Friday, 21 March 2025

मैं इस समय परमशिव से उधार मांगा हुआ जीवन जी रहा हूँ ---

 मैं इस समय परमशिव से उधार मांगा हुआ जीवन जी रहा हूँ ---

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स्वयं की व धर्मपत्नी की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण आध्यात्मिक लेखन लगभग बंद है। जगन्माता ही कृपा कर के कुछ न कुछ नित्य लिखवा देती हैं। अभी इस समय परमशिव से उधार मांगा हुआ जीवन जी रहा हूँ। उनकी उधार उतारनी बाकी है। परमशिव स्वयं ही यह जीवन जी रहे हैं। जीवन का हर क्षण उन्हीं का है। जगन्माता का ही एक रूप -- कुंडलिनी के रूप में जागृत है, जो कभी कभी मेरुदंड, मस्तिष्क व इस भौतिक देह से बाहर के सभी चक्रों को भेद कर सूक्ष्म जगत की अनंतता से भी परे परमशिव को नमन कर बापस लौट आती हैं। लेकिन चेतना वहीं परमशिव में ही रहती है। मुझे निमित्तमात्र बनाकर भगवान अपनी उपासना स्वयं करते हैं। सारी महिमा उन्ही की है, मुझ अकिंचन की कुछ भी नहीं।
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आज से नवरात्र आरंभ है, जो भगवती के तीन रूपों -- महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की आराधना का पर्व है। तीनों का समाहित रूप दुर्गा है। अज्ञान की तीन ग्रंथियाँ हैं -- रुद्रग्रन्थि (मूलाधारचक्र), विष्णुग्रन्थि (अनाहतचक्र) और ब्रह्मग्रन्थि (आज्ञाचक्र) जिनका भेदन महाकाली महालक्ष्मी और महासरस्वती के बीज मंत्रों से होता है, जो नवार्ण मंत्र में दिए हुए हैं। भगवान श्रीकृष्ण की त्रिभंग मुद्रा भी अज्ञान की इन तीनों ग्रंथियों का बोध कराती हैं जिनका भेदन षड़चक्रों में भागवत मंत्र का जप करके भी किया जा सकता है।
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हमारा मन जब मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्रों में रहता है तब हमारे में धर्म की ग्लानि होती है। हर श्वास में ईश्वरप्रणिधान का सहारा लेकर आज्ञाचक्र तथा सहस्त्रारचक्र, व उससे भी ऊपर उठना धर्म का अभ्युत्थान है। आज्ञाचक्र और उस से ऊपर धर्मक्षेत्र है, उसके नीचे कुरुक्षेत्र।
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आध्यात्मिक रूप से श्रीगुरुचरणों में जब एक बार भी हमारे सिर का नमन हो जाता है, तब हमारा सिर फिर बापस कभी नहीं उठता, झुका ही रहता है। यदि सिर बापस उठ गया है तो इसका अर्थ है कि सिर कभी झुका ही नहीं था।
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गुरु का साथ शाश्वत है। साधना में सिद्धि मिलते ही हम गुरु के साथ एक हो जाते हैं। कहीं पर किसी भी तरह का कोई भेद नहीं रहता। श्रीगुरु चरणों में हम अर्पित कर ही क्या सकते हैं? अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) के सिवाय हमारे पास और है ही क्या? इसे पूरी तरह श्रीगुरुचरणों में अर्पित कर देना चाहिए।
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सहस्त्रारचक्र में दिखाई दे रही ज्योति - श्रीगुरु महाराज के चरण-कमल हैं। उस ज्योति का ध्यान श्रीगुरुचरणों का ध्यान है। उस ज्योति-पुंज का प्रकाश "श्रीगुरुचरण सरोज रज" है, जिस में हमारा मन लोटपोट करे, और भगवान का स्मरण, चिंतन और ध्यान भी करता रहे। तभी चार फलों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
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सहस्त्रारचक्र में स्थिति श्रीगुरुचरणों में आश्रय है। खेचरी-मुद्रा -- श्रीगुरुचरणों का स्पर्श है। जिन्हें खेचरी-मुद्रा सिद्ध नहीं है, वे साधनाकाल में जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखें, और आती-जाती श्वास के प्रति सजग रहें। श्री श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय द्वारा सिखाई हुई तालव्य-क्रिया के नियमित अभ्यास से खेचरी मुद्रा सिद्ध होती है।
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'श्री' शब्द में 'श' का अर्थ है श्वास, 'र' अग्निबीज है, और 'ई' शक्तिबीज। श्वास रूपी अग्नि और उसकी शक्ति ही 'श्री' है। श्वास का संचलन प्राण तत्व के द्वारा होता है। प्राण तत्व -- सुषुम्ना नाड़ी में सोम और अग्नि के रूप में संचारित होता है। श्वास उसी की प्रतिक्रिया है। जब प्राण-तत्व का डोलना बंद हो जाता है तब प्राणी की भौतिक मृत्यु हो जाती है।
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संध्याकाल -- दो श्वासों के मध्य का संधिकाल "संध्या" कहलाता है जो परमात्मा की उपासना का सर्वश्रेष्ठ अबूझ मुहूर्त है। हर श्वास पर परमात्मा का स्मरण होना चाहिए, क्योंकि परमात्मा स्वयं ही सभी प्राणियों के माध्यम से साँसें ले रहे हैं। हर श्वास -- एक जन्म है; और हर प्रश्वास -- एक मृत्यु।
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यह मनुष्य देह इस संसार सागर को पार करने की नौका है, गुरु कर्णधार हैं, व अनुकूल वायु -- परमात्मा का अनुग्रह है। हम सदा परमात्मा की चेतना में रहें। ब्रह्मरंध्र से परे की अनंतता से भी परे -- परमशिव हैं। वहाँ स्थित होकर जीव स्वयं शिव हो जाता है। मेरुदंड में विचरण कर रहे प्राणों का घनीभूत रूप "कुण्डलिनी महाशक्ति" है, जिसका परमशिव से मिलन ही योग है। हमारा मन सदा "श्रीगुरु-चरण-सरोजरज" में लोटपोट करता रहे। फिर जो करना है, वह स्वयं परमात्मा ही करेंगे।
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शुभ कामना किन्हें दूँ? कोई अन्य है ही नहीं। जिधर देखता हूँ, उधर मैं स्वयं हूँ। स्वयं में ही डुबकी लगा रहा हूँ। यह सारा दृश्य, दृष्टि और दृष्टा मैं हूँ। मैं, मेरे उपास्य परमशिव के साथ एक हूँ, वे ही उपासक हैं, और वे ही उपासना हैं। परमशिव ही भगवान श्रीहरिः हैं, वे ही वासुदेव हैं, उनसे अन्य कुछ भी नहीं है।
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (गीता)
अर्थात् -- बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ मार्च २०२३

