Tuesday, 12 November 2024

जीवन के इस संध्याकाल में अब कहीं भी जाने, या चला कर किसी से भी मिलने की कोई कामना नहीं रही है ---

 जीवन के इस संध्याकाल में अब कहीं भी जाने, या चला कर किसी से भी मिलने की कोई कामना नहीं रही है। भगवान अपनी इच्छा से कहीं भी ले जाये या किसी से भी मिला दे, उसकी मर्जी, पर मेरी स्वयं की कोई इच्छा नहीं है। जीवन से पूर्ण संतुष्टि और ह्रदय में पूर्ण तृप्ति है, कोई असंतोष नहीं है।

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जहां तक आध्यात्म का सम्बन्ध है, कण मात्र भी कोई संशय या शंका नहीं है। इस अति अल्प और अति सीमित बुद्धि में समा सकने योग्य गहन से गहन आध्यात्मिक रहस्य भी रहस्य नहीं रहे है। सब कुछ स्पष्ट है। परमात्मा की पूर्ण कृपा है। कहीं कोई कमी नहीं है। भगवान ने मुझे अपना निमित्त बनाया यह उनकी पूर्ण कृपा है। सारी साधना वे ही कर रहे हैं, साक्षी भी वे ही हैं, साध्य साधक और साधना भी वे ही हैं। मुझे करने योग्य कुछ भी नहीं है, सब कुछ वे ही कर रहे हैं।
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आप सब महान आत्माओं को नमन !
ॐ तत्सत् ! ॐ शिव! ॐ ॐ ॐ!!
कृपा शंकर
११ नवम्बर २०२४

भगवान से प्रेरणा मिलेगी तभी कुछ लिखूंगा, अपनी स्वतंत्र इच्छा से कुछ भी नहीं ---

 

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आज का दिन मेरे लिए एक Turning point है, जीवन को एक नई दिशा मिल रही है। सभी से क्षमायाचना करता हूँ कि जाने/अनजाने में मुझसे कभी भी कोई प्रज्ञापराध जाने-अनजाने में आपके प्रति हुआ है, तो मुझे क्षमा प्रदान करें। मुझे अपना आशीर्वाद भी दें कि मेरा अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) निरंतर परमब्रह्म परमात्मा में ही स्थित रहे।
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पहले मैं प्रयासपूर्वक निरंतर ब्रह्मचिंतन करता था, अब तो वह मेरा स्वभाव बन गया है। चेतना निरंतर स्वतः ही हर समय ब्रह्ममय रहती है। ध्यान-साधना में मैं कभी अकेला नहीं होता, सारी सृष्टि, सारा ब्रह्मांड, स्वयं परमात्मा ही मेरे साथ साथ अपना ध्यान मुझे माध्यम बना कर करते हैं। कर्ता वे ही होते हैं। मुझे ही कई बार कर्ता होने का भ्रम हो जाता है, जो गलत है।
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Facebook और WhatsApp पर Low Profile रखूँगा, यानि उन पर आने का प्रयास तो नित्य करूंगा, लेकिन नियमित नहीं रहूँगा। कहीं भी घूमने-फिरने की मेरी भौतिक शक्ति भी क्षीण हो गयी है, अतः अति आवश्यक होने पर ही कहीं जाऊंगा। वैसे मैं जहां भी हूँ, वहीं स्वयं परमात्मा हैं, वहीं सारे तीर्थ और महान आत्माएँ हैं।
उपनिषदों में और श्रीमद्भगवद्गीता में ब्रह्मज्ञान भरा पड़ा है, आवश्यकता है हरिःकृपा से उसे समझने की। जिसे प्यास लगी है वही पानी पीयेगा। चिंतन, मनन, निदिध्यासन, जप, और ध्यान-साधना तो स्वयं को ही करनी होगी। कोई दूसरा आपके लिए नहीं करेगा।
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भगवान से प्रेरणा मिलेगी तभी कुछ लिखूंगा, अपनी स्वतंत्र इच्छा से कुछ भी नहीं। भगवान की विशेष परम कृपा आप सब पर बनी रहे। WhatsApp पर इस message के बाद Broadcast mode भी अस्थायी रूप से बंद कर रहा हूँ।
देवउठनी एकादशी की भी शुभ कामनाएँ॥ शेष कुशल॥ ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
१२ नवंबर २०२४

{भाग १} विदेशों में भारतीयों को आकर्षित करने वाले नगर, व्यापार और दुकानें जो मेरी स्मृति में हैं, जहाँ का भ्रमण मैं कर चुका हूँ ---

