Tuesday, 5 May 2020

होली का आध्यात्मिक महत्व और रहस्य :-----

होली का आध्यात्मिक महत्व और रहस्य :-----
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आध्यात्मिक साधना और मंत्र सिद्धि के लिए चार रात्रियों का बड़ा महत्त्व है| ये हैं .... (१)कालरात्रि (दीपावली), (२)महारात्रि (महाशिवरात्रि), (३)मोहरात्रि (जन्माष्टमी). और (४)दारुण रात्रि (होली)| इन रात्रियों को किया गया ध्यान, जप-तप, भजन ... कई गुणा अधिक फलदायी होता है| इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए| होली की कथा का ज्ञान तो सभी को होना चाहिए| हमारे समय तो पाठ्य पुस्तकों में होली का इतिहास पढ़ाया जाता था| पर उसे हिन्दू-द्रोह के कारण धर्म-निरपेक्षता के नाम पर अब हटा दिया गया है|
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हृदय में परमात्मा के प्रति परमप्रेम जागृत कर त्याग और तपस्या के द्वारा निज जीवन में भौतिक देह की चेतना से ऊपर उठने की साधना तो हमें नित्य करनी ही चाहिए| पर होली के अवसर पर अपने बुरे-अच्छे सारे कर्म और उनके फलों की आहुति कूटस्थ में जल रही परमात्मा की विवेकाग्नि में एक विशेष विधि से अर्पित कर देनी चाहिए, जिसके बारे में कभी लिखूंगा|
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हिरण्य का अर्थ है स्वर्ण यानि Gold, तथा कशिपु का अर्थ है मुलायम बिस्तर| यह हिरण्यकशिपु नाम का असुर स्वर्ण के पलंग पर मुलायम बिस्तरों में सोता था और सारी पृथ्वी का स्वर्ण इसने एकत्र कर रखा था| इसकी रुचि सिर्फ स्वर्ण और सुंदर स्त्रियों में थी| अमर होकर यह धूर्त इन्हीं का भोग करना चाहता था| इसने इस हेतु बड़ी कठोर तपस्या की और ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान मांगा| ब्रह्मा जी ने अमरता का वरदान देने में अपनी असमर्थता बताई तो हिरण्यकशिपु ने उनसे प्रार्थना की कि मैं किसी भी मनुष्य, पशु, देवता या ८४ लाख योनियों के अंतर्गत किसी भी जीव द्वारा न मारा जाऊँ| उसने यह प्रार्थना की कि मैं न तो पृथ्वी पर, न जल में, न ही किसी शस्त्र-अस्त्र से मरुँ| इस प्रकार मूर्खतावश हिरण्यकशिपु ने सोचा कि इन प्रबंधों द्वारा वह मृत्यु से बच जायेगा| उसके पुत्र प्रहलाद में इससे विपरीत गुण थे| वह भगवान का परम भक्त था| हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रहलाद को भगवान से विमुख करने के लिए कठोरतम यातनायें दीं| पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा| उसकी एक होलिका नामक बहिन थी जिसे अग्नि में न जलने की सिद्धि थी| हिरण्यकशिपु के आदेश से होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में प्रवेश कर गई| आश्चर्य! होलिका तो अग्नि में जल कर भस्म हो गई पर प्रहलाद का बाल भी बांका न हुआ| हिरण्यकशिपु ने पूछा कि क्या तुम्हारा भगवान इस अग्नि से गर्म हुए लौह-स्तंभ में भी है? प्रहलाद के हाँ कहने पर हिरण्यकशिपु ने उस लौह-स्तंभ पर अपनी गदा से प्रहार किया| उसे समय उस लौह स्तम्भ को फाड़कर नृसिह प्रकट हुए, उनका आधा शरीर सिंह का था और आधा मनुष्य का| बड़ी भयानक गर्जना उन्होनें की और हिरण्यकशिपु को बलात अपनी गोद में लिटाकर अपने नाखूनों से उसका वक्षस्थल विदीर्ण कर उसे मृत्यु प्रदान की|
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यह हिरण्यकशिपु ही फिर रावण और कंस के रूप में आया| वास्तव में वह हिरण्यकशिपु कभी मरा ही नहीं, आज भी लोभ और अहंकार के रूप में हम सब के भीतर बैठा हुआ है| उसको अपनी भक्ति द्वारा हटाना हमारा कार्य है| प्रह्लाद शब्द का अर्थ है आह्लाद, प्रसन्नता, और आनंद| हृदय में भक्ति होगी तो आनंद की प्राप्ति होगी|
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हम यह देह नहीं, शाश्वत आत्मा हैं| आत्म-विस्मृति सब दुःखों का कारण है| इन रात्रियों को अपने आत्म-स्वरुप यानि सर्वव्यापी परमात्मा का ध्यान यथासंभव अधिकाधिक करें| इन रात्रियों में सुषुम्ना नाड़ी में प्राण-प्रवाह अति प्रबल रहता है अतः निष्ठा और भक्ति से की गई साधना निश्चित रूप से सफल होती है| इस सुअवसर का सदुपयोग करें और समय इधर उधर नष्ट करने की बजाय आत्मज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म और राष्ट्र के अभ्युदय के लिए भी साधना करें| धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए एक विराट आध्यात्मिक ब्रह्मशक्ति के जागरण की हमें आवश्यकता है| यह कार्य हमें ही करना पड़ेगा| अन्य कोई विकल्प नहीं है|
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कर्मफलों से मुक्त कैसे हों? .....
जब तक लोभ और अहंकार का एक अणुमात्र भी हमारे अंतःकरण में है तब तक कर्मफलों से मुक्ति असंभव है| कर्म फलों को भस्म ही करना है तो अच्छे और बुरे दोनों को ही एक साथ करना होगा| प्राण-तत्व से जुड़ी हुई एक विधि है जिसका ज्ञान निष्ठावान साधकों को भगवान स्वयं करा देते हैं| सर्वप्रथम गीता में बताई हुई अव्यभिचारिणी अनन्य भक्ति को जागृत करें, तब आगे का कार्य भगवान स्वयं करेंगे|
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इस त्योहार को प्राचीन काल में नवान्नेष्टि पर्व के नाम से मनाया जाता था| यह नए अन्न का यज्ञ है| इस पर्व पर लोग विशाल सामूहिक यज्ञों का आयोजन किया करते थे| इस पर्व पर नया अन्न तैयार हो जाता है और नये कच्चे अन्न की बालों को भूनकर खाने से कफ-पित्त (जो इन दिनों में ज्यादा बढ़े होते हैं) जैसे रोग शांत होते हैं| चरकऋषि ने इस प्रकार के कच्चे अन्न को भूनकर खाने को ‘होलक’ कहा है जिसे आजकल होला कहते हैं| भारत अपने इस पर्व की ऐतिहासिकता, प्राचीनता, पावनता और वैज्ञानिकता को विश्व के समक्ष सही स्वरूप में स्थापित करने में असफल रहा है|
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इस अवसर पर एक बार गीता के आत्मसंयमयोग नाम के छठे अध्याय का स्वाध्याय करना चाहिए और कूटस्थ में भगवान का ध्यान करना चाहिए|
आप सब को नमन! होली की हार्दिक शुभ कामनाएँ!
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ मार्च २०२०

