Thursday, 29 May 2025

मेंरे से बाहर कोई समस्या नहीं है, सारी समस्या मैं स्वयं हूँ .....

 मेंरे से बाहर कोई समस्या नहीं है, सारी समस्या मैं स्वयं हूँ .....

यह समस्या अति विकट है| हे कर्णधार, इस समस्या का हल तुम्ही हो |
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"दीनदयाल सुने जब ते, तब ते मन में कछु ऐसी बसी है |
तेरो कहाये कै जाऊँ कहाँ, अब तेरे ही नाम की फ़ेंट कसी है ||
तेरो ही आसरो एक मलूक, नहीं प्रभु सो कोऊ दूजो जसी है |
ए हो मुरारी ! पुकारि कहूँ, मेरी नहीं, अब तेरी हँसी है ||"
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सभी समस्याएँ प्राणिक (Vital) और मानसिक (Mental) धरातल पर उत्पन्न होती हैं| उन्हें वहीं पर निपटाना होगा| पर वहाँ माया का साम्राज्य इतना प्रबल है जिसे भेदना हमारे लिए बिना हरिकृपा के असम्भव है|
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हमारी एकमात्र समस्या है ..... परमात्मा से पृथकता|
यह बिना शरणागति और समर्पण के दूर नहीं होगी| इस विषय पर बहुत अधिक लिख चुका हूँ, अब और लिखने की ऊर्जा नहीं है| परमात्मा का ध्यान और चिंतन भी सत्संग है| हमें चाहिए सिर्फ सत्संग, सत्संग और सत्संग|
यह निरंतर सत्संग मिल जाए तो सारी समस्याएँ सृष्टिकर्ता परमात्मा की हो जायेंगी|
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हे प्रभु, तुम्हारे चरणों में पूर्ण प्रीति बनी रहे इसके अतिरिक्त अब अन्य कोई इच्छा नहीं है| तुम्हें निवेदन तो कर दिया है पर यह अर्जी भी कभी ना कभी तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी| 'आशा' पिशाचिन नहीं पालना चाहता, अतः ना भी करें तो कोई बात नहीं|
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हे प्रभु, आप के भक्तों की आप से कोई पृथकता नहीं हो, आप के वे पूर्ण उपकरण हों, और आपसे पृथक वे अन्य कुछ भी ना हों|
जिस पर भी उन की दृष्टी पड़े वह परम प्रेममय हो निहाल हो जाये| वे जहाँ भी जाएँ वहीं आपके प्रेम की चेतना सब में जागृत हो जाये| आपकी उपस्थिति से जड़ वस्तु भी चैतन्य हो जाये|
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आप के भक्तों में किसी भी तरह का कोई आवेग ..... भूख, प्यास, विषाद, भ्रम, बुढ़ापा और मृत्यु ना हो| वे सब प्रकार की अवस्थाओं ---- जन्म, स्थिति, वृद्धि, परिवर्तन, क्षय और विनाश से परे हों|
हम सब आपके साथ एक हों और आपके पूर्ण पुत्र हों| आपकी जय हो|
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>>>> हम साधना करते हैं, मंत्रजाप करते हैं, पर हमें सिद्धि नहीं मिलती इसका मुख्य कारण है.... असत्यवादन| झूठ बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है और किसी भी स्तर पर मन्त्रजाप का फल नहीं मिलता| इस कारण कोई साधना सफल नहीं होती|
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>>>> सत्य और असत्य के अंतर को शास्त्रों में, और विभिन्न मनीषियों ने स्पष्टता से परिभाषित किया है| सत्य बोलो पर अप्रिय सत्य से मौन अच्छा है| प्राणरक्षा और धर्मरक्षा के लिए बोला गया असत्य भी सत्य है, और जिस से किसी की प्राणहानि और धर्म की ग्लानी हो वह सत्य भी असत्य है|
>>>> जिस की हम निंदा करते हैं उसके अवगुण हमारे में भी आ जाते हैं|
जो लोग झूठे होते हैं, चोरी करते हैं, और दुराचारी होते हैं, वे चाहे जितना मंत्रजाप करें, और चाहे जितनी साधना करें उन्हें कभी कोई सिद्धि नहीं मिलेगी|
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ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२९ मई २०१६

