आज की गलाकाट प्रतियोगिता के युग में विद्यार्थियों पर कोचिंग और ट्यूशन
का इतना अधिक दबाव है कि उनका जीवन एक उत्सव और आनंद नहीं रहा है|
मैं आज से पचास-साठ वर्षों पूर्व की बात कर रहा हूँ| पहले जब भी वर्षा होती थी तब हमारी आयु के बच्चे बरसात में खूब नहाते थे, प्रकृति का आनंद लेने वन-विहार भी करते थे और नीम के पेड़ की डालियों पर रस्सी बांध कर खूब झूला भी झूलते थे|
हम लोग नित्य संघ की सायं शाखाओं में जाकर खूब खेलते थे| जिनकी किसी खेल विशेष में रुचि होती वे उसे खेलते| पुस्तकालयों में जाकर ज्ञानवर्धक साहित्य भी खूब पढ़ते थे| जीवन में खूब आनंद था|
हमारे यहाँ बिजली १९६३ या १९६४ में आई थी तब तक किरोसिन के लैम्प या लालटेन की रोशनी में ही पढ़ना पड़ता था| घर में नहाना एक विलासिता थी, कुओं पर जाकर नहाते थे| घर में पानी या तो खुद लाते या पनिहारे लाते| घर में पानी आता तो था पर घर से बाहर नहीं जाता था| शौच आदि के लिए भी जंगल में ही जाना पड़ता था| फिर भी एक दिनचर्या थी, नित्य तीन-चार किलोमीटर दौड़ कर या घूम कर आते थे| स्नान कर के मंदिर में भी जाते थे| लोगों में आज की अपेक्षा अधिक प्रेम था| आजकल तो बिना मतलब के कोई बात ही नहीं करता|
मैं आज से पचास-साठ वर्षों पूर्व की बात कर रहा हूँ| पहले जब भी वर्षा होती थी तब हमारी आयु के बच्चे बरसात में खूब नहाते थे, प्रकृति का आनंद लेने वन-विहार भी करते थे और नीम के पेड़ की डालियों पर रस्सी बांध कर खूब झूला भी झूलते थे|
हम लोग नित्य संघ की सायं शाखाओं में जाकर खूब खेलते थे| जिनकी किसी खेल विशेष में रुचि होती वे उसे खेलते| पुस्तकालयों में जाकर ज्ञानवर्धक साहित्य भी खूब पढ़ते थे| जीवन में खूब आनंद था|
हमारे यहाँ बिजली १९६३ या १९६४ में आई थी तब तक किरोसिन के लैम्प या लालटेन की रोशनी में ही पढ़ना पड़ता था| घर में नहाना एक विलासिता थी, कुओं पर जाकर नहाते थे| घर में पानी या तो खुद लाते या पनिहारे लाते| घर में पानी आता तो था पर घर से बाहर नहीं जाता था| शौच आदि के लिए भी जंगल में ही जाना पड़ता था| फिर भी एक दिनचर्या थी, नित्य तीन-चार किलोमीटर दौड़ कर या घूम कर आते थे| स्नान कर के मंदिर में भी जाते थे| लोगों में आज की अपेक्षा अधिक प्रेम था| आजकल तो बिना मतलब के कोई बात ही नहीं करता|
समय के साथ सब कुछ बदल जाता है| जैसा जीवन आज है वैसा कुछ वर्षों बाद नहीं रहेगा|