Tuesday, 4 June 2019

लोगों को मुफ्तखोर मत बनाइये अन्यथा देश नष्ट हो जाएगा :----

लोगों को मुफ्तखोर मत बनाइये अन्यथा देश नष्ट हो जाएगा :----

महाभारत के शांतिपर्व में राजधर्म समझाया गया है| वहाँ यह स्पष्ट लिखा है कि आपत्तिकाल को छोड़कर किसी को कुछ भी निःशुल्क नहीं दिया जाए, अन्यथा यह देश नष्ट हो जायेगा|

मनुस्मृति में भी यह स्पष्ट लिखा है की आपत्तिकाल को छोड़कर किसी को किसी से कुछ भी नहीं मांगना चाहिए|
प्राचीन भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं होती तो आज तक सब लोग भीख मांग कर ही गुजारा कर रहे होते| 

भारत को दिनों दिन गरीब, अकर्मण्य बनाया जा रहा है| अपनी प्राचीन संस्कृति के कारण ही भारत बचा हुआ है जिसे आज के तथाकथित बुद्धिजीवी रोज गाली देते हैं|

मैं सेकुलर क्यों नहीं हूँ ? .....

मैं सेकुलर क्यों नहीं हूँ ? 
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जो लोग स्वयं को सेकुलर (धर्मनिरपेक्ष) कहते हैं क्या उन को "सेक्युलरिज्म" के इतिहास का पता है?
सन १८५१ ई.में इंग्लैंड के राजा हेनरी आठवें को अपनी पत्नी को तलाक देना था जिसके लिए पॉप की अनुमति आवश्यक थी| पॉप ने वह अनुमति नहीं दी| इसलिए पॉप के आदेश को ठुकराने के लिए इंग्लेंड में धर्मनिरपेक्षता यानि सेकुलरिज्म का सिद्धांत बनाया गया जिसके अंतर्गत इंग्लैंड का राजा पॉप के आदेश को मानने केलिए बाध्य नहीं था| सेकुलर का मतलब है "चर्च के आदेश को नहीं मानने वाला"| हम आज उन्हीं अंग्रेजों की नक़ल कर के सेकुलर बन रहे हैं|
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मैं सेकुलर नहीं हूँ क्योंकि मैं अंग्रेजों का गुलाम नहीं हूँ| मैं धर्म-सापेक्ष हूँ, धर्म-निरपेक्ष नहीं| धर्म मेरा प्राण, मेरा जीवन है|
सेकुलर का मतलब है "चर्च के आदेश को नहीं मानने वाला"| हम आज उन्हीं अंग्रेजों की नक़ल कर के सेकुलर बन रहे हैं|
मैं सेकुलर नहीं हूँ क्योंकि मैं अंग्रेजों का गुलाम नहीं हूँ| मैं धर्म-सापेक्ष हूँ, धर्म-निरपेक्ष नहीं| धर्म मेरा प्राण, मेरा जीवन है|
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दुनियाँ में जितने भी सेकुलर हैं वे सब इंग्लैंड के भूतपूर्व राजा हेनरी आठवें के मानस पुत्र/पुत्रियाँ हैं| सन १८५१ ई.में इंग्लैंड के राजा हेनरी आठवें को अपनी पत्नी को तलाक देना था जिसके लिए पॉप की अनुमति आवश्यक थी| पोप ने वह अनुमति नहीं दी| इसलिए पोप के आदेश को ठुकराने के लिए इंग्लेंड में धर्मनिरपेक्षता यानि सेकुलरिज्म का सिद्धांत बनाया गया, जिसके अंतर्गत इंग्लैंड का राजा पोप के आदेश को मानने के लिए बाध्य नहीं था|
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सेकुलर का मतलब है "चर्च के आदेश को नहीं मानने वाला"| हम आज उन्हीं अंग्रेजों की नक़ल कर के सेकुलर बन रहे हैं|

हमारा लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है .....