अपने लक्ष्य परमात्मा को कभी भी एक क्षण के लिए भी मत भूलो ---

 अपने लक्ष्य परमात्मा को कभी भी एक क्षण के लिए भी मत भूलो ---

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इस जीवन में मैनें बड़े बड़े महात्माओं के मुख से जितने भी सत्संग सुने हैं, और जितनी भी साधनानाएं की हैं, उन सब का सार यह है कि अपने लक्ष्य परमात्मा को कभी भी एक क्षण के लिए भी मत भूलो। हर समय उन्हें अपनी स्मृति में रखो। गुरु परंपरा में भी यही सीखा है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीक़ृष्ण भी यही कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
भावार्थ --- अन्तकाल की भावना ही अन्य शरीर की प्राप्ति का कारण है, इसलिये तूँ हर समय मेरा स्मरण कर और शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्मरूप युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझ वासुदेव में जिस के मनबुद्धि अर्पित हैं, ऐसा तू मुझ में अर्पित किये हुए मनबुद्धि वाला होकर मुझको ही अर्थात् मेरे यथाचिन्तित स्वरूप को ही प्राप्त हो जायगा। इसमें संशय नहीं है।
हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग अनेक बार किया है। कूटस्थ -- एक अनुभूति है। "ब्राह्मी स्थिति" भी एक अनुभूति है। जब इनकी अनुभूति हो जाये तब इन्हीं की चेतना में रहना चाहिए। बंद आँखों के अंधकार के पीछे हर समय भगवान अपने ज्योतिर्मय रूप में निरंतर रहते हैं। अब तो आँखें खुली हों या बंद हों, वे हर समय हमारे समक्ष रहें।
"जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे॥"
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ मार्च २०२४