Wednesday, 28 May 2025

सन २०१६ में उज्जैन में हुआ सिंहस्थ कुम्भ

२०१६ में उज्जैन में हुआ सिंहस्थ कुम्भ हर दृष्टी से अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक था| इतनी शानदार और भव्य व्यवस्था आज तक किसी भी कुम्भ के ज्ञात इतिहास में नहीं हुई|
४५ डिग्री सेल्सियस का तापमान, भयंकर गर्मी व तेज धूप में मीलों दूर से पैदल चल कर आये श्रद्धालू, सबका लक्ष्य एक ही था .... क्षिप्रा में स्नान |
स्नान के समय अलौकिक अनुभूति और सब के चेहरों पर दिव्य प्रसन्नता और मुस्कान !
विदेशियों को यह देखकर घोर आश्चर्य हो रहा था कि भारत के लोग इतने प्रसन्न क्यों हैं| जिस खुशी के लिए वे विदेशी लाखों डॉलर खर्च कर के पूरी दुनिया में घूमते हैं, उससे अधिक खुशी तो भारतीयों को एक नदी में इस अवसर पर स्नान कर के ही मिल रही थी|
सफाई की इतनी कुशल व्यवस्था आज तक किसी भी मेले में नहीं देखी गयी| क़ानून-व्यवस्था, भीड़ पर नियंत्रण, सुरक्षा कर्मियों का सदव्यवहार, पीने के स्वच्छ जल की व्यवस्था, नदी में स्वच्छ जल, घाटों पर जीवन रक्षकों व मेडिकल कर्मचारियों की सजगता, सभी प्रशंसनीय और अभूतपूर्व थे|
व्यक्तिगत रूप से मुझे भी इतनी भयंकर गर्मी और भीड़ के पश्चात भी अति दिव्य अनुभूतियाँ हुईं, अनेक दिव्यात्माओं से मिलने का भी अवसर मिला| मैं भी सभी की तरह अति धन्य हूँ जिन्होंने इस कुम्भ में स्नान किया|
धन्य है श्रद्धालुओं की आस्था ! मध्यप्रदेश सरकार को भी धन्यवाद !
जय महाकाल ! ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
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(पुनश्च: --- दण्डी स्वामी मृगेंद्र सरस्वती महाराज की जय हो, जो कृपा कर के मुझे भी अपने साथ कुम्भ मेले में ले गये। वहाँ मेरे सपरिवार निवास, भोजन आदि की सारी व्यवस्था उनके शिष्यों ने की।)
२९ मई २०१६

Tuesday, 27 May 2025

एक प्रश्न :--- इंसानियत, मानवता, और मानवतावाद ..... इन शब्दों के क्या अर्थ हैं ?

 इंसानियत, मानवता, और मानवतावाद ..... इन शब्दों के क्या अर्थ हैं ?

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ये शब्द बड़े आकर्षक हैं पर भ्रामक हैं| दया, करुणा और सहायता करने की भावना ही इनका प्रचलित अर्थ है| इन शब्दों को हिंदी भाषा में सबसे पहले मैंने रूसी भाषा के साहित्यकार मैक्सिम गोर्की के कुछ साहित्य के हिंदी अनुवाद में पढ़ा था| मुंशी प्रेमचंद ने भी इन शब्दों का प्रयोग अपने साहित्य में किया है| अंग्रेजी में इनका अर्थ होता है ... the quality of being humane, benevolence, compassion, brotherly love, fellow feeling, humaneness, kindness, kind-heartedness, consideration, understanding, sympathy, tolerance, goodness, good-heartedness, gentleness, leniency, mercy, mercifulness, pity, tenderness, charity, generosity, magnanimity.
पर ये गुण किसी मनुष्य में हो सकते हैं, इसका विश्वास नहीं होता| क्या सचमुच आज के मनुष्य में उपरोक्त सब गुण हो सकते हैं? मेरे विचार से तो नहीं|
२८ मई २०१८

