Friday, 18 April 2025

यह लेख मैं राष्ट्रहित में लिख रहा हूँ, इसमें कोई राजनीति नहीं है ....

 यह लेख मैं राष्ट्रहित में लिख रहा हूँ, इसमें कोई राजनीति नहीं है ....

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कश्मीर घाटी के वे लोग जो भारत के विरोध में हर अवसर पर और हर स्थान पर भारत विरोधी नारेबाजी और प्रदर्शन कर रहे हैं, संभवतः पाकिस्तान अधिकृत गुलाम कश्मीर की वास्तविकता से परिचित नहीं है| उन्हें यह भी नहीं पता होगा कि बाकी के पाकिस्तान के क्या हाल हैं|
भारत से बाहर मेरा अनेक देशों में अनेक पाकिस्तानियों से मिलना और विचार-विमर्श हुआ है और पाकिस्तान की मानसिकता को मैं खूब अच्छी तरह समझता हूँ| यहाँ मैं कुछ तथ्य प्रस्तुत कर रहा हूँ|
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पाकिस्तान में पंजाबी पाकिस्तानी सबसे अधिक दबंग और प्रभावशाली हैं| वे अपने सामने अन्य पाकिस्तानियों को कुछ भी नहीं समझते| पाकिस्तान की राजनीति में, सेना में और प्रशासन में उन्हीं का दबदबा है और वे अन्य प्रान्त के लोगों को बड़ी हीन दृष्टी से देखते हैं| आपस की बोलचाल में वे पंजाबी भाषा का ही प्रयोग करते हैं|
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भारत से गए लोगों की वहाँ कोई कद्र नहीं है, उनको मुहाजिर कहा जाता है और बड़ी नीची निगाह से देखा जाता है| पंजाबी लोग तो उन्हें अपने पास बैठाना भी पसंद नहीं करते|
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पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों को पंजाबी पाकिस्तानियों द्वारा आतंकित कर के और बहुत डरा धमका कर रखा हुआ है| वहां के कश्मीरियों के पास अपनी व्यथा व्यक्त करने के लिए कोई मंच नहीं है|
पाकिस्तान के सारे आतंकी प्रशिक्षण केंद्र गुलाम कश्मीर में हैं| उन आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों को चलाने वाले सारे पंजाबी पाकिस्तानी हैं|
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गुलाम कश्मीर में कोई विकास का कार्य नहीं हुआ है| बेरोजगार लोगों के लिए आतंकी बन जाना एक मजबूरी है| कश्मीरी लोग यदि पाकिस्तान में चले भी जाते हैं तो जीवन भर रोयेंगे| उनको यहाँ जो सुख सुविधा मिल रही है वह वहाँ एक दुःस्वप्न मात्र होगी| उनको वहाँ पाकिस्तानी पंजाबियों का गुलाम बनकर जीवन भर रहना होगा|
और भी कई बाते हैं, पर विस्तार भय से अधिक नहीं लिख रहा|
तथाकथित शांतिप्रिय भटके हुए कश्मीरी लोगों को भगवान सद्बुद्धि दे|
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पुनश्चः :....
श्रीनगर को सम्राट अशोक ने बसाया था|
जब चीनी यात्री ह्वैंसान्ग भारत आया था तो उसने कश्मीर में ढाई हज़ार से अधिक बौद्ध मठों का होना बताया था|
कश्मीरी शैव दर्शन वास्तविक कश्मीरियत है, इसका जन्म और विकास कश्मीर में ही हुआ|
पूरा कश्मीर अतीत में वैदिक शिक्षा का केंद्र रहा है|
आज से सात सौ वर्ष पूर्व तक कश्मीर में शत प्रतिशत हिन्दू थे| बौद्ध भी हिंदुत्व के ही भाग थे|
जब मंगोलों के आक्रमण मध्य एशिया पर हुए तब मध्य एशिया के अनेक मुसलमान शरणार्थी के रूप में कश्मीर में आये जिन्हें वहाँ के हिन्दू राजाओं ने शरण दी और आगे का इतिहास राजतरंगिनी में लिखा है|
आज जो कश्मीर के हिन्दुओं पर बीत रही है कल को वैसा ही योरोप में होगा| .
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आजकल योरोप में जो शरणार्थी जा रहे हैं वह योरोप पर एक ज़िहादी आक्रमण है| जो भारत के हिन्दू कश्मीरियों पर बीती है वही योरोप के मूल निवासियों पर बीतने वाली है| वह दिन दूर नहीं है जब पूरे योरोप पर इस्लामी शासन होगा|
यह कोई कल्पना नहीं एक वास्तविकता है|
१९ अप्रेल २०१६