स्त्री और पुरुष दोनों एक ही गाडी के दो पहिये होते हैं .....

स्त्री और पुरुष दोनों एक ही गाडी के दो पहिये होते हैं| दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं| न तो स्त्री के बिना पुरुष रह सकता है और न पुरुष के बिना स्त्री| स्त्री जहाँ भाव प्रधान है, वहीं पुरुष विवेक प्रधान| मूल रूप से दोनों आत्मा हैं, आत्मा के कोई लिंग नहीं होता| भारत में स्त्रियों की स्थिति विदेशी आक्रमणों से पूर्व तक विश्व में सर्वाधिक सम्माननीय थी| भारत की नारियाँ विद्वान् और वीरांगणा होती थीं| भारत पर विदेशी आक्रमणकारी, पुरुषों को मार कर उनकी स्त्रियों का बलात् अपहरण कर लेते थे| आतताइयों द्वारा उन पर बहुत अधिक अत्याचार होता था| या तो वे बेच दी जाती या उन्हें घर में रखैल की तरह रख लिया जाता| इस कारण पर्दाप्रथा और बालविवाह का आरम्भ हुआ| जौहर की प्रथा क्षत्रानियों ने अपने मान सम्मान की रक्षा के लिए आरम्भ कीं|
अंग्रेजों ने अपनी सैनिक छावनियों के आसपास वैश्यालय स्थापित किये जहाँ वे भारतीय विधवाओं को बलात् अपहरण कर उन्हें वैश्या बना देते थे ताकि उनके अँगरेज़ सिपाही बापस अपने देश जाने की जल्दी न करें| इस कारण विधवा-दहन यानि सतीप्रथा का आरम्भ हुआ| जहाँ जहाँ अंग्रेजों की छावनियाँ थीं उनके आसपास के क्षेत्रों में ही विधवाएँ आत्मदाह कर लेती थी या उन्हें आत्मदाह के लिए बाध्य कर दिया जाता था| वहीं से सतीप्रथा का आरम्भ हुआ|
स्त्रियों पर अबसे अधिक अत्याचार यूरोप में ही हुए जहाँ डायन होने के संदेह में करोड़ों महिलाओं की ह्त्या कर दी जाती थी| भारत में स्त्रियों की दुर्दशा विदेशी आक्रमणकारियों के कारण ही हुई| पर अब भारत का पुनर्जागरण हो रहा है| पुरुषों के साथ साथ महिलाएँ भी प्रबुद्ध होंगी|
महिला उत्थान के नाम पर आज जहाँ स्त्री-पुरुष दोनों को एक-दूसरे के विरुद्ध खडा किया जा रहा है उसका मैं विरोध करता हूँ| दोनों मिलकर सहयोग और प्रेम से रहें और दोनों मिलकर अपने जीवन के परम लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त करें| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ मार्च २०२०

भक्ति करने का कर्ताभाव एक धोखा है ....

भगवान की भक्ति करने का कर्ताभाव एक धोखा है, भक्ति भी वे हैं, और भक्त भी वे स्वयं ही हैं, कहीं कोई भेद नहीं है .....
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एक प्रेमी के लिए प्रेम करने का भाव एक मायावी धोखा है| प्रेम के पात्र तो सिर्फ भगवान हैं, अन्य कोई नहीं| प्रेम भी वे है, और प्रेमी भी वे ही हैं| करुणावश वे स्वयं ही स्वयं को प्रेम कर रहे हैं| प्रेम का ही दूसरा नाम भक्ति है| यह भक्ति करने और भक्त होने का भ्रम अंततः एक धोखा ही है| हम तो हैं ही नहीं| जो कुछ भी है, वह वे भगवान स्वयं ही हैं| वे स्वयं ही स्वयं को याद करते हैं| वे स्वयं ही यह "मैं" बन गए हैं| हम तो एक निमित्त मात्र हैं| इस देह के अंत समय में भी हे भगवन, तुम स्वयं ही स्वयं को याद कर लेना| यह तुम्हारा ही वचन है ...
"अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम्|"
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हे मेरे उपास्य आराध्य देव, मैं तुम्हारा स्मरण/मनन/चिंतन/ध्यान करने में असमर्थ हूँ| तुम्हारी माया से पार पाना संभव नहीं है| तुम स्वयं ही यह जीवात्मा हो, अब तुम स्वयं ही इस जीवात्मा का उद्धार करो| मैं शाश्वत जीवात्मा, यह देह नहीं, फिर भी इसी की सुख-सुविधा और विलास में डूबा हुआ हूँ| इस की चेतना से निकलने में असमर्थ हूँ| अब तुम ही अनुग्रह करो| मैं तुम्हारी शरणागत हूँ| यह सर्वस्व बापस तुम्हें ही समर्पित कर रहा हूँ| मेरा लक्ष्य और गति तुम स्वयं हो| मैं इस मायावी विक्षेप और आवरण से जकड़ा हुआ हूँ, अब मेरी रक्षा करो| ये तुम्हारे ही वचन हैं ....
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते| अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम||"
"सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं| जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं||"
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते| तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||"
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्|
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्||"
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हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायण केशवा| गोविन्द गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदर माधवा||
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते| बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्||"
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"कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा| बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात्| करोमि यद्यत् सकलं परस्मै| नारायणायेति समर्पयामि||"
Whatever I perform with my body, speech, mind, limbs, intellect, or my inner self either intentionally or unintentionally, I dedicate it all to Thee.
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
८ मार्च २०२०

संक्षेप में नादानुसंधान .....

