Thursday, 17 April 2025

ईश्वर की प्राप्ति मेरा धंधा (व्यवसाय) है ---

 ईश्वर की प्राप्ति मेरा धंधा (व्यवसाय) है। इस व्यवसाय में कुछ मिलता नहीं है, जो कुछ भी पास में है, वह भी छीन लिया जाता है। इस धंधे में जो पड़ गया उससे कुछ भी अपेक्षा करना बेकार है।

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ईश्वर बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं। वे अपने प्रेमी से शत-प्रतिशत समर्पण मांगते हैं, उससे कम कुछ भी नहीं। अपने से पृथक कुछ भी चिंतन को श्रीमद्भगवद्गीता में उन्होंने व्यभिचार की संज्ञा दी है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिर्व्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- "अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
(Unswerving devotion to Me, by concentration on Me and Me alone, a love for solitude, indifference to social life;)
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भगवान क्या कहते हैं, इसे समझने के लिए इससे पूर्व के तीन श्लोकों को समझना भी अनिवार्य है ---
"अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥१३:८॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥१३:९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"आसक्तिर्णभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१३:१०॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- "अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम॥"
Humility, sincerity, harmlessness, forgiveness, rectitude, service of the Master, purity, steadfastness, self-control;
"इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन...৷৷"
Renunciation of the delights of sense, absence of pride, right understanding of the painful problem of birth and death, of age and sickness;
"आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता॥"
Indifference, non-attachment to sex, progeny or home, equanimity in good fortune and in bad;
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महाभारत के अनुशासन-पर्व के १५वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने महाराजा युधिष्ठिर को महर्षि तंडी कृत शिव-सहस्त्रनाम का उपदेश दिया है, उसमें भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उल्लेख किया है। यह उपदेश भगवान श्रीकृष्ण को महर्षि उपमन्यु से मिला था।
यहाँ केवल श्रीमद्भगवद्गीता की ही चर्चा करेंगे
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परमात्मा का आकर्षण बड़ा प्रबल है। बुद्धि इसे नहीं समझ सकती। उनकी अनुभूति इतनी दिव्य है कि उसकी तुलना नहीं की जा सकती। यह अनुभूति का विषय है, बुद्धि का नहीं; अतः इस पर चर्चा केवल मुमुक्षुओं से ही की जा सकती है। जिज्ञासु जन इस विषय का व्यावहारिक अनुसंधान करें। जो सिर्फ बुद्धि द्वारा ही समझना चाहते हैं, उन्हें भी बौद्धिक संतुष्टि तो मिलेगी ही। इस विषय को विस्तार से समझने के लिए शंकर भाष्य और अन्य भी दो-तीन भाष्यों का स्वाध्याय करें व भगवान से प्रार्थना और उन का ध्यान करें। हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ अप्रेल २०२५

Wednesday, 16 April 2025

हम शक्तिशाली होंगे तो हमारा सर्वत्र सम्मान होगा ----

हम शक्तिशाली होंगे तो हमारा सर्वत्र सम्मान होगा, डरपोक और डब्बू होंगे तो हर जगह सिर्फ मार खाएँगे, जिस तरह इस समय खा रहे हैं।

हिंदुओं को हर तरह की क्लीवता (नपुंसकता) को छोड़कर स्वयं अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण बनना पड़ेगा। दूसरों पर दोषारोपण कर के स्वयं के दब्बूपन, डरपोक होने, और कमजोरी को छिपाने से काम नहीं चलेगा। गीता में भगवान का आदेश है ---
"क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥२:३॥"
अर्थात् - हे पृथानन्दन अर्जुन ! इस नपुंसकता को मत प्राप्त हो; क्योंकि तुम्हारे में यह उचित नहीं है। हे परंतप ! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता का त्याग कर के युद्ध के लिये खड़े हो जाओ।
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अब कोई सिद्धांत या विचारधारा मुझे प्रभावित नहीं करती, क्योंकि मेरा लक्ष्य परमात्मा है; कोई सिद्धान्त या विचारधारा नहीं। सिर्फ सनातन धर्म ही ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताता है। अन्य सब पंथ भटकाव हैं। मेरा मार्ग स्पष्ट है, किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१७ अप्रेल २०२३