जो स्वयं से पृथक है, उसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। जो स्वयं के साथ एक है, वही मुझे स्वीकार्य है ---

 जो स्वयं से पृथक है, उसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। जो स्वयं के साथ एक है, वही मुझे स्वीकार्य है।

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भगवान का जो भी रूप मेरे साथ एक है वही मुझे स्वीकार्य है, मैं उसी के प्रति समर्पित हूँ। भगवान कभी भी मुझ से दूर नहीं थे, इस जन्म से पूर्व भी मेरे साथ एक थे, और इस भौतिक शरीर की मृत्यु के बाद भी मेरे साथ एक रहेंगे। इस जन्म में वे ही माँ-बाप, सगे-संबंधी, शत्रु-मित्र और परिचित-अपरिचित के रूप में आये। मुझे किसी से भी जो भी प्रेम मिला है, वह भगवान का ही प्रेम था। वे हर समय मेरे साथ एक हैं। उनका साथ शाश्वत है। वे निकटतम से भी अधिक निकट, और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं। जब हम सर्वात्मभाव से एकता को देखते हैं, तब हम परमात्मा के साथ एक हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में उनका शाश्वत वचन है ---
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
He who sees Me in everything and everything in Me, him shall I never forsake, nor shall he lose Me.
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर १९ अप्रेल २०२५

Thursday, 17 April 2025

ईश्वर की प्राप्ति मेरा धंधा (व्यवसाय) है ---

 ईश्वर की प्राप्ति मेरा धंधा (व्यवसाय) है। इस व्यवसाय में कुछ मिलता नहीं है, जो कुछ भी पास में है, वह भी छीन लिया जाता है। इस धंधे में जो पड़ गया उससे कुछ भी अपेक्षा करना बेकार है।

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ईश्वर बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं। वे अपने प्रेमी से शत-प्रतिशत समर्पण मांगते हैं, उससे कम कुछ भी नहीं। अपने से पृथक कुछ भी चिंतन को श्रीमद्भगवद्गीता में उन्होंने व्यभिचार की संज्ञा दी है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिर्व्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- "अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
(Unswerving devotion to Me, by concentration on Me and Me alone, a love for solitude, indifference to social life;)
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भगवान क्या कहते हैं, इसे समझने के लिए इससे पूर्व के तीन श्लोकों को समझना भी अनिवार्य है ---
"अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥१३:८॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥१३:९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"आसक्तिर्णभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१३:१०॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- "अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम॥"
Humility, sincerity, harmlessness, forgiveness, rectitude, service of the Master, purity, steadfastness, self-control;
"इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन...৷৷"
Renunciation of the delights of sense, absence of pride, right understanding of the painful problem of birth and death, of age and sickness;
"आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता॥"
Indifference, non-attachment to sex, progeny or home, equanimity in good fortune and in bad;
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महाभारत के अनुशासन-पर्व के १५वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने महाराजा युधिष्ठिर को महर्षि तंडी कृत शिव-सहस्त्रनाम का उपदेश दिया है, उसमें भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उल्लेख किया है। यह उपदेश भगवान श्रीकृष्ण को महर्षि उपमन्यु से मिला था।
यहाँ केवल श्रीमद्भगवद्गीता की ही चर्चा करेंगे
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परमात्मा का आकर्षण बड़ा प्रबल है। बुद्धि इसे नहीं समझ सकती। उनकी अनुभूति इतनी दिव्य है कि उसकी तुलना नहीं की जा सकती। यह अनुभूति का विषय है, बुद्धि का नहीं; अतः इस पर चर्चा केवल मुमुक्षुओं से ही की जा सकती है। जिज्ञासु जन इस विषय का व्यावहारिक अनुसंधान करें। जो सिर्फ बुद्धि द्वारा ही समझना चाहते हैं, उन्हें भी बौद्धिक संतुष्टि तो मिलेगी ही। इस विषय को विस्तार से समझने के लिए शंकर भाष्य और अन्य भी दो-तीन भाष्यों का स्वाध्याय करें व भगवान से प्रार्थना और उन का ध्यान करें। हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ अप्रेल २०२५

Wednesday, 16 April 2025

हम शक्तिशाली होंगे तो हमारा सर्वत्र सम्मान होगा ----

हम शक्तिशाली होंगे तो हमारा सर्वत्र सम्मान होगा, डरपोक और डब्बू होंगे तो हर जगह सिर्फ मार खाएँगे, जिस तरह इस समय खा रहे हैं।

