Wednesday, 2 April 2025

ब्रह्म एक है, तो अपने संकल्प से अनेक कैसे हुआ? जीवात्मा, परमात्मा से भिन्न कैसे किस विधि से हुआ?

 (प्रश्न) ब्रह्म एक है, तो अपने संकल्प से अनेक कैसे हुआ? जीवात्मा, परमात्मा से भिन्न कैसे किस विधि से हुआ?

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(उत्तर) यह अगम्य विषय मेरी अत्यल्प व सीमित बुद्धि की समझ से परे का है, अतः कुछ भी नहीं कह सकता। लेकिन महात्माओं के मुख से सुना है कि कारण शरीर ही हमारे पुनर्जन्म, कर्मफलों की प्राप्ति, और सारे बंधनों का कारण है। इसीलिए उसे कारण शरीर कहते हैं। हमारा अंतःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार), सूक्ष्म शरीर का भाग है। हमारी सोच विचार और भाव हमारे कर्म हैं जिनका सारा हिसाब कारण शरीर में रहता है। बहुत गहरे ध्यान यानि समाधि की अवस्था में हमारा संबंध कारण शरीर से टूटता रहता है, और कारण शरीर का पतन ही मोक्ष है, क्योंकि तब बंधन का कोई कारण नहीं रहता।
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सत्य का ज्ञान तो हमें भगवान की परम कृपा से ही हो सकता है, तब तक यह अनुमान ही सत्य लगता है। इस भौतिक विश्व में हम इस भौतिक देह में व्यक्त है, और यह भौतिक देह ही हमारी यहाँ पहिचान है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३ अप्रेल २०२३

Tuesday, 1 April 2025

समस्त नवविवाहिता व कुआंरी कन्याओं को गणगौर पर्व की शुभ कामनाएँ|

 समस्त नवविवाहिता व कुआंरी कन्याओं को गणगौर पर्व की शुभ कामनाएँ|

यह पर्व बहुत धूमधाम से प्रायः सारे राजस्थान और हरियाणा व मालवा के कुछ भागों में आज चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जा रहा है| इस दिन नवविवाहिताएँ अपने वैवाहिक जीवन की सफलता, और कुंआरी कन्याएँ अच्छे पति की प्राप्ति के लिए गौरी (पार्वती) जी की आराधना करती हैं|
होली के दूसरे दिन से ही यह आराधना आरम्भ हो जाती है और चैत्र शुक्ल तृतीया तक चलती है|
राजस्थानी प्रवासी चाहे वे कहीं भी हों, इस पर्व को अवश्य मनाते हैं| कल द्वितीया के दिन सिंजारे थे| इस दिन कन्याओं व नव विवाहिताओं को उनके माता पिता व भाई खूब लाड करते हैं, उनकी मन पसंद मिठाइयाँ आदि देते हैं और उनकी हर इच्छा यथासंभव पूरी करते हैं|
आज सायं गणगौर की सवारी राजस्थान के प्रायः प्रत्येक नगर में बहुत धूमधाम से निकलेगी|
पुनश्चः समस्त मातृशक्ति को शुभ कामनाएँ|
२ अप्रैल २०१४

"रामनवमी" पर सभी का अभिनंदन, बधाई व शुभ कामनायें.

 "रामनवमी" पर सभी का अभिनंदन, बधाई व शुभ कामनायें.

