Sunday, 12 November 2017

सबसे अधिक कठिन कार्य :---

सबसे अधिक कठिन कार्य :---

हमारे लिए सबसे अधिक कठिन कार्य है ..... इस संसार में रहते हुए परमात्मा के प्रति अभीप्सा, तड़प और प्रेम की निरंतरता को बनाए रखना| इससे अधिक कठिन कार्य और कोई दूसरा नहीं है| इस संसार में हर कदम पर माया विक्षेप उत्पन्न कर रही है जो हमें परमात्मा से दूर करती है| घर-परिवार के लोगों, सांसारिक मित्रों और जन सामान्य के नकारात्मक स्पंदन हमें निरंतर परमात्मा से दूर करते हैं|
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हमें ढूँढ़ ढूँढ़ कर समान सकारात्मक विचार और स्पंदन के साधकों जिनका एक ही लक्ष्य है ....परमात्मा की प्राप्ति, का एक समूह बनाना चाहिए और उनके साथ सप्ताह में कम से कम एक दिन सामूहिक ध्यान साधना और सत्संग आयोजित करने चाहियें| वे एक ही गुरु-परम्परा के हों तो बहुत ही अच्छा| बड़े नगरों में ऐसे अनेक समूह हैं जिनके यहाँ सप्ताह में कम से कम एक बार तो सामूहिक ध्यान होता ही है| यदि ऐसे समूह न बना सकें तो प्रतिदिन किसी मंदिर में जाना चाहिए| यदि वहाँ भी सकारात्मकता न मिलती हो तो एकांतवास करें| नकारात्मक लोगों से मिलने से तो अच्छा है किसी से भी न मिलें|
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मिलना भी उसी से है जो हमारे लक्ष्य में सहायक हो, चाहे किसी से भी न मिलना पड़े, बात भी वही करनी है अन्यथा बिना बात किये रहें, भोजन भी वो ही करना है जो लक्ष्य में सहायक हो, अन्यथा बिना भोजन किये रहें, हर कार्य वो ही करना है जो हमें हमारे लक्ष्य की ओर ले जाता हो| किसी भी तरह का समझौता एक धोखा है| एक साधक के लिए सबसे बड़ा धोखा हमारी तथाकथित सामाजिकता है| मैं पुनश्चः कह रहा हूँ कि सबसे बड़ी बाधा हमारी तथाकथित सामाजिकता है| धन्य हैं वे परिवार जहाँ पति-पत्नी दोनों ही प्रभुप्रेमी हैं और जिनका एक ही लक्ष्य है ..... परमात्मा की प्राप्ति|
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हे परम ब्रह्म परमात्मा भगवान परम शिव, आपका विस्मरण एक क्षण के लिए भी ना हो| हमें अपने मायावी आवरण और विक्षेप से मुक्त करो| हमें निरंतर सत्संग प्राप्त हों, हम सदा आपकी ही चेतना में रहें|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ नवम्बर २०१६

जीवन का यह संध्याकाल है, पता नहीं कब हरी झंडी मिल जाए .....

जीवन के इस संध्याकाल में अब कहीं भी जाने की या चला कर किसी से भी मिलने की कोई कामना नहीं रही है | भगवान अपनी इच्छा से कहीं भी ले जाए या किसी से भी मिला दे, उसकी मर्जी, पर मेरी स्वयं की कोई इच्छा नहीं है | जीवन से पूर्ण संतुष्टि और ह्रदय में पूर्ण तृप्ति है, कोई असंतोष नहीं है |
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जहां तक आध्यात्म का सम्बन्ध है, कण मात्र भी कोई संदेह या शंका नहीं है| इस अति अल्प और अति सीमित बुद्धि में समा सकने योग्य गहन से गहन आध्यात्मिक रहस्य भी रहस्य नहीं रहे हैं| सब कुछ स्पष्ट है| परमात्मा की पूर्ण कृपा है| कहीं कोई कमी नहीं है| भगवान ने मुझे अपना निमित्त बनाया यह उनकी पूर्ण कृपा है| सारी साधना वे ही कर रहे हैं, साक्षी भी वे ही हैं, साध्य साधक और साधना भी वे ही हैं| मुझे करने योग्य कुछ भी नहीं है, सब कुछ वे ही कर रहे हैं|
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आप सब महान आत्माओं को नमन !
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!

कठोरतम ह्रदय में भी परम प्रेम के पुष्प पल्लवित होते हैं .....

कठोरतम ह्रदय में भी परम प्रेम के पुष्प पल्लवित होते हैं .....
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शुष्क से शुष्क मरूभूमि में और पथरीली चट्टान पर भी सुन्दर पुष्पों को उगते, खिलते और महकते हुए मैनें देखा है| गंदे पानी में भी अनायास गुलाब के फूलों को अपनी सुगंध बिखेरते हुए मैनें देखा है|

मेरी दृष्टी में हम सब के नीरस और अति कठोर ह्रदय की बंजर भूमि में भी भक्ति रुपी सुन्दर सुगन्धित पुष्प खिल रहे हैं और उनकी महक हमारे ह्रदय से सभी हृदयों में व्याप्त हो रही है|

ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!