हिंदुओं को हर तरह की क्लीवता (नपुंसकता) को छोड़कर स्वयं अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण बनना पड़ेगा। दूसरों पर दोषारोपण कर के स्वयं के दब्बूपन, डरपोक होने, और कमजोरी को छिपाने से काम नहीं चलेगा। गीता में भगवान का आदेश है ---
"क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥२:३॥"
अर्थात् - हे पृथानन्दन अर्जुन ! इस नपुंसकता को मत प्राप्त हो; क्योंकि तुम्हारे में यह उचित नहीं है। हे परंतप ! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता का त्याग कर के युद्ध के लिये खड़े हो जाओ।
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अब कोई सिद्धांत या विचारधारा मुझे प्रभावित नहीं करती, क्योंकि मेरा लक्ष्य परमात्मा है; कोई सिद्धान्त या विचारधारा नहीं। सिर्फ सनातन धर्म ही ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताता है। अन्य सब पंथ भटकाव हैं। मेरा मार्ग स्पष्ट है, किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१७ अप्रेल २०२३

Tuesday, 15 April 2025

हमारी कोई भी बुराई हो, वह निज प्रयासों से कभी दूर नहीं होती, चाहे कितना भी हम प्रयास करें ---

 हमारी कोई भी बुराई हो, वह निज प्रयासों से कभी दूर नहीं होती, चाहे कितना भी हम प्रयास करें| इसके लिए भगवान का अनुग्रह चाहिए| वे तो इन सब से ऊपर उठने का उपदेश देते हैं, और मार्ग भी बताते हैं| सारी बुराइयाँ और अच्छाइयाँ हमारे अवचेतन मन में अनेक जन्मों के संस्कारों के रूप में छिपी होती हैं जो अवसर मिलते ही प्रकट हो जाती हैं| भगवान की परम कृपा का पात्र हमें बनना होगा जिसके लिए चाहिए ..... परमप्रेम, अभीप्सा और समर्पण|

गीता के अध्याय १८ "मोक्ष-सन्यास योग" का स्वाध्याय एक बार अवश्य करें|
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ अप्रेल २०२०

जब परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगे, तब सब नियमों से स्वयं को मुक्त कर परमात्मा का ही चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करना चाहिए।

हम नित्यमुक्त हैं। जब परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगे, तब सब नियमों से स्वयं को मुक्त कर परमात्मा का ही चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करना चाहिए।

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जब से सृष्टि की रचना हुई है, तब से इस वर्तमान क्षण तक, इतना मधुर और शुभ समय कभी भी नहीं आया। हर क्षण हम सृष्टिकर्ता परमात्मा के साथ एक हैं। चारों ओर आनंद ही आनंद है। हमारी चेतना हर समय पूरी सृष्टि के साथ एक है। पूरी सृष्टि भगवान का ध्यान कर रही है। मैं सारी सृष्टि में हूँ, और सारी सृष्टि मुझ में है। हे सच्चिदानंद परमशिव, तुम कितने सुंदर हो !!
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अब स्वाध्याय और बाहरी सत्संग छूट गया है। इनका कोई महत्व नहीं रहा है, क्योंकि निरंतर परमात्मा से सत्संग हो रहा है। अब परमात्मा के ही चिंतन, मनन, निदिध्यासन, प्राणायाम, ध्यान और समाधि में ही मन लगता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हठयोग के कुछ व्यायाम भी करने चाहियें। मैं मुक्त हूँ, किसी नियम से नहीं बंधा हूँ; मेरे लिए कोई नियम नहीं है। इस सृष्टि में कुछ भी निराकार नहीं है। जिसकी भी सृष्टि हुई है, वह साकार है। भगवान के साकार रूप ही मेरे चैतन्य में रहते हैं। यह जीवन अपने अंतिम क्षण तक साकार परमात्मा का ध्यान करते करते ही व्यतीत हो जायेगा।
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जब परमात्मा की अनुभूति होने लगे, तब परमात्मा का ध्यान ही करना चाहिए। पुस्तकों का अध्ययन और बाहरी सत्संग कभी कभी ही आवश्यक है, सदा नहीं। निरंतर परमात्मा का ही सत्संग हो। ज्ञान का स्त्रोत परमात्मा हैं, पुस्तकें नहीं। अगर आप कहीं जा रहे हैं और आप का लक्ष्य आप को दिखाई देना आरंभ हो जाये तो आपको "मार्ग-निर्देशिका" की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर आपका दृष्टि-पथ आपके लक्ष्य की ओर ही हो जाता है। फिर अपने लक्ष्य को व अपने पथ को ही निहारिये, अन्यत्र कहीं भी नहीं। हमारी प्रथम, अंतिम, और एकमात्र आवश्यकता -- परमात्मा है। वे मिल गए तो सब कुछ मिल गया, और जीवन तृप्त हो गया।
परमात्मरूप आप सभी को नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ अप्रेल २०२३ . पुनश्च: --- पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध की अंधकारमय रात्री में यदि कोई मुझसे पूछे कि ध्रुवतारा कहाँ है, तो मैं उसे अपनी अंगुली का संकेत कर के ध्रुव तारा और सप्तऋषिमण्डल दिखा दूंगा| एक बार उसने देख लिया और ध्रुवतारे की पहिचान कर ली तो फिर मेरी अंगुली का कोई महत्व नहीं है| यदि मैं यह अपेक्षा करूँ कि वह मेरे अंगुली का भी सदा सम्मान करे तो यह मेरी मूर्खता होगी| उत्तरी गोलार्ध की बात मैंने इस लिए की है क्योंकि ध्रुवतारा और सप्तऋषिमण्डल इस पृथ्वी पर भूमध्य रेखा के उत्तर से ही दिखाई देते हैं, दक्षिण से नहीं| जितना उत्तर में जाओगे उतना ही स्पष्ट यह दिखाई देने लगेगा| भूमध्य रेखा के दक्षिण से ध्रुव तारे व सप्तऋषिमण्डल को नहीं देख सकते|