भगवान श्रीराम का ध्यान, उपासना व निज जीवन में उनका अवतरण/प्राकट्य ही भारतवर्ष की रक्षा और सत्य सनातन धर्म का पुनरोत्थान व वेश्वीकरण कर सकेगा| हम सब के हृदय में भगवाम श्रीराम का निरंतर जन्म हो, हम सब उन के हनुमान बनें, तभी हम स्वयं की और समाज व राष्ट्र की रक्षा कर पायेंगे|
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पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड। चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड॥
आवत देखि सक्ति अति घोरा। प्रनतारति भंजन पन मोरा॥
तुरत बिभीषन पाछें मेला। सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला॥
लागि सक्ति मुरुछा कछु भई। प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई॥
देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो। गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो॥
रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे। तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे॥
सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए। एक एक के कोटिन्ह पाए॥
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो। अब तव कालु सीस पर नाच्यो॥
राम बिमुख सठ चहसि संपदा। अस कहि हनेसि माझ उर गदा॥
उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर्‌यो।
दस बदन सोनित स्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर्‌यो॥
द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै।
रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै॥
उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ। सो अब भिरत काल ज्यों श्री रघुबीर प्रभाउ॥
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रावण ने क्रोधित होकर प्रचण्ड शक्ति छोड़ी। वह विभीषण के सामने ऐसी चली जैसे काल (यमराज) का दण्ड हो॥
अत्यंत भयानक शक्ति को आती देख और यह विचार कर कि मेरा प्रण शरणागत के दुःख का नाश करना है, श्री रामजी ने तुरंत ही विभीषण को पीछे कर लिया और सामने होकर वह शक्ति स्वयं सह ली॥
शक्ति लगने से उन्हें कुछ मूर्छा हो गई। प्रभु ने तो यह लीला की, पर देवताओं को व्याकुलता हुई। प्रभु को श्रम (शारीरिक कष्ट) प्राप्त हुआ देखकर विभीषण क्रोधित हो हाथ में गदा लेकर दौड़े॥
(और बोले-) अरे अभागे! मूर्ख, नीच दुर्बुद्धि! तूने देवता, मनुष्य, मुनि, नाग सभी से विरोध किया। तूने आदर सहित शिवजी को सिर चढ़ाए। इसी से एक-एक के बदले में करोड़ों पाए॥
उसी कारण से अरे दुष्ट! तू अब तक बचा है, (किन्तु) अब काल तेरे सिर पर नाच रहा है। अरे मूर्ख! तू राम विमुख होकर सम्पत्ति (सुख) चाहता है? ऐसा कहकर विभीषण ने रावण की छाती के बीचों-बीच गदा मारी॥
बीच छाती में कठोर गदा की घोर और कठिन चोट लगते ही वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके दसों मुखों से रुधिर बहने लगा, वह अपने को फिर संभालकर क्रोध में भरा हुआ दौड़ा। दोनों अत्यंत बलवान्‌ योद्धा भिड़ गए और मल्लयुद्ध में एक-दूसरे के विरुद्ध होकर मारने लगे। श्री रघुवीर के बल से गर्वित विभीषण उसको (रावण जैसे जगद्विजयी योद्धा को) पासंग के बराबर भी नहीं समझते।
(शिवजी कहते हैं-) हे उमा! विभीषण क्या कभी रावण के सामने आँख उठाकर भी देख सकता था? परन्तु अब वही काल के समान उससे भिड़ रहा है। यह श्री रघुवीर का ही प्रभाव है॥)
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इस संसार में जैसी कुटिलता भरी पड़ी है, उस से मेरा मन भर गया है| अब यहाँ और रहने की इच्छा नहीं है, परमात्मा का साथ ही सर्वश्रेष्ठ है|
परमशिव का ध्यान ही हिमालय से भी बड़ी-बड़ी मेरी कमियों को दूर करेगा| मुझ अकिंचन में अदम्य भयहीन साहस व निरंतर अध्यवसाय की भावना शून्य है| मुझे लगता है कि आध्यात्म के नाम पर मैं अकर्मण्य बन गया हूँ और अपनी कमियों को बड़े बड़े सिद्धांतों के आवरण से ढक लिया है| शरणागति के भ्रम में अपने "अच्युत" स्वरूप को भूलकर "च्युत" हो गया हूँ| जैसा प्रमाद मुझ में छा गया है वह मेरे लिए मृत्यु है ... "प्रमादो वै मृत्युमहं ब्रवीमि"|
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हे परात्पर गुरु, आपके उपदेश मेरे जीवन में निरंतर परिलक्षित हों, आपकी पूर्णता और अनंतता ही मेरा जीवन हो, कहीं कोई भेद न हो| सब बंधनों व पाशों से मुझे मुक्त कर मेरी रक्षा करो| इन सब पाशों से मुझे इसी क्षण मुक्त करो| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ अप्रेल २०२०

हम लोग पश्चिमी प्रचार-तंत्र से प्रभावित हैं ---

 हम लोग पश्चिमी प्रचार-तंत्र से प्रभावित हैं। भारत की बिकी हुई टीवी समाचार मीडिया वही समाचार दिखा रही है, जैसा उसको अमेरिकी गुप्तचर संस्था CIA द्वारा निर्देशित किया जा रहा है। दो दिन पहले ही रूस ने घोषणा कर दी थी कि युद्ध का उसका पहला लक्ष्य पूरा हो गया है। अब दूसरा लक्ष्य भी वे शीघ्र ही प्राप्त कर लेंगे। कुछ महत्वपूर्ण बाते हैं ---

