Tuesday, 4 November 2025

परमात्मा को अपनी पूर्ण निष्ठा से वचन दें कि हम उन्हें प्राप्त करना चाहते हैं ---

 परमात्मा को अपनी पूर्ण निष्ठा से वचन दें कि हम उन्हें प्राप्त करना चाहते हैं ---

हमारे जीवन का लक्ष्य भगवत्-प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार है। यदि सच में हम उन्हें प्राप्त करना चाहते हैं तो नित्य एक डायरी में लिखें कि हमने आज के दिन कितनी देर तक परमात्मा का ध्यान, जप और भजन आदि किया। हमारा आज का ध्यान बीते हुए कल से अधिक गहन और दीर्घ होना चाहिए।
यह एक प्रतिबद्धता है जो हमारे और परमात्मा के मध्य में है। यह हमारे श्रद्धा और विश्वास की परीक्षा है। हर महीने जांच करें कि हमने कितनी प्रगति की है। यदि हम नित्य नियमित साधना नहीं करते हैं तो आज से और इसी क्षण से आरंभ कर दीजिए। यदि हम नित्य साधना करते है तो उसकी गहनता और गुणवत्ता को बढ़ाने का प्रयास करते रहें। एक बात याद रखें कि हम भगवान को धोखा नहीं दे सकते, क्योंकि वे हमारे भीतर ही बिराजमान हैं।
मेरे इस लेख में कोई कमी कभी दिखायी देगी तो मैं उसका संशोधन करता रहूँगा। आप सभी महान आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२४ अक्तूबर २०२५

पूर्वाञ्चल के लोग छठ पूजा अवश्य मनाते हैं ---

छठ पूजा -- पहिले केवल पूर्वाञ्चल (बिहार, झारखंड, और पूर्वी उत्तर-प्रदेश) के लोगों के साथ ही पहिचानी जाती थी, अब पूरे भारत में इसे लोग जानते हैं। इसका कारण है कि पूर्वाञ्चल के लोग पूरे भारत में कार्यरत हैं। वे अपनी सांस्कृतिक पहिचान के प्रति पूर्ण सजग हैं। वे कहीं भी हों, छठ महापर्व को अवश्य मनाते हैं।

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पूर्वाञ्चल की अब और उपेक्षा नहीं कर सकते क्योंकि इस समय वहाँ पढ़ाई-लिखाई सबसे अधिक हो रही है, सबसे अधिक IAS और IPS का चयन, और IITs और IIMs में सबसे अधिक चयन पूर्वाञ्चली (विशेष रूप से बिहारी) नवयुवक/नवयुवतियों का हो रहा है। वहाँ के नवयुवक और नवयुवतियाँ खूब परिश्रम कर रहे हैं।
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वास्तव में अंग्रेजों के समय से ही बिहार को जान-बूझकर पिछड़ा हुआ रखा गया क्योंकि अंग्रेजों का सबसे अधिक विरोध वहाँ हुआ था। अंग्रेजों ने वहाँ जनरल जेम्स जॉर्जस्मिथ नील नाम के एक अति क्रूर और भयानक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी को नियुक्त किया था जिसका उद्देश्य ही वहाँ के लोगों की हत्या करना और गाँवों को जला कर नष्ट करना था। लेकिन सन १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतन्त्रता सेनानियों ने उसे लखनऊ व कानपुर में उलझा दिया और २५ सितंबर १८५७ को लखनऊ में उसे मार दिया। उसके व हेवलॉक और रोज जैसे क्रूर और भयानक जनरलों के सम्मान में अंग्रेजों ने अंडमान द्वीप समूह में कुछ द्वीपों के नाम रखे थे। उन नामों को वर्तमान केंद्र सरकार ने बदला है। इस नराधम नील और उसके साथी ब्रिटिश सैनिक अधिकारियों ने बिहार के सैंकड़ों गांवों को जला दिया और लाखों भारतियों की हत्या करवायी थी।
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आज़ादी के बाद भी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बिहार को जानबूझ कर पिछड़ा हुआ रखा ताकि वहाँ से सस्ते मजदूर भारत के अन्य भागों को मिल सकें। यदि सेठ डालमिया जी (मूल रूप से चिड़ावा, जिला झुंझुनूं निवासी) आबाद रहते तो बिहार आज महाराष्ट्र जितना उन्नत होता। उन्हें नेहरू ने झूठे मामलों में फंसा कर बर्बाद कर दिया क्योंकि वे स्वामी करपात्री जी के शिष्य और एक कट्टर हिन्दू थे। उनके सारे उद्योग-धंधे बिहार में थे, और वे पूरे बिहार और उड़ीसा का पूर्ण औद्योगीकरण करने की क्षमता रखते थे।
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बात छठपूजा से चली थी, जिसका समापन भी छठपूजा पर चर्चा से ही कर रहा हूँ जिसका समापन आज प्रातः सूर्य को अर्घ्य देकर हो गया है। मेरे अनेक परिचित और मित्र भारत के पूर्वाञ्चल में हैं। सभी श्रद्धालुओं को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
२८ अक्तूबर २०२५

