Sunday, 21 September 2025

हरिःद्वार की यात्रा चल रही है। हरिःद्वार (कूटस्थ) और उसका मार्ग (सुषुम्ना में ब्रह्मनाड़ी) स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।

 

हरिःद्वार की यात्रा चल रही है। हरिःद्वार (कूटस्थ) और उसका मार्ग (सुषुम्ना में ब्रह्मनाड़ी) स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। हरिःद्वार के मार्ग का पक्का पता चलते ही घड़ी में समय देखना बंद कर देना चाहिए। सिर्फ श्रीहरिः की ओर ही देखो, घड़ी की ओर नहीं। श्रीहरिः की ओर देखते देखते, उसी की चेतना में चलते रहो, चलते रहो, और चलते रहो। अचानक ही एक दिन पाओगे कि हरिःद्वार तो बहुत पीछे छूट गया है, और हम श्रीहरिः के मध्य उनकी गोद में हैं। श्रीहरिः के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है।
दिन का आरंभ और समापन, हृदय के सम्पूर्ण प्रेम से हो। जीवन का हर क्षण उन्हें समर्पित हो।
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आध्यात्म में जो हमारे स्वभाव के अनुकूल है वही ठीक है। जो बात समझ में आये, उसे स्वीकार करें, जो समझ में न आये उसे छोड़ दें। समय नष्ट न करें, आगे बढ़ते रहें। किसी भी तरह की उलझन में न पड़ें। सारा मार्गदर्शन भगवान से प्राप्त होगा। किसी भी बात के लिए रुकें मत।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ सितंबर २०२३

हमारे पास ऐसा कौन सा सबसे अधिक कीमती धन है जिसे किसी भी परिस्थिति में खोना नहीं चाहिए ---

 हमारे पास ऐसा कौन सा सबसे अधिक कीमती धन है जिसे किसी भी परिस्थिति में खोना नहीं चाहिए ---

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सबसे बड़ा धन जो हमारे पास हो सकता है, वह है -- स्वयं में श्रद्धा और विश्वास। जीवन में निरंतर अनंत आनंदमय अवस्था ही भगवान का ध्यान है। आनंद भी ऐसा जो सचेतन, नित्य-नवीन, और शाश्वत हो। बिना श्रद्धा और विश्वास के हम न तो ध्यान कर सकते हैं, और न ही कोई आराधना। भगवान हमसे हमारा अंतःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) माँगते हैं, और कुछ भी नहीं। हमें उन से परमप्रेम होगा तभी हम उन्हें अपना अंतःकरण दे सकते हैं।
बिना श्रद्धा और विश्वास के हम भगवान को तो क्या, किसी को भी कुछ भी नहीं दे सकते।
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"भवानी शङ्करौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्॥" (रामचरितमानस)
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"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥४:३९॥
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४:४०॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥
श्रीमते रामचंद्राय नमः॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२१ सितंबर २०२३

पितृ पक्ष चल रहा है, पूरी श्रद्धा से अपने पित्तरों का श्राद्ध करें ---

 पितृ पक्ष चल रहा है, पूरी श्रद्धा से अपने पित्तरों का श्राद्ध करे। जिस परिवार में बड़े-बूढ़ों की सेवा नहीं होती, पित्तरों का अनुग्रह उस परिवार पर नहीं होता। पित्तरों के देवता भगवान अर्यमा हैं। गीता में भगवान कहते हैं --

"अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितृ़णामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥"
अर्थात् "मैं नागों में अनन्त (शेषनाग) हूँ और जल देवताओं में वरुण हूँ; मैं पितरों में अर्यमा हँ और नियमन करने वालों में यम हूँ॥"
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श्राद्ध शब्द 'श्रद्धा' से बना है। स्कंद पुराण का कथन है कि 'श्राद्ध' नाम इसलिए पड़ा है कि उस कृत्य में श्रद्धा मूल है। ॠग्वेद में श्रद्धा को 'देवत्व' नाम दिया गया है। मनु व याज्ञवल्क्य ऋषियों ने धर्मशास्त्र में नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहा कि श्राद्ध करने से कर्ता पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है, तथा पितर संतुष्ट रहते हैं जिससे श्राद्धकर्ता व उसके परिवार का कल्याण होता है। श्राद्ध महिमा में कहा गया है-
'आयु: पूजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च। प्रयच्छति तथा राज्यं पितर: श्राद्ध तर्पिता।।'
अर्थात - जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके पितर संतुष्ट होकर उन्हें आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं। हमारी संस्कृति में माता-पिता व गुरु को विशेष श्रद्धा व आदर दिया जाता है, उन्हें देवतुल्य माना जाता है। 'पितरं प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्वदेवता:' - अर्थात पितरों के प्रसन्न होने पर सारे ही देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
२१ सितम्बर २०२१

