Thursday, 22 May 2025

आत्मा की उन्नति के बिना समाज और राष्ट्र की उन्नति संभव नहीं है ....,

 आत्मा की उन्नति के बिना समाज और राष्ट्र की उन्नति संभव नहीं है ....,

.
हर मनुष्य की शाश्वत जिज्ञासा होती है सत्य को जानने की| सत्य है परमात्मा| जब हमें सत्य यानि परमात्मा का बोध नहीं होता और हम असत्य को अपना लेते हैं तब समाज और राष्ट्र का बहुत बड़ा अहित करते हैं| सत्य को जानने के लिए स्वाध्याय, उपासना, संस्कृति व स्वधर्म का ज्ञान आवश्यक है| माता-पिता, आचार्यों, बड़े-बूढ़ों, व समाज की सेवा भी सत्य के प्रेमी ही कर सकते हैं| समाज में माता-पिता का भी दायित्व होता है कि वे अपने बालकों को अच्छे से अच्छे संस्कार दें| देश की वास्तविक संपत्ति देश के सत्यनिष्ठ, कार्यकुशल व चरित्रवान नागरिक होते हैं| पर दुर्भाग्य से देश की शिक्षा व्यवस्था और कुछ सरकारी प्रावधान देश की अस्मिता को ही नष्ट कर रहे हैं| आशा है शासक वर्ग में सद्बुद्धि आएगी और दैवीय शक्तियाँ भारत की अस्मिता की रक्षा करेंगी| आशा अब दैवीय शक्तियों पर ही है|
ॐ तत्सत् !!
२२ मई २०२०

जापान जाने का अवसर मुझे अनेक बार मिला है ---

 २२ वर्ष पूर्व तक जापान जाने का अवसर मुझे अनेक बार मिला है। उन दिनों जापान में सबसे बड़ा भारतीय समुदाय 'कोबे' नगर में हुआ करता था। कोबे में व्यापारी और नौकरी करने वाले बहुत भारतीय रहते थे। कल प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के स्वागत में भारतीयों की जितनी बड़ी भीड़ थी, उससे लगा कि टोकियो और उसके आसपास भी बहुत बड़ी संख्या में भारतीय अब रहने लगे हैं।

भारतीयों के लिए जापान विश्व का सबसे मंहगा देश है।
वहाँ के लोगों की देशभक्ति और कानून के प्रति आस्था बहुत सराहनीय है। वहाँ पुलिस अपने आप को बेकार पाती है क्योंकि अपराध नहीं के बराबर होते हैं। सबसे बड़ा अपराध तो ड्रग्स का सेवन है जिसके लिए कोई क्षमा नहीं है।
और भी कई बाते हैं जिनको लिखूँगा तो मुझ पर 'सांप्रदायिक' होने का ठप्पा लग जाएगा। आप समझ गए होंगे।
.
पुनश्च :--- जापान का कोई शासक आज तक न तो किसी इस्लामी देश में गया है, और न ही किसी इस्लामी देश के शासक को अपने यहाँ बुलाया है। वहाँ इस्लामी शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध है। किसी भी इस्लामी देश के नागरिक को वहाँ का वीजा नहीं मिलता। पाकिस्तानियों को तो वे अपने यहाँ घुसने ही नहीं देते। जो पाकिस्तानी राजनयिक वहाँ रहते हैं, उन पर निगाह रखी जाती है।
२३ मई २०२२

अब तो भगवान से मिलना निश्चित है, वे अब और छिप नहीं सकते ---

 अब तो भगवान से मिलना निश्चित है, वे अब और छिप नहीं सकते ---

.
भगवान की बड़ी कृपा है कि वे स्वयं अपने स्वयं की उपासना कर रहे हैं। मेरी क्या औकात है उनका चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करने की? उनकी कृपा के बिना उनका नाम सोच भी नहीं सकता। अपनी परम कृपा कर वे मेरे कूटस्थ ऊर्ध्वमूल में शांभवी मुद्रा में बिराजमान हैं। केवल वे ही हैं, उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है।
.
जब तक भारत में १० भी ऐसे व्यक्ति हैं जो भगवान के साथ एक हैं, भारत कभी नष्ट नहीं हो सकता। उपासना द्वारा जागृत एक ब्रह्मशक्ति की आवश्यकता भारत को है। ब्रह्मशक्ति का प्राकट्य ही निश्चित रूप से धर्म की पुनर्स्थापना व वैश्वीकरण कर, चारों ओर छाये असत्य के अंधकार को नष्ट कर सकेगा। हमें आवश्यकता व्यावहारिक उपासना की है, बौद्धिक चर्चा की नहीं। अपना अधिकाधिक समय ध्यान द्वारा स्वयं में भगवान को व्यक्त करने में लगायें, तभी धर्म व राष्ट्र की रक्षा होगी। भगवान की चेतना स्वयं में निरंतर जागृत कर सभी में जागृत करें। यही सबसे बड़ी सेवा है जो हम समष्टि के लिए कर सकते हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! 🔥🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹🔥
कृपा शंकर
२३ मई २०२३

