Friday, 2 August 2019

पुरानी यादें .....

आज की गलाकाट प्रतियोगिता के युग में विद्यार्थियों पर कोचिंग और ट्यूशन का इतना अधिक दबाव है कि उनका जीवन एक उत्सव और आनंद नहीं रहा है|

मैं आज से पचास-साठ वर्षों पूर्व की बात कर रहा हूँ| पहले जब भी वर्षा होती थी तब हमारी आयु के बच्चे बरसात में खूब नहाते थे, प्रकृति का आनंद लेने वन-विहार भी करते थे और नीम के पेड़ की डालियों पर रस्सी बांध कर खूब झूला भी झूलते थे|

हम लोग नित्य संघ की सायं शाखाओं में जाकर खूब खेलते थे| जिनकी किसी खेल विशेष में रुचि होती वे उसे खेलते| पुस्तकालयों में जाकर ज्ञानवर्धक साहित्य भी खूब पढ़ते थे| जीवन में खूब आनंद था|
हमारे यहाँ बिजली १९६३ या १९६४ में आई थी तब तक किरोसिन के लैम्प या लालटेन की रोशनी में ही पढ़ना पड़ता था| घर में नहाना एक विलासिता थी, कुओं पर जाकर नहाते थे| घर में पानी या तो खुद लाते या पनिहारे लाते| घर में पानी आता तो था पर घर से बाहर नहीं जाता था| शौच आदि के लिए भी जंगल में ही जाना पड़ता था| फिर भी एक दिनचर्या थी, नित्य तीन-चार किलोमीटर दौड़ कर या घूम कर आते थे| स्नान कर के मंदिर में भी जाते थे| लोगों में आज की अपेक्षा अधिक प्रेम था| आजकल तो बिना मतलब के कोई बात ही नहीं करता|

समय के साथ सब कुछ बदल जाता है| जैसा जीवन आज है वैसा कुछ वर्षों बाद नहीं रहेगा|

"राम" नाम परम सत्य है, और सत्य ही परमात्मा है ......

"राम" नाम परम सत्य है, और सत्य ही परमात्मा है ......
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साकार रूप में तो भगवान श्रीराम परमात्मा के अवतार हैं ही, निराकार रूप में भी परमब्रह्म हैं| ऊर्ध्व में स्थिति प्राप्त होने पर ब्रह्मज्ञान का उदय होता है, उस अवस्था में यानि आत्मतत्व में रमण करने का नाम राम है| मणिपुर-चक्र के भीतर कुंकुमाभास तेजसतत्व अग्निबीज 'र'कार है, उसके साथ आकार रूप हंस यानि अजपा-जप द्वारा आज्ञा-चक्र स्थित ब्रह्मयोनि के भीतर बिंदु स्वरुप 'म'कार का मिलन होता है| यहाँ राम नाम एक अनुभूति का विषय है जिसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त करना बड़ा कठिन है|
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जो साधक सदा आत्मा में रमण करते हैं, उनके लिए "राम" नाम तारकमंत्र है| मृत्युकाल में "राम" नाम जिनके स्मरण में रहे वे स्वयं ही ब्रह्ममय हो जाते हैं| आत्मतत्व में स्थित होने को तंत्र में मैथुन कहा गया है| अंतर्मुखी प्राणायाम आलिंगन है| स्थितिपद में मग्न हो जाने का नाम चुंबन है| केवल कुम्भक की स्थिति में जो आवाहन होता है वह सीत्कार है| खेचरी मुद्रा में जिस अमृत का क्षरण होता है वह नैवेद्य है| अजपा-जप ही रमण है| यह रमण करते करते जिस आनंद का उदय होता है वह दक्षिणा है| यह साधना उन को स्वतः ही समझ में आ जाती है जो नियमित ध्यान करते हैं| "श्री" शब्द में "श" श्वास है, "र" तेजस यानि अग्नि तत्व है, और "ई" शक्तिबीज है| अजपा-जप और नाद-श्रवण करते करते अनंत परमात्मा की अनुभूति निराकार श्रीराम की अनुभूति है जहाँ अहंकार नष्ट होकर चेतना राममय हो जाती है|
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परमात्मा के निरंतर चिंतन से मद्य यानि शराब का सा नशा होता है| परमात्मा का निरंतर चिंतन ही मद्यपान है| पुण्य और पाप रूपी पशुओ की ज्ञान रूपी खड़ग से हत्या कर उनका भक्षण करने से मौन में स्थिति होती है| मौन में स्थिति ही मांस है| ध्यान के द्वारा इड़ा (गंगा) और पिंगला (यमुना ) के मध्य सुषुम्ना (सरस्वती) में विचरण करने वाली प्राण-ऊर्जा मीन है| दुष्टों की संगती रूपी बंधन से बचे रहना ही मुद्रा है| मूलाधार से कुंडलिनी महाशक्ति को उठाकर सहस्त्रार में परमशिव से मिलाना मैथुन है| महाशक्ति कुंडलिनी और परमशिव के मिलन के बाद की स्थिति आत्माराम और राममय होना है| राम नाम ही परम सत्य है|
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(अपनी अति अल्प और सीमित बुद्धि द्वारा लिखा गया उपरोक्त लेख सूर्य को दीपक दिखाने के समान है| किसी भी अशुद्धि के लिए विद्वानों से क्षमायाचना करता हूँ| किसी भी तरह की टिप्पणी इस लेख पर नहीं करूँगा| जो भी लिखा है वह अनुभूत सत्य है|)
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ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०१९