मेरे बहुत सारे मित्र अज्ञात में चले गये ---

 मेरे बहुत सारे मित्र अज्ञात में चले गये ---

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कुछ ने तो अपने आप को बेकार पाया, कुछ अपनों की उपेक्षा से व्यथित हो कर चले गये। दो-चार केवल वे ही बचे हैं जिन्होनें अपना जीवन राम जी को सौंप दिया, और इस सत्य को स्वीकार कर लिया कि -- "जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये।" उन बचे हुओं का भी कुछ पता नहीं है कि वे कहाँ कहाँ हैं।
राम नाम अंतिम सत्य है जिसे सब को स्वीकार करना ही होगा, चाहे रो कर करो चाहे हँसकर। अपेक्षाएँ कभी किसी की पूरी नहीं होतीं। अपेक्षाएँ ही सब दुःखों का मूल है। जीवन में अंततः मैंने उन्हीं को सुखी पाया जिन्होंने आध्यात्म की शरण ले ली। जब तक हाथ पैर चलते हैं, दिमाग काम करता है, मनुष्य को सम्भल जाना चाहिये। जय सियाराम !!
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२७ मई २०१४

यक्ष प्रश्न ---

यक्ष प्रश्न ---

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महाभारत में आता है कि सरोवर में जल लेने गये महाराज युधिष्ठिर को उस सरोवर में रहनेवाले यक्ष ने चार प्रश्न किये, और कहा कि उन चार प्रश्नों के उत्तर देने पर ही वह सरोवर का जल ले सकते हैं, अन्यथा नहीं| यक्ष के प्रश्नों के उत्तर न देने पर अन्य चारों पांडव मूर्छित हो चुके थे|
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यक्ष ने पूछा .... का वार्ता, किमाश्चर्यं, कः पन्था, कश्च मोदते ? इति मे चतुरः प्रश्नान् पूरयित्वा जलं पिब|
अर्थात् ...
(1) कौतुक करने जैसी क्या बात है ?
(2) आश्चर्य क्या है ?
(3) कौन सा मार्ग है ?
(4) कौन आनंदित रहता है ?
मेरे इन चार प्रश्नों के उत्तर देने के पश्चात् ही पानी पी सकते हो|
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महाराज युधिष्ठिर ने उत्तर दिया .....
(1) मासर्तुवर्षा परिवर्तनेन सूर्याग्निना रात्रि दिवेन्धनेन |
अस्मिन् महामोहमये कराले भूतानि कालः पचतीति वार्ता ||
अर्थात् ....
इस कराल मोह में, महिने, वर्ष इत्यादि के परिवर्तन से, सूर्यरुप अग्नि के इंधन से काल रात-दिन प्राणियों को पकाता है; यह कौतुक करने की बात है |
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(2) अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम् |
शेषा जीवितुमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ||
अर्थात् ....
प्रतिदिन कितने हि प्राणी यम मंदिर जाते हैं (मर जाते हैं), यह देखने के पश्चात भी शेष मनुष्य सदा जीवित रहना चाहते हैं| यह सबसे बड़ा आश्चर्य है|
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(3) "तर्को प्रतिष्ठः श्रुतया विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम्
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः स पन्थाः |"
अर्थात् ....
तर्कों से कुछ भी प्रतिष्ठित किया जा सकता है, श्रुति के अलग अलग अर्थ कहे जा सकते हैं, कोई एक ऐसा मुनि नहीं केवल जिनका वचन प्रमाण माना जा सके; धर्म का तत्त्व तो मानो निविड़ गुफाओं में छिपा है (गूढ है), इस लिए महापुरुष जिस मार्ग से गये हों, वही मार्ग जाने योग्य है |
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(4) दिवसस्याष्टमे भागे शाकं पचति गेहिनी |
अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते ||
अर्थात् .......
हे जलचर ! दिन के आठवें भाग में (सुबह-शाम रसोई के वक्त) जिसकी गृहिणी खाना पकाती हो, जिसके सर पे कोई ऋण न हो, जिसे (अति) प्रवास न करना पड़ता हो, वह मनुष्य (घर) सदा आनंदित होता है ।
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ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२८ मई २०१६

सब कुछ तो "वे" ही हैं ---

 सब कुछ तो "वे" ही हैं .....