आध्यात्मिक साधना द्वारा हमारे ऊपर परमात्मा की पूर्ण कृपा कैसे हो ? --

 आध्यात्मिक साधना द्वारा हमारे ऊपर परमात्मा की पूर्ण कृपा कैसे हो ? ---

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भक्ति, योग व तंत्र की साधनाओं में मूलाधार चक्र का जागृत होना बड़ा आवश्यक है। उसके बिना कोई प्रगति नहीं होती। मूलाधार चक्र के पूरी तरह जागृत हुए बिना ध्यान-साधना में तो बिल्कुल भी सफलता नहीं मिलती। मूलाधार चक्र के अधिपति श्रीगणेश जी हैं। उन्हीं की अनुकंपा से सारे विघ्न दूर होते हैं। इस विषय पर मार्गदर्शन अपनी अपनी गुरु-परंपरा से ही प्राप्त हो सकता है।
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हम स्वभावतः उसी मत या संप्रदाय की ओर आकृष्ट होते हैं, जिस के संस्कार हमारे में पूर्वजन्मों से होते हैं। लेकिन सत्य तो यह है कि वही मत, सिद्धान्त, और मान्यता सर्वश्रेष्ठ है, जो हमें शीघ्रातिशीघ्र ईश्वर की प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार करा दे। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है। जो हमारे में परमात्मा के प्रति परमप्रेम जागृत कर हमें सच्चिदानंदमय बना दे, वही मत सर्वश्रेष्ठ है। जो हमें ईश्वर से दूर ले जाये वह सिद्धान्त गलत है।
. अपनी आध्यात्मिक साधना का आरंभ मूलाधारचक्र में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से गणेश जी के ध्यान से आरंभ करें --
"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।"
उपरोक्त मंत्र का मूलाधारचक्र पर दिन में दो बार सायं और प्रातः १०८ बार जप इतना अधिक लाभदायक होगा, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
यदि श्रद्धा और विश्वास नहीं है, तो कोई साधना मत करें। बिना श्रद्धा और विश्वास से की गई कोई साधना सफल नहीं होती। साधनाकाल में अपनी चेतना को कूटस्थ में रखें।
पञ्चदेवोपासना का मैं पूर्ण समर्थक हूँ। हमारा मेरुदंड -- भगवान की वेदी है। वही हमारा मंदिर है। मेरुदंड के चक्रों में पंचदेवोपासना करें। फिर आज्ञाचक्र पर ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करें।
यदि आप द्विज हैं, यानि आपका उपनयन संस्कार हो चुका है तो सायं प्रातः संध्या करें, और सविता देव की भर्गः ज्योति का कूटस्थ में खूब ध्यान करें। निरंतर कूटस्थ-चैतन्य / ब्राह्मी-चेतना / कैवल्य में स्थित रहने का प्रयास करें। श्रीमद्भगवद्गीता का अर्थ अच्छी तरह समझते हुए कम से कम पाँच मंत्रों का नित्य स्वाध्याय करें। आप पर परमात्मा की पूर्ण कृपा होगी।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२९ अक्तूबर २०२५

हमारा जीवन अशांत क्यों है? ---

  (प्रश्न) : हमारा जीवन अशांत क्यों है?

(उत्तर) : जीवन में अशांति कोई रोग नहीं, रोग का एक लक्षण है। कहीं न कहीं हम कोई भूल कर रहे हैं। स्वयं के सच्चिदानंद रूप, यानि आत्म-तत्व की विस्मृति ही हमारी अशांति का एकमात्र कारण है। अन्य कोई कारण नहीं है। हम अपने परमशिव सच्चिदानंद रूप का ही निरंतर ध्यान करेंगे, तो जीवन में कोई अशांति नहीं होगी।
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ध्यान के जिस आसन पर मैं बैठा हूँ, वह मेरा सिंहासन है। जहाँ तक मेरी कल्पना जाती है, वह सब और उससे भी परे जो कुछ भी है, वह मैं स्वयं हूँ। मेरा अस्तित्व ही मेरा साम्राज्य है, जिसका मैं चक्रवर्ती सम्राट हूँ। सम्पूर्ण सृष्टि ही मैं हूँ, अतः कोई कामना नहीं है। मेरे भूत, भविष्य व वर्तमान के सारे पाप-पुण्य, और मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व -- परमात्मा को समर्पित है। मेरा जीवन शांत है। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० अक्तूबर २०२५

मेरी नौका के एकमात्र कर्णधार वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं, वे स्वयं ही यह नौका हैं, और वे ही यह "मैं" बन गए हैं ---

 मैं इस समय किनारे पर बैठा हुआ, आने वाले समय के लिए पूरी तरह तैयार हूँ। स्वयं को छोड़कर किसी भी अन्य पर कोई भरोसा नहीं रहा है। मेरी नौका के एकमात्र कर्णधार वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं, वे स्वयं ही यह नौका हैं, और वे ही यह "मैं" बन गए हैं। जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह भी वे ही हैं। अन्य सब मिथ्या है।