अपनी आध्यात्मिक साधना के पथ पर हम निरंतर अग्रसर रहें ......

अपनी आध्यात्मिक साधना के पथ पर हम निरंतर अग्रसर रहें ......
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इस संसार में हमारे बारे में कोई क्या सोचता है और कौन क्या कहता है, इसकी परवाह न करते हुए निरंतर हम अपने पथ पर अग्रसर रहें, चलते रहें, चलते रहें, चलते रहें, चलते रहें, और कहीं पर भी न रुकें | अपनी विफलताओं व सफलताओं की ओर भी न देखें, वे एक अवसर के रूप में आई थीं, कुछ सिखाने के लिए, और कुछ भी उनका महत्त्व नहीं था | महत्व इस बात का भी नहीं है कि अपने साथ क्या हो रहा है, महत्व सिर्फ इस बात का है कि ये अनुभव हमें क्या सिखा रहे हैं और क्या बना रहे हैं | हर परिस्थिति कुछ ना कुछ सीखने का एक अवसर है | कौन क्या सोचता है या कहता है, यह उसकी समस्या है, हमारी नहीं | हमारा कार्य सिर्फ चलते रहना है क्योंकि ठहराव मृत्यु और चलते रहना ही जीवन है | इस यात्रा में वाहन यह देह पुरानी और जर्जर हो जायेगी तो दूसरी देह मिल जायेगी, पर अपनी यात्रा को मत रोकें, चलते रहें, चलते रहें, चलते रहें, तब तक चलते रहें, जब तक अपने लक्ष्य को न पा लें |
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अंशुमाली मार्तंड कमलिनीकुलवल्लभ भुवनभास्कर भगवान आदित्य जब चमकती हुई अपनी दिव्य आभा और प्रकाश के साथ अपने पथ पर अग्रसर होते हैं, तब मार्ग में कहीं भी किंचित भी तिमिर का कोई अवशेष उन्हें नहीं मिलता | उन्हें क्या इस बात की चिंता होती है कि मार्ग में क्या घटित हो रहा है ? निरंतर अग्रसर वे भगवान भुवन भास्कर आदित्य ही इस साधना पथ पर हमारे परम आदर्श हैं जो सदा प्रकाशमान और गतिशील हैं |
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वैसा ही एक आत्मसूर्य कूटस्थ है, जिसकी आभा निरंतर सदा हमारे समक्ष रहे, वास्तव में वह हम स्वयं ही हैं | उस ज्योतिषांज्योति आत्मज्योति के चैतन्य को निरंतर प्रज्ज्वलित रखें और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को उसी में विलीन कर दें | वह कूटस्थ ही परमशिव है, वही नारायण है, वही विष्णु है, वही परात्पर गुरु है और वही परमेष्ठी परब्रह्म हमारा वास्तविक अस्तित्व है |
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जो नारकीय जीवन हम जी रहे हैं उससे तो अच्छा है कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दें | या तो यह देह ही रहेगी या लक्ष्य की प्राप्ति ही होगी जो हमारे जीवन का सही और वास्तविक उद्देश्य है | भगवान हमें सदा सफलता दें |
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ॐ तत्सत् ! ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ !!
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कृपा शंकर
१० नवम्बर २०१७

Wednesday, 8 November 2017

सारे भौतिक प्रदूषणों का कारण मानसिक व वैचारिक प्रदूषण है ......

सारे भौतिक प्रदूषणों का कारण मानसिक व वैचारिक प्रदूषण है ......
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हमारा वैचारिक प्रदूषण ही सारे प्रदूषणों का कारण है | हमारे विचार, हमारा चिंतन, हमारी मानसिकता ही प्रदूषित हो गयी है, अतः प्रकृति हमारे से कुपित है | यही इस सभ्यता का सर्वनाश करेगा |
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हमारे विचार ही इस सृष्टि के समस्त घटनाक्रमों को संचालित कर रहे हैं | जैसा हम सोचते हैं, जैसे हमारे विचार हैं, वे ही घनीभूत होकर बाहर के विश्व में प्रकट हो रहे हैं |
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वास्तविक विकास आत्मिक विकास है | बड़ी बड़ी इमारतें और साफ़ सुथरी व चौड़ी सड़कें ही विकास की निशानी नहीं हैं | वास्तविक विकास है नागरिकों का चरित्र | वह शिक्षा अशिक्षा है जो व्यक्ति को चरित्रवान नहीं बनाती | हम दूसरों को ठगने, बेईमानी करने, व कामुकता का निरंतर चिंतन करते हैं, यह हमारा पतन है | यह भीतर का पतन ही बाहर परिलक्षित हो रहा है |
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!