हमारा लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है, न कि कोई सिद्धांत विशेष, साधना पद्धति, मत-मतान्तर, पंथ, मज़हब या कोई वाद-विवाद ......
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हमारा प्रथम अंतिम और एकमात्र लक्ष्य है .... परमात्मा की प्राप्ति| वह कैसे हो इस का ही चिंतन करना चाहिए| हमें न तो किसी को खुश करना है और न किसी के पीछे पीछे भागना है, न भविष्य के लिए यह कार्य छोड़ना है, अगले जन्मों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं|
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महाभारत में युधिष्ठिर को यक्ष पूछता है ... 
कः पन्था ? अर्थात् कौन सा मार्ग सर्वश्रेष्ठ है? युधिष्ठिर का उत्तर होता है ....
"तर्को प्रतिष्ठः श्रुतया विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम्|
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः स पन्थाः||"
अर्थात् ....
तर्कों से कुछ भी प्रतिष्ठित किया जा सकता है, श्रुति के अलग अलग अर्थ कहे जा सकते हैं, कोई एक ऐसा मुनि नहीं केवल जिनका वचन प्रमाण माना जा सके; धर्म का तत्त्व तो मानो निविड़ गुफाओं में छिपा है (गूढ है), इस लिए महापुरुष जिस मार्ग से गये हों, वही मार्ग जाने योग्य है |
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अतः हमें उन महापुरुषों का अनुकरण करना चाहिए जिन्होंने निज जीवन में परमात्मा को प्राप्त किया हो और उन की प्राप्ति का मार्ग बताया हो| साकार-निराकार, सगुण-निर्गुण .... इन सब में भेद करना मात्र अज्ञानता है| ये सब परमात्मा की अभिव्यक्तियाँ ही हैं| इस सृष्टि में कुछ भी निराकार नहीं है| जो भी सृष्ट हुआ है वह साकार है| एक बालक चौथी कक्षा में पढ़ता है, और एक बालक बारहवीं में पढता है, सबकी अपनी अपनी समझ है| जो जिस भाषा और जिस स्तर पर पढता है उसे उसी भाषा और स्तर पर पढ़ाया जाता है| जिस तरह शिक्षा में क्रम होते हैं वैसे ही साधना और आध्यात्म में भी क्रम हैं| एक सद्गुरू आचार्य को पता होता है कि किसे क्या उपदेश और साधना देनी है, वह उसी के अनुसार शिष्य को शिक्षा देता है|
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मेरा इस देह में जन्म हुआ उससे पूर्व भी परमात्मा मेरे साथ थे, इस देह के पतन के उपरांत भी वे ही साथ रहेंगे| वे ही माता-पिता, भाई-बहिन, सभी सम्बन्धियों और मित्रों के रूप में आये| यह उन्हीं का प्रेम था जो मुझे इन सब के रूप में मिला| वे ही मेरे एकमात्र सम्बन्धी और मित्र हैं| उनका साथ शाश्वत है|
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किसी भी तरह के वाद-विवाद में न पड़ कर अपना समय नष्ट न करें और उसका सदुपयोग परमात्मा के अपने प्रियतम रूप के ध्यान में लगाएँ| कमर को सीधी कर के बैठें भ्रूमध्य में ध्यान करें और एकाग्रचित्त होकर उस ध्वनी को सुनते रहें जो ब्रह्मांड की ध्वनी है| हम यह देह नहीं है, परमात्मा की अनंतता हैं| अपनी सर्वव्यापकता पर ध्यान करें|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ जून २०१९

परमात्मा से "परम प्रेम" और "समर्पण" का स्वभाव ....