संक्षेप में नादानुसंधान .....
"नास्ति नादात परो मन्त्रो न देव: स्वात्मन: पर:| नानु सन्धात परा पूजा नहि तृप्ते: परम सुखं||"
There is no mantra superior to Nada and there is no other deity superior to Atma. No worship is superior to the worship of soul. स्थिर तन्मयता (Stable total identification) ही नादानुसंधान है|
मन्त्रयोग संहिता में आठ प्रमुख बीज मन्त्रों का उल्लेख है जो शब्दब्रह्म ओंकार की ही अभिव्यक्तियाँ हैं| लिंग पुराण के अनुसार ओंकार का प्लुत रूप नाद है| मन्त्र में पूर्णता "ह्रस्व", "दीर्घ" और "प्लुत" स्वरों के ज्ञान से ही आती है जिसके साथ पूरक मन्त्र की सहायता से विभिन्न सुप्त शक्तियों का जागरण होता है| वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक नाद, बिंदु और मुद्राओं व साधन क्रम का ज्ञान सद्गुरु ही करा सकता है|
बीजमंत्रों, अजपा-जप, षटचक्र साधना, योनी मुद्रा में ज्योति दर्शन, और नाद व ज्योति तन्मयता, खेचरी मुद्रा, साधन क्रम आदि का ज्ञान ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय सिद्ध गुरु की कृपा से ही हो सकता है| साधना में सफलता भी गुरु कृपा से ही होती है और ईश्वर लाभ भी गुरु कृपा से होता है| हम सब जीव से शिव बनें और परमात्मा में हमारी जागृति हो|
जब साधक को मेरुशीर्ष (खोपड़ी के पीछे का भाग) में प्रणव ध्वनि जिसे अनाहत नाद भी कहते हैं, सुननी आरम्भ हो जाए और ईश्वर लाभ के अतिरिक्त अन्य कोई कामना नहीं है तो अन्य बीज मन्त्रों के जाप की आवश्यकता नहीं है| फिर साधक इस ध्वनि को ही सुनता रहे और इसी का ही मानसिक जप करता रहे| इस ध्वनी को सम्पूर्ण सृष्टि में और उससे भी परे विस्तृत कर दे और अपने स्वयं के अस्तित्व को भी उसी में समर्पित कर दे| एक बार आँख खोलकर अपनी देह को देखो और यह भाव दृढ़ करो कि मैं यह शरीर नहीं हूँ, बल्कि मैं सम्पूर्ण अस्तित्व और उससे भी परे जो है वह सब मैं ही हूँ| अपने आप को उस पूर्णता में समर्पित कर दें| परमात्मा का परम प्रेम यह ओंकार की ध्वनि ही है और वह परम प्रेम जिससे यह सम्पूर्ण सृष्टि बनी है वह परम प्रेम मैं ही हूँ| जप करते हुए इस ध्वनी को सुनते रहें| मन में पूर्ण समर्पण का भाव हो यानि मैं यह देह नहीं बल्कि सर्व व्यापक ओंकार रूप परमात्मा का अमृत पुत्र हूँ, मै और मेरे प्रभु एक ही हैं| मैं उनसे पृथक नहीं हूँ|
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यह एक गुरुप्रदत्त ज्ञान है जो सदगुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है| यहाँ जो लिखा है वह मात्र पाठक की रुचि जागृत करने के लिए है| भगवान से प्रेम होगा तो वे गुरुरूप में भी आयेंगे और ज्ञान प्रदान करेंगे| ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
६ मार्च २०२०

मंदिरों का महत्व .....