दिल्ली का प्रदूषण .....

दिल्ली अब रहने योग्य नगर नहीं रहा है | पर जिनकी आजीविका वहीं है वे तो दिल्ली में ही रहेंगे | दिल्ली के चारों ओर नीम, पीपल, बड़ जैसे वातावरण को शुद्ध करने वाले वृक्षों की अति सघन वृक्षावली लगानी चाहिए | नगर के भीतर जहाँ भी संभव हो वहाँ नीम व पीपल जैसे वृक्षों को लगाना चाहिए | हर परिवार को अपने घरों में तुलसी के पौधे खूब लगाने चाहिएँ | निजी वाहनों का प्रयोग कम से कम हो और सार्वजनिक वाहनों का अधिक से अधिक | सरकारी भूमि पर जहाँ खूब दिखावटी दूब और सजावटी बगीचे लगे हैं, के स्थान पर वातावरण को शुद्ध करने वाले वृक्ष लगाए जाएँ | धीरे धीरे युक्लिप्टस और गुलमोहर जैसे वृक्षों को हटा दिया जाए, और उनके स्थान पर नीम के पेड़ लगाए जायें | मंत्रियों और सांसदों के घरों में पीपल और नीम के सारे पेड़ कटवा दिए गए थे, उन्हें बापस लगाया जाए | तभी दिल्ली प्रदूषण मुक्त होगी, अन्यथा दिल्ली में सारे वाहन बंद कर सिर्फ तांगे चलाने पड़ेंगे |

सदा सफल हनुमान ....

अब तक के सारे ज्ञात और अज्ञात इतिहास और साहित्य के सर्वाधिक और सदा सफल यदि कोई पात्र हैं तो वे हैं श्री हनुमान जी जिन्हें किसी भी काम में कभी भी कोई असफलता नहीं मिली| वे सदा सफल रहे| इतना ही नहीं उन्होंने अपने आराध्य देव भगवान श्रीराम के प्रति जितना प्रेम और सेवाभाव अपने निज जीवन में व्यक्त किया उतना अन्य कोई भी नहीं कर पाया|
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इसीलिये वे स्वयं सदा पूज्य हैं| भारत में सर्वाधिक मंदिर भी श्री हनुमान जी के ही हैं| उनके जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि हम भगवान से सदा निरंतर जुड़े रहें| वे स्वयं भी भगवान ही हैं| उनकी जय हो|
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मनोजवं मारुत तुल्यवेगं जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं |
वातात्मजमं वानर यूथ मुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥
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हनुमान जी के चरित्र में तीन गुण ऐसे हैं जिन का दस लाखवाँ भाग भी यदि किसी को उपलब्ध हो जाए तो वह भगवान श्री राम को पा सकता है| वे गुण हैं ----
(1) पूर्ण प्रेम|
(2) पूर्ण समर्पण|
(3) पूर्ण सेवा|
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हे हनुमान जी, आप हमारे रक्षक हैं| सब तरह के विक्षेप, आवरण व बाधाओं से हमारी रक्षा करो|
हमें अपनी परम प्रेम रूपा पूर्ण भक्ति दो| अन्य किसी भी तरह की कोई कामना और विकार हमारे में ना रहे|
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हमारे राष्ट्र की रक्षा करो| किसी भी तरह के असत्य और अन्धकार का अवशेष हमारे राष्ट्र में ना रहे| यह राष्ट्र पूर्णतः धर्मनिष्ठ और अखंड हो| यहाँ रामराज्य पुनश्चः स्थापित हो|
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हमारा अस्तित्व राममय हो| किसी भी तरह की पृथकता ना हो|
ना मैं रहूँ न कोई मेरापन रहे, सिर्फ तुम रहो और मेरे प्रभु श्री राम रहें|
श्री राम, राम, राम, राम, राम, राम ||
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कहइ रीछपति सुनु हनुमाना, का चुप साधी रहेहु बलवाना|
पवन तनय बल पवन समाना, बुद्धि बिबेक बिज्ञान निधाना |
कवन सो काज कठिन जग माहि, जो नहीं होय तात तुम पाहि ||
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* शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥1॥

भावार्थ:-शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजी से निरंतर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्य रूप में दिखने वाले, समस्त पापों को हरने वाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरोमणि राम कहलाने वाले जगदीश्वर की मैं वंदना करता हूँ॥1॥

* नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥2॥

भावार्थ:-हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अंतरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिए और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिए॥2॥

* अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥3॥

भावार्थ:-अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्य रूपी वन (को ध्वंस करने) के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान्‌जी को मैं प्रणाम करता हूँ॥3