महावतार बाबाजी को नमन .......

महावतार बाबाजी को नमन .......
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स्वामी योगानंद गिरी (जो बाद में परमहंस योगानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए) को उनके गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरी ने सनातन धर्म के प्रचार प्रसार हेतु अमेरिका जाने की आज्ञा दी| अपने शिष्य स्वामी योगानंद गिरी को उन्होंने यह भी बताया की तुम महावातार बाबाजी की प्रेरणा से ही मेरे पास आये थे और उन्हीं के आदेश से मैं तुम्हे अमेरिका भेज रहा हूँ| स्वामी योगानंद गिरी अमेरिका जाने से पूर्व प्रत्यक्ष बाबाजी से आशीर्वाद पाना चाहते थे| इसके लिए उन्होंने प्रार्थना की और बाबाजी ने उनके समक्ष प्रकट होकर आशीर्वाद दिया| उस दिन को महावातार बाबाजी स्मृति दिवस के रूप में उनकी शिष्य परम्परा में मनाया जाता है| इस परम्परा के सभी साधकों को मेरा अभिनन्दन और प्रणाम|
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्|
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्, भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि||"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नम: पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व: ||"
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शरीरं सुरुपं तथा वा कलत्रं यशश्चारू चित्रं धनं मेरुतुल्यम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥ (1)
भावार्थ : जिस व्यक्ति का शरीर सुन्दर हो, पत्नी भी खूबसूरत हो, कीर्ति का चारों दिशाओं में विस्तार हो, मेरु पर्वत के समान अनन्त धन हो, लेकिन गुरु के श्रीचरणों में यदि मन की लगन न हो तो इन सभी उपलब्धियों का कोई महत्व नहीं होता है।
कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥ (2)
भावार्थ : पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र, घर एवं स्वजन आदि पूर्व जन्म के फल स्वरूप सहज-सुलभ हो लेकिन गुरु के श्रीचरणों में मन की लगन न हो तो इन सभी प्रारब्ध-सुख का कोई महत्व नहीं होता है।
षडंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥ (3)
भावार्थ : सभी वेद एवं सभी शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, अति सुन्दर कविता स्वरूप निर्माण की प्रतिभा हो, लेकिन गुरु के श्रीचरणों में लगन न हो तो इन सभी सदगुणों का कोई महत्व नहीं होता है।
विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥ (4)
भावार्थ : देश विदेश में सम्मान मिलता हो, अपने देश में जिनका नित्य जय-जयकार से स्वागत किया जाता हो और जो सदाचार-पालन में भी अनन्य स्थान रखता हो, यदि उसका भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्ति न हो तो इन सभी सदगुणों का कोई महत्व नहीं होता है।
क्षमामण्डले भूपभूपालवृन्दैः सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥ (5)
भावार्थ : जिन महानुभाव के चरण-कमल पृथ्वी-मण्डल के राजा-महाराजाओं से नित्य पूजित होते हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्री चरणों में आसक्त न हो तो इन सभी सदभाग्य का कोई महत्व नहीं होता है।
यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्ज गद्वस्तु सर्वं करे सत्प्रसादात्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥ (6)
भावार्थ : दानवृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति दिग-दिगान्तरों में व्याप्त हो, अति उदार गुरु की सहज कृपा दृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख-ऐश्वर्य प्राप्त हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों में आसक्ति भाव न रखता हो तो इन सभी ऎश्वर्यों का कोई महत्व नहीं होता है।
न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ न कान्तासुखे नैव वित्तेषु चित्तम्।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥ (7)
भावार्थ : जिनका मन भोग, योग, अश्व, राज्य, धनोपभोग और स्त्री सुख से कभी विचलित न हुआ हो, फिर भी गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाया हो तो इस मन की दृड़ता कोई महत्व नहीं होता है।
अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्घ्ये।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥ (8)
भावार्थ : जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में, अपने कार्य या शरीर में तथा अमूल्य भंडार में आसक्त न हो, पर गुरु के श्रीचरणों में भी यदि वह मन आसक्त न हो पाये तो उसकी सारी अनासक्तियों का कोई महत्व नहीं होता है।
अनर्घ्याणि रत्नादि मुक्तानि सम्यक्स मालिंगिता कामिनी यामिनीषु।
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥ (9)
भावार्थ : अमूल्य मणि-मुक्तादि रत्न उपलब्ध हो, रात्रि में समलिंगिता विलासिनी पत्नी भी प्राप्त हो, फिर भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाये तो इन सारे ऐश्वर्य-भोगादि सुखों का कोई महत्व नहीं होता है।
गुरोरष्टकं यः पठेत्पुण्यदेही यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही।
लभेत् वांछितार्थ पदं ब्रह्मसंज्ञं गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम्॥ (10)
भावार्थ : जो यती, राजा, ब्रह्मचारी एवं गृहस्थ इस गुरु-अष्टक का पठन-पाठन करता है और जिसका मन गुरु के वचन में आसक्त है, वह पुण्यशाली शरीरधारी निश्चित रूप से अपने सभी इच्छायें और ब्रह्मपद दोनों को समान रूप से प्राप्त कर लेता है।
॥ हरि ॐ तत सत ॥ जय गुरु !!