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(१) युद्ध के आरंभ होते ही उकराइन की वायुसेना और नौसेना को रूस ने पंगु कर के निष्क्रिय कर दिया था। आज तक उकराइन की वायुसेना के एक भी विमान ने युद्ध में भाग नहीं लिया है। इसी तरह उकराइन की नौसेना भी निष्क्रिय कर दी गई थी, और कुछ भी करने में असमर्थ है।
(२) उकराइन की ओर से लड़ने में वहाँ की नियमित थलसेना के वरिष्ठ अधिकारियों की कोई रुचि नहीं है। वे सब रूस द्वारा प्रशिक्षित हैं। उनको पता है कि वर्तमान युद्ध का एकमात्र कारण NATO द्वारा रूस की घेराबन्दी करने में उकराइन का दुरुपयोग है।
(३) उकराइन की ओर से -- अमेरिका द्वारा गठित नात्सी विचारधारा की अवैध "अजोव बटालियन", और विभिन्न देशों में NATO द्वारा प्रशिक्षित भाड़े के सिपाही और आतंकवादी लड़ रहे हैं। उकराइन अपने नागरिकों का ढाल की तरह उपयोग कर रहा है। उनकी महिलाओं और बच्चों को तो शरणार्थी बनाकर पोलेंड में भेज दिया गया है, और पुरुषों को सैनिक वेशभूषा पहिनाकर लड़ने को बाध्य किया जा रहा है।
(४) अजोव बटालियन की स्थापना उकराइनी सेना की एक नयी शाखा के तौर पर तब की गयी थी जब उकराइन के रूसी भाषियों का नरसंहार करने का निर्णय CIA, और उसके द्वारा अवैध तरीके से गठन की गई वर्तमान उकराइनी सरकार ने लिया। उकराइन की सेना एक professional army है, वह नरसंहार नहीं कर सकती। दूसरे देशों से CIA द्वारा प्रशिक्षित आतंकी गुण्डों को बुलाकर नयी बटालियनें बनायी गई थी, वे ही यूक्रेनी सेना के नाम पर लड़ रहे हैं।
(५) अजोव बटालियन ने रूसी भाषी जनसंख्या के दुधमुँहे बच्चों की सामूहिक हत्या की है जिसके प्रमाण रूस के पास हैं। उनमें से कई हत्यारों को पकड़ा गया है, और युद्ध समाप्त होते ही उन पर मुकदमा चलाया जाएगा।
(६) रूसी समाचार मीडिया पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगा दिया गया है। अतः उनका पक्ष कहीं भी नहीं सुना जाता।
(७) रूस ने अब तक क्यिव पर अधिकार करने का प्रयास ही नहीं किया। क्यिव के तीन ओर भयानक दलदल है, जिसे पार करने के पुल उकराइन ने उड़ा दिये थे। अब सिर्फ दक्षिण दिशा से ही क्यिव में प्रवेश किया जा सकता है, जहाँ रूसी सेना अभी तक गई ही नहीं है। एक रणनीति के अंतर्गत क्यिव के पास इरपिन नगर पर रूसी सेना ने अधिकार किया था जिससे लगे कि अगला लक्ष्य क्यिव है। अब अपनी रणनीति के अंतर्गत वहाँ से भी रूसी सेना पीछे हट गई है। उकराइन की सरकार यह झूठा प्रचार कर रही है कि उसकी सेना ने रूस को पीछे खदेड़ दिया है।
(८) अब रूस सिर्फ उन्हीं क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर रहा है जहाँ रूसी-भाषी बहुसंख्यक हैं। जहाँ जहाँ उकराइनी-भाषी बहुसंख्यक हैं, उन क्षेत्रों से रूस पीछे हट रहा है।
(९) अमेरिका झूठे प्रचार द्वारा स्केंडेनेवियन देशों को भी NATO में लाने का प्रयास कर रहा है।
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भारत को अमेरिकी डॉलर की गुलामी से मुक्त हो जाना चाहिए। भारत की राजनीति में और प्रशासन में बहुत सारे अमेरिका-भक्त बैठे हुए हैं जो ऐसा नहीं होने दे रहे हैं। रूस और चीन दोनों ही अमेरिकी डॉलर के विरुद्ध हैं।
इस युद्ध में अमेरिका व NATO के देश हारेंगे। अंततः रूस विजयी होगा। इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
२ अप्रेल २०२२

हमारा यह शरीर ही नहीं, यह समस्त सृष्टि --- ऊर्जा व प्राण का घनीभूत स्पंदन और प्रवाह है ---

