Thursday, 10 April 2025

साधना में सबसे बड़ी बाधा ही हमारे मन की चंचलता है ---

 साधना में सबसे बड़ी बाधा ही हमारे मन की चंचलता है ---

.
गीता के छठे अध्याय "आत्मसंयम योग" में मन पर नियंत्रण रखने के लिए भगवान भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के आत्म-संयम योग (अध्याय ६) में एक बात कही है जो वयोवृद्ध और युवा सभी साधकों के लिये अमूल्य और अनुपम है। जैसे जैसे इस शरीर की आयु बढ़ती है वैसे वैसे ही हमारा मन चंचल होता जाता है। साधना में सबसे बड़ी बाधा ही हमारे मन की चंचलता है। सब से बड़ी आध्यात्मिक समस्या है कि हम अपने चंचल मन पर पूर्ण नियंत्रण कैसे करें।
.
गीता के छठे अध्याय के चार श्लोक (२३, २४, २५, और २६) बहुत अधिक महत्वपूर्ण हैं, जिनका स्वाध्याय बार बार करना चाहिये। भगवान ने इसी विषय पर बहुत सुंदर उपदेश दिया है जिस का स्वाध्याय एक बार फिर गहरायी से करें। धन्यवाद !! ॐ तत्सत् !!
७ अप्रेल २०२५

भगवत्-प्राप्ति -- समर्पण की पूर्णता है ---

 भगवत्-प्राप्ति -- समर्पण की पूर्णता है, एक अनुभूति है, जो हरिःकृपा से हमारे जीवन में समर्पण की पूर्णता के बाद स्वतः घटित होती है। भगवान के महासागर में मैं जल की एक बूंद की तरह तैर रहा हूँ। इस जल की एक बूंद और महासागर की पृथकता के बोध की समाप्ती ही भगवत्-प्राप्ति है।

.
लगता है, सब ठीक है। सब प्रसन्न और संतुष्ट हैं। यह मेरे और भगवान के मध्य का मामला है। भगवान ने मुझे आश्वासन दिया है कि भगवत्-प्राप्ति के बाद तुम्हारी सारी पीड़ायें, अच्छे-बुरे सारे कर्म और सारे क्षोभ -- समाप्त हो जायेंगे।
.
भगवत्-प्राप्ति -- घटित होने वाली कोई घटना नहीं, समर्पित होने के भाव की पूर्णता है। जिस क्षण हमारा समर्पण पूर्ण होगा उसी क्षण हमें भगवान की प्राप्ति हो जायेगी। यही आत्म-साक्षात्कार है। हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ अप्रेल २०२५

सत्संग क्या है?

 सत्संग क्या है?

.
यारों के बीच की बातें, और यारों के बीच में रहना ही सत्संग है। हमारी यारी तो केवल परमात्मा और उनके प्रेमियों से है। भाव जगत में परमात्मा से संवाद होता रहता है, उन से और उन के प्रेमियों से जो भी संवाद होता है, वही मेरा सत्संग है। यारों के बीच की बातें दूसरों से नहीं हो सकतीं। हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
८ अप्रेल २०२५

आज का दिन जीवन का एक अति श्रेष्ठ दिन है ---

 ९ अप्रेल २०२५

आज का दिन जीवन का एक अति श्रेष्ठ दिन है। पिछले दो सप्ताह से यह शरीर रुग्ण चल रहा था। बीते हुए कल का दिन लग रहा था कि ठीक है, लेकिन दिन के ढलते ढलते फिर से अस्वस्थ हो गया। आज प्रातः स्वयं परमात्मा ही इस देह से सोकर उठे हैं। उठते ही परमात्मा इस देह को माध्यम बनाकर ध्यानस्थ हो गये। अब से आगे जो कुछ भी करना है, वह परमात्मा स्वयं करेंगे, वे ही एकमात्र कर्ता हैं। परमात्मा स्वयं ही इन नासिकाओं से सांस ले रहे हैं और कूटस्थ-चैतन्य/ब्राह्मी-स्थिति में हैं। हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर

मुक्ति और बंधन में अब कोई भेद नहीं रहा है ---

 