 {भाग १} विदेशों में भारतीयों को आकर्षित करने वाले नगर, व्यापार और दुकानें जो मेरी स्मृति में हैं, जहाँ का भ्रमण मैं कर चुका हूँ ---

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(१) सिंगापूर का मुस्तफा डिपार्टमेंटल स्टोर -- यहाँ आपको सूई से लेकर कंप्यूटर तक मिल जाएगा। यह बहुत विशाल दुकान है जहाँ सैकड़ों कर्मचारी काम करते हैं, जिनको हिन्दी का ज्ञान होना अनिवार्य है। यहाँ सामान वही मिलता है जो भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में काम आ सकता है। भारत,पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले पर्यटक यहाँ अवश्य आते हैं। यहाँ के कर्मचारी आपसे हिन्दी में ही बात करेंगे।
सिंगापूर की सेरंगून रोड़ पर तो आपको लगता ही नहीं है कि आप भारत में नहीं है। भारतीय ही भारतीय, और भारतीयों की दुकानें यहाँ खूब हैं। ऐसे लगता है जैसे तमिलनाडु के किसी नगर में घूम रहे हों। सिंगापूर एक बहुत ही शानदार नगर है। यह एक सार्वभौम देश भी है और नगर भी। यह दिल्ली से बड़ा नहीं है। यहाँ की भौगोलिक स्थिति और मुक्त व्यापार से ही यहाँ की समृद्धि है। यहाँ पीने का पानी भी पर्याप्त नहीं है। पीने का पानी, सब्जियाँ और अनाज तक भी यहाँ बाहर से आयातित ही होते हैं। फिर भी यहाँ खूब समृद्धि है।
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(२) होङ्ग्कोंग का चूंकिङ्ग टावर ---
होङ्ग्कोंग में शायद यही एक स्थान है जहाँ भारतीयों और नेपालियों की खूब दुकानें हैं। किसी भारतीय को देखकर वे हिन्दी में ही बात करते हैं। वहाँ पास में ही संघ की एक शाखा भी हिन्दू स्वयंसेवक संघ के नाम से लगती थी। अब पता नहीं है कि नहीं। यहाँ खूब भारतीय आपको मिलेंगे।
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(३) कनाडा की वेंकूवर सिटी में पंजाबी मार्केट ---
वेंकूवर सिटी में एक इंडिया स्ट्रीट है जिसमें एक खूब बड़ा पंजाबी मार्केट है। वहाँ लगता ही नहीं है कि आप कनाडा में हैं। लगता है कि आप पंजाब में जलन्धर या लुधियाना में घूम रहे हैं।
वेंकूवर एक बहुत ही शानदार नगर है, जहाँ कई बार गया हूँ। वहाँ खूब घूमा-फिरा भी हूँ, और किसी समय वहाँ अनेक लोगों को जानता भी था। पास में ही कुछ और छोटे नगर भी हैं जहाँ आपको खूब पंजाबी और गुजराती लोग मिलेंगे। कनाडा के पूर्व में मोंट्रियाल भी गया हूँ, लेकिन कोई भारतीय वहाँ नहीं मिले। भारत में जो खालिस्तानी लोग हैं, उनको सबसे अधिक धन वेंकूवर से आता है। वे लोग कनाडा में ही खालिस्तान क्यों नहीं बनाते?
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(४) जापान का कोबे नगर ---
जापान के कई नगरों का भ्रमण किया है, लेकिन जितने भारतीय मुझे कोबे नगर में मिले उतने अन्यत्र कहीं भी नहीं मिले। वहाँ के बाजार का नाम भूल रहा हूँ जहाँ खूब भारतीय व्यापारियों का व्यवसाय है। अब तो जापान बहुत मंहगा है। कोई मुझे मुफ्त में भी वहाँ भेजे तो नहीं जाऊंगा।
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विश्ब के और भी अनेक देशों का भ्रमण मैंने किया है। वहाँ की कुछ स्मृतियाँ हैं। कभी मानस बनेगा तो फिर लिखूंगा।
(क्रमशः)