"रथस्थं वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते" ---

 "रथस्थं वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते" ---

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इस शरीर रूपी रथ में सदा जो सूक्ष्म आत्मा को देखता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता| यह बुद्धि का नहीं बल्कि अनुभूति का विषय है जिसे अनुभूतियों द्वारा ही समझा जा सकता है| इसका अर्थ वही समझ सकता है जो कूटस्थ में ज्योति, अक्षर और स्पंदन के लय को सदा अनुभूत करता है| इसे लययोग भी कहते हैं| अपना संपूर्ण ध्यान ब्रह्मरंध पर केंद्रित करके ब्रह्म में लीन हो जाना "लय योग ध्यान" है| इसमें नादानुसन्धान, आत्म-ज्योति-दर्शन और कुण्डलिनि-जागरण करना पड़ता है| इसे किसी सिद्ध गुरु से ही सीखना चाहिए, हर किसी से नहीं|
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हम झूले में ठाकुर जी को झूला झुला कर उत्सव मनाते हैंं, यह तो प्रतीकात्मक है| पर वास्तविक झूला तो कूटस्थ में है जहाँ सचमुच आत्मा की अनुभूति --- ज्योति, नाद व स्पंदन के रूप में होती है| तब सौ काम छोड़कर भी उस में लीन हो जाना चाहिए| यह स्वयं में एक उत्सव है| ज्योति, नाद व भगवत-स्पंदन की अनुभूति होने पर पूरा अस्तित्व आनंद से भर जाता है जैसे कोई उत्सव हो| यही ठाकुर जी को झूले में डोलाना है ---
'दोलारूढं तु गोविन्दं मञ्चस्थं मधुसूदनम् । रथस्थं वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥'
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गीता में भगवान कहते हैं .....
"आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन| मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते||८:१६||"
अर्थात् हे अर्जुन ब्रह्म लोक तक के सब लोक पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं| परन्तु हे कौन्तेय मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता||
जिसमें प्राणी उत्पन्न होते और निवास करते हैं, उसका नाम भुवन है| ब्रह्मलोक ब्रह्मभुवन कहलाता है| भगवान के अनुसार ब्रह्मलोक सहित समस्त लोक पुनरावर्ती हैं| अर्थात् जिनमें जाकर फिर संसार में जन्म लेना पड़े ऐसे हैं| परंतु केवल भगवान के प्राप्त होनेपर फिर पुनर्जन्म नहीं होता|
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तंत्र शास्त्रों में इसे दूसरे रूप में समझाया गया है....
"पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा, यावत् पतति भूतले| उत्थाय च पुनः पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते||" (तन्त्रराज तन्त्र).
अर्थात् पीये, और बार बार पीये जब तक भूमि पर न गिरे| उठ कर जो फिर से पीता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता|
यह एक बहुत ही गहरा ज्ञान है जिसे एक रूपक के माध्यम से समझाया गया है| यह क्रियायोग विज्ञान है| आचार्य शंकर ने "सौंदर्य लहरी" के आरम्भ में ही भूमि-तत्त्व के मूलाधारस्थ कुण्डलिनी के सहस्रार में उठ कर परमशिव के साथ विहार करने का वर्णन किया है| विहार के बाद कुण्डलिनी नीचे भूमि तत्त्व के मूलाधार में वापस आती है| बार बार उसे सहस्रार तक लाकर परमेश्वर से मिलन कराने पर पुनर्जन्म नहीं होता|
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को सादर साष्टांग दंडवत् !!
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवाते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२१ मार्च २०२१

बंद आँखों के अंधकार के पीछे कूटस्थ चैतन्य में ज्योतिषांज्योतिः भगवान स्वयं हैं ---

 बंद आँखों के अंधकार के पीछे कूटस्थ चैतन्य में ज्योतिषांज्योतिः भगवान स्वयं हैं| कभी वे त्रिभंग-मुद्रा में, कभी पद्मासन में, कभी ज्योतिर्मय ब्रह्म, कभी पञ्चमुखी महादेव, कभी परमशिव आदि-आदि के रूप में व्यक्त होते हैं| सारी महिमा उन्हीं की है| अपना रहस्य वे स्वयं ही अनावृत कर सकते हैं, हमारे में उतना सामर्थ्य नहीं है| उनकी जय हो!!