परमात्मा से "परम प्रेम" और "समर्पण" का स्वभाव हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है ..... 
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परमात्मा से पूर्ण प्रेम करो, "अनाहत नाद" या "ज्योति" के रूप में, या अपने अन्य किसी प्रियतम के रूप में साकार या निराकार, पर प्रेम करो| गीता में भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का सार ही भक्ति और समर्पण है ....
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः|९:३४||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||
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अपने भौतिक व्यक्तित्व का मोह हमें हिंसक बनाता है| भिन्नता से भेद की उत्पत्ति होती है, और भेद से भय और हिंसा उत्पन्न होती है| भयभीत प्राणी दूसरों को भी भयभीत करता है और हिंसक बन जाता है| व्यक्तित्व की दासता और मोह हमें हिंसक बना देता है| इस व्यक्तित्व की दासता से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है ..... "परमात्मा से परम-प्रेम और समर्पण"|
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परमात्मा से "पूर्ण प्रेम" और "समर्पण" हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है| जब हम परमात्मा को "प्रेम" और "समर्पण" करते हैं तब वही "प्रेम" और "समर्पण" अनंत गुणा होकर हमें ही बापस मिलता है| जब हम उन के "शिवत्व" में विलीन हो जाते हैं, वह "शिवत्व" भी हमारे में विलीन हो जाता है| तब हम "जीव" नहीं, स्वयं साक्षात शिव बन जाते हैं| जहाँ कोई क्रिया-प्रतिक्रिया, मिलना-बिछुड़ना, अपेक्षा व मांग नहीं, जो बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा से भी परे है, वह असीमता, अनंतता व सम्पूर्णता हम स्वयं हैं| हमारा पृथक अस्तित्व उस परम प्रेम और परम सत्य को व्यक्त करने के लिए है| भक्ति और समर्पण द्वारा हम जीव से शिव बनें|
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ॐ तत्सत् ! शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ अप्रेल २०१९

Sunday, 2 June 2019

गुरु चरणों में आश्रय और गुरु दक्षिणा क्या है ?

गुरु चरणों में आश्रय और गुरु दक्षिणा क्या है ?
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(ये मेरे निजानुभूतिजन्य व्यक्तिगत विचार हैं). मेरे लिए मेरे गुरु मेरे साथ एक हैं| उन में और मुझ में कोई अंतर नहीं हैं| इस देह में ..... मैं नहीं, वे ही साधना कर रहे हैं| मेरे सारे पाप-पुण्य, अच्छे-बुरे कर्म, और मेरा संपूर्ण अस्तित्व उन्हीं को समर्पित है| वे एक तत्व हैं जो सब प्रकार के नाम और रूपों से परे हैं| अंततः वे एक दिव्य अनुभूति हैं| ध्यान में उन की अनुभूति कूटस्थ में नाद और ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में होती है| इस देह में सांस भी वे ही ले रहे हैं और सारी चेतना उन्हीं की है| मैं और मेरा कुछ भी नहीं है|
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गुरु चरणों में आश्रय :--- सहस्त्रार में उनका गहनतम ध्यान, और चेतना में उन की निरंतर अनुभूति ही गुरु चरणों में आश्रय है| मेरे लिए सहस्त्रार ही श्रीगुरु महाराज के चरण कमल हैं|
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गुरु दक्षिणा :--- अपने अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार) का परमप्रेम सहित उनमें यथासंभव निरंतर समर्पण ही मेरे लिए गुरु-दक्षिणा है|
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इस देह रूपी नौका के कर्णधार वे ही हैं| प्रारब्ध कर्मों के फल भुगतने के लिए मैनें यह जन्म लिया| जब यह देह छूट जायेगी तब मेरी कोई पृथकता नहीं है, सब कुछ उन्हीं का है| वे परमात्मा के साथ एक हैं व परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हैं| मेरा समर्पण उन्हीं के प्रति है|
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्|
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्, भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि||"
जो ब्रह्मानंदस्वरूप हैं, परम सुख देनेवाले हैं जो केवल ज्ञानस्वरूप हैं, (सुख, दुःख, शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वों से रहित हैं, आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं, तत्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ हैं, एक हैं, नित्य हैं, मलरहित हैं, अचल हैं, सर्व बुद्धियों के साक्षी हैं, भावना से परे हैं, सत्व, रज और तम तीनों गुणों से रहित हैं ऐसे श्री सदगुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूँ|
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"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च|
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते||"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व|
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः||"
आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति (ब्रह्मा) और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी कारण) हैं| आपके लिए सहस्र बार नमस्कार, नमस्कार है, पुनः आपको बारम्बार नमस्कार, नमस्कार है||
हे अनन्तसार्मथ्य वाले भगवन्, आपके लिए अग्रत और पृष्ठत नमस्कार है, हे सर्वात्मन् आपको सब ओर से नमस्कार है| आप अमित विक्रमशाली हैं और आप सबको व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप सर्वरूप हैं||
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ॐ तत्सत् ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ ! गुरु ॐ !
कृपा शंकर
२ जून २०१९