Tuesday, 15 April 2025

हमारी कोई भी बुराई हो, वह निज प्रयासों से कभी दूर नहीं होती, चाहे कितना भी हम प्रयास करें ---

 हमारी कोई भी बुराई हो, वह निज प्रयासों से कभी दूर नहीं होती, चाहे कितना भी हम प्रयास करें| इसके लिए भगवान का अनुग्रह चाहिए| वे तो इन सब से ऊपर उठने का उपदेश देते हैं, और मार्ग भी बताते हैं| सारी बुराइयाँ और अच्छाइयाँ हमारे अवचेतन मन में अनेक जन्मों के संस्कारों के रूप में छिपी होती हैं जो अवसर मिलते ही प्रकट हो जाती हैं| भगवान की परम कृपा का पात्र हमें बनना होगा जिसके लिए चाहिए ..... परमप्रेम, अभीप्सा और समर्पण|

गीता के अध्याय १८ "मोक्ष-सन्यास योग" का स्वाध्याय एक बार अवश्य करें|
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ अप्रेल २०२०

जब परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगे, तब सब नियमों से स्वयं को मुक्त कर परमात्मा का ही चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करना चाहिए।

हम नित्यमुक्त हैं। जब परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगे, तब सब नियमों से स्वयं को मुक्त कर परमात्मा का ही चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करना चाहिए।

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जब से सृष्टि की रचना हुई है, तब से इस वर्तमान क्षण तक, इतना मधुर और शुभ समय कभी भी नहीं आया। हर क्षण हम सृष्टिकर्ता परमात्मा के साथ एक हैं। चारों ओर आनंद ही आनंद है। हमारी चेतना हर समय पूरी सृष्टि के साथ एक है। पूरी सृष्टि भगवान का ध्यान कर रही है। मैं सारी सृष्टि में हूँ, और सारी सृष्टि मुझ में है। हे सच्चिदानंद परमशिव, तुम कितने सुंदर हो !!
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अब स्वाध्याय और बाहरी सत्संग छूट गया है। इनका कोई महत्व नहीं रहा है, क्योंकि निरंतर परमात्मा से सत्संग हो रहा है। अब परमात्मा के ही चिंतन, मनन, निदिध्यासन, प्राणायाम, ध्यान और समाधि में ही मन लगता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हठयोग के कुछ व्यायाम भी करने चाहियें। मैं मुक्त हूँ, किसी नियम से नहीं बंधा हूँ; मेरे लिए कोई नियम नहीं है। इस सृष्टि में कुछ भी निराकार नहीं है। जिसकी भी सृष्टि हुई है, वह साकार है। भगवान के साकार रूप ही मेरे चैतन्य में रहते हैं। यह जीवन अपने अंतिम क्षण तक साकार परमात्मा का ध्यान करते करते ही व्यतीत हो जायेगा।
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जब परमात्मा की अनुभूति होने लगे, तब परमात्मा का ध्यान ही करना चाहिए। पुस्तकों का अध्ययन और बाहरी सत्संग कभी कभी ही आवश्यक है, सदा नहीं। निरंतर परमात्मा का ही सत्संग हो। ज्ञान का स्त्रोत परमात्मा हैं, पुस्तकें नहीं। अगर आप कहीं जा रहे हैं और आप का लक्ष्य आप को दिखाई देना आरंभ हो जाये तो आपको "मार्ग-निर्देशिका" की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर आपका दृष्टि-पथ आपके लक्ष्य की ओर ही हो जाता है। फिर अपने लक्ष्य को व अपने पथ को ही निहारिये, अन्यत्र कहीं भी नहीं। हमारी प्रथम, अंतिम, और एकमात्र आवश्यकता -- परमात्मा है। वे मिल गए तो सब कुछ मिल गया, और जीवन तृप्त हो गया।
परमात्मरूप आप सभी को नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ अप्रेल २०२३ . पुनश्च: --- पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध की अंधकारमय रात्री में यदि कोई मुझसे पूछे कि ध्रुवतारा कहाँ है, तो मैं उसे अपनी अंगुली का संकेत कर के ध्रुव तारा और सप्तऋषिमण्डल दिखा दूंगा| एक बार उसने देख लिया और ध्रुवतारे की पहिचान कर ली तो फिर मेरी अंगुली का कोई महत्व नहीं है| यदि मैं यह अपेक्षा करूँ कि वह मेरे अंगुली का भी सदा सम्मान करे तो यह मेरी मूर्खता होगी| उत्तरी गोलार्ध की बात मैंने इस लिए की है क्योंकि ध्रुवतारा और सप्तऋषिमण्डल इस पृथ्वी पर भूमध्य रेखा के उत्तर से ही दिखाई देते हैं, दक्षिण से नहीं| जितना उत्तर में जाओगे उतना ही स्पष्ट यह दिखाई देने लगेगा| भूमध्य रेखा के दक्षिण से ध्रुव तारे व सप्तऋषिमण्डल को नहीं देख सकते|