Thursday, 1 August 2019

नित्यमुक्त को जाने की आज्ञा कौन दे ?

नित्यमुक्त को जाने की आज्ञा कौन दे? परमशिव स्वेच्छा से अविद्या का आनंद लेने स्वतंत्र बंधनों में आये हैं. वे परतंत्र नहीं हैं.
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जब उन की कृपा से "इदम्" मिट जाता हैे, तब वे ही "अहम्" बन जाते हैं, और हमें अपने अच्युत अपरिछिन्न भाव की सिद्धि और अहम् व इदम् के भेद का ज्ञान होता है. हमारे बंधन स्वतंत्र हैं, परतंत्र नहीं. अंततः साधकत्व और मुमुक्षुत्व भी एक भ्रम ही है, क्योंकि स्वयं से पृथक कोई सत्ता है ही नहीं. कोई बद्धता भी नहीं है, क्योंकि हम तो हैं ही नहीं. जो भी है वे भगवान वासुदेव ही हैं. वे ही परमशिव है, वे ही पारब्रह्म हैं, वे ही जगन्माता हैं, वे ही सर्वस्व हैं.
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते |
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: ||गीता ७:१९||

भवसागर पता नहीं कब का पार हो गया ! कुछ पता ही नहीं चला ----

भवसागर पता नहीं कब का पार हो गया ! कुछ पता ही नहीं चला.
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एक निर्जन, अनंत अन्धकार से घिरे प्रचंड चक्रवातों से ग्रस्त भयावह भवसागर को पार करने के लिए, जहाँ कोई तारा भी दृष्टिगत नहीं हो रहा था, वहाँ भगवान ने यह देह रुपी टूटी-फूटी असंख्य छिद्रों वाली नौका दी थी| सद्गुरु महाराज ने इसका कर्णधार बनने की बड़ी कृपा की और भगवान की अनुग्रह रूपी अनुकूलता मिली| सारे छिद्रों को भगवान ने भर दिया और जब ठीक से देखा तो पता चला कि भवसागर तो कभी का पार हो गया है, कुछ पता ही नहीं चला|
हे सच्चिदानंद हरिः, तुम कितने सुन्दर हो ! हे हरिः सुन्दर हे हरिः सुन्दर !

गुरुकृपा है या नहीं, इसकी क्या पहिचान है? गुरु, गुरुपूजा, गुरुदक्षिणा, गुरुस्थान और गुरुसेवा क्या है? .....