मंगलमय, शुभ, और आनंददायक दीपावली का यह उत्सव हो ---

 परमात्मा के प्रकाश का निज जीवन में निरंतर विस्तार ही परम-धर्म है। प्रकाशमय हो जाना ही भगवत्-प्राप्ति है, यही आत्म-साक्षात्कार है। जहाँ तक मेरी कल्पना जाती है, अनंतता में व उससे भी परे परमात्मा ही परमात्मा हैं। परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। हम सब यह भौतिक शरीर नहीं परमात्मा की अनंतता और उससे भी परे का सम्पूर्ण अस्तित्व हैं। पूरी अनंतता और सम्पूर्ण अस्तित्व ही परमात्मा है। परमात्मा स्वयं ही यह प्रकाश और अंधकार बन गए हैं। हमें यह जन्म ही इसीलिए मिला है कि हम अपने निज जीवन में छाये हुए अंधकार को दूर करें।

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परमात्मा का आज के लिए यही संदेश है, जो वे मुझे भी अपना एक माध्यम बना कर दे रहे हैं। आज का पूरा दिन और पूरी रात्रि ही उत्सव का पर्व है। हर क्षण आनंद में रहें। मैं आज भोर में जगन्माता की गोद में सोता हुआ वैसे ही उठा हूँ जैसे एक अबोध शिशु अपनी माता की गोद में से सोकर उठता है। जब से सोकर उठा हूँ तभी से परमात्मा ही परमात्मा की अनुभूतियाँ हो रही हैं। चारों ओर परमात्मा ही परमात्मा हैं, उनसे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है।
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स्वयं जगन्माता ने मुझे बताया है कि सृष्टि में अंधकार इसी लिये है, क्योंकि सृष्टि के संचालन के लिए यह आवश्यक है। अंधकार के बिना प्रकाश नहीं हो सकता, और प्रकाश के बिना अंधकार नहीं हो सकता। यह सृष्टि प्रकाश और अंधकार दोनों का ही एक खेल है। अंधकार और प्रकाश दोनों में से एक भी नहीं रहेगा तो यह सृष्टि ही समाप्त हो जाएगी। परमात्मा स्वयं ही यह प्रकाश और अंधकार हैं। लेकिन वे चाहते हैं कि हम अपने निज जीवन में छाये हुए अंधकार को दूर करें। यही इस सृष्टि का उद्देश्य है।
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जहाँ तक हो सके, आज की पूरी रात सोयें नहीं। चाहे दिन में पर्याप्त विश्राम कर लें, लेकिन यथा संभव पूरी रात जागकर भगवान का भजन करें। वृद्धों, बच्चों, बीमारों और अशक्त जनों को इसमें छूट है। वर्ष में चार रात्रियाँ ऐसी होती हैं, जिनमें किया गया पुण्य अक्षय होता है। वे रात्रियाँ हैं --- (१) दीपावली (कालरात्रि), (२) महाशिवरात्रि (महारात्रि) (३) होली (दारुणरात्री) (४) जन्माष्टमी (मोहरात्रि)।
आज की रात्रि कालरात्रि है। इसमें जूआ नहीं खेलें, शराब नहीं पीयें, सात्विक भोजन करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें, और निरंतर भगवान को अपनी स्मृति में रखें।
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यदि अन्तःकरण में काम-वासना और अन्य विकार विक्षेप उत्पन्न करते हैं, तो -- अपना आहार सात्विक लें, कुसंग का त्याग करें, सत्संग करें, और महाकाली की आराधना उनके बीजमंत्र "ॐ क्लीं" से करें। आपके बुरे विचारों का शमन होगा। यदि आप बुरे विचारों को छोड़े बिना ही महाकाली की आराधना करेगे तो महाकाली आपका स्वयं का ही महाविनाश कर देगी, और आपके मस्तिष्क में एक ऐसी विकृति उत्पन्न कर देगी जो इस जीवन में ठीक नहीं हो सकती, उसे ठीक करने के लिए आपको दूसरा जन्म ही लेना होगा। अतः यदि आप अपने बुरे विचारों पर नियंत्रण नहीं कर सकते तो महाकाली की आराधना न करें।
