ग्रन्थ क्या कहते हैं इस विषय मैं...
सबसे पहले मध् के विषय में :-
जिह्वाया गल्संयोगात पिबेत्ताम्रितम तदा,
योगिभि पिबते तत्तु न मध् गोड पेसटीकम .... ( गन्धर्व तंत्र )
यहाँ बताया गया है की मध् ब्रह्म रंध्र से बहकर आता है जिसका योगीजन पान किया करते है (खेचरी मुद्रा के विषय में आप सभी जानते हैं ) न की गुड और पिसटी से बना पेय (सूरा या शराब)
इसी प्रकार मांस के सम्बन्ध मैं कुलार्णव तंत्र में कहा गया है.:-
पुन्यापुन्ये पशु हत्वा ज्ञान खडगएन योगवित,
परे लयम नायेच्चितम मांसाशी सो निगधते ...
पुण्य और पाप रूपी पशुओ की ज्ञान रूपी खडग से हत्या कर उनका भक्षण अर्थात अर्थात उनका अस्तित्व ही समाप्त कर देना...
मीन के सम्बन्ध में आगम सार में लिखा है... :-
मनसादी इन्द्रियगनम संयम यात्मानी योजयेत,
सा मीनाशी भवेद देवी इतरे प्राण घातका,
गंगा यामुन्योर्मध्य द्वो मत्स्यो चरत सदा ,
तौ मतस्यो भक्ष्येस्तु स भवेन मतस्य साधकं ...
अर्थात ध्यान के द्वारा इडा (गंगा ) और पिंगला (यमुना ) में विचरण करने वाली स्वास प्रस्वास पर विजय...
इसी प्रकार मुद्रा के विषय विजय तंत्र मैं कहा गया है... :-
असत संगती मुद्रानम तन मुद्रा परिकीर्तिता,
सतसंगें भावेंमुक्ति असत्संगेनु बन्धनं...
अर्थात दुष्टो की संगती रूपी बंधन से बचे रहना ही मुद्रा है...
यामल तंत्र में मैथुन के विषय में कहा गया है...:-
शहस्त्रारे बिन्दु कुंडली मिलानाछिवे ,
मैथुनम परम दिव्यं यातिनाम परिकीर्तितं ....
अर्थात मूलाधार से उठकर कुंडलिनी रूपी शक्ति का शहस्त्रार स्थित परम ब्रह्म शिव से सायुज्य ही मैथुन है...
इन ग्रंथो मैं उपरोक्त विषय और विस्तार से बताया गया है ... लेकिन मेरा उद्देश्य इतने से ही पूर्ण हो जाता है...
वास्तव मैं इस सागर में मोती ही मोती भरे पड़े है आवश्यकता है तो बस गहरा गोता लगाने की....
(श्लोक टाइप करने में थोड़ी त्रुटी हो गयी है... यहाँ उचित शब्दों का अभाव है... अर्थ भी मैंने अपनी भाषा में ही लिख दिया है...केवल भावार्थ लिख दिया है .... )
इसका अर्थ कृपया ये न लगाएं में वाम मार्गी साधनाओं में उपयोगी पञ्च मकारों का विरोधी हूँ... उनमे भी मेरी पूर्ण सृद्धा है...
जय माँ आदिशक्ति (साभार विकास त्यागी)
११ जून २०१३

Sunday, 14 July 2019

अपरिग्रह .....

अपरिग्रह .....
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अधिकार-मुक्ति, या लोभ-मुक्ति की अवधारणा को हम अपरिग्रह कह सकते हैं| जितना कम से कम आवश्यक है, बस उतने का ही संग्रह, अन्य किसी का भी संग्रह नहीं, अर्थात् कोई भी वस्तु संचित ना करना .... अपरिग्रह कहलाता है| यह योग-दर्शन के पांच यमों में आता है और श्रमण परम्परा में महावीर स्वामी के अनुसार अहिंसा और अपरिग्रह जीवन के आधार हैं| अहिंसा के पश्चात् अपरिग्रह जैन धर्म में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण गुण है| सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ये पांच यम हैं| ये ही पांच महाव्रत हैं, जितना अधिक हम इनका पालन करते हैं, उतना ही अधिक इनका प्रभाव होने लगता है| अपरिग्रह एक महान व्रत है, जिसका आज के युग में जनकल्याण की दृष्टि से और भी अधिक महत्त्व है| क्योंकि वर्तमान युग में परिग्रह लालसा बहुत बढ़ रही है| परिग्रह पर महावीर स्वामी कहते हैं जो आदमी खुद सजीव या निर्जीव चीजों का संग्रह करता है, दूसरों से ऐसा संग्रह कराता है या दूसरों को ऐसा संग्रह करने की सम्मति देता है, उसका दुःख से कभी भी छुटकारा नहीं हो सकता| ज्ञानी लोग कपड़ा, पात्र आदि किसी भी चीज में ममता नहीं रखते, यहाँ तक कि शरीर में भी नहीं|
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अध्यात्म के साधकों के लिए 'अपरिग्रह' महाव्रत के रूप में रखा गया है। महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्रों में उसे अष्टांग-योग-साधना के अंतर्गत यम के पांच स्तम्भों में से एक माना है| अपरिग्रह का अर्थ होता है परिग्रह का अभाव और परिग्रह का तात्पर्य है-लेना, स्वीकार करना| इस प्रकार अपरिग्रह वह गुण है, जो किसी से भेंट स्वीकार करने का निषेध करता है|

वासनात्मक कामना विष है .....

वासनात्मक कामना विष है, इसकी काट परमात्मा का निरंतर नियमित चिंतन ही है, अन्य कुछ भी नहीं| थोड़ा-बहुत जितना भी हो सकता है उतना तो विचलित हुए बिना करना ही चाहिए| हिम्मत न हारें, अभ्यास करते ही रहें, भगवान सदा हमारे साथ हैं|

मन में वासनात्मक विचारों का आना यानि विषयों का आकर्षण आध्यात्म मार्ग का सबसे बड़ा शत्रु है| विष तो एक बार ही मारता है पर विषय बार-बार मारते हैं| गीता में जो रजोगुणी लक्षण व कामनाएँ बताई गयी हैं, उनका पूर्णतः परित्याग किये बिना सतोगुण नहीं आयेंगे| तमोगुणी व रजोगुणी विषयों का त्याग निरंतर अभ्यास व वैराग्य द्वारा करना ही होगा, और सतोगुणी विषयों का निरंतर चिंतन करना होगा| अंततः जाना तो तीनों गुणों से परे ही होगा|

अन्तःकरण में उन वृत्तियों को ही लाना होगा जो हमें परमात्मा में स्थित करती हैं| इसके लिए अपने विचारों और आचरण में पवित्रता लानी होगी| मन के साथ साथ बाहरी आचरण को भी शुद्ध करना होगा| आहार शुद्धि, कुसंग-त्याग, सत्संग आदि अति आवश्यक हैं| सबसे बड़ा है ... निज-विवेक| हर कार्य अपने निज-विवेक के प्रकाश में ही करें|

मंगलमय शुभ कामनाएँ ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
१३ जुलाई २०१९
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पुनश्चः :---- 

यह शरीर एक धोखेबाज मित्र है. इसके साथ जुड़ा अंतःकरण
(मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार)
भी धोखेबाज है.
इन्हें इतना ही दें जो इनके लिए आवश्यक है, अधिक नहीं.
इन पर नियंत्रण रखें. इन का कोई भरोसा नहीं है.