नेहरू-गांधी परिवार की अमर कहानी ---

 नेहरू-गांधी परिवार की अमर कहानी ---

अपनी पुस्तक "द नेहरू डायनेस्टी" में लेखक के.एन.राव लिखते हैं - ऐसा माना जाता है कि जवाहरलाल, मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे। मोतीलाल के पिता का नाम था गंगाधर। जवाहर लाल की पुत्री का नाम इन्दिरा प्रियदर्शिनी था, और पत्नी का नाम था कमला नेहरू, जिनकी मृत्यु स्विटजरलैण्ड में टीबी से हुई थी।
आनन्द भवन का असली नाम था "इशरत मंजिल" जिसके मालिक थे मुबारक अली। मुबारक अली बहुत बड़े वकील थे, जिनके यहाँ मोतीलाल नेहरू सहायक की नौकरी करते थे।
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फ़िरोज़ गांधी का असली नाम फिरोज खान था जो नवाब अली खान के बेटे थे। नवाब अली खान एक गुजराती व्यापारी थे, जो इलाहाबाद और प्रतापगढ़ जिलों के दारू के सबसे बड़े ठेकेदार थे, और जवाहर लाल के घर पर किराने का सारा सामान, दारू, और आवश्यकता का हर सामान पहुंचाते थे। डिलीवरी बॉय का काम फिरोज खान करते थे। नवाब अली खान की कब्र इलाहाबाद में है जहाँ श्रद्धा-सुमन कोई अर्पित नहीं करता। नवाब अली खान ने एक पारसी महिला से शादी की और उसे मुस्लिम बनाया। फ़िरोज इसी महिला की सन्तान थे, और उनकी मां का उपनाम था "घांदी" (गांधी नहीं)। घांदी नाम पारसियों में अक्सर पाया जाता था। एक झूठ हमें बताया जाता है कि राजीव गांधी पहले पारसी थे। एक भ्रम पैदा करने के लिये यह झूठ फैलाया गया था। इंदिरा प्रियदर्शिनी को शांति निकेतन में पढते वक्त ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने अनुचित व्यवहार के लिये निकाल बाहर किया था। एक तन्हा जवान लड़की जिसके पिता राजनीति में पूरी तरह से व्यस्त और मां लगभग मृत्यु शैया पर पडी़ हुई हों, थोड़ी सी सहानुभूति मात्र से क्यों ना पिघलेगी और विपरीत लिंग की ओर क्यों ना आकर्षित होगी? इसी बात का फ़ायदा फ़िरोज खान ने उठाया और इन्दिरा को बहला-फ़ुसला कर उसका धर्म परिवर्तन करवाकर लन्दन की एक मस्जिद में उससे शादी रचा ली। नाम रखा "मैमूना बेगम"। नेहरू को पता चला तो वे बहुत लाल-पीले हुए, लेकिन अब क्या किया जा सकता था? जब यह खबर मोहनदास करमचन्द गांधी को मिली तो उन्होंने ताबड़तोड़ नेहरू को बुलाकर समझाया, राजनैतिक छवि की खातिर फ़िरोज को मनाया कि वह अपना नाम गांधी रख लें। यह एक आसान काम था कि एक शपथ पत्र के जरिये, बजाय धर्म बदलने के सिर्फ़ नाम बदला जाये तो फ़िरोज खान (घांदी) बन गये फ़िरोज गांधी। विडम्बना यह है कि सत्य-सत्य का जाप करने वाले और "सत्य के साथ मेरे प्रयोग" लिखने वाले गांधी ने इस बात का उल्लेख कभी आज तक कहीं नहीं किया और वे महात्मा भी कहलाये। फिरोज खान और मेमुना बेगम को भारत बुलाकर जनता के सामने दिखावे के लिये एक बार पुनः वैदिक रीति से उनका विवाह करवाया गया, ताकि उनके खानदान की ऊंची नाक का भ्रम बना रहे।
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इस बारे में नेहरू के सेक्रेटरी एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक "रेमेनिसेन्सेस ऑफ़ नेहरू एज"(पृष्ट ९४ पैरा २) (अब भारत सरकार द्वारा प्रतिबन्धित) में लिखते हैं कि "पता नहीं क्यों नेहरू ने सन १९४२ में एक अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक विवाह को वैदिक रीति-रिवाजों से किये जाने को अनुमति दी, जबकि उस समय यह अवैधानिक था। कानूनी रूप से उसे "सिविल मैरिज" होना चाहिये था। यह तो एक स्थापित तथ्य है कि राजीव गांधी के जन्म के कुछ समय बाद इन्दिरा और फ़िरोज अलग हो गये थे, हालांकि तलाक नहीं हुआ था। फ़िरोज गांधी अक्सर नेहरू परिवार को पैसे मांगते हुए परेशान किया करते थे, और नेहरू की राजनैतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप तक करने लगे थे। तंग आकर नेहरू ने फ़िरोज का "तीन