भगवान शिव की मानसपुत्री महारानी अहिल्याबाई होलकर ....

भगवान शिव की मानसपुत्री महारानी अहिल्याबाई होलकर (३१ मई १७२५ - १३ अगस्त १७९५) की आज २९४ वीं जयंती है| इनके गौरव और महानता के बारे में जितना लिखा जाए उतना ही कम है| व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में विकटतम कष्ट और प्रतिकूलताओं के पश्चात् भी इन्होने महानतम कार्य किये, जिनकी तुलना नहीं की जा सकती| इनका विवाह मल्हार राव होलकर के बेटे खाण्डेराव के साथ हुआ था जिनकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी| इनके एकमात्र पुत्र मालेराव भी जीवित नहीं रहे| इनकी एकमात्र कन्या बालविधवा हो गयी और पति की चिता में कूद कर स्वयं के प्राण त्याग दिए| अपने श्वसुर मल्हारराव होलकर की मृत्यु के समय ये मात्र ३१ वर्ष की थी और राज्य संभाला| अपने दुर्जन सम्बन्धियों व कुछ सामंतों के षडयंत्रों और तमाम शोक व कष्टों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए इन्होने अपने राज्य का कुशल संचालन किया| अपना राज्य इन्होने भगवान शिव को अर्पित कर दिया और उनकी सेविका और पुत्री के रूप में राज्य का कुशल प्रबंध किया| राजधानी इंदौर उन्हीं की बसाई हुई नगरी है| जीवन के सब शोक व दु:खों को शिव जी के चरणों में अर्पित कर दिया और उनके एक उपकरण के रूप में निमित्त मात्र बन कर जन कल्याण के व्रत का पालन करती रही| उनके सुशासन से इंदौर राज्य ऐश्वर्य और समृद्धि से भरपूर हो गया|
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सोमनाथ मंदिर के भग्नावशेषों के बिलकुल निकट एक और सोमनाथ मंदिर बनवाकर प्राण प्रतिष्ठा करा कर पूजा अर्चना और सुरक्षा आदि की व्यवस्था की| वाराणसी का वर्तमान विश्वनाथ मन्दिर, गयाधाम का विष्णुपाद मंदिर आदि जो विध्वंश हो चुके थे, इन्हीं के प्रयासों से बने| हज़ारों दीन दुखियारे बीमार और साधू लोग इन्हें करुणामयी माता कह कर पुकारते थे| सैंकड़ों असहाय लोगों और साधू संतों को अन्न वस्त्र का दान इनकी नित्य की दिनचर्या थी| पूरे भारतवर्ष में अनगिनत मंदिर, सडकें, धर्मशालाएँ, अन्नक्षेत्र, सदावर्त, तालाब और नदियों के किनारे पक्के घाट इन्होने बनवाए| नर्मदा तट पर पता नहीं कितने तीर्थों को वे जागृत कर गईं| महेश्वर तीर्थ इन्हीं के प्रयासों से धर्म और विद्द्या का केंद्र बना| अमरकंटक में यात्री निवास और जबलपुर में स्फटिक पहाड़ के ऊपर श्वेत शिवलिंग स्थापित कराया| परिक्रमाकारियों के लिए व्यवस्थाएँ कीं| ओम्कारेश्वर में ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति की| वहाँ प्रतिदिन पंद्रह हज़ार आठ सौ मिटटी के शिवलिंग बना कर पूजे जाते थे, फिर उनका विसर्जन कर दिया जाता था|