मुक्ति और बंधन में अब कोई भेद नहीं रहा है ---
.
अरुणिमा की अति दूर से आती झलक जैसे बताती है कि सूर्योदय में विलम्ब नहीं है। वैसे ही परमात्मा से परमप्रेम और अनुराग की हर अनुभूति बताती है कि इस जीवन में परमात्मा के अवतरण में विलम्ब नहीं है।
हे प्रभु, ये सब अनुकूलताएँ और प्रतिकूलताएँ तुम्ही हो। सारी मायावी बाधाएँ, और अभीप्सा भी तुम हो। हर पाश, हर बंधन, और उनसे मुक्ति भी तुम ही हो।
.
प्रश्न : क्या मैं अवधूतावस्था की ओर अग्रसर हूँ?
उत्तर : यह दीवानापन या पागलपन तो यही बता रहा है। एकमात्र अवधूत तो भगवान दत्तात्रेय हैं, अन्य सब उन्हीं के कृपापात्र हैं।
अ --- आनंदे वर्तते नित्यम् (सदैव आनंदमय ही रहनेवाला)।
व --- वर्तमानेन वर्तते (प्रत्येक क्षण वर्तमान काल में रहनेवाला)।
धू --- ज्ञाननिर्धूत कल्याणः (जो ज्ञान से निर्धूत व कल्याणकारी है)।
त --- तत्त्वचिन्तनधूत येन (जो तत्त्वचिंतन रत हो)।
.
हरिः ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१० अप्रेल २०२५

हम शाश्वत आत्मा हैं, जिसका एकमात्र धर्म -- परमात्मा को पूर्ण समर्पण है ---

 हम शाश्वत आत्मा हैं, जिसका एकमात्र धर्म -- परमात्मा को पूर्ण समर्पण है ---

.
ईश्वर ने हमें मनुष्य शरीर और विवेक दिया है, इसलिए हमारी जाति मनुष्य है। शरीर तो बदलते रहते हैं, लेकिन आत्मा शाश्वत है। आत्मा का धर्म ही हमारा धर्म है, और वह है -- परमात्मा को पूर्ण समर्पण। समर्पण की पूर्णता ही "भगवत्-प्राप्ति है। पूर्ण समर्पण के लिए हमें परमात्मा का निरंतर स्मरण, मनन, निदिध्यासन, ध्यान, और उन्हीं में रमण करना पड़ता है। इससे अतिरिक्त आत्मा का अन्य कोई धर्म नहीं है। यह धर्म सनातन है। इससे अतिरिक्त अन्य सब -- धर्म के नाम पर अधर्म है।
गीता में भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् - जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
.
इस स्वधर्म का पालन इस संसार के महाभय से सदा हमारी रक्षा करेगा। भगवान का गीता में वचन है ---
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
अर्थात् इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है| इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है॥
.
इस स्वधर्म में मरना ही श्रेयस्कर है| भगवान कहते हैं ---
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
अर्थात् सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥
.
रात्री को परमात्मा का गहनतम ध्यान कर के ही सोयें, और प्रातःकाल उठते ही पुनश्च उनका ध्यान करें। पूरे दिन उन्हें अपनी स्मृति में रखें। साकार और निराकार -- सारे रूप उन्हीं के हैं। प्रयासपूर्वक अपनी चेतना को आज्ञाचक्र में या उससे ऊपर रखें। इसे अपनी साधना बनायें। जो अति उन्नत साधक हैं वे अपनी चेतना को इस शरीर से बाहर परमात्मा की अनंतता से भी परे परमशिव में रखें। अनंतता का बोध और और उसमें स्थिति होने पर आगे का मार्गदर्शन भगवान स्वयं करेंगे। हृदय में परमात्मा के प्रति परमप्रेम/अनुराग रखें, जिसके बिना प्रगति असंभव है।
.
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
१० अप्रेल २०२५

परमात्मा का आकर्षण अत्यधिक प्रबल है। मैं स्वयं को रोक नहीं सकता ---

 परमात्मा का आकर्षण अत्यधिक प्रबल है। मैं स्वयं को रोक नहीं सकता।

अब से बचा-खुचा सारा समय और यह जीवन परमात्मा की उपासना को समर्पित है -- दिन में २४ घंटे, सप्ताह में सातों दिन।
सारी सृष्टि को अपने साथ लेकर परमात्मा की चेतना स्वयं ही अपना ध्यान करती है। कहीं कोई भेद नहीं है। मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ, जो केवल समर्पण कर सकता हूँ, इससे अधिक कुछ भी नहीं। आप सब की यही सबसे बड़ी सेवा है, जो मैं कर सकता हूँ।
हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
7 अप्रैल 2025