मूर्ति भवन" मे आने- जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। मथाई लिखते हैं फ़िरोज की मृत्यु से नेहरू और इन्दिरा को बडी़ राहत मिली थी। १९६० में फ़िरोज गांधी की मृत्यु भी रहस्यमय हालत में हुई थी, जबकि वह दूसरी शादी रचाने की योजना बना चुके थे। अपुष्ट सूत्रों, कुछ खोजी पत्रकारों और इन्दिरा गांधी के फ़िरोज से अलगाव के कारण यह तथ्य भी स्थापित हुआ कि श्रीमती इन्दिरा गांधी (या श्रीमती फ़िरोज खान) का दूसरा बेटा अर्थात संजय गांधी, फ़िरोज की सन्तान नहीं था। संजय गांधी एक पारिवारिक मित्र मोहम्मद यूनुस का बेटा था। संजय गांधी का असली नाम दरअसल संजीव गांधी था, अपने बड़े भाई राजीव गांधी से मिलता जुलता। लेकिन संजय नाम रखने की नौबत इसलिये आई क्योंकि उसे लन्दन पुलिस ने इंग्लैण्ड में कार चोरी के आरोप में पकड़ लिया था और उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया था। ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन ने तब मदद करके संजीव गांधी का नाम बदल कर नया पासपोर्ट संजय गांधी के नाम से बनवाया था (इन्हीं कृष्ण मेनन साहब को भ्रष्टाचार के एक मामले में नेहरू और इन्दिरा ने बचाया था)। अब संयोग पर संयोग देखिये संजय गांधी का विवाह "मेनका आनन्द" से हुआ। कहां? मोहम्मद यूनुस के घर पर, है ना आश्चर्य की बात। मोहम्मद यूनुस की पुस्तक "पर्सन्स, पैशन्स एण्ड पोलिटिक्स" में बालक संजय का इस्लामी रीति- रिवाजों के मुताबिक खतना बताया गया है, हालांकि उसे "फ़िमोसिस" नामक बीमारी के कारण किया गया कृत्य बताया गया है, ताकि हम लोग (आम जनता) गाफ़िल रहें। मेनका जो कि एक सिख लडकी थी,संजय की रंगरेलियों की वजह से गर्भवती हो गईं थीं और फ़िर मेनका के पिता कर्नल आनन्द ने संजय को जान से मारने की धमकी दी थी, फ़िर उनकी शादी हुई और मेनका का नाम बदलकर "मानेका" किया गया, क्योंकि इन्दिरा गाधी को "मेनका" नाम पसन्द नहीं था। पसन्द तो मेनका, मोहम्मद यूनुस को भी नहीं थी क्योंकि उन्होंने एक मुस्लिम लडकी संजय के लिये देख रखी थी फ़िर भी मेनका कोई साधारण लडकी नहीं थीं, क्योंकि उस जमाने में उन्होंने बॉम्बे डाईंग के लिये सिर्फ़ एक तौलिये में विज्ञापन किया था। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि संजय गांधी अपनी मां को ब्लैकमेल करते थे, जिसके कारण उनके सभी बुरे कृत्यों पर इन्दिरा ने हमेशा परदा डाला और उसे अपनी मनमानी करने की छूट दी । ऐसा प्रतीत होता है कि शायद संजय गांधी को अपने असली पिता का नाम मालूम हो गया था और यही इन्दिरा की कमजोर नस थी। संजय की मौत के तत्काल बाद काफ़ी समय तक वे एक चाबियों का गुच्छा खोजती रहीं थी, जबकि मोहम्मद यूनुस संजय की लाश पर दहाडें मार कर रोने वाले एकमात्र बाहरी व्यक्ति थे। संजय गांधी के तीन अन्य मित्र कमलनाथ,अकबर अहमद डम्पी और विद्याचरण शुक्ल, ये चारों उन दिनों "चाण्डाल चौकडी" कहलाते थे। इनकी रंगरेलियों के किस्से तो बहुत मशहूर हो चुके हैं जैसे कि अंबिका सोनी और रुखसाना सुलताना (अभिनेत्री अमृता सिंह की मां) के साथ।