"महाकाली तो एक कल्पवृक्ष हैं, जिसके नीचे आप जो भी चाहोगे वह स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा। कुछ मांगने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। लेकिन यदि आपके आचार-विचार सही नहीं हैं तो मामला ही उलट जाएगा।"
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भगवान श्रीकृष्ण की आराधना का बीजमंत्र भी "ॐ क्लीं" है। यह वही बीज है जो भगवती महाकाली का भी है। इस बीज मंत्र का जप करते हुए भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें। उस समय भी अन्तःकरण में पवित्रता होनी चाहिए, अन्यथा कामदेव आपको पकड़ लेगा, और भटका देगा।
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जिन्हें आत्म-साक्षात्कार चाहिए, उन्हें भगवती महासरस्वती की आराधना "ॐ ऐं" बीजमंत्र से करनी चाहिए। अपने सद्गुरु को, और अपने सांसारिक पिताजी को भी इसी मंत्र से प्रणाम करते हैं।
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सतयुग में समुद्र-मंथन से माँ महालक्ष्मी का इस दिन प्राकट्य हुआ था, इसलिए इस दिन महालक्ष्मी का पूजन होता है। महालक्ष्मी सारे सद्गुण प्रदान करती हैं।
उनकी आराधना का बीजमंत्र "ॐ ह्रीं" है।
भगवती भुवनेश्वरी और श्री-विद्या का बीजमंत्र भी यही है। अपनी सांसारिक माता को भी इसी मंत्र से प्रणाम करते हैं।
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भगवान श्री राम की आराधना "रां" बीजमंत्र के ध्यान से होती है। उनका पूरा मंत्र "रां रामाय नमः" है। लोकमान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम इसी दिन लौटे थे। अयोध्या वासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। इसीलिए दीपावली मनाई जाती है। मुझे इतना ही पता है। और प्रश्न मुझसे न पूछें। मैं अकिंचन आपके प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकूँगा।
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जिन्होंने श्रीविद्या (भगवती राजराजेश्वरी श्रीललिता महात्रिपुरसुंदरी) की दीक्षा ले रखी है वे श्रीविद्या के मंत्रों का जप करें। आचार्य शंकर की परंपरा में श्रीविद्या की दीक्षा अंतिम दीक्षा है, इसके पश्चात और कोई दीक्षा नहीं होती। यह बड़ी से बड़ी दीक्षा है। इसके मंत्र गोपनीय हैं, इसलिए फेसबुक जैसे सार्वजनिक मंचों पर इन्हें लिख नहीं सकते।
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दिवाली के दो नाम हैं। एक नाम "लक्ष्मी पूजन" है जो सतयुग से जुड़ा है, और दूसरा नाम "दीपावली" है जो त्रेतायुग से जुड़ा है। अब प्रश्न उठता है कि यह पूजा तो लक्ष्मी जी की है और बीच में गणेश जी क्यों आ गए? इस के आध्यात्मिक कारणों पर अभी नहीं लिखूंगा क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर अति गंभीर है जिसे आध्यात्मिक रूप से उन्नत साधक ही समझ सकेंगे। सामान्य रूप से यही लिखूंगा कि गणेश जी विघ्न-विनाशक हैं, जिनकी पूजा सर्वप्रथम और सब देवी-देवताओं से पहिले और उनके साथ-साथ होती है।
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पुनश्च: -- दीपावली की समस्त मंगलमय शुभ कामनाएँ। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
"श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥"
"श्रीमते रामचंद्राय नमः !! रां रामाय नमः॥"
"श्री रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नमः !
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥"
कृपा शंकर
१२ नवंबर २०२३