हमारा यह शरीर ही नहीं, यह समस्त सृष्टि --- ऊर्जा व प्राण का घनीभूत स्पंदन और प्रवाह है, जिसके पीछे परमात्मा का एक विचार है। हम उस परमात्मा के साथ पुनश्च एक हों, यही इस जीवन का उद्देश्य है। एकमात्र शाश्वत उपलब्धि और महत्व -- कुछ बनने का है, पाने का नहीं। पूर्णतः समर्पित होकर हम अपने मूल स्त्रोत परमात्मा के साथ एक हों, यही शाश्वत उपलब्धि है, जिसका महत्व है। अन्य सब कुछ महत्वहीन और नश्वर है। आध्यात्मिक दृष्टी से हम क्या बनते हैं, महत्व इसी का है, कुछ प्राप्त करने का नहीं। परमात्मा को प्राप्त करने की कामना भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि परमात्मा तो पहले से ही प्राप्त है। अपने अहं को परमात्मा में पूर्णतः समर्पित करने की साधना निरंतर करते रहनी चाहिए। हमारा यह समर्पण हमें परमात्मा में मिलायेगा, कोई अन्य साधन नहीं।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२ अप्रेल २०२२

मनसा, वाचा, कर्मणा मैंने कभी किसी का कोई अहित किया हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ ---

मनसा, वाचा, कर्मणा मैंने कभी किसी का कोई अहित किया हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। जीवन के हर क्षेत्र में मैंने खूब मनमानी की है। प्राय सभी से मेरा व्यवहार बहुत ही गलत था। भगवान ने तो मुझे क्षमा कर दिया है, आप भी क्षमा कर दीजिए।
सारे संचित और प्रारब्ध कर्मफल भी एक न एक दिन कट ही जाएंगे।
महत्व वर्तमान क्षण का है। निमित्त मात्र रहते हुए भगवान को ही कर्ता बनाओ। जीवन में सब सही होगा। किसी भी तरह की किसी कामना या आकांक्षा का जन्म ही न हो।
जय सियाराम !!
ॐ ॐ ॐ !! २ अप्रेल २०२३

इस समय पूरे विश्व में ज्ञात-अज्ञात रूप से अच्छा-बुरा बहुत कुछ हो रहा है, और बहुत कुछ होने वाला है ---

इसकी झलक भी मुझे दिखाई दे रही है। अनेक नकारात्मक और सकारात्मक शक्तियाँ अपना प्रभाव दिखायेंगी। पूरी समष्टि के साथ हम एक हैं, कोई भी या कुछ भी हम से पृथक नहीं है। अगले तीन वर्षों में आप बहुत कुछ देखोगे, और बहुत कुछ सीखोगे। प्रकृति के निर्देशों का पालन करें जिनकी अब और उपेक्षा नहीं कर सकते।
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आज २१ मार्च को अपना सूर्य इस पृथ्वी की भूमध्य रेखा पर रहेगा, जिस कारण पूरी पृथ्वी पर महाबसंत विषुव (Equinox) होगा, यानि दिन और रात की अवधि लगभग बराबर रहेगी। पृथ्वी अपनी धुरी पर २३½° झुके हुए, सूर्य के चक्कर लगाती है, इस प्रकार वर्ष में एक बार पृथ्वी इस स्थिति में होती है जब वह सूर्य की ओर झुकी रहती है, व एक बार सूर्य से दूसरी ओर झुकी रहती है। वर्ष में दो बार ऐसी स्थिति आती है, जब पृथ्वी का झुकाव न सूर्य की ओर होता है, और न ही सूर्य से दूसरी ओर, बल्कि बीच में होता है। इस स्थिति को विषुव या Equinox कहा जाता है। इन दोनों तिथियों में दिन और रात की लंबाई लगभग बराबर होती है।
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पुराण पुरुष को नमन ---
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् - आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसार के परम आश्रय हैं। आप ही सब को जानने वाले, जानने योग्य और परमधाम हैं। हे अनन्तरूप ! आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।
आप वायु (अनाहतचक्र), यम (मूलाधारचक्र), अग्नि (मणिपुरचक्र), वरुण (स्वाधिष्ठानचक्र) , चन्द्रमा (विशुद्धिचक्र), प्रजापति (ब्रह्मा) (आज्ञाचक्र), और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी कारण) (सहस्त्रारचक्र) हैं; आपके लिए सहस्र बार नमस्कार, नमस्कार है, पुन: आपको बारम्बार नमस्कार, नमस्कार है॥
हे अनन्तसार्मथ्य वाले भगवन्! आपके लिए अग्रत: और पृष्ठत: नमस्कार है, हे सर्वात्मन्! आपको सब ओर से नमस्कार है। आप अमित विक्रमशाली हैं और आप सबको व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप सर्वरूप हैं॥
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सब का कल्याण हो, सब का जीवन कृतकृत्य और कृतार्थ हो।
कहीं कोई पृथकता का बोध न रहे। ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२१ मार्च २०२५