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राजीव गांधी ने, तूरिन (इटली) की महिला ऐंटोनिया माईनो से विवाह करने के लिये अपना 'तथाकथित' पारसी धर्म छोड़ कर कैथोलिक ईसाई धर्म अपना लिया था। राजीव गांधी बन गये थे रोबेर्तो और उनके दो बच्चे हुए जिसमें से लड़की का नाम था "बियेन्का" और लड़के का "रॉल"। बड़ी ही चालाकी से भारतीय जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिये राजीव-सोनिया का हिन्दू रीति-रिवाजों से पुनर्विवाह करवाया गया और बच्चों का नाम "बियेन्का" से बदलकर प्रियंका और "रॉल" से बदलकर राहुल कर दिया गया। बेचारी भोली-भाली आम जनता !
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प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने लंदन की एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में अपने-आप को पारसी की सन्तान बताया था, जबकि पारसियों से उनका कोई लेना-देना ही नहीं था, क्योंकि वे तो एक मुस्लिम की सन्तान थे जिसने नाम बदलकर पारसी उपनाम रख लिया था। हमें बताया गया है कि राजीव गांधी कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के स्नातक थे, यह अर्धसत्य है। ये तो सच है कि राजीव केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में मेकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे, लेकिन उन्हें वहां से बिना किसी डिग्री के निकलना पड़ा था,क्योंकि वे लगातार तीन साल फ़ेल हो गये थे। लगभग यही हाल ऐंटोनिया माईनो का था। हमें यही बताया गया है कि वे भी कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की स्नातक हैं। जबकि सच्चाई यह है कि सोनिया स्नातक हैं ही नहीं, वे कैम्ब्रिज में पढने जरूर गईं थीं लेकिन कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में नहीं । सोनिया गांधी कैम्ब्रिज में अंग्रेजी सीखने का एक कोर्स करने गई थी, ना कि विश्वविद्यालय में (यह बात हाल ही में लोकसभा सचिवालय द्वारा मांगी गई जानकारी के तहत खुद सोनिया गांधी ने मुहैया कराई है,उन्होंने बडे ही मासूम अंदाज में कहा कि उन्होंने कब यह दावा किया था कि वे कैम्ब्रिज की स्नातक हैं,अर्थात उनके चमचों ने यह बेपर की उडाई थी)। खोजी पत्रकार कहते हैं कि अंतोनियों मायनों वहाँ एक दारूखाने में शराब परोसने की काम करती थी जहां राजीव गांधी शराब पीने आते थे। पैसे खत्म हो जाने पर उधार की शराब खूब पी। अंतोनियों ने सारी उधार अपने साथ शादी की शर्त पर माफ कर दी। क्रूरता की हद तो यह थी कि राजीव का अन्तिम संस्कार हिन्दू रीति-रिवाजों के तहत किया गया,ना ही पारसी तरीके से ना ही मुस्लिम तरीके से। इसी नेहरू खानदान की भारत की जनता पूजा करती है, एक इटालियन महिला जिसकी एकमात्र योग्यता यह है कि वह इस खानदान की बहू है आज देश की सबसे बडी पार्टी की कर्ता-धर्ता है और "रॉल" को भारत का भविष्य बताया जा रहा है। मेनका गांधी को विपक्षी पार्टियों द्वारा हाथों-हाथ इसीलिये लिया था कि वे नेहरू खानदान की बहू हैं,इसलिये नहीं कि वे कोई समाजसेवी या प्राणियों पर दया रखने वाली हैं।और यदि कोई ऐंटोनिया माइनो की तुलना मदर टेरेसा या एनी बेसेण्ट से करता है तो उसकी बुद्धि पर तरस खाया जा सकता है और हिन्दुस्तान की बदकिस्मती पर सिर धुनना ही होगा।
आजकल रौल गांधी -- एक जनेऊधारी दत्तात्रेय-गौत्रीय कश्मीरी ब्राह्मण बन गए हैं। बियांका भी गले में जनेऊ डाल कर घूमती है। इस बढेरन ने भी अपने बेटे का नाम रखा है - रोहन राजीव गांधी। नेहरू-गांधी खानदान ज़िन्दाबाद। यहाँ सब गांधी ही पैदा होते हैं।