सर्वप्रथम आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति करो, फिर उस चेतना में ही बाकी जीवन व्यतीत करो

 

सर्वप्रथम आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति करो, फिर उस चेतना में ही बाकी जीवन व्यतीत करो
.
मनुष्य को अधिक से अधिक ३०-३५ वर्ष की आयु तक आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति कर लेनी चाहिए। फिर परमात्मा की चेतना में ही अवशिष्ट जीवन व्यतीत करना चाहिए। वे सब बहुत भाग्यशाली हैं, जो युवावस्था में ही आध्यात्म की ओर चल पड़ते हैं, व भगवत्-प्राप्ति कर लेते हैं। ३५ वर्ष की आयु के पश्चात परमात्मा को समर्पित होना असंभव सा है। पहले आत्म-साक्षात्कार करो, फिर समान विचारों के जीवन साथी के साथ घर-गृहस्थी बसाओ, नहीं तो विरक्त होकर अकेले ही रहो।
.
मैं बहुत देरी से इस क्षेत्र में आया था। स्वयं के व्यक्तित्व में साहस का अभाव, घर व समाज में मार्ग-दर्शन का अभाव, हर कदम पर विरोध, घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारियाँ और अनेक तरह के बहाने थे, जिन्होंने ईश्वर की ओर पूरी तरह से उन्मुख नहीं होने दिया।
मेरा जन्म एक ऐसे समाज में हुआ जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए ही संघर्ष कर रहा था। वैसे वातावरण में जहाँ सब ओर से विरोध हो, विरक्त होकर परमात्मा को समर्पित होना असंभव था।
.
बहुत कुछ प्राप्त किया लेकिन अब भी एक बहुत पतले धुएँ का सा आवरण मेरे और परमात्मा के बीच में है, जो दूर नहीं हो रहा है। वह इसी जन्म में दूर तो हो जाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है। परमात्मा के और मेरे मध्य में बस एक ही कदम की दूरी है।
.
हमारा सर्वप्रथम और सर्वोच्च लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति हो, फिर उस चेतना में बाकी जीवन जीना हो। मुझे कोई मुक्ति या मोक्ष नहीं चाहिए। यदि पुनर्जन्म हो तो जन्म से ही वैराग्य और परमात्मा से परमप्रेम हो। परमात्मा को तो आना ही पड़ेगा। वे भी हमारे बिना नहीं रह सकते।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मई २०२४

मनुष्य जीवन की एकमात्र समस्या और समाधान ..... .

मनुष्य जीवन की एकमात्र समस्या और समाधान .....