जहाँ तक ईरान-इज़राइल युद्ध की बात है, इसमें नया कुछ भी नहीं है ---

 जहाँ तक ईरान-इज़राइल युद्ध की बात है, इसमें नया कुछ भी नहीं है। इस युद्ध की घोषणा तो ४५ वरसों पूर्व सन १९७९ में ईरान में इस्लामिक क्रांति के पश्चात सत्ता में आते ही ईरान के तत्कालिक मुल्ला-मौलवी शासकों ने कर दी थी। मैं उन दिनों बीबीसी लंदन से समाचार सुना करता था। यह बीबीसी के समाचारों में ही था कि सत्ता में आते ही ईरान के तत्कालीन शासनाध्यक्ष ने घोषणा की थी कि एक दिन वे इज़राइल को लाल-सागर में दफन कर देंगे।

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हालांकि यहूदीयत, ईसाईयत, और इस्लाम --- तीनों मज़हबों का आरंभ हज़रत इब्राहिम (Prophet Abraham) अलैहिस्सलाम से हुआ है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बड़े बेटे हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम के खानदान में हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हुए जिनसे इस्लाम की शुरुआत हुई। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के छोटे बेटे हज़रत इसाक अलैहिस्सलाम से यहूदी मज़हब चला। उन्हीं के खानदान में जन्म लिए हज़रत ईसा ने ईसाई मज़हब चलाया।
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जैसे एक ही खानदान के लोगों में दुश्मनी हो जाती है, वैसे ही यहूदियों और मुसलमानों में शुरू से ही खानदानी दुश्मनी है। इस विषय पर अधिक लिखना उचित नहीं है। जिन को रुचि है वे इंटरनेट से विकिपीडिया पर जाकर पढ़ सकते हैं।
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इज़राइल को जन्म देने के लिए ही इंग्लैंड ने प्रथम विश्व युद्ध में अपने मित्र देशों की सहायता से सल्तनत-ए-उस्मानिया को हराया और उस उस्मानिया सल्तनत के चालीस टुकड़े कर के चालीस नए देश बना दिये, जिन में इज़राइल भी है। उस्मानिया-सल्तनत के अंतिम वर्षों के इतिहास को पढे बिना इस विषय को समझना कठिन है।
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पुनश्च: --- सल्तनत-ए-उस्मानिया के प्रमुख को खलीफा कहते थे। सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) के ३६ वें खलीफा सुल्तान महमूद (छठा) वहिदेद्दीन को कमाल अतातुर्क ने अपदस्थ कर के तुर्की से इटली और फिर फ्रांस भगा दिया था। उसका बेटा अब्दुल मजीद (द्वितीय) २३ अगस्त १९४४ को पेरिस में निर्वासित जीवन जीता हुआ मर गया| भारत में महात्मा गांधी ने इसी अब्दुल मजीद को बापस तुर्की की राजगद्दी दिलाने के किए खिलाफत आंदोलन शुरू किया था जिससे बहुत अधिक हानि हुई| पाकिस्तान की नींव भी इसी आंदोलन से पड़ी। और भी कई बातें हैं जिन्हें पूर्व में लिख चुका हूँ। और अधिक लिखने का अब धैर्य नहीं है।
कृपा शंकर
१६ अप्रेल २०२४