Saturday, 20 September 2025

जिनमें सत्यनिष्ठा नहीं है, मैं उनके किसी काम का नहीं हूँ, सिर्फ सत्यनिष्ठ साधक ही मुझसे सपर्क रखें ---

जिनमें सत्यनिष्ठा नहीं है, मैं उनके किसी काम का नहीं हूँ, सिर्फ सत्यनिष्ठ साधक ही मुझसे सपर्क रखें। अन्य सब मुझे विष की तरह त्याग दें।

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मैं कृपा शंकर नाम का व्यक्ति नहीं, भगवान को पाने की अभीप्सा की वह दाहक अग्नि हूँ जो तब तक आपको बेचैन रखेगी जब तक आप भगवान को उपलब्ध नहीं हो जाओगे। जब आप परमात्मा को उपलब्ध हो जाओगे तब मुझे आनंद रूप में स्वयं के भीतर ही पाओगे। यह शरीर तो एक दिन भस्म होकर अनंत में विलीन हो जाएगा, लेकिन मैं एक शाश्वत आत्मा हूँ जो अपने प्रभु के साथ एक होकर सदा रहूँगा।
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हमें भगवान की प्राप्ति नहीं होती, इसका एकमात्र कारण सत्यनिष्ठा का अभाव है। अन्य कोई कारण नहीं है। हम झूठ बोल रहे हैं। हमने भगवान को कभी चाहा ही नहीं। भगवान सत्यनारायण हैं। वे ही एकमात्र सत्य हैं। यदि इसी जीवन में भगवत्-प्राप्ति करनी है तो अभी से यथासंभव अधिकतम समय भगवान के स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान में बिताएँ।
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आने वाले अगले कुछ महीने आध्यात्मिक साधना के लिए अति श्रेष्ठ हैं। यदि आप श्रद्धालु निष्ठावान हैं तो आपको इसी जीवन में भगवान की प्राप्ति निश्चित रूप से होगी। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का यह स्पष्ट संदेश है --
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् - मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥
श्रीमते रामचंद्राय नमः॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२० सितंबर २०२३

आज का दिन बड़ा शुभ है, जीवन का हर पल शुभ है, शुभ ही शुभ है, और शुभ ही शुभ रहेगा ---

कल रात्री को परमात्मा की गहनतम चेतना में सोया, पूरी रात परमात्मा की गहनात्म चेतना में ही विश्राम किया। आज प्रातः जगन्माता की गोद से वैसे ही उठा जैसे एक शिशु अपनी माँ की गोद से सोकर उठता है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार -- सब में परमात्मा ही परमात्मा भरे पड़े है, और कुछ भी नहीं है। इस जीवन के अंत काल तक परमात्मा ही रहेंगे और पुनर्जन्म के समय भी केवल परमात्मा ही रहेंगे।

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जिनको सिर्फ ईश्वर से प्रेम हैं, केवल उन्हीं का स्वागत है। भगवान ने मुझे ठीक ही बोध कराया था कि कोई दो लाख लोगों में से एक के ही हृदय में भगवान की भक्ति होती है।
ॐ नमः शिवाय॥
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
कृपा शंकर
२० सितंबर २०२४

बिना मांगी चार सलाह वृद्धावस्था के लिये ---

"दुनिया भी अजब सराय-ए-फ़ानी देखी, हर चीज़ यहाँ की आनी-जानी देखी।

जो आके न जाये वो बुढ़ापा देखा, जो जाके न आये वो जवानी देखी ॥" (फ़ानी)

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इसीलिए बिना मांगी ४ सलाह दे रहा हूँ। किसी को अच्छी लगे तो ठीक, और न लगे तो भी ठीक ---
(१) अब से न तो कोई ऐसा चिंतन करना है, और न कोई ऐसा कार्य करना है जो निज चेतना को ईश्वर से विपरीत दिशा में कर दे। हर समय सतर्क और ईश्वर की चेतना में रहना है।
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(२) जहाँ जो और जितना पूछा जाये, बस उतनी ही सलाह दीजिये। बाकी मौन रहिये। नयी पीढ़ी को बड़े-बूढ़ों की सलाह अच्छी नहीं लगती है।
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(३) जो कुछ भी हो रहा है, उसे होने दीजिए। साक्षी भाव में रहें, और हर समय प्रसन्न रहें। कभी कुछ लेने की जिद्द न करें। जो मिल जाये सो ठीक, और जो न मिले वह भी ठीक।
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(४) परिवार में सभी की यथासंभव सहायता कीजिए। अपना काम स्वयं करें। हर समय मुस्कराते रहें। वृद्धावस्था में बस इतना ही पर्याप्त है। और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२० सितंबर २०२४