मंदिरों का महत्व .....
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मंदिरों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता| उनकी पुनर्प्रतिष्ठा करनी ही पड़ेगी| मंदिर सामूहिक साधना के केंद्र हैं| जहाँ अनेक लोग साधना करते हैं वहाँ ऐसे स्पंदनों का निर्माण हो जाता है कि नवागंतुक की चेतना भी भक्ति से भर जाती है| उनकी स्थापत्य कला भी ऐसी होती है जहाँ सूक्ष्म दिव्य स्पंदनों का निर्माण और संरक्षण बहुत दीर्घकाल तक रहता है| मंदिरों में आरती व भजन पूजन, भक्तों के कल्याण के लिए होते है| विधिवत आरती के समय उपस्थित भक्तों के ह्रदय भक्ति से भर जाते हैं| ठाकुर जी कोे हमसे हमारे परमप्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| सारे कर्मकांड भक्ति जगाने के लिए हैं|
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मंदिरों में नियमित जाने से भक्तों का आपस में मिलना-जुलना होता है इससे उनमें पारस्परिक प्रेम बना रहता है| मंदिर का शिखर दूर से ही दिखाई देता है अतः इसे ढूँढने में कठिनाई नहीं होती| मंदिर के साथ धर्मशाला भी होती है ताकि आगंतुक वहां विश्राम कर सकें| प्रसाद के रूप में क्षुधा शांति की भी व्यवस्था होती है| अंग्रेजों के शासन से पूर्व मंदिरों के साथ साथ विद्यालय भी होते थे जहां नि:शुल्क शिक्षा दी जाती थी| अंग्रेजों ने ऐसे सभी विद्यालय नष्ट करवा दिए| मंदिरों के पुजारी व महंत धर्म-प्रचारक होते थे| हिन्दू साधू संतों के हाथ में ही मंदिरों की व्यवस्था होनी चाहिए| उन्हें फिर से धर्म-प्रचार के केन्द्रों के रूप में पुनर्प्रतिष्ठित करना ही पड़ेगा|
हरिः ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
६ मार्च २०२०

मंदिरों में आरती के समय जाने से हृदय में भक्ति जागृत होती है ----

मंदिरों में आरती के समय जाने से हृदय में भक्ति जागृत होती है ----
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किसी भी मंदिर में जहाँ ठाकुर जी की आरती विधि विधान से होती है, नियमित रूप से आरती के समय जाने पर हृदय में भक्ति निश्चित रूप से जागृत होती है| आरती के समय बजाये जाने वाले घंटा, घड़ियाल, नगाड़े व शंख आदि की ध्वनि अनाहत चक्र पर चोट करती है| अनाहत चक्र से ही आध्यात्म का आरम्भ होता है और वहीं भक्ति का जागरण होता है| अनाहत चक्र का स्थान है मेरु दंड में ह्रदय की पीछे थोडा सा ऊपर पल्लों (shoulder blades) के बीच में| जो साधक नियमित रूप से ध्यान करते हैं उन्हें अनाहत चक्र के जागृत होने पर ऐसी ही ध्वनि सुनती है जो ह्रदय में दिव्य प्रेम की निरंतर वृद्धि करती है| उसी ध्वनी की ही नक़ल कर भारत में आरती के समय मंदिरों में घंटा, घड़ियाल, नगाड़े व टाली आदि बजाने की परम्परा आरम्भ की गयी| मंदिरों में होने वाली घंटा-ध्वनि भी अनाहत चक्र को आहत करती है| फिर मंदिरों के शिखर आदि के बनाने की शैली भी ऐसी होती है कि वहाँ दिव्य स्पंदन बनते हैं और खूब देर तक बने रहते है| वहाँ जाते ही शांति का आभास होता है| बिना तुलसी-चरणामृत लिए प्रातःकाल कुछ भी आहार ग्रहण नहीं करना चाहिए| पूरे दिन प्रभु का स्मरण रखें| यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः प्रारम्भ कर दें|