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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (गीता)
अर्थात् -- बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥
"अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥८:५॥"
अर्थात् -- और जो कोई पुरुष अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं॥
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
अर्थात् -- जो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है॥
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥८:२२॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है॥
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"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत: क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गोब्राह्मण हिताय च।
जगत् हिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
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"हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह।
एक पुरुष, भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह॥" (कामायनी)
(उस पुरुष की तरह मैं भी एक साक्षी की तरह इस संसार का अवलोकन कर चुका हूँ जो किसी प्रलय से कम नहीं है)
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हरि: ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३ नवंबर २०२५

७ नवंबर १९१७ से पेत्रोग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग ) में आरंभ हुई बोल्शेविक क्रांति को ७ नवंबर २०२५ को १०८ वर्ष हो जायेंगे ---

 ७ नवंबर १९१७ से पेत्रोग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग ) में आरंभ हुई बोल्शेविक क्रांति को ७ नवंबर २०२५ को १०८ वर्ष हो जायेंगे। यह विश्व की एक अत्यधिक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसके पश्चात मार्क्सवादी (साम्यवादी) शासनों की स्थापना का क्रम आरंभ हुआ। ५८ वर्ष पूर्व 7 नवंबर १९६७ को इस क्रांति की ५०वीं वर्षगांठ पर मैं रूस में मनाए जा रहे उत्सवों का साक्षी था।

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एक समय था जब मैं मार्क्सवाद से बहुत अधिक प्रभावित था। लेकिन अब बात दूसरी है। मैं इसे सर्वहारा की क्रांति ही नहीं मानता। इस ने विश्व में असत्य का अंधकार ही अंधकार बहुत अधिक फैलाया। अब निष्पक्ष दृष्टि से सोचता हूँ तो यह वोल्गा नदी में खड़े क्रूजर युद्धपोत 'अवरोरा' से आरंभ हुआ तत्कालीन परिस्थितियों में एक सैनिक विद्रोह था, जिसे जर्मनी की सहायता से लेनिन ने रूस में आकर बोल्शेविक क्रांति का रूप दे दिया। रूस का तत्कालीन शासक ज़ार निकोलस रोमानोव एक अक्षम और बहुत कमजोर भोला-भाला शासक था। उसके समय भ्रष्टाचार अपने चरम पर था। वह रूस की सेना के तोपखाने में एक कर्नल रह चुका था। शासक की योग्यता उसमें नहीं थी। अगर वह सक्षम होता तो बात दूसरी ही होती। उस समय रूस का पूरा शासक वर्ग ही भ्रष्ट था। मार्क्सवादी बोल्शेविक क्रांति के बारे में कुछ भी टिप्पणी करने से पूर्व तत्कालीन विकट परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। मेरे विचार से वह एक त्रासदी थी, कोई क्रांति नहीं।
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जो भी हुआ, मनुष्यता को उस अनुभव से निकलना था। इसी लिए मनुष्य रचित ये सारे वाद आये। इससे अधिक मैं नहीं लिखना चाहता।
कृपा शंकर
४ नवंबर २०२५

हृदय में परमात्मा से प्रेम के बिना हम सब एक नाक कटी हुई सुन्दर नारी की तरह हैं --- .

 हृदय में परमात्मा से प्रेम के बिना हम सब एक नाक कटी हुई सुन्दर नारी की तरह हैं ---

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मैं अपने विचारों पर दृढ़ हूँ। जो मेरे विचारों से सहमत नहीं हैं, वे मेरे मित्र-संकुल का त्याग कर सकते हैं। यह मेरे ऊपर उनका एक बहुत बड़ा उपकार होगा। मैं सिर्फ उन्हीं का साथ चाहता हूँ, जिनके हृदय में कूट कूट कर परमात्मा के प्रति अहैतुकी परमप्रेम भरा पड़ा हो, जो ईश्वर को उपलब्ध होना चाहते हों, और जिनके हृदय में भारतवर्ष व सनातन धर्म के प्रति पूर्ण प्रेम हो।
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मुट्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं। मोक्ष की हमें व्यक्तिगत रूप से कोई आवश्यकता नहीं है। आत्मा तो नित्य मुक्त है, बंधन केवल भ्रम मात्र हैं। जब धर्म और राष्ट्र की अस्मिता पर मर्मान्तक प्रहार हो रहे हैं, तब व्यक्तिगत मोक्ष और कल्याण की कामना धर्म नहीं हो सकती।
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सब ओर से निराश होकर बड़ी कठिनाई से हम परमात्मा के सम्मुख आ पाये हैं। इसे शरणागति मानकर उन्हें हमारा समर्पण स्वीकार करना ही होगा। कुछ करने की ऊर्जा भी नहीं रही है। अब तो स्वयं परमात्मा को हमारे हृदय-मंदिर में पधार कर अपना स्थायी डेरा डालना होगा। सारी प्रार्थनाएँ हम भूल गये हैं। अब कोई साधना नहीं होती। हम तो उनके उपकरण मात्र हैं, जिसे वे ही संभाल सकते हैं। हमारे वश में कुछ भी नहीं है। हृदय में परमात्मा से प्रेम के बिना हम सब एक नाक कटी हुई सुन्दर नारी की तरह हैं।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ नवंबर २०२५