Monday, 11 November 2024

अपने घर में यदि एक अलग कमरे की व्यवस्था न हो सके तो एक अलग कोने को अपने लिए आरक्षित कर लो ---

 अपने घर में यदि एक अलग कमरे की व्यवस्था न हो सके तो एक अलग कोने को अपने लिए आरक्षित कर लो। उस स्थान का उपयोग केवल अपनी साधना के लिए ही करो। वहीं बैठ कर अपना भजन/साधन नित्य करो। धीरे-धीरे वह स्थान जागृत हो जायेगा। जब भी वहाँ बैठोगे तो पाओगे कि आपकी चेतना भगवान से जुड़ गई है।

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आपके आसन ने जितना स्थान घेर रखा है वह आपका राज्य है। वहाँ से आकाश में जितनी ऊंचाई तक आपकी कल्पना जाती है, वह आपका साम्राज्य है। आपके साम्राज्य को आपसे कोई नहीं छीन सकता। आप वहाँ के चक्रवर्ती सम्राट हो। अपने साम्राज्य में भगवान को निमंत्रित करो, और अपना सारा साम्राज्य, और स्वयं को उन्हें समर्पित कर दो। आगे की ज़िम्मेदारी उनकी है, आपकी नहीं। .
जीवन के इस संध्याकाल में अब कहीं भी जाने, या चला कर किसी से भी मिलने की कोई कामना नहीं रही है। भगवान अपनी इच्छा से कहीं भी ले जाये या किसी से भी मिला दे, उसकी मर्जी, पर मेरी स्वयं की कोई इच्छा नहीं है। जीवन से पूर्ण संतुष्टि और ह्रदय में पूर्ण तृप्ति है, कोई असंतोष नहीं है।
जहां तक आध्यात्म का सम्बन्ध है, कण मात्र भी कोई संशय या शंका नहीं है। इस अति अल्प और अति सीमित बुद्धि में समा सकने योग्य गहन से गहन आध्यात्मिक रहस्य भी रहस्य नहीं रहे है। सब कुछ स्पष्ट है। परमात्मा की पूर्ण कृपा है। कहीं कोई कमी नहीं है। भगवान ने मुझे अपना निमित्त बनाया यह उनकी पूर्ण कृपा है। सारी साधना वे ही कर रहे हैं, साक्षी भी वे ही हैं, साध्य साधक और साधना भी वे ही हैं। मुझे करने योग्य कुछ भी नहीं है, सब कुछ वे ही कर रहे हैं।
आप सब महान आत्माओं को नमन !
ॐ तत्सत् ! ॐ शिव! ॐ ॐ ॐ!!
कृपा शंकर
११ नवम्बर २०२४

भगवान से मेरा संबंध व्यक्तिगत है, मैं उन्हें कैसे भी पुकारूँ, यह मेरा निजी मामला है ---

भगवान के अनेक नाम हैं, जिनमें से कुछ हैं -- "हरिः", "दुःखतस्कर", और "चोरजारशिखामणी" आदि। इन सब का एक ही अर्थ होता है - "चोर"। वे अपने भक्तों के दुःखों, कष्टों और अभावों की इतनी चुपचाप चोरी कर लेते हैं कि भक्त को पता ही नहीं चलता। मुझे पता नहीं था कि भगवान डाका भी डालते हैं। भगवान ने मुझे भी नहीं छोड़ा, आज सुबह सुबह बहुत बड़ा डाका डाल दिया, और चोरी भी कर ली।

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आज प्रातःकाल भगवान का ध्यान कर रहा था, कि भगवान ने मेरे हृदय पर ही डाका डाल दिया, मुझे और मेरा सामान उठाकर बाहर फेंक दिया। साथ में वहाँ जमा हुआ सारा कचरा भी साफ कर के स्वयं वहाँ विराजमान हो गए।
मैंने कहा - भगवन् अब मैं कहा जाऊँ? मैं बहुत ही असहाय और धनहीन हूँ, मेरा कोई अन्य आश्रय नहीं है। भगवान ने कहा - "तुम मेरे हृदय में रहो।"
अब से मेरा धन, मेरा आश्रय, एकमात्र संबंधी और मित्र सिर्फ भगवान ही हैं। जीवन के अंत समय तक उन्हीं का रहूँगा। वे ही मेरे तीर्थ हैं, वे ही मेरे आश्रम हैं, और वे ही मेरी एकमात्र गति हैं।
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ये सब भाव-जगत की बातें हैं, जिन्हें भगवान के प्रेमी ही समझ सकते हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
११ नवंबर २०२२

Sunday, 10 November 2024

अगले पचास वर्षों बाद सम्पूर्ण विश्व में केवल सनातन धर्म ही होगा। पूरा विश्व ही एक राष्ट्र होगा ---

 अगले पचास वर्षों बाद सम्पूर्ण विश्व में केवल सनातन धर्म ही होगा। पूरा विश्व ही एक राष्ट्र होगा।

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सनातन को ही आजकल हिन्दू धर्म कहते है। सनातन और हिन्दुत्व में क्या भेद है? कुछ भी नहीं। पूरी सृष्टि ही सनातन धर्म से चल रही है। हम शाश्वत आत्मा है, जिसका स्वधर्म -- परमात्मा की प्राप्ति है। इसके दस लक्षण मनुस्मृति में दिए हैं, कणाद सूत्रों में जिसे परिभाषित किया गया है, वही सत्य सनातन धर्म है। वही हमारी रक्षा करेगा।
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धर्म एक ही है, वह सनातन है। अन्य सब मत और पन्थ हैं, जिन्हें हम रिलीजन और मजहब कहते हैं। धर्म वह है जिसे धारण किया जाता है। पन्थ और रिलीजन -- मान्यताओं पर आधारित होते हैं। मान्यता सनातन नहीं हो सकती, वह नश्वर है। केवल सनातन ही शाश्वत है। पूरा विश्व ही एक राष्ट्र होगा।
ॐ तत्सत्!! 🌹🍂💐🙏🕉️🙏💐🍂🌹
कृपा शंकर
१ अक्टूबर २०२४