Monday, 14 April 2025

हम इस संसार की मानसिक दासता से मुक्त हों ---

हम इस संसार की मानसिक दासता से मुक्त हों ---
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संसार की मानसिक दासता -- एक बड़ी दुःखद स्थिति है, जिसका एकमात्र कारण हमारा राग-द्वेष और अहंकार रूपी मोहकलिल (मोह रूपी कीचड़) है। राग-द्वेष और अहंकार से मुक्ति -- वीतरागता है। वीतराग व्यक्ति किसी का दास नहीं हो सकता, क्योंकि वह मोहात्मक अविवेक कालिमा का उल्लंघन कर चुका है। वीतराग व्यक्ति ही निःस्पृह और स्थितप्रज्ञ हो सकता है। गीता में भगवान हमें स्थितप्रज्ञ होने का उपदेश देते हैं। इसके लिए स्वाध्याय और साधना करनी पड़ेगी। शास्त्रों के सिर्फ स्वाध्याय (अध्ययन), और प्रवचन सुनने मात्र से परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। साधना (उपासना) अपरिहार्य है।
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भगवान कहते हैं --
"यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥२:५२॥"
"श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥२:५३॥"
अर्थात् - जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूप दलदल (कलिल) को तर जायेगी तब तुम उन सब वस्तुओं से निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त हो जाओगे? जो सुनने योग्य और सुनी हुई हैं॥ ॥२:५२॥
जब अनेक प्रकार के विषयों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि आत्मस्वरूप में अचल और स्थिर हो जायेगी तब तुम (परमार्थ) योग को प्राप्त करोगे॥ ॥२:५३॥
When thy reason has crossed the entanglements of illusion, then shalt thou become indifferent both to the philosophies thou hast heard and to those thou mayest yet hear. ॥२:५२॥
When the intellect, bewildered by the multiplicity of holy scripts, stands unperturbed in blissful contemplation of the Infinite, then hast thou attained Spirituality. ॥२:५३॥
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अर्जुन पूछते हैं --
"स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥२:५४॥"
अर्जुन ने कहा -- हे केशव समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले पुरुष का क्या लक्षण है? स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ॥२:५४॥
Arjuna asked: My Lord! How can we recognize the saint who has attained Pure Intellect, reached this state of Bliss, and whose mind is steady? how does he talk, how does he live, and how does he act? ॥२:५४॥
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भगवान कहते है --
"प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥२:५५॥"
"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥२:५६॥"
"यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२:५७॥"
"यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२:५८॥"
"विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥२:५९॥"
अर्थात् -- श्रीभगवान् ने कहा -- हे पार्थ? जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है? उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है॥ ॥२:५५॥
दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है। जिसके मन से राग भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है॥ ॥२:५६॥
सब जगह आसक्तिरहित हुआ जो मनुष्य शुभ-अशुभको प्राप्त करके न तो अभिनन्दित होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है॥ ॥२:५७॥
जिस तरह कछुआ अपने अङ्गों को सब ओर से समेट लेता है, ऐसे ही जिस काल में यह कर्मयोगी इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है। ॥२:५८॥
निराहारी देही पुरुष से विषय तो निवृत्त (दूर) हो जाते हैं? परन्तु (उनके प्रति) राग नहीं परम तत्व को देखने पर इस (पुरुष) का राग भी निवृत्त हो जाता है। (२:५९)
Lord Shri Krishna replied: When a man has given up the desires of his heart and is satisfied with the Self alone, be sure that he has reached the highest state. ॥२:५५॥
The sage, whose mind is unruffled in suffering, whose desire is not roused by enjoyment, who is without attachment, anger, or fear - take him to be one who stands at that lofty level. ॥२:५६॥
He who wherever he goes is attached to no person and to no place by ties of flesh; who accepts good and evil alike, neither welcoming the one nor shrinking from the other - take him to be one who is merged in the Infinite. ॥२:५७॥
He who can withdraw his senses from the attraction of their objects, as the tortoise draws his limbs within its shell - take it that such a one has attained Perfection. ॥२:५८॥
The objects of sense turn from him who is abstemious. Even the relish for them is lost in him who has seen the Truth. ॥२:५९॥
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आजकल भगवान का खूब अनुग्रह मुझ पर है। प्रातः उठते ही वे मुझे पकड़ लेते हैं, और दिन भर छोड़ते नहीं हैं। अपनी स्मृति में भी हर समय रखते हैं। उनके हृदय में झांक कर देखता हूँ, तो स्वयं को ही वहाँ पाता हूँ। यह उनकी विशेष कृपा है। मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व उन को समर्पित है।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर