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यहाँ दो शब्द उनके श्वसुर मल्हार राव के बारे में भी लिखना उचित रहेगा|
छत्रपति शिवाजी के पोते साहू जी ने एक चित्तपावन ब्राह्मण बालाजी बाजीराव (प्रथम) को पेशवा नियुक्त किया| बालाजी बाजीराव वेश बदल कर बिना सुरक्षा व्यवस्था के तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े| मार्ग के एक गाँव में उनको मुगलों के जासूसों ने पहचान लिया और उनकी हत्या के लिए बीस मुग़ल सैनिक पीछे लगा दिए| मल्हार राव ने कुछ भैंसे पाल रखीं थीं और उस गाँव में दूध बेच कर गुजारा करते थे| वे मुग़ल जासूस भी उन्हीं से दूध खरीदते थे| उनकी आपसी बातचीत से मल्हार राव को सब बातें स्पष्ट हो गईं| उनकी देशभक्ति जागृत हो गयी और चुपके से उनहोंने पेशवा को ढूंढकर सारी स्थिति स्पष्ट कर दी| यही नहीं पेशवा को एक संकरी घाटी में से सुरक्षित निकाल कर भेज दिया और उनकी तलवार खुद लेकर उन बीस मुगलों को रोकने खड़े हो गए| उस तंग घाटी से एक समय में सिर्फ एक ही व्यक्ति निकल सकता था| ज्यों ही कोई मुग़ल सैनिक बाहर निकलता, मल्हार राव की तलवार उसे यमलोक पहुंचा देती| उन्होंने पाँच मुग़ल सैनिकों को यमलोक पहुंचा दिया| इसे देख बाकी पंद्रह मुग़ल सैनिक गाली देते हुए बापस लौट गए| उन्होंने मल्हार राव के घर को आग लगा दी, उसके बच्चों और पत्नी की हत्या कर दी व भैंसों को हाँक कर ले गए|
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मल्हार राव, पेशवा बाजीराव के दाहिने हाथ बन कर उनके साथ हर युद्ध में रहे| समय के साथ बाजीराव विश्व के सफलतम व महानतम सेनानायक बने| बाजीराव ने लगातार ४२ युद्ध लड़े और कभी पराजय का मुंह नहीं देखा| उनकी लू लगने से असमय मृत्यु नहीं होती तो भारत का इतिहास ही अलग होता और वे पूरे भारत के शासक होते| पेशवाओं ने वर्तमान इंदौर क्षेत्र का राज्य मल्हार राव होलकर को दे दिया था जहाँ की महारानी परम शिवभक्त उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई बनी|
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हमें गर्व है ऐसी शासिका पर| दुर्भाग्य से भारत में धर्म-निरपेक्षता के नाम पर ऐसे महान व्यक्तियों के इतिहास को नहीं पढाया जाता| भारत के अच्छे दिन भी लौटेंगे| इस लेख को लिखने के पीछे यही स्पष्ट करना था की यदि ह्रदय में भक्ति और श्रद्धा हो तो व्यक्ति कैसी भी मुसीबतों का सामना कर जीवन में सफल हो सकता है| इति| 
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ॐ स्वस्ति ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर बावलिया
३१ मई २०१९

कश्मीर की समस्या पर एक सामान्य भारतीय की सोच ......