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गीता कहती है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः| यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम||१५:६||"
श्रुति भगवती कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः|
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति||"
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टिप्पणी :-- यहाँ मैंने जिस "ज्योतिषांज्योतिः" शब्द का प्रयोग किया है, वह "शिवसंकल्पसूक्त" के प्रथम मंत्र से लिया है| वह मंत्र इस प्रकार है --
"यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति| दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु||"
मूलमंत्र में इसका भावार्थ भिन्न है| लेकिन यहाँ मैंने परमात्मा के लिए इस शब्द का प्रयोग किया है, क्योंकि वे मन के स्वामी हैं, और सभी प्रकाशों के प्रकाश हैं|
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ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२१ मार्च २०२१

Thursday, 20 March 2025

"सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म" से प्रार्थना ---

 "सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म" से प्रार्थना ---

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हे परमप्रेममय सर्वव्यापी ब्रह्म, आप एकमात्र सत्य, ज्ञान और अनंत हो। मैं आप के साथ एक हूँ। आपकी आरोग्यकारी उपस्थिति सभी प्राणियों के अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) में निरंतर व्यक्त हो रही है। आप सच्चिदानंद (सत् चित्त आनंद) हैं। सारी सृष्टि आपका एक संकल्प है। आप स्वयं ही यह विश्व हो। आप प्रेम और आनंद के रूप में सर्वत्र व्याप्त हो।
ॐ ॐ ॐ !!
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"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् - आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसार के परम आश्रय हैं। आप ही सब को जानने वाले, जानने योग्य और परमधाम हैं। हे अनन्तरूप ! आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।
आप वायु (अनाहतचक्र), यम (मूलाधारचक्र), अग्नि (मणिपुरचक्र), वरुण (स्वाधिष्ठानचक्र) , चन्द्रमा (विशुद्धिचक्र), प्रजापति (ब्रह्मा) (आज्ञाचक्र), और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी कारण) (सहस्त्रारचक्र) हैं; आपके लिए सहस्र बार नमस्कार, नमस्कार है, पुन: आपको बारम्बार नमस्कार, नमस्कार है॥
हे अनन्तसार्मथ्य वाले भगवन्! आपके लिए अग्रत: और पृष्ठत: नमस्कार है, हे सर्वात्मन्! आपको सब ओर से नमस्कार है। आप अमित विक्रमशाली हैं और आप सबको व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप सर्वरूप हैं॥
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कहीं कोई पृथकता का बोध न रहे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२१ मार्च २०२३

कोई भी आध्यात्मिक साधना हो, उसमें "सत्यनिष्ठा" और "श्रद्धा" से ही सफलता मिलती है ---

कोई भी आध्यात्मिक साधना हो, उसमें "सत्यनिष्ठा" और "श्रद्धा" से ही सफलता मिलती है। बिना सत्यनिष्ठा और श्रद्धा के कुछ भी नहीं मिलता, चाहे कितने भी जप-तप और अनुष्ठान कर लो। आने वाले कल से आरंभ होने वाले भारतीय नववर्ष (संवत्सर/वर्ष प्रतिपदा) और नवरात्र घट-स्थापना की मंगलमय शुभ कामनायें।