१५ अप्रेल २०२३ 

पशु बली ---

 पशु बली ---

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बहुत पहिले की बात है। श्रावण के पवित्र महीने में सोमवार के पवित्र दिन एक बार पशुपतिनाथ की आराधना करने (काठमाण्डू, नेपाल) गया था। जिस समय जैसी मनःस्थिति होती है, उस समय वैसी ही बात दिमाग में आती है। मंदिर के आसपास बहुत घूर घूर कर बहुत दूर दूर तक देखा, कहीं कोई पशु नहीं दिखाई दिया। यही सोच रहा था कि ये कैसे पशुपतिनाथ हैं? यहाँ तो कोई पशु है ही नहीं।
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दर्शनार्थियों की पंक्ति बहुत लंबी थी। दो घंटे पंक्ति में खड़े रहने के पश्चात मेरा भी नंबर आया। वहाँ पंचमुखी महादेव के भौतिक और मानसिक दर्शन कर के बहुत आनंद हुआ। मेरे प्रश्न का उत्तर भी पशुपतिनाथ से मिल गया। जिस पशु को मैं खोज रहा था, अनुभूति द्वारा पाया कि वह पशु तो मैं स्वयं हूँ। जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, और अहंकार जैसे पाशों द्वारा आबद्ध है, वह पशु मेरे सिवाय कोई अन्य नहीं हो सकता। जीव को ही पशु कहते हैं जो जन्म-जन्मांतर से अनेकानेक प्रकार के पाशों से बंधा हुआ है।
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तत्पश्चात पास ही के शक्तिपीठ गुहयेश्वरी देवी के मंदिर में पूजा करने गया। वहाँ तीर्थ-पुरोहित ने पूछा कि सात्विक या राजसिक कौन सी पूजा करोगे? मैंने तीर्थ-पुरोहित से सात्विक और राजसिक का भेद पूछा। उसने कहा कि राजसिक पूजा तो मांस-मदिरा से होगी और सात्विक पूजा दूध, पुष्प आदि से होगी। मैंने कहा कि पूजा तो सात्विक ही करूंगा। थोड़ी देर भगवती से प्रार्थना की कि अज्ञानमय आवरण से घिरे मेरे चित्त में प्रवेश कर सारे अंधकार को दूर करो।
मुझे तो यही समझ में आया कि जिन पाशों से बंधकर हम पशु बन गए हैं, आत्म-समर्पण द्वारा उस पशुत्व से मुक्त होना ही पशु-बलि है।
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इस अनुभव ने इतना थका दिया कि मैं चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गया। अपने साथ मुजफ्फरपुर (बिहार) से एक मित्र को ले गया था। उन से अनुरोध किया कि मुझे उठाकर कैसे भी एक टेक्सी में बैठा दो और साथ में उस अतिथि-भवन तक ले चलो जहां हम ठहरे हुए थे। वहाँ एक दिन आराम किया तब जाकर मैं सामान्य हुआ। अन्य कहीं भी नहीं गया, और अन्य सारे कार्यक्रम स्थगित कर दिये।
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भगवान परमशिव से प्रार्थना है की वे सब जीवों पर कृपा करें और अपना बोध सब को करायें। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अप्रेल २०२४