 कश्मीर की समस्या पर एक सामान्य भारतीय की सोच ......
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कुछ दिनों पहिले मैनें दो लेख लिखे थे कि 'कश्मीर की समस्या राजनीतिक नहीं बल्कि मज़हबी है'| इसका समाधान हो सकता है पर चीन, अमेरिका और पश्चिमी देश कभी भी नहीं चाहेंगे कि कश्मीर की समस्या का कोई समाधान हो, क्योंकि इसके पीछे उनके व्यवसायिक और राजनीतिक हित हैं| कश्मीर की समस्या भी वास्तव में नेहरू को मोहरा बनाकर ब्रिटेन व अमेरिका ने ही उत्पन्न की थी|
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कश्मीर की समस्या ब्रिटेन ने अपने ही ख़ास आदमी हमारे प्रथम प्रधान मंत्री श्री नेहरु जी के माध्यम से उत्पन्न की जिनको उन्होंने सत्ता स्थानांतरित की थी| नेहरु जी की कमजोरी एक सुन्दर ब्रिटिश महिला लेडी एडविना माउंटबेटन के प्रति थी, और अन्य सुन्दर महिलाओं के प्रति भी, जिसका अनुचित लाभ ब्रिटेन ने भरपूर उठाया और सता हस्तांतरण के पश्चात भी भारत में लेडी माउंट बेटन के माध्यम से वही हुआ जो ब्रिटेन चाहता था| आजादी के बाद भी भारत पर अप्रत्यक्ष रूप से राज्य लेडी माउंटबेटन का ही था जो वास्तव में ब्रिटेन की गुप्तचर संस्थाओं द्वारा भारत में स्थापित एक ब्रिटिश गुप्तचर थी| नेहरु ने अपनी पत्नी को तो स्विट्ज़रलैंड के एक सेनिटोरियम में भर्ती करा रखा था जिसे उसने कभी नहीं संभाला, और एडविना के साथ उसके प्रेमी गुलाम की तरह रहता था| कटु सत्य तो यह है कि नेहरु और गाँधी दोनों ही लार्ड माउंटबेटन की मुट्ठी में थे और वह चाहे जैसे उनका इस्तेमाल करता था| लार्ड माउंटबेटन ... नेहरू और गाँधी की कोई कद्र नहीं करता था और उन्हें अपना गुलाम ही मानता था|
भारत को लेडी एडविना माउंटबेटन (Countess of Burma, CI, GBE, DCVO, GCStJ) से छुटकारा २१ फरवरी १९६० को मिला जब उसने ब्रिटिश नार्थ बोर्निओ के 'जेस्सोल्टन' (अब मलयेशिया के कोटा किनाबालू) नामक स्थान पर आत्महत्या कर ली जब उसे पता चला कि उस को सिफलिस की लाइलाज बीमारी हो गयी है| हालांकि ब्रिटेन ने यह बात छिपाई और प्रचारित किया कि वह वहाँ सेंट जॉन एम्बुलेंस ब्रिगेड के निरीक्षण के के लिए गयी थी जहाँ नींद में स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त हुई| भारत ने उसके सम्मान में नौसेना का एक फ्रिगेट भी इंग्लैंड भेजा था| चार साल बाद भारत में नेहरु की मृत्यु भी सिफलिस से हो गयी|
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अमेरिका का स्वार्थ यह था की वह पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगित में अपना सैनिक अड्डा स्थापित करना चाहता था जहाँ से वह चीन और मध्य एशिया पर दृष्टि रख सके| वह सैनिक अड्डा उसने स्थापित कभी का कर भी लिया था|
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चीन का स्वार्थ एक तो यह था कि कश्मीरी लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र पर उसका पूर्ण अधिकार हो ताकि सिंकियांग और तिब्बत के मध्य दूरी न रहे| और दूसरा यह कि पाक अधिकृत कश्मीर के माध्यम से पकिस्तान होते हुए वह अरब सागर तक पहुँच सके|