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कभी ऐसे स्थान पर जाएँ जहाँ सरोवर हो या नदी के बहते हुए जल की ध्वनि आ रही हो, वहाँ विशुद्धि चक्र पर (कंठकूप के पीछे गर्दन के मूल में) ध्यान करना चाहिए| इससे विशुद्धि चक्र आहत होता है और चैतन्य के विस्तार की अनुभूति होती है| ऐसे स्थान पर गहरा ध्यान करने पर यह अनुभूति शीघ्र होती है कि आप यह देह नहीं बल्कि सर्वव्यापक चैतन्य हैं|
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आज्ञाचक्र पर ध्यान करते करते प्रणव की ध्वनि (समुद्र की गर्जना जैसी) सुननी आरम्भ हो जाती है तब उसी पर ध्यान करना चाहिए| मूलाधारचक्र पर भ्रमर या मधुमक्खियों के गुंजन, स्वाधिष्ठानचक्र पर बांसुरी कि ध्वनि, मणिपुरचक्र पर वीणा की ध्वनि, अनाहतचक्र पर घंटे,घड़ियाल,नगाड़े आदि की मिलीजुली ध्वनि, विशुद्धिचक्र पर बहते जल की ध्वनि, और आज्ञाचक्र पर समुद्र की गर्जना जैसी ध्वनि सुनाई देती है| इन ध्वनियों से इन चक्रों की जागृति भी होती है|
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साधना के लिए नीचे से ऊपर की ओर निम्न बीजमंत्रों का क्रमशः जाप करें| नीचे के तीन चक्रों पर कम समय दें और ऊपर के तीन चक्रों पर अधिक|
मूलाधार पर लं लं लं लं लं ......| स्वाधिष्ठान पर वं वं वं वं वं .....| मणिपुर पर रं रं रं रं रं .......| अनाहत पर यं यं यं यं यं .....| विशुद्धि पर हं हं हं हं हं .....| आज्ञाचक्र पर ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ .....| सहस्त्रार में स्थिति सद्गुरु की कृपा से ही होती है| चक्र जागरण का एकमात्र उद्देश्य है चेतना और भक्ति का विस्तार| कुण्डलिनी जागरण भी स्वतः ही होता है जो हमारी चेतना को ईश्वर की चेतना से संयुक्त कर देता है|
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साधना में सबसे बड़ी और पूर्ण आवश्यक है --- भक्ति| बिना भक्ति के आप कितनी भी यंत्रवत (mechanical) साधना कर लो, कुछ भी लाभ नहीं होगा|
लोग मुझसे प्रश्न करते हैं कि भक्ति से क्या लाभ होगा? यदि दो पैसे का लाभ हो तो भक्ति करें अन्यथा क्यों समय नष्ट करें| मैं पूरी गारंटी के साथ कहता हूँ कि भगवान की भक्ति से लाभ ही लाभ होगा| अधिकाँश लोगों के लिए ईश्वर तो एक साधन है और संसार साध्य| पर वास्तविकता इससे विपरीत है|
नारद भक्ति-सूत्र में नारद जी कहते हैं कि भगवान के भक्त अपने कुल, जाति का ही गौरव नहीं होते वल्कि पूरे विश्व को ही गौरवान्वित करते हैं| ऐसे दिव्य पुरुष संसार के प्राणियों में दयाभाव व सहिष्णुता बढ़ाकर जगत की वासना को शुद्ध करते हैं| ऐसे प्राणी धरती पर चलते फिरते भगवान हैं| वे जहाँ रहते हैं वह स्थान तीर्थ बन जाता है| भक्तों के पितृगण आनंदित होते हैं, देवता नृत्य करते हैं और यह पृथ्वी इनसे सनाथ हो जाती है|
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भक्ति के मार्ग में अग्रसर होने के लिए किसी शुभ समय की प्रतीक्षा न करें| अभी इसी समय से बढकर कोई और अच्छा समय है ही नहीं| अपने जीवन का केंद्रबिंदु परमात्मा को ही बनाएं, जीवन का हर कार्य उन्हीं की प्रसन्नता के लिए करें और उन्हीं को कर्ता, साक्षी और दृष्टा भी बनाएँ|
हरिः ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
६ मार्च २०२०