गुरुकृपा है या नहीं, इसकी क्या पहिचान है? गुरु, गुरुपूजा, गुरुदक्षिणा, गुरुस्थान और गुरुसेवा क्या है? .....
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यदि गुरु के उपदेश निज जीवन में चरितार्थ हो रहे हैं, यानी हम गुरु के उपदेशों का पालन अपने निजी जीवन में कर पा रहे हैं तो हम पर गुरु-कृपा है, अन्यथा नहीं| इसके अतिरिक्त अन्य कोई मापदंड नहीं है|
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मेरी दृष्टि में कूटस्थ ही गुरु है, कूटस्थ ही गुरुस्थान है, और कूटस्थ पर निरंतर ध्यान और समर्पण ही गुरुसेवा है| गुरु-रूप ब्रह्म सब नाम-रूप और गुणों से परे हैं, वे असीम हैं, उन्हें किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता| वे परमात्मा की अनंतता, पूर्णता और आनंद हैं| असली गुरुदक्षिणा है ..... कूटस्थ में पूर्ण समर्पण, जिसकी विधी भी स्वयं गुरु ही बताते हैं|
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यह मनुष्य देह तो लोकयात्रा के लिए परमात्मा से मिला हुआ एक वाहन रूपी उपहार है| हम यह वाहन नहीं हैं, गुरु भी यह वाहन नहीं हैं| पर लोकाचार के लिए लोकधर्म निभाना भी आवश्यक है| लोकधर्म निभाने के लिए गुरु यदि देह में हैं तो प्रतीक के रूप में उनकी देह को, यदि नहीं हैं तो उनकी परम्परा को, आवश्यक धन, अन्न-वस्त्र और पत्र-पुष्प आदि अर्पित करना हमारा दायित्व बनता है| गुरु देह में हैं तो यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें किसी प्रकार का कोई कष्ट तो नहीं है| तब उनकी देह की भी सेवा होनी चाहिए| गुरु के उपदेशों को चरितार्थ करना गुरुसेवा है| गुरु कभी स्वयं को भौतिक देह नहीं मानते| जो स्वयं को भौतिक देह मानते हैं वे गुरु नहीं हो सकते| उनकी चेतना कूटस्थ ब्रह्म के साथ एक होती है| उनके साथ हमारा सम्बन्ध शाश्वत है और वे शिष्य को भी स्वयं के साथ ब्रह्ममय करने के लिए प्रयासरत रहते हैं|
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हमारी सूक्ष्म देह में हमारे मष्तिष्क के शीर्ष पर जो सहस्त्रार है, जहाँ सहस्त्र पंखुड़ियों वाला कमल पुष्प है, वह गुरु के चरण कमल रूपी हमारी गुरु-सत्ता है| वह गुरु का स्थान है| सहस्त्रार में स्थिति ही गुरुचरणों में आश्रय है| उस सहस्त्र दल कमल पर हमें निरंतर परमशिव परात्पर परमेष्ठी गुरु का ध्यान करना चाहिए| यह सबसे बड़ी गुरुसेवा है| सहस्त्रार से परे की अनंतता में वे परमशिव हैं| वह अनंतता ही वास्तव में हमारा स्वरुप है| ध्यान करते करते हम स्वयं भी अनंत बन जाते हैं|
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गुरु-चरणों में मस्तक एक बार झुक गया तो वह कभी उठना नहीं चाहिए| वह सदा झुका ही रहे| यही शीश का दान है| इससे हमारे चैतन्य पर गुरु का अधिकार हो जाता है| तब जो कुछ भी हम करेंगे उसमें गुरु हमारे साथ सदैव रहेंगे| तब कर्ता और भोक्ता भी वे ही बन जाते हैं| यही है गुरु चरणों में सम्पूर्ण समर्पण| तब हमारे अच्छे-बुरे सब कर्म भी गुरु चरणों में अर्पित हो जाते हैं| हम पर कोई संचित कर्म अवशिष्ट नहीं रहता| तब गुरु ही हमारी आध्यात्मिक साधना के कर्ता और भोक्ता हो जाते हैं|
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साकार रूप में गुरु-पादुका या गुरु के चरण-कमलों की पूजा होती है, गुरु के देह की नहीं| गुरु रूप परब्रह्म को कर्ता बनाओ| साधना, साध्य और साधक; दृष्टा, दृश्य और दृष्टी; व उपासना, उपासक और उपास्य .... सब कुछ हमारे गुरु महाराज ही हैं| हमारी उपस्थिति तो वैसे ही है जैसे यज्ञ में यजमान की होती है| गुरुकृपा ही हमें समभाव में अधिष्ठित करती है| गुरुकृपा हि केवलं||
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ॐ श्री गुरवे नमः ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ जुलाई २०१९
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(यह लेख मेरे निजी अनुभवों और विचारों पर आधारित है. यदि किसी के विचार नहीं मिलते तो अन्यथा न लें. मैं सभी का पूर्ण सम्मान करता हूँ.)

धर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है .....

धर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है .....
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जो दृढ़ राखे धर्म को, तिंही राखे करतार| इण मंत्र रो जाप करे, वो मेवाड़ी सरदार|| 
उपरोक्त पंक्तियाँ अकबर के सेनापति अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना ने महाराणा प्रताप की प्रशंसा में लिखी थीं).
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण का आश्वासन है ....
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते| स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्||२:४०||
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हमने अपना धर्म छोड़ दिया है, इसलिए हमारा पतन हो रहा है और हम इतने अधिक कष्टों में हैं| हम धर्म की रक्षा करेंगे तभी धर्म हमारी रक्षा करेगा|
"धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ||"
धर्म ही रक्षा करेगा, और कोई नहीं |