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जब १९४८ में भारतीय सेना जीतने लगी तब ब्रिटेन ने नेहरू जी पर दबाव डाल कर युद्धविराम करा कर मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में भिजवाया और जनमत संग्रह का फैसला करवा दिया| जनमत संग्रह का निर्णय सशर्त था कि पहले पकिस्तान पूरा कश्मीर खाली करेगा, फिर जनमत संग्रह संयुक्त राष्ट्र संघ की निगरानी में होगा| अगर पाकिस्तान पाक अधिकृत कश्मीर खाली करता तो अमेरिका को गिलगिट से अपना सैनिक अड्डा भी हटाना पड़ता जो अमेरिकी हितों के विरुद्ध था| अतः अमेरिका ने सदा पकिस्तान का साथ दिया और भारत को डराने धमकाने के लिए पाकिस्तान का प्रयोग किया| पाकिस्तान ने भारत से जो युद्ध किये हैं वे सब अमेरिका की सहमती और सहायता से ही किये हैं| नेहरू जी को भारतीय सेना से अधिक अंग्रेजों यानि ब्रिटेन पर भरोसा था, अतः सदा उन्होंने वही किया जो ब्रिटेन चाहता था| अनुच्छेद ३७० को संविधान में जोड़ना भी उनकी एक भयानक गलती थी|
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कश्मीर में अल्पसंख्यक सुविधाएँ सिर्फ मुसलमानों को प्राप्त हैं, हिदुओं को नहीं जो वास्तव में अल्प-संख्यक हैं| कश्मीर को अब छः टुकड़ों में बाँट देना चाहिए ..... (१) जम्मू, (२) लद्दाख, (३) कश्मीर घाटी, (४) कश्मीर घाटी से बाहर का क्षेत्र, (५) पाक अधिकृत कश्मीर और (६) चीन अधिकृत कश्मीर| हिन्दुओं और बौद्धों को अल्प-संख्यक की सुविधाएँ दी जाएँ|
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जब तक पकिस्तान और चीन, पाक-अधिकृत कश्मीर को खाली नहीं करते तब तक कश्मीर में जनमत संग्रह नहीं हो सकता| चीन और पाक कभी भी अधिकृत क्षेत्र को खाली नहीं करेंगे| वैसे जनमत संग्रह हो भी जाए तो वह भारत के ही पक्ष में ही होगा क्योंकि पूरे कश्मीर में बहुमत शिया मुसलमानों का है जो पाकिस्तान विरोधी हैं| सिर्फ कश्मीर घाटी में ही सुन्नी बहुमत है|
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कश्मीर में अब भारत सरकार कानूनी रूप से यह तय करे कि कौन अल्प-संख्यक है और कौन बहु-संख्यक| धारा ३७० समाप्त कर सेवानिवृत सैनिको और अन्य सभी समर्थवान भारतीयों को वहाँ बसाया जाए| कश्मीरी हिन्दुओं को एक सुरक्षित क्षेत्र दिया जाये| कश्मीर को विशेष आर्थिक पैकेज न दिए जाएँ| अपना कमाओ और खाओ| तुष्टिकरण की नीति समाप्त हो| अंततः पकिस्तान को तो तोड़ना ही पड़ेगा जो एक दुष्ट राष्ट्र है|
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मैं कोई विशेषज्ञ नहीं हूँ, एक सामान्य नागरिक हूँ| जैसी मेरी बुद्धि थी और जैसा मुझे समझ में आया वैसा लेख मैनें लिख दिया| बड़े बड़े राजनेता और विशेषज्ञ हैं जो इस मामले को सुलाझायेगे| बाकी जैसी प्रभु की इच्छा|
अब इस विषय पर और कुछ लिखने के लिए मेरे पास नहीं है| आगे और नहीं लिखूंगा| इति| ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० मई २०१७