होली की दारुण रात्रि की तैयारी अभी से करें .....

होली की दारुण रात्रि की तैयारी अभी से करें .....
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सर्वप्रथम भगवान नृसिंह और भक्त प्रहलाद को नमन| उन की परम कृपा मुझ अकिंचन पर निरंतर बनी रहे| भगवान नृसिंह ने जिस तरह हिरण्यकशिपु को अपनी गोद में लेटाकर उसका वक्षस्थल विदीर्ण कर दिया था, वैसे ही वे मेरे लोभ व अहंकार रूपी हिरण्यकशिपु को मार डालें| कुछ बचे तो उन का प्रेम ही बचे, बाकी सब नष्ट हो जाये| असत्य का जो आवरण मुझे परमात्मा से दूर रखे हुए है, वह आवरण, इस नश्वर देह का बोध और इसकी चेतना भी नष्ट हो जाए| हमारे राष्ट्र भारतवर्ष के भीतर और बाहर के सभी शत्रुओं का नाश हो| भारतवर्ष में कहीं भी असत्य का अंधकार न रहे|
इस सुअवसर का सदुपयोग करें और समय इधर उधर नष्ट करने की बजाय आत्मज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म और राष्ट्र के अभ्युदय के लिए भी साधना करें| एक विराट आध्यात्मिक शक्ति के जागरण की हमें आवश्यकता है| यह कार्य हमें करना ही पड़ेगा| अन्य कोई विकल्प नहीं है|
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पुनश्चः आप सब को नमन और होली की शुभ कामनाएँ| ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
५ मार्च २०२०