जहाँ तक ईरान-इज़राइल युद्ध की बात है, इसमें नया कुछ भी नहीं है ---

 जहाँ तक ईरान-इज़राइल युद्ध की बात है, इसमें नया कुछ भी नहीं है। इस युद्ध की घोषणा तो ४५ वरसों पूर्व सन १९७९ में ईरान में इस्लामिक क्रांति के पश्चात सत्ता में आते ही ईरान के तत्कालिक मुल्ला-मौलवी शासकों ने कर दी थी। मैं उन दिनों बीबीसी लंदन से समाचार सुना करता था। यह बीबीसी के समाचारों में ही था कि सत्ता में आते ही ईरान के तत्कालीन शासनाध्यक्ष ने घोषणा की थी कि एक दिन वे इज़राइल को लाल-सागर में दफन कर देंगे।

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हालांकि यहूदीयत, ईसाईयत, और इस्लाम --- तीनों मज़हबों का आरंभ हज़रत इब्राहिम (Prophet Abraham) अलैहिस्सलाम से हुआ है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बड़े बेटे हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम के खानदान में हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हुए जिनसे इस्लाम की शुरुआत हुई। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के छोटे बेटे हज़रत इसाक अलैहिस्सलाम से यहूदी मज़हब चला। उन्हीं के खानदान में जन्म लिए हज़रत ईसा ने ईसाई मज़हब चलाया।
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जैसे एक ही खानदान के लोगों में दुश्मनी हो जाती है, वैसे ही यहूदियों और मुसलमानों में शुरू से ही खानदानी दुश्मनी है। इस विषय पर अधिक लिखना उचित नहीं है। जिन को रुचि है वे इंटरनेट से विकिपीडिया पर जाकर पढ़ सकते हैं।
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इज़राइल को जन्म देने के लिए ही इंग्लैंड ने प्रथम विश्व युद्ध में अपने मित्र देशों की सहायता से सल्तनत-ए-उस्मानिया को हराया और उस उस्मानिया सल्तनत के चालीस टुकड़े कर के चालीस नए देश बना दिये, जिन में इज़राइल भी है। उस्मानिया-सल्तनत के अंतिम वर्षों के इतिहास को पढे बिना इस विषय को समझना कठिन है।
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पुनश्च: --- सल्तनत-ए-उस्मानिया के प्रमुख को खलीफा कहते थे। सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) के ३६ वें खलीफा सुल्तान महमूद (छठा) वहिदेद्दीन को कमाल अतातुर्क ने अपदस्थ कर के तुर्की से इटली और फिर फ्रांस भगा दिया था। उसका बेटा अब्दुल मजीद (द्वितीय) २३ अगस्त १९४४ को पेरिस में निर्वासित जीवन जीता हुआ मर गया| भारत में महात्मा गांधी ने इसी अब्दुल मजीद को बापस तुर्की की राजगद्दी दिलाने के किए खिलाफत आंदोलन शुरू किया था जिससे बहुत अधिक हानि हुई| पाकिस्तान की नींव भी इसी आंदोलन से पड़ी। और भी कई बातें हैं जिन्हें पूर्व में लिख चुका हूँ। और अधिक लिखने का अब धैर्य नहीं है।
कृपा शंकर
१६ अप्रेल २०२४