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अंतर्चेतना में भगवान की जो छवि मेरे समक्ष है, वह इस जीवनकाल में ही नहीं, अनंतकाल तक बनी रहे, और यह पृथक अस्तित्व भी उसी में विलीन हो जाये| यह कोई कामना नहीं बल्कि हृदय की गहनतम अभीप्सा है|
भगवान कहते हैं .....
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया|
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्||६:२५||"
अर्थात् शनै शनै धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे| मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे||
शनैः शनैः धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को आत्मा में स्थित करके अर्थात् यह सब कुछ आत्मा ही है उससे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है, इस प्रकार मन को आत्मामें अचल करके अन्य किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे|
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मुमुक्षुत्व और फलार्थित्व .... दोनों साथ साथ नहीं हो सकते| जब मुमुक्षुत्व जागृत होता है तब शनैः शनैः सब कामनाएँ नष्ट होने लगती हैं, क्योंकि तब कर्ताभाव ही समाप्त हो जाता है| भगवान कहते हैं ....
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्| मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः||४:११||"
अर्थात् जो मुझे जैसे भजते हैं मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ| हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं||
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जहाँ राग-द्वेष और अहंकार है वहाँ आत्मभाव नहीं हो सकता| जो भगवान के लिए व्याकुल हैं, भगवान भी उन के लिए व्याकुल हैं| भगवान् कहते हैं ....
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||"
अर्थात् सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ| मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो||
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हम सब तरह की चिंताओं को त्याग कर भगवान में ही स्थित हो जाएँ, यही गुरु महाराज की शिक्षाओं का भी सार है| ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ मई २०२०

एक ऐसी बात है जिसे लिखने में मुझे कोई पीड़ा नहीं होनी चाहिए फिर भी दिल दुखी तो होता ही है ---

एक ऐसी बात है जिसे लिखने में मुझे कोई पीड़ा नहीं होनी चाहिए फिर भी दिल दुखी तो होता ही है| कोई मेरी बात से आहत होता है तो मैं पहिले ही क्षमा मांग लेता हूँ|

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कुछ हिन्दू कथावाचकों द्वारा हिन्दू विरोधी मतों के गुणगान से मुझे कुछ कुछ क्षोभ हुआ था और पूरे देश में लाखों हिंदुओं को गहरी ठेस पहुंची थी| पर मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं थी| इससे पहिले भी कई हिन्दू मठों और हिन्दू सन्यासियों द्वारा ईसाईयत व इस्लाम की और कुछ हिन्दू-द्रोही ईसाई नेताओं की बहुत ऊँची-ऊँची झूठी प्रशंसाओं से मैं कई बार आहत हो चुका हूँ| कई अधकचरे ज्ञान वाले विधिवत रूप से दीक्षित हिन्दू सन्यासी और साधू भी मिले हैं जिन के अधकचरे घटिया ज्ञान और उनके द्वारा विधर्मी मतों (ईसाईयत और इस्लाम) की की गई अधकचरी प्रशंसा सुन कर मैंने ऐसे लोगों की उपेक्षा ही करनी आरंभ कर दी| देश के कुछ प्रसिद्ध मठों में देवी काली की प्रतिमा के साथ साथ मदर टेरेसा की फोटो और देवी की तरह उनकी आरती भी होती हुई देखी है| जीसस क्राइस्ट की आरती देश के कई हिन्दू मठों में होती है|
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पहिले देश में कई नौटंकियाँ और नाटक मंडलियाँ हुआ करती थीं| वे लोग बहुत भले होते थे| वे पौराणिक पात्रों के सदगुणों और देश-रक्षक वीरों का महिमा-मंडन किया करते थे| आजकल वे नाटक-मंडलियाँ और नौटंकियाँ तो बंद हो गई हैं पर उनका स्थान कुछ कथावाचकों ने ले लिया है जिन का एकमात्र लक्ष्य पैसा व नाम कमाना है| सत्यनिष्ठ धर्म-प्रचारक तो बहुत कम बचे हैं|
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मुझे गर्व है कि मेरा बहुत उच्च कोटि के ज्ञानी और तपस्वी साधु-संतों से भी सत्संग हुआ है, पर यह ईश्वर की एक विशेष कृपा ही थी| अधिकांशतः तो नौटंकीबाज कालनेमी ही मिलते हैं| यह सत्य है|
आप सब को प्रणाम | धन्यवाद ||
27 May 2020