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आज मंगलवार २१ मार्च को सूर्य पृथ्वी की भूमध्य रेखा पर था जिसके कारण उत्तरी गोलार्ध में भारत में महाबसंत विषुव (Equinox) है, जिसका अर्थ -- दिन और रात की अवधि लगभग बराबर रहती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर २३½° झुके हुए, सूर्य के चक्कर लगाती है, इस प्रकार वर्ष में एक बार पृथ्वी इस स्थिति में होती है जब वह सूर्य की ओर झुकी रहती है, व एक बार सूर्य से दूसरी ओर झुकी रहती है। वर्ष में दो बार ऐसी स्थिति आती है, जब पृथ्वी का झुकाव न सूर्य की ओर होता है, और न ही सूर्य से दूसरी ओर, बल्कि बीच में होता है। इस स्थिति को विषुव या Equinox कहा जाता है। इन दोनों तिथियों पर दिन और रात की लंबाई लगभग बराबर होती है।
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भारतीय नव वर्ष और चैत्र नवरात्र कल २२ मार्च २०२३ से आरंभ हो रहे हैं।
घट-स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त आप अपने स्थानीय पारिवारिक पंडित जी से पूछ सकते हैं। नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। अनेक श्रद्धालु इस दिन भगवान श्रीराम और हनुमान जी की आराधना भी करते हैं।
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जहां तक मेरा प्रश्न है, जगन्माता अपने जिस भी रूप की साधना करवा देगी, वही ठीक है। मेरी कोई आकांक्षा नहीं है।
कृपा शंकर
21 मार्च 2023

आध्यात्म में भगवान से कोई मांग नहीं होती, केवल समर्पण ही होता है ---

 आध्यात्म में भगवान से कोई मांग नहीं होती, केवल समर्पण ही होता है ---

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मेरे विचार अधिकांश श्रद्धालुओं से नहीं मिलते, इसलिए मुझे भीड़ से दूरी में ही आनंद मिलता है। जिन से मेरे विचार मिलते हैं, उनका थोड़ा-बहुत सत्संग आनंददायक होता है। मेरी मान्यता भगवान से कुछ मांगने की नहीं, बल्कि अपना सर्वस्व उन्हें समर्पित करने की ही है। भगवान से कुछ मांगना मेरे लिए संभव नहीं है। यदि भगवान से कुछ मांगना ही है तो उनकी अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति ही मांगनी चाहिए, अन्य कुछ भी भगवान से मांगना, भगवान का अपमान है।
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शिवभक्ति के संस्कार पूर्व जन्म से ही हैं। शिव को मैं सीमित नहीं कर सकता। ध्यान-साधना में सहस्त्रार से ऊपर का भाग खुल जाता है, अतः ध्यान-साधना सूक्ष्म-जगत की अनंतता से भी परे के एक परम आलोकमय जगत में होती है, जहाँ स्वयं भगवान परमशिव हैं। कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन, और परमशिव का साक्षीभाव से ध्यान मेरी आध्यात्मिक साधना है। कुछ निषेधात्मक कारणों से कुंडलिनी महाशक्ति के बारे में सार्वजनिक मंचों पर चर्चा नहीं की जा सकती। इस विषय की चर्चा का अधिकार गुरु-परंपरा के भीतर ही है, बाहर नहीं।
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सारी प्रेरणा मुझे श्रीमद्भगवद्गीता से मिलती है। मेरे सारे संशयों का निवारण भी श्रीमद्भगवद्गीता से ही हुआ है। अतः गीता-पाठ और शिव पूजा -- साधना के भाग हैं। कर्ता के रूप में तो भगवान स्वयं है। वे ही साध्य, साधक और साधना हैं। भगवान से कुछ मांगना, भगवान का अपमान है; अतः मैं भगवान से कुछ मांग नहीं सकता। जो कुछ भी सामान मेरे पास है, वह सब उन्हें समर्पित है। पूर्व-जन्म की स्मृतियाँ कभी कभी जागृत हो जाती थीं, अब उन्हें पूरी तरह भुला दिया है। भगवान की अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी भगवान से मांगने योग्य नहीं है।
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"अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥१३:८॥"
"इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥१३:९॥"
"असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१३:१०॥"
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
"अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥१३:१२॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् --
अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम॥
इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन॥
आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।।
अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है॥
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आज के स्वाध्याय के लिए गीता के उपरोक्त पाँच श्लोक ही पर्याप्त हैं। भगवान से कोई मांग नहीं, बल्कि स्वयं को उन्हें पूर्णतः समर्पित करें।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२१ मार्च २०२४