.
मनुष्य जीवन की प्रथम, अंतिम और एकमात्र समस्या है .... ईश्वर की प्राप्ति, और एकमात्र समाधान भी है .... ईश्वर की प्राप्ति| यह सृष्टि परमात्मा की रचना है जिसे चलाने में वह सक्षम है| उसे हमारे सुझावों की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम स्वयं भी उसी की रचना हैं| हरेक कार्य विधिवत रूप से कुछ नियमों के अंतर्गत होता है, जिन्हें न जानना ही हमारी अज्ञानता है| किसी नियम का उल्लंघन करने पर दंड तो हमें भुगतना ही पड़ता है| हमारा यह तर्क स्वीकार्य नहीं हो सकता कि हमें नियमों का ज्ञान नहीं था| कहीं न कहीं किसी आध्यात्मिक नियम का उल्लंघन करने से कष्ट और पीड़ा का सामना करना ही पड़ता है| यहीं से सभी तथाकथित समस्याएँ उत्पन्न होती हैं|
.
वास्तव में ये सब समस्याएँ हमारी नहीं बल्कि सृष्टिकर्ता परमात्मा की हैं| वही तो सब कुछ कर रहा है| जब हम कुछ करेंगे ही नहीं तो हम कैसे उत्तरदायी हो सकते हैं? हम ने तो कहा नहीं था कि हमें पृथक जीवन दो| जिसने यह जीवन दिया है और जो सब कुछ कर रहा है वही अपने कर्मफलों का भोगी है, हम नहीं| हम अहंकारवश स्वयं को कर्ता बना देते हैं बस यहीं से सब दु:ख, कष्ट और पीड़ाएँ आरम्भ होती हैं| कर्ता भी वह है और भोक्ता भी वह ही है|
.
अपना ध्यान निरंतर कूटस्थ पर रखो और परमात्मा के उपकरण बन जाओ| वह जब इस अनंत अन्धकार से घिरे घोर भवसागर में हमारा ध्रुव तारा ही नहीं, कर्णधार भी बन जाएगा तब हम भटकेंगे नहीं| प्रकृति की प्रत्येक शक्ति हमारे अनुकूल बन जायेगी| बस उसे और सिर्फ उसे अपनी जीवन नौका का कर्णधार बना लो|
.
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ मई २०१३

यह कठिन समय भी अब अति शीघ्र ही निकल जाएगा| ---

 यह कठिन समय भी अब अति शीघ्र ही निकल जाएगा| पहिले की लिखी हुई अपनी सारी नकारात्मक पोस्ट अब डिलीट कर रहा हूँ| उन क्षणों में मेरी सोच ही गलत हो गई थी| कोई भी नकारात्मक लेख कभी भी नहीं लिखने चाहियें, और नकारात्मक लिखने वाले दूसरे लोगों को भी अमित्र और ब्लॉक कर देना चाहिए|

.
चाहे सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाये, भगवान के भक्त का कुछ भी नहीं बिगड़ सकता, यह स्पष्ट आश्वासन भगवान ने स्वयं दे रखा है| सारे प्रारब्ध कर्मफल और बुरे से बुरे ग्रह-नक्षत्र भी हमारा कुछ भी नही नहीं बिगाड़ सकते, जब हमारे समर्पण में पूर्णता हो| भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....
.
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते| तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||९:२२||"
"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्||९:२७||
"शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः| संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि||९:२८||
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः| ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्||९:२९||"
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्| साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः||९:३०||"
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति| कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति||९:३१||"
"मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः| स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्||९:३२||"
"किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा| अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्||९:३३||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः||९:३४||"
.
अब बात भगवान की ही सुनेंगे, न कि परनिंदकों की|
भगवान श्रीराम ने स्पष्ट आश्वासन दे रखा है .....
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते| अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम|| वाल्मीकि रामायण ६:१८:३३||"
.
"एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः| दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय|| (महाभारत, शान्तिपर्व ४७/९२)"
.
भगवान हैं अतः हम निर्भय हैं| उनके होते हुए हमारा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता|
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ शिव !!
कृपा शंकर
२२ मई २०२०

परमात्मा की विस्मृति कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में अब और नहीं हो सकती, चाहे सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाये, और मृत्यु मेरे सामने खड़ी हो।

 परमात्मा की विस्मृति कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में अब और नहीं हो सकती, चाहे सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाये, और मृत्यु मेरे सामने खड़ी हो। उनको मैं कभी नहीं भूल सकता, जो मुझे एक निमित्त मात्र बना कर मेरा यह जीवन जी रहे हैं। यह जीवन उन्हीं का है, वे ही इसे जी रहे हैं, मैं नहीं। मैं सदा निर्भय, निश्चिंत और शांत हूँ।

.
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥९:२७॥"
"शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥९:२८॥"
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
"मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥९:३२॥"
"किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥९:३३॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
.
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥६:१८:३३॥" (वाल्मीकि रामायण)
.
"एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः।
दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय॥४७:९२॥" (महाभारत शान्तिपर्व)
.
भगवान हैं, इसी समय हैं, यहीं पर है, हर समय व हर स्थान पर वे मेरे साथ हैं। मैं भी हर समय उनके ही कूटस्थ हृदय में हूँ। कहीं कोई भेद नहीं है।
ॐ तत्सत् ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपा शंकर
२२ मई २०२१